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"जीवन में बुद्धि और भावना का सन्तुलन रखना चाहिये।"

प्रश्न : सेवा से थक जाते हैं, उत्साह नहीं रहता तो खुशी से उत्सव कैसे मनायें?

श्री श्री रविशंकर :
तब तो तुम्हारी सेवा में कोई कमी रह गयी होगी। जब सेवा उत्सव मनाने के भाव से करते हैं तो न थकावट और न ही मुर्झाहट लगती है। देखो भई, तुम सब लोग पिछ्ले दो तीन दिन कितने उत्साहित रहे पूरे दिनभर, और कल रात आप लोग देर रात तक जगे थे, पर मुझे तो कोई भी थका हुआ नज़र नहीं आ रहा !  आप को जो भी इतना लाभ मौन और ध्यान से मिल रहा है उसको सुरक्षित रखिये। हर एक काम में संयम का पालन करना चाहिये, कार्य में, बातचीत में, व्यवहार में - सब में। किसी बात में अतिश्योक्ति न हो, इसका ध्यान रखना चाहिये।

प्रश्न : जीवन में बहुत कुछ मिलता है पर अधूरी इच्छाओं के रहते एक असंतुष्टता की भावना रह जाती है मन में। इससे दुख पहुँचता है, क्या करें, इनसे कैसे निपटें?

श्री श्री रविशंकर :
आपने बेसिक कोर्स किया है न? उसमें क्या सीखा? जीवन में कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती है और दोनों को साथ लेकर चलना है। असफलता से आप को कभी खुशी नहीं मिल सकती, उस से दुख ही मिलेगा। तो फ़िर उस समय क्या करें? उसके लिये अपने पास दो उपाय हैं - ’सो वट?’(तो क्या?) और ’सोहम’! अब तुम्हारे पास ये दो कुंजियाँ हैं परिस्तिथि को सम्भालने के लिये!

प्रश्न : गुरुजी,आज मैं सेवा कर रहा था पर ये भूल स्वीकार करना चाहता हूँ कि वह मैं आप का ध्यान आकर्षित करने के लिये कर रहा था।

श्री श्री रविशंकर :
कोई बात नहीं, इतनी ग्लानि महसूस मत करो कि तुमने मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिये सेवा की थी। माना गलती हुई पर तुमने सेवा भी तो करी ना! और जैसे जैसे तुम आगे बढ़ोगे सुधार होता जायेगा। बहुत बार लोग प्रश्न भी ध्यान आकर्षित करने के लिये पूछते हैं। मैं जानता हूँ! इसीलिये केवल ध्यान आकर्षित करने में ही रुचि मत रखो - दोनों काम करो।

प्रश्न : हम ने सुना है कि यहाँ कृपा भरपूर मिल रही है पर हम कितना ले सकते हैं ये हमारे पात्र पर निर्भर है, तो हम ज्यादा मिलने के लिये अपने पात्र का आकार कैसे बढ़ायें?

श्री श्री रविशंकर :
योग से योग्यता और पात्रता बढ़ती है। योग, प्राणायाम आदि जो भी तुम सब यहाँ कर रहे हो, वे सभी तरह के गुण कुशलता और पात्रता बढ़ाते हैं। सेवा से भी ये सब बढ़ता है।

प्रश्न : साँस कैसी हो, लंबी, गहरी या धीमी, शांत?

श्री श्री रविशंकर :
आपको कभी लंबी और कभी धीमी दोनों सांस लेनी चाहिए। जब लंबी गहरी साँस लेते हो तो प्राण की ऊर्जा बढ़ती है, और धीमी और शांत साँस से विश्राम मिलता है।

प्रश्न : आज के युग में बहुत लोग शर्करा(Diabetes) की बीमारी से पीड़ित हैं जो सामान्य दवाइयों से दूर नहीं हो सकती है। क्या योग से ठीक हो सकती है?

