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जीवन और गुरु अविभाजिनीय है !!!

गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर श्री श्री की वार्ता 
१५ जुलाई २०११, मॉन्ट्रियल, कनाडा

जीवन और गुरु अविभाजिनीय है | आपका जीवन गुरु तत्व से बना है | अपने स्वयं के जीवन पर प्रकाश डालिये | आपके जीवन के द्वारा ज्ञान चमकता है | उसका आपको सम्मान करना चाहिये, और उसे  सम्मान देना ही गुरु है | आपको जीवन ने कई बातें सिखाई है | आपने क्या गलत किया और आपने क्या सही किया, और जब आप अपने स्वयं के जीवन पर प्रकाश नहीं डालते तो फिर वहां गुरु की मौजूदगी नहीं होती है | इसलिए इसे आप अपने जीवन में प्रकट करे  और जीवन में आप को जो भी  ज्ञान प्राप्त हुआ है उसका सम्मान करे |  सम्मान देना ही गुरु है | क्या आप सब मुझे सुन रहे है? क्या यह एक गंभीर विषय है ? 


जीवन और गुरु अविभाजिनीय है | जब आप अपने स्वयं के जीवन पर प्रकाश डालते है और आपको ज्ञान प्राप्त होता है तो उसका सम्मान करे | ज्ञान ही गुरु तत्व है | इसलिए जब गुरु तत्व होता है तो वहाँ पर ज्ञान होता है | हम सब में ज्ञान और विवेक होता है, उस पर प्रकाश डालिए |जीवन में ज्ञान का उदय होता है और ज्ञान प्राप्त होता है उसका सम्मान कीजिये | जब आप ज्ञान का सम्मान करना छोड़ देते है तो फिर  अमावस्या के जैसे अँधेरा छा जाता है, जब पूर्ण चंद्रमा या चंद्रमा दिखाई नहीं देता | चंद्र ही मन है और जब वह ज्ञान से  परिपूर्ण होता है तो वहीं गुरु पूर्णिमा है | इसलिए आपका प्रत्येक दिन भी गुरु पूर्णिमा हो सकता  है जब आपको  जीवन ने जो कुछ भी दिया है आप उसका सम्मान करते है |


कई बार हम इसका विपरीत करते है और अपनी आँखे बंद करके अपनी इच्छाओं की तरफ भागते है | मुझे यह चाहिये, मुझे वह चाहिये कहते हुये आप अपनी इच्छाओ के वश में होकर ज्ञान का सम्मान नहीं करते | देने वाले ने वैसे भी बहुत कुछ दिया है | सबसे पहेले आपको ज्ञान का सम्मान करना चाहिये और फिर इस गुरु पूर्णिमा पर आपने यह प्रण लेना चाहिये कि जीवन में जो आपको उपहार मिला है आप उसका उपयोग करेंगे |  आप पर  बहुत सारा आशीर्वाद और कृपा निछावर की गई है | जो भी आशीर्वाद आपको मिले है यदि आप उसका उपयोग करेंगे तो आप को और आशीर्वाद प्राप्त होगा | देने वाला बिना थके आपको आशीर्वाद दे रहा है और इसके लिये वह सम्मान की अपेक्षा भी नहीं करता और आपको यह अहसास कराता है कि वह आपका  ही है | वह आपको यह अहसास कराता है  कि वह आपकी अपनी उपलब्धि है | देने वाले का कोई अंत नहीं है और वह देने से थकता नहीं और आपको असीमित और बहुत सारी प्रचुरता प्रदान करता है और आपको उसका  उपयोग अच्छे कार्यो में करना चाहिये |


