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जब आपका दिल साफ होता है तो जीवन कितना रंगमय बन जाता है

भारत मे होली भरपूर मस्ती का त्यौहार होकर एक अत्यंत लोकप्रिय अवसर हैं| लोग चन्दन और रंगीन जल से होली खेलते हैं | यह त्यौहार मार्च महीने के शुरुवात में मनाया जाता है| लोगो की मान्यता है कि चमकदार रंग ऊर्जा, जीवन और आनंद को दर्शाते है | उत्सव के रूप में संध्या में विशाल होलिका दहन की जाती है |

रंगमय जीवन के लिये होली की शुभकामनाये !!!
सफेद या श्वेत सरल और शुद्ध है !!!!
रंग जीवन की जटिलता है | 
जब आपका दिल साफ होता है तो जीवन कितना रंगमय बन जाता है |
--- श्री श्री                           

जीवन पूर्णता रंगमय होना चाहिए ! प्रत्येक रंग को स्पष्ट दिखना चाहिए और उसका अलग से आनंद लेना चाहिए, और यदि सारे रंगों को यदि मिला दिया जाये तो वह वे सब काले रंग के दिखेंगे |सारे रंग जैसे लाल,पीला,हरा इत्यादि आस पास होना चाहिए और उसी समय उनका आनंद एक साथ लेना चाहिए |
उसी तरह जीवन मे एक व्यक्ति द्वारा निभायी गयी विभिन्न भूमिकाये उसके भीतर शांतिपूर्ण और प्रत्यक्ष रूप से आस्तित्व मे होनी चाहिए | उदाहरण के लिए यदि कोई पिता कार्यालय में भी पिता की भूमिका निभाने लगेगा तो फिर बातों का बिगड़ना निश्चित हैं| हमारे देश में राजनीतिज्ञ कई बार पहले पिता होते हैं, फिर बाद में नेता होते है|

हम जिस किसी भी परिस्थिति मे हो, हमें उसके अनुरूप सफलतापूर्वक उस भूमिका को निभाना चाहिए, फिर जीवन का रंगमय होना तय है | इस संकल्पना को प्राचीन भारत मे वर्णश्रम कहते थे | इसका अर्थ था हर कोई यदि वह चिकित्सक, अध्यापक, पिता जो कोई भी या जो कुछ भी हो उसे अपनी भूमिका को पूर्ण उत्साह से निभाना चाहिये | किसी भी दो व्यवसाय के मिलाप से हमेशा उचित परिणाम नहीं मिलते है | यदि किसी चिकित्सक को व्यापार करना है तो वह उसे अलग से करना होगा और अपने व्यवसाय से अलग रखना होगा और अपने चिकित्सिक व्यवसाय को व्यापार नहीं बनाना होगा | मन के इन भावो को अलग और भिन्न रखना ही सफल और आनंदमय जीवन का रहस्य है और होली हमें यही सिखाती है|

सारे रंग सफेद रंग से उत्पन्न होते है और यदि उन्हें फिर से मिला दिया जाए तो वह काला रंग बन जाते है | जब आपका मन श्वेत या साफ होता है और चेतना शुद्ध, शांतिपूर्ण,प्रसन्न और ध्यानस्थ होती है, तो फिर विभिन्न रंग और भूमिकाये प्रकट होने लगती है | फिर किसी भी विपरीत परिस्थिति के विरुद्ध हमें हर भूमिका को इमानदारी से निभाने की शक्ति मिलती है |हमें समय समय पर अपनी चेतना की गहन अनुभूति करनी चाहिए | यदि हम अपने भीतर को देखते हुए हमारे बहारी रंगों या भूमिकयो को निभाएंगे तो सब कुछ निरर्थक प्रतीत होना निश्चित है | इसलिए हर भूमिका को इमानदारी से निभाने के लिए दो भूमिका के मध्य मे गहन विश्राम होना चाहिए | गहन विश्राम पाने मे सबसे बड़ी बाधा इच्छा होती है | इच्छा का अर्थ तनाव है |यहाँ तक छोटी इच्छाये भी बड़ा तनाव उत्पन्न करती है | बडे लक्ष इसकी तुलना में कम परेशानी देते है| कई बार इच्छाये मन को परेशान करती है |