श्री श्री रविशंकर :
हाँ, कुछ तरह की शर्करा की बीमरी योग और आयुर्वेद के साथ दूर हो सकती हैं, सब प्रकार की नहीं। यहाँ के अनुसंधान केन्द्र में डाक्टर वेदमूर्ताचार्य ने कुछ शोध किया है और ४३ शोध पत्र भी लिखे हैं। आप लोग उनसे बात कर लीजिये। इन्होंने १००० शर्करा के मरीजों पर शोध किया है जो सुदर्शन क्रिया व संतुलित भोजन से इस बीमारी से मुक्त हो गये हैं।

प्रश्न : मुझे हर काम के लिये बहुत प्रयत्न करना पड़ता है और सन्तोष जनक फल भी नहीं मिलता है।

श्री श्री रविशंकर :
तुमने अपने मन में ऐसा संकल्प क्यों धारण कर लिया कि तुम्हे सब काम के लिये बहुत प्रयत्न करना पड़ता है, यां तुम ठीक से कार्य नहीं कर पाते इत्यादि? ऐसी मान्यता तुमने स्वयं अपने ऊपर लाद रखी है। किसी समय ऐसा हुआ होगा पर आगे भविष्य में भी ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है।

प्रश्न : चित्त की एकाग्रता बढ़ाने के लिये क्या करना चाहिये?

श्री श्री रविशंकर :
और अधिक एडवान्स कोर्स करो।

प्रश्न : मैं बोध कैसे हासिल करूँ? मुझे भगवान से साक्षात्कार करना है, मुझे बोध प्राप्त करना है।

श्री श्री रविशंकर :
बोध प्राप्त करना है? भगवान से साक्षात्कार करना है? तो सेवा करो और विश्राम करो।

प्रश्न : मैं हर रोज़ अपनी साधना करता हूँ पर हर समय आपके साथ रहूँ यह एक प्रबल इच्छा बनी रहती है और जब दूसरों को आपके साथ बात करते देखता हूँ तो मतिभ्रम में पड़ कर सोचने लगता हूँ कि आप केवल मेरे से ही बात कर रहे हैं- एक बीमरी सी लगने लगी है। अगर मैं आपको देख लेता हूँ या आपका कुछ इशारा देखता हूँ तो कुछ ठीक पाता हूँ खुद को। पर आज सबको मिलते समय आपने मुझे देखा भी नहीं तो मुझे बुरा लगा। अब ये बुरा लगना और ये आपके पास रहने की बीमारी को कैसे दूर करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
देखो जिस वक्त तुम्हें यह अहसास हुआ कि ये मोह बीमरी स्वरूप बन रहा है तो तुम उसी वक्त इस से बाहर आ गये। ठीक है कुछ वक्त के लिये किसी का ध्यान आकर्षित करना, पर हर समय ऐसा नहीं करना। तुम अपनी साधना, सेवा, सत्संग करते जाओ, खुश रहो और केन्द्रित रहो। ठीक है, बैठ कर उसका विश्लेषण मत करो- ये भक्ति थी यां मोह? ज्यादा विश्लेषण से परिणाम और भी खराब होंगे। बस सहज रहो, आगे चलते रहो, जो भी हो रहा है उसे स्वीकार करते जाओ, समझे? हमें हमेशा उस चीज़ की प्राप्ति होती है जिसकी हमें सही में जरूरत होती है, है ना? यह एक निर्धारित नियम है, यह जान कर आगे बढ़ते रहो।

प्रश्न : कुछ काम करते समय मैं ये सुनता हूँ कि यह कार्य गुरुजी ने मुझसे करने को कहा, इस से मेरे सामन्य जीवन पर असर पड़ने लगा है, मैं क्या करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
संतुलन होना चाहिये तुम्हारे अंतरात्मा की आवाज़ और अपनी आन्तरिक शक्ति पर। जो तुम्हें परेशान कर रही है उसे योग माया कहते हैं। कभी कभी योग माया से भ्रमित मन में विचार आते हैं जो गलत भी होते हैं। इसलिये हमें अपने विवेक और बुद्धि को तीक्ष्ण और स्पष्ट रखना चाहिये। आन्तरिक चेतना के स्तर पर दिखने वाले दृश्य यां झलक और सुनाई पड़ने वाली आवाज़ को सही समझने के लिये विवेक और बुद्धि मे तीक्ष्णता चाहिए। राम कृष्ण परमहंस को भी ऐसी कई झलकियाँ, दृश्य दिखते थे। दुनिया में और भी कई सत्पुरुषों को ऐसे कई झलक दिखने या आन्तरिक आवाज़ सुनने का आभास हुआ है। इसलिये सन्तुलन रखो और धीमी गति से बुद्धि और भावों में समता से आगे बड़ों। जीवन में दोनों- बुद्धि और भावना का, दिमाग और दिल का सन्तुलन होना चाहिये।

प्रश्न : गीता में श्री कृष्ण ने ये संसार गुणों का खेल कहा है - इसका क्या अर्थ है?