आपको अच्छी वाणी मिली है उसका अच्छा उपयोग किजिये | अपनी वाणी का उपयोग दोष गिनाने में और शिकायत करने में या बुरी बातें कहने में नहीं कीजिये | आपको अत्यंत प्रतिभाशाली बुद्धि प्रदान की गई है, उस बुद्धि का अच्छा उपयोग करे | मुझे समझ में नहीं आता कि कई लोग अपनी बुद्धि का प्रयोग करने में इतने कंजूस क्यों होते है | शराब जितनी पुरानी होती है वह उतनी ही बेहतर और महंगी हो जाती है | मैने ऐसा सुना है उसका सेवन कभी नहीं किया | वैसे जितना आप अपनी बुद्धि का उपयोग करेंगे वह उतनी बेहतर होती जायेगी | जितना आप उसका उपयोग अच्छे काम के लिये करेंगे वह उतनी ही तीव्र और प्रतिभाशाली बनेगी | इस बात को न सोचे या इसकी चिंता करे कि आप अपनी बुद्धि का उपयोग करने से उसे खो देंगे | उसका उपयोग न करने से आप उसे खो देंगे | अपने बुद्धि का उपयोग अच्छे काम के लिये करे | यदि आपकी वाणी मधुर और मीठी  है तो उसका उपयोग अच्छे से करे | यदि आपके शारीर में शक्ति है तो सेवा करे | आपको जो कुछ भी मिला है उसका उपयोग अच्छे कार्यो में करे | जब मैं कहता हूं, “अच्छा उपयोग करना” तो उसका तात्पर्य है, उसका उपयोग स्वयं के लिये न होकर समाज और विश्व  के उपयोग के लिये होना चाहिये | दिव्यता इसी संसार में रहती है | इसलिए इस संसार की सेवा करना दिव्यता की पूजा करने के जैसा है |


ज्ञान का सम्मान करने से आपका जीवन उन्नत हो जाता है| और जब आप इन दोनों बातों को समझ जाते है तो फिर आप कृतज्ञता का अनुभव करते है और फिर आप भाव,प्रेम और भक्ति में परिपूर्ण हो जाते हैं, जो दिव्यता को अति प्रिय है |


यह जान लीजिये आप सभी के भीतर एक गुरु छुपा हुआ है जो आपमें ज्ञान का प्रकाश देता है , आप उस भीतर के गुरु की आरती करे | आरती करने का तात्पर्य क्या है ?ज्ञान के साथ परमानन्द को प्राप्त करना और जीवन ने जो आपको दिया है, उस पर प्रकाश डालना चाहिये |  क्या वस्ताविक है और क्या वास्तविक नहीं है ? क्या सही है और क्या सही नहीं है? आप उसे क्यों चुनते है जो सही नहीं है और आप उसे करने के लिए कौन प्रलोभन देता है | और सही क्या है और गलत क्या है ? इसे आप को किसे से पूंछने की जरूरत नहीं है | आपके भीतर कुछ है जो आपको यह बताता है | आपके भीतर कुछ हैं जो आपको यह बताता है कि यह सही है | आपके भीतर कुछ चुभता जो यह बताता हैं कि यह सही नहीं है | उसी का सम्मान करे | क्या आप सभी लोग सुन रहे है?

यह बहुत  ही सरल है फिर भी  अत्यंत गहन है |

यह एक और सुंदर बात होती है कि आप सच्चाई और धर्म की राह पर होते हुये उसके होने का दावा नहीं करे | यदि आपको कोई व्यक्ति उपहार दे और आपको उपहार  देने का अहसास कराये तो क्या वह उपहार रह जाता है ? देखो मैं तुम्हे उपहार दे रहा हूं| दस बार कोई व्यक्ति आपको यह कहे कि मैं तुम्हे टोफ़ी दे रहा हूं तो आप क्या कहेंगे? आप कहेंगे कि आप ही उसे रख लीजिए | मुझे नहीं चाहिये | उसी तरह जब आप सच्चाई और धर्म की राह पर होते है तो उस पर होने का दावा न करे कि, “मैं सच्चाई और धर्म की राह पर हूं”|सच्चाई और धर्म की राह पर होने का दावा करने से क्रोध, और निराशा आती है और आप किसी और रूप में गलत बन जाते है | एक रूप में आप सही हो सकते है लेकिन किसी और रूप में आप गलत हो जाते है |क्या आप मेरे साथ है? क्या इसका कुछ तात्पर्य है ? सच्चाई और धर्म की राह पर होने का दावा न करना , शुद्ध और पवित्र होने पर उस पर गर्व न करना, उदार होते हुये उसका प्रदर्शन न करना ही सही होता है | क्या आप समझ रहे है कि मैं क्या कर रहा हूं | समझदार होने का ढिंढोरा पीटना, कि देखो ‘मैं कितना समझदार और ज्ञानी हूं’ ऐसा कहने से उसका रस निकल जाता है | आपको समझदार, स्वाभाविक और सरल होना चाहिये और कभी कभी मूर्ख बनने के लिए भी तत्पर होना चाहिये | यह कितना सुंदर ज्ञान है | आपका जीवन आपको यह प्रदान करता है और फिर यह आप पर झलकता है | जीवन में इस ज्ञान का बार बार प्रदर्शन होना चाहिये |