इसलिये किसी ने क्या करना चाहिये ?
इसका सिर्फ यह उपाय है कि इच्छा पर केंद्रित होकर उसे समर्पित कर दीजिये |सजगता पर केंद्रित होने का कृत्य या इच्छा या काम पर दृष्टि को कामाक्षी कहते है |सजगता के साथ इच्छा अपनी पकड़ छोड़ देती और समर्पण संभव हो जाता है और फिर उसमे से अमृत प्रवाहित होता है कामाक्षी देवी अपने एक हाथ में गन्ने की डंठल को पकड़ी हुई है और उनके दुसरे हाँथ में फूल है | गन्ने की डंठल इतने कड़ी होती है कि उसकी मिठास पाने के लिए उसे निचोडना पड़ता है जबकि फूल इतना कोमल होता है कि उससे अमृत निकालना सरल है | वास्तव में यही जीवन है जिसमे दोनो का थोडा थोडा मिश्रण है | भीतर के परमानन्द को प्राप्त करना ज्यादा सरल है बहारी दुनिया के सुखों को हासिल करने की तुलना में जिसके लिये अधिक प्रयासों की आवश्यकता होती है |

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अपनी आत्मा को आनंद के रंगों से विकसित करो

सोमवार, १ मार्च, २०१०

होली, रंगों का त्योहार है। ये विश्व रंगमय है। प्रकृति की तरह, हमारी भावनायें भी रंगों से संबंधित हैं। लाल रंग, क्रोध से संबंधित है। ईर्ष्या, हरे रंग से संबंधित है। उत्साह और आनंद, पीले रंग से संबंधित है। प्रेम, गुलाबी रंग से संबंधित है। नीला रंग, व्यापकता से संबंधित है। सफ़ेद रंग, शांति से संबंधित है। केसरिया रंग, बलिदान का द्योतक है। बैंगनी रंग ज्ञान का द्योतक है। हर व्यक्ति रंगों का एक फ़व्वारा है, जिसमें की रंग बदलते रहते हैं।

पुराणों में कई रंगबिरंगे दृष्टांत और कथायें आती हैं। उन में होली के संबंध में एक कथा है।

एक असुर राजा, हिरण्याकश्यप, चाहता था कि सब उसकी पूजा करें। परंतु उसका पुत्र, प्रह्लाद, श्री नारायण का भक्त था। हिरण्याकश्यप श्री नारायण के प्रति शत्रुता का भाव रखता था। क्रोध में आकर हिरण्याकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को मिटाने के लिये कहा। होलिका के पास ऐसी विद्या थी कि वो अग्नि का ताप सह सकती थी। वह जलती हुई लकड़ियों के ढेर में प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ गई। परंतु प्रह्लाद को अग्नि से कोई हानि नहीं हुई, जबकि, होलिका जल कर मिट गई।

हिरण्याकश्यप मोटी बुद्धि का प्रतीक है। प्रह्लाद, निष्पाप, सरलता, विश्वास और आनंद का प्रतीक है। आत्मा को केवल पदार्थों के प्रेम में नहीं बांधा जा सकता। हिरण्याकश्यप की आनंद की खोज केवल पदार्थों में थी। पर वो उसे प्राप्त नहीं कर सका। एक जीवात्मा, हमेशा के लिये पदार्थों के प्रेम में बंध कर नहीं रह सकती। जीव का नारायण की ओर, अपने उच्चतम स्वरूप की ओर बढ़ना स्वाभाविक है।

होलिका अतीत के संस्कारों का प्रतीक है। उन पूर्व संस्कारों के बोझ का जो प्रह्लाद की स्वाभाविकता(innocence) को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। प्रह्लाद की नारायण भक्ति दृढ़ होने की वजह से वह अपने पूर्व संस्कारों को भस्म कर सका।