श्री श्री रविशंकर :
गीता पर बहस करने में बहुत वक्त लगेगा, तो अभी नहीं करेंगे। फिर से पढ़ो, क्योंकि कभी कभी पढ़ते ही तुरंत समझ आ जाता है, और कभी अनेक बार पढ़ने पर समझ आता है।

प्रश्न : कभी मुझे अच्छा लगता है और कभी बुरा- दोनों में संतुलन कैसे लाऊँ?

श्री श्री रविशंकर :
कुछ दिन मौन रखो और देखो जो उचित है वही भावना प्रेक्षित होंगी।

प्रश्न : मैं पिछले छह साल से सुदर्शन क्रिया कर रहा हूँ और एक नयी जिंदगी जी रहा हूँ। खुशीपूर्वक नकारात्मक विचार रहित जीवन जी रहा हूं पर एक समस्या है - मेरी स्मरण शक्ति पहले जैसी नहीं है अब तो कुछ उपाय करूँ यां ऐसे ही छोड़ दूँ?

श्री श्री रविशंकर :
उम्र के हिसाब से तुम्हें आयुर्वेदिक दवाई लेनी चाहिये जैसे ब्राह्मी, शंख पुष्पी आदि जिससे लाभ मिलेगा। हमारे देश में आजकल जो हमने भोजन प्रणाली बना रखी है वह स्मरणशक्ति के लिये उपयुक्त नहीं है, उसमें स्टार्च, कार्बोहाईड्रेट्स ज्यादा हैं व सब्जी, प्रोटीन्स, फल इत्यादि कम। अपने भोजन में बदलाव करो और देखो कि इनकी मात्रा ज्यादा हो। इसके साथ आयुर्वेदिक दवाइयाँ (ब्राह्मी आदि), प्राणायाम, योग से लाभ होगा।

प्रश्न : आप कहते हैं चुनाव या निर्णय हमारा है और आशीर्वाद आपका पर मैं क्या नौकरी करूं, यह समझ नहीं पा रही। एक नौकरी लेती हूँ और कुछ समय बाद छोड़ देती हूँ - क्या आप मेरे लिये निर्णय ले सकते हैं?

श्री श्री रविशंकर :
जब हम कभी भी कोई काम लेते हैं तो कुछ समय बाद लगता है ये नहीं कुछ और ठीक रहता। जो लोग डाक्टर बने हैं वे सोचते हैं एन्जिनीयर बनते तो अच्छा था, और जो एन्जिनीयर हैं वे सोचते हैं अरे वकील बनते तो अच्छी कमाई रहती! तो हर नियुक्त कार्य में कोई दोष तो मिलेगा ही। इसीलिये मैं कहता हूँ अपनी पसंद का काम हाथ में लो और उसके साथ निभाओ। और मैं आपके लिए कार्यक्षेत्र नहीं चुनूंगा। आप सब अपना कार्य क्षेत्र खुद तय करें, मेरा आशीर्वाद साथ में है ही।

प्रश्न : गुरुजी, समय क्या है? क्या इसको और इसकी गति को बदला जा सकता है?

श्री श्री रविशंकर :
दो घटनाओं के बीच जो दूरी है वह समय है। दुख में समय लंबा और सुख में छोटा प्रतीत होता है, इसकी गति में बदलाव मौन द्वारा किया जा सकता है।

प्रश्न : आपने नारद भक्ति सूत्र में कहा कि सब माया है, तो क्या इसका मतलब है कि हम कोई कार्य नहीं करें?