दूर छोर पर कुछ लोगों की चाल को देखकर श्री श्री ने कहा :


ऐसे कई लोग है जो कई बार ऊपर और निचे आ जा रहे होते है और उन्हें पता ही नहीं होता है कि कहां जाना है और क्या करना है | ऐसी ही परिस्थिति में गुरु की आवश्यकता होती है | कई लोग उसी पथ पर चलते रहते है और उन्हें पता ही होता है कि द्वार कहां है और कहां प्रवेश करना है | अपने आस पास इन छोटी छोटी बातों का अवलोकन करने से आपको कई पाठ सिखने को मिलते हैं |


एक संत की कथा है; मुझे लगता है कि वे संत रामदास थे | वे एक गांव में प्रातः काल में सैर कर रहे थे, और एक महिला अपने झोपड़ी के सामने के भाग को साफ कर रही थी, और उसने कहा हे राम उठ जाओ, तुम कब तक सोते रहोगे? उसने अपने पुत्र से यह कहा जो भीतर सो रहा था और उस छोटे बालक का नाम भी राम था | जब संत ने यह सुना तो उन्होंने कहा कि कोई मुझे जागने के लिए कह रहा है | ऐसा कहा गया है कि उस क्षण वे सचमुच जाग गए और उन्हें ऊर्जा और स्फुर्ती महसूस होने लगी | उन्होंने कहा कि फिर मैं कभी नहीं सोया क्योंकि मैं अत्यंत  ऊर्जा और स्फुर्ती पूर्ण महसूस कर रहा था और पहेले मेरा मन पूरे समय अतीत और भविष्य में भटकता रहता था | 

उन्हें ऐसा करने को किसी ने नहीं कहा,और मन आपको ऐसी सैर पर लेकर जाता हैं | हमारा मन अपना स्वयं की माया निर्मित करता है और अपने स्वयं के विश्व और बबूले का संचालन करता है और आप अपने बबूले के आस पास ही घुमते रहते है|आप पूरी दुनिया को अपने ही चश्मे से और अपने दृष्टिकोण से देखना ही चाहते   है | इसे विपरार्य कहते हैं |

विपरार्य का अर्थ होता हैं रंगीन दृष्टि और न किकी वास्तिविक दृष्टि | इसलिए गुरु तत्व या जीवन में ज्ञान का प्रकाश आपको जगाता हैं और यह समझ देता है कि यह ऐसा है |