जब व्यक्ति भक्ति में दृढ़ हो तो उसके जीवन में आनंद के कई रंग उभर कर आते हैं। जीवन एक उत्सव बन जाता है।

पूर्व संस्कार भस्म कर के तुम एक नई शुरुआत के लिये तैयार होते हो। अग्नि की ही तरह भावनायें तुम्हें जलाती हैं। परंतु जब ये भावनायें रंगों के फ़व्वारे की तरह हों तो जीवन में रस आता है। अज्ञानता में भावनायें परेशानी का कारण बनती हैं। ज्ञान में वही भावनायें जीवन को रंगीन बनाती हैं।

एक कथा है, जब पार्वती तपस्या में थी, और शिव समाधि में, तब शिव और पार्वती के दिव्य मिलन के लिये कामदेव ने प्रयत्न किया। शिव नें कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। शिव को पार्वती से मिलन के लिये समाधि से बाहर आना पड़ा। पर्व का अर्थ है, त्योहार। पार्वती का अर्थ है जिसका जन्म पर्व से हुआ, उत्सव।

समाधि और उत्सव के मिलन हेतु कामना आवश्यक थी। इसलिये, कामदेव का आह्वाहन किया गया। परंतु उत्सव मनाने के लिये कामना से ऊपर उठने की आवश्यकता है। इस कारण शिव ने तीसरा नेत्र खोल कर कामना को जला कर भस्म कर दिया। जब मन में कामना खत्म होती है तब जीवन में उत्सव होता है। जीवन रंगमय हो जाता है।

होली की ही तरह जीवन भी रंगमय होना चाहिये, उदास नहीं। जब हर रंग अलग अलग दिखाई दे, तो जीवन रंगमय दिखता है। अगर सब रंगों को मिला दो, तो काला रंग हो जाता है। इसी प्रकार, जीवन में भी हम विभिन्न भूमिकायें निभाते हैं। हर भूमिका और भावना को परिभाषित करने की आवश्यकता है। भावनात्मक भ्रम से समस्यायें जन्म लेती हैं।
जब तुम पिता हो, तो तुम्हें पिता की भूमिका अदा करनी है। दफ़्तर में तुम पिता की भूमिका में नहीं रह सकते। जीवन में जब तुम अपनी भूमिकाओं का मिश्रण कर लेते हो, तो भूल हो जाती है। तुम जिस भी भूमिका में हो, उसे पूरी तरह निभाओ। विविधता में एकता जीवन को जीवंत, आनंदमय और रंगमय बनाती है।
जीवन में तुम जिस आनंद की अनुभूति करते हो, वो तुम्हारे भीतर से ही आता है -- जब तुम सब पर अपनी पकड़ छोड़ कर अपने भीतर के आकाश में केन्द्रित हो जाते हो। इसे ध्यान कहते हैं। ध्यान कोई विशेष क्रिया नहीं है। कुछ ना करने की कला ही ध्यान है! ध्यान में जो विश्राम मिलता है, वो गहरी से गहरी नींद के विश्राम से अधिक है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ध्यान में तुम सब कामनाओं से ऊपर उठ जाते हो। इस से दिमाग को ठंडक मिलती है और शरीर और मन को पूर्ण विश्राम।

तभी हम आत्मा की उच्च अवस्था का अनुभव कर सकते हैं और ये देख पाते हैं कि समस्त विश्व आत्मा या चेतना ही है। उत्सव आत्मा का सहज स्वभाव है। मौन से जिस उत्सव का जन्म हो, वही सच्चा उत्सव है। अगर उत्सव के साथ पवित्रता का समागम हो जाये, तो वो पूर्ण-उत्सव है, जिसमें केवल शरीर और मन ही नहीं, आत्मा भी उत्सव मनाती है।