श्री श्री रविशंकर :
पहले तुम पूरे भक्ति सूत्र की व्याख्या सुनो, आधा यां एक टेप सुन कर कोई धारणा बनाना उचित नहीं है।

प्रश्न : आप से मिल कर भी मैं संतुष्ट नहीं होता - मुझे लगता है आप दूसरों को ज़्यादा वक्त देते हैं। आज भी दर्शन कतार में आप मुझे बिना देखे आगे निकल गये। और मुझे जब आप से बात करने का मौका भी मिलता है तब मैं बोल ही नहीं पाता, क्या बोलूं समझ ही नहीं पाता! फिर लगता है ’अरे मैं ये कहना भूल गया’, ’ये पूछना भूल गया’-और इस तरह अपने दिमाग में विश्लेषण करने लगता हूँ- अब क्या करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
कैसे सोचा कि तुम्हें नहीं देखा? मैं हर एक जो दर्शन के लिये आता है उसे देखता हूँ, किसी को भी नहीं छोड़ता! और तुम मिलने पर कुछ भी पूछना भूल जाते हो तो वो भी ठीक है- अब बोल दिये ना!

प्रश्न : सुना है कि अभिमन्यु ने युद्ध की एक कठिन कला "चक्रव्यूह" तोड़ने की कला, गर्भ में ही सीख ली थी। क्या ये सम्भव है कि कोई गर्भ में भी सीख सकता है?

श्री श्री रविशंकर :
हाँ, यह सत्य है।


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"हमारा विस्तार हमारे शरीर से कई अधिक है"

पिछली पोस्ट के शेष अंश..

जीवन प्रेम है, जीवन उत्साह है, जीवन उर्जा का फव्वारा है।

मध्यम भोजन, मध्यम गतिविधि, और मध्यम कृत्य से आप अपने को सर्वव्यापी चेतना से जुड़ा हुआ पाते हैं। फिर आप अपने को केवल एक इंसान के रूप में नहीं देखते, बल्कि आप अपना विस्तार बहुत बड़ा और फैला हुआ पाते हैं। शरीर केवल एक सूत्र है, मन बहुत बड़ा है। हमारा मन पूरी सृष्टि में फैला हुआ है। मन बहुत बड़ा है, और चेतना का विस्तार बहुत विस्तृत है।

हम टी वी पर बहुत से कार्यकम देखते हैं। टी वी कवल एक डिब्बा है जो तरंग बाहर उत्सर्जित करता है। हमारा शरीर भी ऐसा ही है जो सारी दुनिया से तरंग प्रतिबिंबित करता है। इसी तरह तुम हर जगह व्यापक हो, मैं हर जगह व्यापक हूँ। यह तुम्हे आत्मीय स्तर से जोड़ता है।

तुम इतने व्यापक हो।

तुम ज्ञान से इतने स्थिर हो।

तुम शांतिपूर्ण ज्वलित उर्जा हो।

तुम पत्थर की तरह मज़बूत और फूल की तरह नाज़ुक हो।

तुम्हारी पूर्ण चेतना खिली हुई है।

बहुत से लोग प्रार्थना करते हैं और उन्हे लगता है कि उनकी प्रार्थना सुनी नहीं जा रही है। ऐसा कयों होता है? क्योंकि वो ध्यान नहीं करते। यह बिना सिम कार्ड के मोबाइल फोन जैसा है। तुम बार बार डायल कर सकते हो पर उसका फैदा नहीं होगा। हमे समाज के लिए कोई ना कोई कार्य करना ही चाहिए तांकि बैटरी चार्ज रहे, और एक बेहतर नेटवर्क के लिए ध्यान और साधना। सिम कार्ड के लिए पथ पर होना ज़रुरी है।


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"काम पूरा करने की इच्छा तुम्हारे भीतर से आनी चाहिये"

बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : मैं कई काम शुरु कर लेता हूँ, पर उन्हें पूरा नहीं कर पाता हूँ। आप मुझे इस स्थिति को सुधारने का कोई उपाय बता सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम चाहो, तो तुम कुछ भी कर सकते हो। काम पूरा करने की इच्छा तुम्हारे भीतर से आनी चाहिये। इस संकल्प के साथ कि मैं ये काम करूंगा ही। भीतर से किया गया ये संकल्प तुम्हारी सहायता करेगा। समझ गये? ये काम तुम्हारे सिवा कोई नहीं कर सकता है।