आप लोगों ने कितने बार यह महसूस किया है कि आपकी राय या मत गलत थे ?
 अधिकांश समय आपकी राय या मत गलत होते है पर आप सब उसी राय के साथ जी रहे थे और समझ रहे थे सब कुछ ऐसा ही है |यह वहीँ बबूल हैं जिसमे आप रहते है | इसी   बबूल से गुरु तत्व आता है ,जो आपके जीवन में प्रकाश देता है और उस ज्ञान पर प्रकाश देता है जो इस जीवन ने आपको दिया है | फिर आप देखेंगे कि आपकी राय या मत अधिक से अधिक सही होने लगेंगे | आपके ९०% राय या मत गलत होते है और सिर्फ १०% सही होते है | वास्तव में इसका विपरीत होना चाहिये | ९०% सही होना चाहिये और १०% गलत होना चाहिये | २ से ३ या १० % गलत हुआ तो कोई बात नहीं |
१.आपका स्वयं का जीवन ही आपका गुरु होता हैं |
२. जीवन और गुरु अविभाजिनीय है| यह कोई नर्सरी शिक्षक के जैसे नहीं है,कि आप उनसे कुछ सीखा और फिर आप चले गए परन्तु जीवन और गुरु अविभाजिनीय है |
३. जीवन का ज्ञान ही आपका गुरु है | अपने जीवन पर प्रकाश डालने से ज्ञान का उदय होता है |
४.देने वाले ने आपको प्रचुरता के साथ दिया है और वह आपको देता ही रहता हैं और आप उसका अच्छा उपयोग कीजिये | आप अपने कौशल और योग्यता  का जितना अच्छा उपयोग करेंगे उतना ही आपको और  अधिक प्राप्त होगा |
५. ज्ञान का सम्मान करे | ज्ञान का सम्मान इसलिए करना चाहिये क्योंकि गुरु और ज्ञान अविभाजिनीय है और जीवन और ज्ञान को भी अविभाजिनीय होना चाहिये | कई बार आप अपना जीवन ज्ञान बिना जीते है | फिर गुरु तत्व मौजूद नहीं रहता | और आप गुरु का सम्मान नहीं करते | समझ में आया क्या ?
वह सतगुरू है |
६. जब आप सच्चाई और धर्म की राह पर रहे और  उस पर होने का दावा न करे | सच्चाई और धर्म की राह पर होने का दावा करने से क्रोध, और निराशा आती है और आप किसी और रूप में गलत बन जाते है | यह अच्छाई के साथ भी है | जब आप सोचते है कि ‘ मैं अच्छा हूं फिर आपको लगता हैं कि दुसरे लोग बुरे है, और आप दूसरों को बुरा बना देते हैं | जब आप सोचते हैं कि मैं बहुत अच्छा हूं , तो इससे आप में उदासी आती है | जो लोग सोचते कि वे बहुत अच्छे है वे उन लोगों की तुलना में दुखी होते है जो यह सोचते है कि वे बुरे हैं |जो लोग सोचते है कि वे बुरे है, वे परवाह नहीं करते लेकिन यदि कोई सोचता है कि वह बहुत अच्छा है तो वह यह सोचने लगता है कि उसे क्या हो रहा है | इसलिए यदि आप सोचते है कि ‘मैं  अच्छा हूं’ और उसका दावा करने से आप दुखी और निराश हो जाते है | अपनी अच्छाई का दावा करने से आप क्रोधित हो जाते है | आप कितने भी अच्छे हो परन्तु उसका दावा न करे | दूसरों को उसके बारे में बोलने दीजिए, और उसका ढिंढोरा न पीटे | उदार रहे और उदारता का दिखावा न करे | 

आप सब को यह सब करना है  और इन सभी बातों को बार बार इकट्ठा हुए इसे अपने बुद्धि में समाना हैं | यहीं सत्संग होता है | सत्संग सत्य, विवेक और आपके भीतर के ज्ञान की संगति होती है |  आपका परिचय  अपने भीतर के सत्य के होता है और यहीं सत्संग होता है |


देने वाला देने से थकता नहीं है और वह आपको यह अहसास करता है कि यह आपका है | उसकी उदारता इतनी अधिक है कि वह देकर आपको उस पर गर्व महसूस करवाता है | यह देखो’ यह मेरा है, वास्तव में आपका कुछ भी नहीं है | देने वाला आपको इस तरह से देता है कि आपको यह अहसास ही नहीं होता कि आपने कुछ लिया है | देने वाला आपको इस तरह से देता है कि आपको लगता है कि वह चीज़ आपकी ही है और आपने कुछ भी नहीं लिया | उसकी यहीं महानता और सुंदरता है |