उत्सव के उत्साह में अक़्सर ही मन दिव्यता को भूल जाता है। हमें दिव्य शक्ति की उपस्थिति और अपने इर्द-गिर्द उसके दिव्य प्रकाश को अनुभव करना चाहिये। तुम में उस तत्व को अनुभव करने की इच्छा होनी चाहिये जिसकी शक्ति से पूरी दुनिया चल रही है। पूरे मन से ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये। अगर प्रार्थना करते समय तुम्हारा मन कहीं और बंटा है, तो ये प्रार्थना नहीं है।

जब तुम समस्याओं से घिरे हो, तो गहरी प्रार्थना से चमत्कार हो सकता है। प्रार्थना दो ही स्थिति में, यां इन दोनों स्थितियों के समन्वय में होती है। जब तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, या बिल्कुल असहाय। कृत्ज्ञता ना होने पर
तुम दुख अनुभव करते हो। कृतार्थ भाव तुम्हें किसी भी असफलता के धक्के से बाहर ले आयेगा। एक बार तुम ये जान लेते हो कि तुम कृपा के पात्र हो, तुम्हारी शिकायतें, बड़बड़ाहट, असुरक्षित होने की भावना, सभी दूर हो जाती हैं।

सहज ही जीवन एक रंगमय उत्सव हो जाता है।


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तृप्त होने के लिए विज्ञान और ज्ञान दोनो चाहिए

कोलकता (भारत), १२ फ़रवरी २०१०

रुद्र पूजा शुरु करने से पहले, श्री श्री ने शिव तत्व और शिवरात्रि का सार बताया:

आइये हम सब शिव तत्व के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं। थोड़ा ही जान सकते हैं। इसे समझने के लिए बुद्धि को संतुष्ट और शुद्ध भावनाओं का उदय करने की ज़रुरत है।

हमें विज्ञान और ज्ञान, दोनों से तृप्त होना है। ईश्वर की खोज के लिये लंबी तीर्थयात्राओं पर जाना आवश्यक नहीं है। जहां तुम हो, वहां तुम्हें ईश्वर की प्राप्ति न हो, तो कहीं और भी नहीं हो सकती। जब मन लीन हो जाता है, वही शिव है। जहां तुम हो, वहीं स्थिर हो जाओ। जैसे ही तुम अपने भीतर के केन्द्र में स्थिर हो जाते हो, तुम ईश्वरीय दिव्य शक्ति को हर जगह पाते हो। यही ध्यान है।
शिव का एक नाम विरूपाक्ष है। इसका अर्थ है कि वह निराकार है, परंतु सब को देख रहा है। हम जानते हैं कि वायु हमारे इर्द गिर्द सभी जगह व्याप्त है। हम वायु को महसूस कर सकते हैं।अगर वायु भी हमको महसूस करने लगे, तो? हम आकाश तत्व से घिरे हैं, और उसे पहचानते हैं। अगर आकाश भी तुम्हें देखने और महसूस करने लगे, तो? ऐसा होता है। बस, हम इसके प्रति सजग नहीं है। विज्ञान की भाषा में इसे Theory of Relativity कहते हैं। देखने की प्रक्रिया में दृष्य और दृष्टा, दोनों पर कुछ प्रभाव पड़ता है। ईश्वर की दिव्य शक्ति चारों ओर से तुम्हें देख रही है। ये निराकार दिव्य शक्ति है। ये निराकार तत्व ही सृष्टि के अस्तित्व का मूल है और लक्ष्य भी। दृष्टा भी वही है, दृष्टि और दृश्य भी। ये निराकार दिव्य शक्ति शिव है। इस तत्व को अपने भीतर जगाना और इसे अनुभव करना ही शिवरात्रि है।