तो, छोटे छोटे काम हाथ में लो, और उन्हें पूरा करो । इस तरह तुम में आत्मविश्वास आ जायेगा। इस से तुम बड़े काम करने के लिये तैयार होते हो। तुम्हें पता है कि तुम काम पूरा क्यों नहीं करते हो? क्योंकि तुम उसे महत्वपूर्ण नहीं समझते। पर, जीवन में कुछ भी महत्वहीन नहीं है। हर चीज़ का अपना महत्व है। अगर तुम्हें कोई काम महत्वपूर्ण नहीं लगे, तब भी तुम कहो, ‘मुझे ये काम पूरा करना है, और मैं इसे पूरा करूंगा।’ इस से तुम्हारी पर्तिबद्धता बढ़ेगी।

प्रश्न : कहते हैं कि सिर्फ़ अपने बारे में सोचने से अवसाद हो जाता है, पर महाभारत के युद्ध की शुरुवात में अर्जुन तो दूसरों के बारे में सोच रहा था, तब भी अवसाद-ग्रस्त हो गया था। कृपया इस पर प्रकाश डालिये।

श्री श्री रवि शंकर :
अवसाद-ग्रस्त होने का मंत्र है - ‘मेरा क्या होगा? मेरा क्या होगा?’। अर्जुन सोच रहा था कि जो काम उसे करना है वो उसे कैसे करे, और लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। वो अपने बारे में ही सोच रहा था। सिर्फ़ अपने बारे में सोचने से ही नहीं, पर मोह और सही तरह से ना समझ पाने की वजह से भी अवसाद हो जाता है। अवसाद ग्रस्त होने का एक अचूक तरीका है – बिना किसी काम के, खाली बैठना और सोचना, ‘मेरा क्या होगा?’ इस तरह तुम ज़रूर अवसाद-ग्रस्त हो जाओगे।

प्रश्न : गुरुजी, आज एक कार्यशाला में बताया कि अगर तुम्हारे किसी मित्र के मित्र का मित्र खुश है तो तुम भी खुश हो सकते हो। क्या वैदिक शास्त्रों में ऐसा कोई सूत्र है?

श्री श्री रवि शंकर : हाँ! इसका अर्थ है, उदाहरण के तौर पर - जैसे कि अहिंसा को पसंद करना, अहिंसा को अपनाना। जो व्यवहार प्रकृति और परमात्मा तुम्हारे साथ करते हैं, तुम भी करो। कुछ ऐसा करो जिसके बदले में कुछ पाने की इच्छा ना हो।
एक वैदिक प्रार्थना है, ‘मैं सबको मित्रता की दृष्टि से देखूं, और सभी मुझे मित्रता के भाव से देखें।’

प्रश्न : अंधविशवासी होने का क्या अर्थ है? मैं भ्रमित हूँ। कभी कभी मैं इन बातों को मानता हूँ, पर मैं अंधविश्वासी नहीं हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
तुम कह रहे हो कि तुम अंधविश्वासी नहीं हो, पर उन बातों को मानते हो। अच्छा, पहले ये बताओ कि अंधविश्वास क्या है?
देखो, कई तरह की मान्यतायें होती हैं। किसी को कोई बात अंधविश्वास लग सकती है, पर किसी दूसरे को ऐसा नहीं लगता। पर एक व्यापक दृष्टि से देखें तो जो तर्क-संगत ना हो, मानव की क्रमगत उन्नति में सहायक ना हो, और बौधिक, मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से नुक्सान पहुँचाये, वह अंधविश्वास है और उसे मिटाने की आवश्यकता है। दुनिया के कई भागों में अंधविश्वास प्रचलित है।
आध्यात्म और अंधविश्वास, एक दूसरे के विलोम हैं। वे संग में नहीं चल सकते। हमें समाज में आध्यात्मिक गुणों को बढ़ाना है, और अंधविश्वास को घटाना है।

प्रश्न : जीज़स की इस बात का क्या अर्थ है, ‘जो रोटी तुम खाते हो, वो मैं ही हूँ।’?