उस महिला का अपने पुत्र के लिए चिल्लाना ही था जिसे एक संत जाग गए और उनका ज्ञानोदय हो गया | एक महिला ने कहा; राम तुम कब तब निद्रा लोगे ?- जाग जाओ, और इसी वाक्य ने शुरुवात करी | प्रकृति आपको काफी  सारे संकेत देती है कि प्रिय अब तो जाग जाओ, और कितने देर निद्रा में रहोगे और कब तक अपने मन से कहते  रहोगे कि “ क्यों, क्यों | एक रोता हुआ ढलता हुआ और शिकायत करने वाले मन को जागना होगा, जीवन बहुत छोटा है | जीवन की इस छोटी सी अवधि में जीवन का सम्मान करे | जीवन बहुमूल्य हैं | आपके कौशल, योग्यताओं और साधन जो कुछ भी आपको मिला है उसका अच्छा उपयोग करे | आपके पास जो कुछ है जैसे वाणी, बुद्धि इत्यादि उनका अच्छा उपयोग करे | बुद्धि का अच्छा उपयोग करे | गान करे चाहे उसकी कोई प्रशंसा करे या न करे |


The Art of living 
© The Art of Living Foundation

यह एक नया नियम हैं, किसी भी को खुश करने की चेष्टा न करे, आप यह कर ही नहीं सकते


१८ मई २०११, बैंगलुरू आश्रम

प्राचीन काल के स्वामी, साधु और लोग कहीं भी किसी भी किस्म की कलह सुनना पसंद नहीं करते थे | यदि उनके पास कोई भी आकर उनसे कोई भी शिकायत करता था तो वे उनके कान पकड़ कर उनसे कहते थे कि “तुम ही इससे निपटो |”  यदि आप समाधान का हिस्सा हो तो आप के उर्जा का स्तर उच्च होता है | परन्तु यदि आप सिर्फ समस्याओं की बात करते है तो आप की उर्जा नीचे आ जाती है |
दुनिया हर समय सकारक और नकारक बातों की क्रीड़ा होती है, कुछ समस्याएं और चुनौतियां आती रहती हैं और उनके साथ उनका हल भी आता है | प्राचीन लोग अपनी उर्जा के स्तर को उच्च रखने पर केंद्रित होते थे | यदि आपकी उर्जा का स्तर उच्च होता है तो जब लोग आपके पास अपनी समस्याएं लेकर आते है तो उनका समाधान हो जाता है |
अक्सर जब लोग आपसे अपनी समस्याओं के बारे मे बात करते हैं तो क्या होता है? आपका  उनकी समस्याओं के प्रति  झुकाव हो जाता है | वे अपनी समस्याओं के बारे बात करते हैं तो क्या होता है ? आप उनकी समस्याओं के साथ बह जाते हैं | इसलिए एक बार इसका प्रयत्न करें ; एक दिन यदि लोग आपके पास आकर १०० शिकायत करें, आप सिर्फ अपनी उर्जा को उच्च रखें और अपनी दृष्टि और मन को भीतर की ओर केंद्रित रखे जैसे कुछ भी नहीं हुआ है, तो फिर आप अचानक अपने भीतर मुक्ति महसूस करेंगे |
आप इसे प्रयत्न कर के देखें, घर पर आपकी सास, पति और हर कोई व्यक्ति किसी भी बात की शिकायत कर सकता है | पूरी दुनिया इधर से उधर हो जाए, परन्तु आप सिर्फ एक विचार को पकड़ कर रखें कि - मैं अपनी उर्जा को उच्च रखूंगा | आप सिर्फ यह एक कदम उठायें और देखें कि समस्याएं और चुनौतियां सिर्फ इसलिए आती हैं जिससे कि आप अपने मन को भीतर की ओर केंद्रित करके रख सकें |
मन को भीतर की ओर केंद्रित करने के बजाय, जब समस्याएं ओर चुनौतियां आती हैं तो आप क्या करते हैं? आप समस्या का पीछा करते हैं और उसी दिशा में प्रवाहित हो जाते हैं और फिर आपकी उर्जा का स्तर नीचे आ जाता हैं और आपका पतन हो जाता हैं | क्या ऐसे ही होता है ना ?