आमतौर पर उत्सव के जोश में हम होश खो देते हैं। शिवरात्रि उत्सव में गहन विश्राम के साथ सजगता का समन्वय है। शिवरात्रि में हम सजगता के साथ विश्राम करते हैं। कहा गया है कि जब सब सो रहे हों, तब भी योगी सचेत रहता है। एक योगी के लिये हर दिन शिवरात्रि है। भगवान शिव की व्याख्या आदि शंकराचार्य ने बड़े सुन्दर भाव से इन पंक्तियों में की है... (श्री श्री उनमें से कुछ पंक्तियां गाते हैं।)
आदिय्न्तहीनं – जिस का ना आदि है ना अंत। भोलेनाथ, जो सभी लोगों के भोले नाथ हैं। और सर्वदा सभी जगह उपस्थित हैं। हम सोचते हैं कि शिव गले में सर्प डाल कर कहीं बैठे हैं। ऐसा नहीं है। यह केवल चित्रकारों की एक कल्पना है। शिव वो है जिस में सृष्टि का जन्म हुआ है, जिसमें इस समय सब मौजूद हैं, और जिसमें सृष्टि लीन होती है। तुम जगत में जितने भी आकार देखते हो, सब उसी शिव के आकार हैं।

समस्त सृष्टि में शिव समाये हैं। शिव अजन्मा है, और उनका अंत भी नहीं है। शिव चेतना की चौथी अवस्था हैं; तुरीया अवस्था, ध्यान की अवस्था - जो जाग्रत, सुषुप्त और स्वप्नावस्था से ऊंची है।

ये अद्वैत चेतना सब जगह उपस्थित है। इसीलिये शिव की पूजा शिवमय होकर करनी चाहिये। चिदानंदरूप – शिव सत चित आनंद है।

तपोयोगम्य – जिसे तप और योग से जाना जा सकता है। शिव तत्व को वेदों के ज्ञान में अनुभव किया जा सकता है, शिवोहं (मैं शिव हूं), शिवकेवल्योहं (केवल शिव ही है) की अवस्था तक जीव पंहुच जाता है।

शिवरात्रि का दिन आनंद और संतोष के अनुभव के लिये है। योग के बिना शिव तत्व का अनुभव नहीं हो सकता। योग का अर्थ केवल योगासन नहीं है। योग का अर्थ है शिव तत्व की अनुभूति जो प्राणायाम और ध्यान से होती है - जब हम भीतर से ‘वाह’ अनुभव करते है।

शंभो शब्द भी उसी मूल से आया है – ये अनुभव करना कि दिव्यता, यह सृष्टि, और अपना खुद का स्वरूप कितना सुंदर है! ये एक आश्चर्य है कि वही दिव्य चेतना इस जगत के हरेक जीव के भीतर है! इससे बड़ा कोई आश्चर्य नहीं है। वह एक अनेक कैसे बना? शिवरात्रि हमें अनेक से एक की ओर ले जाती है। इसके लिये योग और ध्यान आवश्यक हैं। ध्यान के बिना मन शांत नहीं होता।

भजन और ध्यान शिवरात्रि के उत्सव का अंग हैं। पूर्ण हृदय से सभी इस में सहभागिता करते हैं। सभी को गाना चाहिये।

शिव सभी कारणों के कारण हैं। शिव के कारण ही सब हो रहा है। शिव के कारण ही सब है – पेड़ उग रहे हैं, सूर्योदय हो रहा है, हवा चल रही है...हर कार्य का कारण शिव है। शिव के बिना कुछ नहीं होता।
पंचमुख यां पंचतत्व – शिव के पांच मुख हैं – जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश। इन पांच तत्वों को जानना तत्वज्ञान है।
फिर शिव की उपासना अष्टमूर्ति (आठ आकारों) में होती है – मन, चित्त और अहंकार इसी में आते हैं। यह शिव का साकार और निराकार रूप हुआ।