श्री श्री रवि शंकर :
मैंने इस बारे में, ‘Jesus - the embodiment of love’ किताब में बताया है।

प्रश्न : आध्यात्मिक पथ पर सांसारिक सुखों का परित्याग करना पड़ता है, जिससे ऐसा लगता है कि जीवन से खुशी छिन गई है। क्या ऐसा है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं। बल्कि, ये तुम्हें और खुशी देता है।

प्रश्न : अद्वैत शब्द के प्रयोग के बारे में जानना चाहिती हूँ । ‘जो दो नहीं है’ क्यों कहते हैं? इसे ‘एक ही है’ क्यों नहीं कहते?

श्री श्री रवि शंकर :
क्योंकि एक को गिन सकने के लिए दो चाहिए।

प्रश्न : पंचतत्वों में पृथ्वी और जल को स्त्रीलिंग बताया है, अग्नि और वायु को पुल्लिंग बताया है। आकाश का क्या लिंग है? ये भेद क्यों?

श्री श्री रवि शंकर : इस के बारे में कई सोच विचार हैं। लोग हर चीज़ में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग आरोपित कर देते हैं। पर मानव मन इसी तरह कुछ समझ पाता है। वो इसके आगे नहीं समझता।

प्रश्न : मोक्ष क्या है, और उसे कैसे प्राप्त करें?

श्री श्री रवि शंकर :
जिस दिन तुम्हारी छुट्टी होती है तुम्हें कैसा लगता है? वो मोक्ष की एक हल्की सी झलक है। तब भी तुम्हें ऐसा ही लगता है जब तुम्हारे इम्तिहान खत्म होते हैं, और तुम एक राहत के साथ अपनी किताबों को किनारे रखते हो। जब बस में एक लंबा सफ़र करने के बाद तुम अपनी मंज़िल पर उतरते हो, और एक चैन की सांस के साथ अपने आप को हिलाते डुलाते हो तो भी मुक्ति का अनुभव होता है। ऐसे ही जब जीवन में तुम पूर्ण विश्राम पाते हो, जब मन आनंदित और संतुष्ट होता है, उसे मोक्ष कहते हैं।

प्रश्न : ऐसा क्यों है कि मैं Art of living के सेवा कार्यों में अपना १००% दे पाता हूँ, पर पढ़ाई में ऐसा नहीं कर पाता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे पता है कि ये कठिन है, पर तुम्हें करना होगा। जो काम अच्छा लगता है, मन उस में आसानी से लग जाता है। अगर उस में तुम्हें रस आ रहा है, तो मन लगाना कठिन काम नहीं है। ये स्वाभाविक रूप से हो जाता है। पर कोई काम अगर रुचिकर ना हो, रूखा और उबाऊ लगे, पर आगे चल कर तुम्हारे लिये फ़ायदेमंद सिद्ध हो तो तुम्हें उसे करने में पूरा प्रयास करो। कोई विकल्प नहीं है।

प्रश्न : Yes+ कोर्स करने से मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है, पर जीवन में एक नई समस्या हो गई है। कोर्स करने के पहले मैं हर छोटी छोटी बात के लिये भी अपने माता पिता पर निर्भर थी, पर अब मैं अपने कुछ निर्णय खुद ही लेने लगी हूँ। । इससे मेरी मां हमारे रिश्ते के नये प्रारूप को लेकर कुछ असुरक्षित महसूस करती हैं। उन्हें लगता है कि उनकी बेटी उनसे दूर जा रही है। पर ये सच नहीं है। मेरे हृदय में उनके लिए पहले से अधिक सम्मान है।मैं चाहती हूँ कि वे असुरक्षित ना महसूस करें और मैं अपने कुछ निर्णय खुद भी के सकूं। इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
अपनी भावनाओं को ठीक तरह अभिव्यक्त करना, और दूसरों की भावनाओं को ठीक तरह समझना सबसे कठिन कार्य है। इस कौशल की कमी ही आज समाज की सब से बड़ी समस्या है। इस कौशल का विकास करना है। ये कभी परिपूर्ण नहीं होता है। इस मामले में उतार चढ़ाव होते ही रहते हैं। हम जो महसूस करते हैं, उसे ठीक तरक व्यक्त नहीं कर सकते हैं, और दूसरों को ठीक तरह समझ नहीं सकते हैं। ऐसा जीवन में होता ही रहता है। पर, जब हम शांत और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं, तब हम दूसरों के मन को अधिक समझ पाते हैं। इसीलिये, प्राणायाम और ध्यान करना आवश्यक है। इनसे हमें अंतःस्फूर्णा और भीतरी स्पष्टता मिलती है। और हम पाते हैं कि दूसरें हमें आसानी से समझ पाते हैं और हम अपने विचारों को बेहतर अभिव्यक्त कर पाते हैं।