कई बार करुणा और सहानुभूति के नाम पर आप उसी ओर प्रवाहित हो जाते हैं | आपकी करुणा वास्तव में आपकी समस्या का समाधान करने में सहायक नहीं है | यह बहुत चौंकाने वाली बात है कि करुणा में समस्या बढ़ जाती है और उसका समाधान नहीं हो पाता है |
जब भी कोई समस्या आती है तो वह व्यक्ति को भीतर के गहन की ओर केंद्रित करने के लिए होती है जिससे व्यक्ति वैराग्य और शान्ति की अवस्था में जा सके | इसके बजाय आप व्यक्ति को तर्क के द्वारा संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं | समस्या में व्यक्ति को संतुष्ट करना सबसे बुरी बात है | आपको उनको संतुष्ट नहीं करना चाहिए | हर किसी व्यक्ति को उनके कर्म और समस्या को सहन करना चाहिए | यदि आप दुखी या खुश हैं तो वह भी आपका कर्म है | आप अपने कर्म को बदल दीजिए | यह मनोभाव व्यक्ति को और अधिक स्वतंत्र और मुक्त करता है |
आप उनके प्रति करुणा दिखाते है और फिर उन्हें और ध्यान पाने की चाहत हो जाती है |  आप और करुणामय हो जाते हैं और उन पर और अधिक ध्यान देते हैं, और फिर न तो करुणा रह जाती है और न तो आप उन पर उतना ध्यान दे पाते हैं | फिर सिर्फ परेशानी रह जाती है और उसके कारण आप भी परेशान हो जाते हो; “वह व्यक्ति कितना दुखी है, मुझे उसे खुश करना है” किसी को खुश करना बहुत बड़ा बोझ है | और उसे करने की चेष्टा न करें | यह एक नया नियम है, किसी को भी खुश करने की चेष्टा न करें, आप यह कर ही नहीं सकते !!!
संस्कृत में एक कहावत है जो कहती है, “कश्तस्य सुखस्य नकोपी दता”| कोई भी खुशी या दुःख नहीं दे सकता | वह अपने स्वयं या मन से निर्मित होती है | जब कोई अपनी समस्या बताता हैं तो घूम कर दूसरी दिशा में चले जाएँ और उनसे कहें कि अपनी समस्या से स्वयं ही निपटें | फिर आप स्वतंत्रता या मुक्ति को प्राप्त करेंगे, और लोगों में परस्पर निर्भरता आती है जिसके वजह से आप अपने आप को आत्म निर्भर बना सकते हैं |
मैं यह बात साधकों और आप सब लोगों से कह रहा हूं, जो वैसे भी इस पथ पर हैं | लेकिन इसका प्रयोग तब न करें जब सड़क पर कोई गाड़ी में बैठने के लिए गुहार लगा रहा हो और आप उससे कहें कि ‘गुरूजी ने कहा हैं कि उन्हें उससे स्वयं ही निपटने दीजिये’ इसलिए मैं कुछ नहीं कर सकता’ | यदि आपकी गाड़ी में जगह है तो उनकी मदद करें | वहां पर करुणा की आवश्यकता है, परन्तु वह संबंधों में आवश्यक नहीं है | जब आप लोगों से जुड़ते हैं तो वहां पर एकाएक करुणा के कृत्य आवश्यक हैं | जिस को आप जानते नहीं हैं उनके प्रति करुणामय रहें |
वैराग्य के लिए उत्साहित रहें |
आपका मन कैसे लोगों की भावनाओं, चिंताओं और उनके दुखों में फंस जाता है | आप उसके लिए क्या कर सकते हैं और आप कहां चले गए हैं ? आपको क्या हो गया है ? आप पूरी तरह से बिखर जाते हैं | इसलिए ऐसा कहा जाता है कि आस पास के सभी जाल और तार को काट दो और सिर्फ एक दिव्यता के तार के साथ जुड़े रहो |
यह मत कहो, गुरूजी ने मेरे तरफ देखा नहीं शायद भगवान मुझ से नाराज़ है और बहुत कुछ | यह सब नहीं कहना है | सब कुछ प्रसाद है, यदि मुझे निकाल दिया जाता है तो वह भी प्रसाद है | यदि मुझे डांटा जाता है तो वह भी प्रसाद है | सब कुछ प्रसाद है | यह मनोभाव सबसे अच्छा है, इसलिए यदि आप पर ध्यान नहीं है तो चिंता की कोई बात नहीं है | ठीक है |