शिव की उपासना का अर्थ है, शिव तत्व में लीन होकर शुभ कामना करना। क्या कामना करें? उदार हृदय से विश्व के कल्याण के लिये कामना करें। कोई दुखी ना रहे। सर्वे जनः सुखिनो भवन्तु।
हां, इस मौके पर एक संकल्प कर सकते हो। ऐसा संकल्प जो तुम्हारी सांस की तरह, तुम्हारे हृदय की धड़कन की तरह बार बार तुम्हारे ज़हन में आये। जब तुम ऐसा संकल्प दिव्य शक्ति को समर्पित करते हो, तो वह अवश्य पूरा होता है।

हम प्रकृति की भी उपासना करते हैं। इस धरती पर जो कुछ भी है, उसमें दिव्य शक्ति का समावेश है। वृक्ष, पहाड़, नदियां, पृथ्वी और उस पर रहने वाले सब लोग - इन सब का आदर किये बिना पूजा पूर्ण नहीं होती। सब का सम्मान करना, दक्षिणा है। दा का अर्थ है, देना। दक्षिणा का अर्थ है, जिसे देने से हमारे भीतर की अपवित्रता दूर हो जाती है। दक्षिणा के बिना पूजा अधूरी है।
जब हम समाज में दक्षता से, और मन की भ्रांतियों से मुक्त होकर कार्य करते हैं, तो नकरात्मक वृत्तियां, जैसे क्रोध, चिंता और दुख नष्ट हो जाते हैं।

मैं कहूंगा अपनी समस्यायें, चिंता और दुख, मुझे दक्षिणा में दे दो। ये कैसे होता है? साधना, सेवा और सत्संग (सत्य का संग) से।


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"हमारी वाणी में मिठास हो"

बैंगलोर आश्रम, भारत

हमारी वाणी में मिठास हो
भारत में आज संक्रान्ति का त्यौहार है। पूरे देश के किसान यह उत्सव मनाते हैं। दक्षिण भारत में इसे ’पोंगल’ कहते हैं। लोग आपस में तिल और गन्ना बाँटते हैं।
पुराने समय में जब पैसे का चलन नहीं था तो लोग आपस में सामान बदलते थे। जैसे बादाम के बदले सेब, चावल के बदले गन्ना। इस तरह से पूरे विश्व में कुछ लेन देन चलता रहता था।
आज के दिन भी वैसा ही व्यव्हार चलता है। ज़्यादातर लोग मिठाई बाँटते हैं। इस इच्छा के साथ कि इस वर्ष हम अपनी वानी में मिठास लाएँ, और ज्ञान की बात करें।
कई जगह ऐसा कहते हैं:
तिलगुड़ खाया,
गुड़ गुड़ बोला।

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"मन की आनंदित और जागृत अवस्था के बीच चैतन्य विश्राम करता है। "

बैगलोर आश्रम, ३ सितम्बर २००९

प्रश्न: कई बार सुख की इच्छा और पुरानी याद की वजह से मैं गलतियां दोहराता हूं। इससे ऊपर कैसे उठूं?

श्री श्री रवि शंकर: इससे ऊपर उठने के तीन उपाय हैं। सबसे पहले, अपने आप को याद दिलाओ कि पूर्व भी तुम्हें इसकी वजह से कितना कष्ट उठाना पड़ा था। हर बार सुख की लालसा से तुम्हें दुख ही मिला है। यां तो खुद पर बीते अनुभव याद करो यां दूसरों के अनुभव से सीख लो।

दूसरा उपाय है, सर्वोत्तम आनंद की एक झलक भर पा लो। बिना प्रयत्न के जो सुख प्राप्त होता है, वो प्रयत्न से प्राप्त सुख से श्रेष्ठ है।

तीसरा उपाय है, अपने आप को व्यस्त रखो। जब तुम व्यस्त रहोगे तो सुख का लालच छिपा रहेगा, यां उसका बीज अंकुरित नहीं होगा।

प्रश्न: अनंत पद्म चतुर्दशी का क्या महत्व है, और कलाई पर लाल धागा बांधने का क्या उद्देश्य है?