प्रश्न : अगर हम कोई वस्तु यां घटना चाहते हों तो हमारे पास दो रास्ते हैं - एक तो ये कि इच्छा को छोड़ दो, और उसे पूरा होने दो। दूसरा रास्ता है कि, उसे इतना चाहो कि वह पूरी हो जाये। इन दोनों में से हमें कौन सा रास्ता अपनाना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : स्वाभाविक रूप से जो हो रहा है, होने दो। कभी कभी तुम किसी चीज़ के लिये दिल से प्रार्थना करते हो और वो तब पूरी होती है। कभी कभी बस मन में एक हल्का सा विचार आता है और वो इच्छा पूरी हो जाती है। है ना? तो, इसके लिये कोई तय मापदंड नहीं है। सब कुछ संभव है।

प्रश्न : हम कथाओं में पढ़ते हैं कि योगी कभी कभी श्राप भी देते हैं। योगी श्राप क्यों देते हैं? एक तरफ़ तो वो कहते हैं, ‘सुखी रहो। ध्यान करो, इत्यादि।’ तो फिर श्राप क्यों देते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
योगी अगर श्राप भी दें तब भी उस से लाभ होता है। एक अज्ञानी का प्रेम भी नुक्सान करता है। जैसे कि, गाँव में कोई बच्चा रो कर कहे कि वो स्कूल नहीं जाना चाहता, तो कभी कभी उसकी माँ उसका रोना बंद करने के लिए अज्ञानवश बच्चे की बात मान जाती है, और बच्चा घर पर खेलता रहता है, यां जानवरों को जंगल में चराने ले जाता है। स्कूल ना जाने से बच्चे को आगे चल कर नुक्सान होगा। उसी तरह, एक योगी के क्रोध से भी प्रेरणा मिल सकती है और इससे कल्याण हो सकता है।

प्रश्न : क्या आपने कभी किसी को श्राप दिया है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं। कभी ऐसा मौका ही नहीं आया। जब आप पूर्ण महसूस करते हैं, तब श्राप देने की इच्छा ही नहीं जागती। जो लोग जीवन में कुछ कमी महसूस करते हैं, वे ही श्राप दे सकते हैं।

प्रश्न : क्या मृत्यु के समय तुरंत ही आत्मा शरीर को छोड़ देती है? अस्वाभाविक और दुर्घटना से हुई मौत के बाद क्या होता है?

श्री श्री रवि शंकर :
शरीर और आत्मा का रिश्ता अद्भुत है। ये बहुत गहरा विषय है, इसके बारे में फिर कभी बात करेंगे।

प्रश्न : मैं वस्तुओं और व्यक्तियों से बहुत मालिकीपन और आसक्ति रखता हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। इसकी सजगता से ही तुम इससे बाहर आने लगते हो।

प्रश्न : हम चिंता और अपेक्षा से कैसे मुक्त हो सकते हैं? साथ ही बार बार आती अपेक्षाओं की वजह से परेशान ना हो?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। उसे रहने दो। तुम अपनी सभी अपेक्षाओं से क्यों मुक्त होना चाहते हो? जब तुम्हें उनसे परेशानी होती है, तब तुम उनसे मुक्ति चाहते हो, है ना? तुम्हें पता है, जब तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं होता तब तुम बैठ कर चिंता करते हो, अपेक्षा रखते हो यां दिवास्वप्न देखते हो। जब तुम व्यस्त होते हो, तब ऐसा नहीं होता है।

प्रश्न : मैं कभी कभी तय नहीं कर पाता कि क्या करूं, क्या ना करूं। जैसे कि पढ़ाई के समय मैं कहीं खो जाता हूं, और पढ़ाई करना भूल जाता हूं। ऐसी स्थितियों में मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
साधना, सत्संग और सेवा करो, इससे मन केन्द्रित होता है।
शेष अंश अगली पोस्ट में..


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