श्री श्री रवि शंकर: अनंत पद्म चतुर्दशी का त्यौहार अनंत को मनाने का उत्सव है। (अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत पद्मनाभ स्वामी (भगवान विष्णु) की पूजा होती है।)

जीवन का उच्चतम ध्येय है अनंत का अनुभव करना। बिना अनंत के अनुभव के मनुष्य जीवन पशु के जीवन के समान है। आत्मा की अनंतता की एक झलक मात्र पा जाने से जीवन में बदलाव आ जाता है। सभी साधक इसके ज़रिये ही साधक बनते है - ध्यान में साधक अनंत की एक झलक का अनुभव कर लेते हैं।

चित्रकार ने भगवान विष्णु को क्षीर सागर (दूध के सागर) पर नाग के बिछौने पर विश्राम करते हुये दिखाया है। मन की आनंदित स्थिति क्षीर सागर है, जहाँ संतोष की लहरे हिलोरे लेती हैं। नाग, मन की जागृत अवस्था का प्रतीक है - कुण्डलिनी शक्ति जो कि हमारे भीतर है। मन की आनंदित और जागृत अवस्था के बीच, चैतन्य विश्राम करता है। इसकी तीन परते हैं। दूध के सागर का अर्थ है कि वातावरण अनुकूल है। वातावरण के अनुकूल होने पर ही समाधि संभव है। शास्त्रों का अध्य्यन मनन करने के लिये भी ये आवश्यक है कि वातावरण में कोई व्यवधान ना हो। अगर आस-पास भूकंप यां बाढ़ आई हो, तो कोई बैठ कर शास्त्र का पाठ, यां ज्ञान की चर्चा नहीं करेगा। इसीलिए क्षीर सागर अनुकूल वातावरण का प्रतीक है।

जब तक ज्ञान का गहराई से अनुभव ना हो, वह ज्ञान सतही रहता है। जितना चाहे कोई वेदांत का अध्य्यन कर ले, पर बिना अनुकूल वातावरण के...।

जब कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठती है, तब हमारे भीतर जो चैतन्य शक्ति है, जो अनंत है, उसी का राज हो जाता है। उस अनंत शक्ति की नाभि से बिना किसी प्रयास के ही कमल का प्रागट्य हो जाता है। इसी तरह सृजन शक्ति का जन्म हुआ।

चैतन्य के आनंदित स्वरूप से सृजन शक्ति का उदय होता है। बड़े से बड़े वैज्ञानिकों ने विश्राम करते हुये ही नये अविष्कार किये हैं।

शोधकर्ताओं के लिये ये परम आवश्यक है कि उनका वातावरण अनुकूल हो - कोई शोर या व्यवधान ना हो। आप किसी से दो दिन में कोई नया अविष्कार करने को नहीं कह सकते हैं। अविष्कार, समय के बंधन से परे है, और प्रतिकूल वातावरण में नहीं हो सकता है।

नाभि को दूसरा मस्तिष्क भी कहा जाता है। इस तरह, हमारे शरीर में दो मस्तिष्क हैं। एक तो सिर है, और दूसरा है नाभि। इसे मणिपुर चक्र (solar plexus) कहते हैं। दिमाग जो कार्य करता है, मणिपुर चक्र उसकी सहायता करता है। आधा कार्य तो मणिपुर चक्र ही करता है। इसीलिये, जब पेट अस्वस्थ होता है, तो अक्सर दिमाग में उथल पुथल होती है, मन में बहुत सारे विचार होते हैं।

इसलिये कहा गया है कि योग साधना से मणिपुर चक्र खिल उठता है। जो लोग योग साधना नहीं करते, उनका मणिपुर चक्र एक आमले के आकार का होता है। जब कुण्डलिनी शक्ति विकसित हो, तो मणिपुर चक्र का आकार एक संतरे से भी बड़ा हो जाता है - एक खिले हुये कमल के फूल की तरह।

धागा एक बहुत बढ़िया प्रतीक है। भारत में हर महीने कोई ना कोई उत्सव होता है। जिसका उद्देश्य है किसी ना किसी तरह उत्सव मना कर चेतना को ऊँचा उठाना। कुछ लोग व्रत करते है, कुछ लोग पूजा करते हैं, और एक प्रतीक के रूप में एक धागे में १४ गांठ लगा कर कलाई में बांधते हैं। हमारे देश में, पूर्णिमा के एक दिन पहले यां बाद में अक्सर कोई ना कोई उत्सव होता है। मन का संबंध चंद्रमा से है। पूर्णिमा और अमावस्या के आस पास के दिनों में मन में अधिक हलचल रहती है। इस दौरान मानसिक और शारीरिक रोग बढ़ जाते हैं। इन दिनों अगर हम उत्सव में व्यस्त हों तो स्वास्थ्य भी ठीक रहता है।

पूर्णिमा के दिन, नींद भी कम आती है। इस समय उत्सव की व्यस्तता के बाद नींद में भी मदद मिलती है।

हर व्रत के साथ कोई कथा जुड़ी है। इन कथाओं में किसी राजा यां व्यापारी की कहानी होती है जो वह व्रत करने से अपनी समस्याओं को सुलझा सका, और बहुत लाभ प्राप्त किया। तो, इस लालच से कई लोग कोई व्रत-नियम करते हैं। हर कथा ये दर्शाती है कि कैसे पूजा करने से समस्या का समाधान हो गया। आजकल लोग सोचते हैं कि इन कथाओं के श्रवण मात्र से वे अपनी समस्याओं से छुटकारा पा जायेंगे। हमारे पूर्वज बड़े कुशल थे। हर उत्सव के साथ उन्होंने कोई लाभ जोड़ दिया था।

जीवन में हमें जो कुछ मिला है, उसके लिये कृतज्ञ होना सर्वश्रेष्ठ है। किसी लाभ के लोभ में पूजा करना, मध्यम प्रकार की पूजा है। और भय के कारण पूजा करना निम्न प्रकार की पूजा है। पर, कैसे भी करें, लाभ ही है।

प्रश्न: ये कैसे जाने कि हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है या नहीं?

श्री श्री रवि शंकर: इसका क्या प्रमाण है कि तुम्हारे पैर में दर्द है? तुम ये कैसे जानते हो कि तुम्हारे पैर में दर्द है? आत्मज्ञान हो जाने पर ऐसे प्रश्न मन में नहीं उठेंगे। दूसरों से पूछना कि तुम्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है कि नहीं, ये अज्ञान है। आत्मज्ञान हो जाने पर हमें प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती है। जैसे तुम्हारा दर्द, स्वयं ही प्रमाण है, वैसे ही आत्मज्ञान स्वयं ही प्रमाण है। पर कल्पनाओं में नहीं फंसना कि आत्मज्ञान कैसा होगा। सहज रहो।

तुम वो हो, जो तुम हो, इसलिये विश्राम करो। कुछ करने से आत्मज्ञान नहीं होता, अपितु विश्राम करने से आत्मज्ञान होता है। और विश्राम तुम कुछ करने के बाद ही कर सकते हो।

प्राणायाम और आसन करने से रजोगुण से तुम निवृत्त होते हो। और तब सत्वगुण बढ़ता है। जब ऐसा होता है तब हम ध्यान कर सकते हैं और सजगता बड़ती है। अगर ठीक तरक से नींद ना आये तो सत्वगुण नहीं जगेगा।रजोगुण के द्वारा तमोगुण से ऊपर उठा जा सकता है। और रजोगुण से ऊपर उठने के लिये आवश्यकता है विश्राम की और कर्म की।

भगवद् गीता में कहा है, 'युक्ताहार विहारस्य योगः भवति सिद्धितः।' समाधि ना तो अधिक सोनेवाले लोगों के लिये है, और ना ही उनके लिये जो बहुत अधिक कार्यों में पूरे दिन व्यस्त रहते हैं।


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