प्रश्न: गुरूजी यदि हम ऐसा करेंगे तो वे सोचेंगे कि हम असंवेदनशील हैं |
श्री श्री रवि शंकर: उन्हें जो कहना हैं, उन्हें कहने दीजिये | आप उन्हें खुश करने का प्रयास ही तो कर रहे हैं | मैं असंवेदनशील नहीं हूं, मैं संवेदनशील हूं |
जैसे मैने कहा आपका जो भी काम हैं उसे करें, लेकिन सिर्फ बैठ कर उनकी समस्याओं को न सुनें, और उसी हवा में प्रवाहित न हो जाएँ |

प्रश्न: पार्ट १ कोर्स में ३ ध्वनि के बारे में बताया जाता है और जब उन तीनों को एक साथ रखा जाये तो वे ‘ॐ, आमेन और अमीन’ की ध्वनि सुनाई पड़ती है |
श्री श्री रवि शंकर: नहीं! वह सब सामान है | ‘आ’ और ‘म’ की ध्वनि निश्चित ही काफी सामान  है | अँगरेज़ी भाषा संस्कृत का बिगड़ा हुआ स्वरुप है | अँगरेज़ी के कई शब्द संस्कृत भाषा से ही उत्पन्न हुए हैं | मैं तो कहूंगा पूरे १००% शब्द | Brother - भ्राता, Sister - स्वस,  Mother - माता इत्यादि |
जब भाषा बदलती है तो सामान्यता उसमे विकृति उत्पन्न होती है |
जैसे बंगाली में कई बदलाव हुए हैं | ‘विष्णु’ ‘बिष्णु’ बन गया हैं, ‘विश्वास’ ‘बिश्वास’ बन गया |
बंगाली लोग कहते है, ‘जल खाबे’ खाबे का अर्थ है ‘खाना’ लेकिन वे कहते हैं ‘जल खाबे’ ‘जल’ बन जाता हैं ‘जोल’ ‘जोल खाबे’ प्रत्येक भाषा की अपनी विशेषता होती है |
अँगरेज़ी में भी उनके उच्चारण बदल जाते हैं | ‘वेस्ट बंगाल’ को वे कहते हैं ‘बेस्ट बंगाल’ ‘डोंट बेस्ट फूड’ (अन्न को बर्बाद मत करो) ‘वेस्ट’ को वे ‘बेस्ट’ कहते हैं | यह ऐसा ही हैं और इसे हमें स्वीकारना पड़ता है |
यू लाइक् बाइट’ (आपको सफेद पसंद हैं) ‘यू आलवेज बियर बाइट’ (आप हर समय सफेद पहनते हैं)  वे वास्तव में कह रहे हैं  ‘यू आलवेज वियर वाइट’ (आप हर समय सफेद पहनते हैं) ‘गुरूजी लाइकस बाइट’ - (गुरूजी को सफेद रंग पसंद हैं) यह एक विशिष्ट उच्चारण है | गुजरात में लाँन (मैदान) बन जाता है ‘लोन’, हॉल (बड़ा कमरा) ‘होल’ बन जाता है, ‘द लोन इज़ इन फ्रंट आफ होल’ (मैदान के सामने हॉल हैं) |

प्रश्न : अमावस के दिन हम हमारे प्रियजनों के पितृ के सम्मान मे तर्पन अर्पित करते हैं, क्या यह वैज्ञानिक है या सिर्फ एक रीती रिवाज़ है ?
श्री श्री रवि शंकर: तर्पण का अर्थ होता है संतुष्ठ करना | तर्प तृप्ति से बनता है जिसका अर्थ होता है संतुष्ठ होना | आपके पूर्वज की कुछ इच्छाएं थी उसे पूरा करना या यह मान लेना की वह पूरी हो गयी है, ऐसा करने से फिर किसी बात की तृष्णा नहीं रह जाती | साल मे पितरों को एक बार याद करना तर्पण कहलाता है |
ईसाई और इस्लाम धर्म में भी विशेष रूप से साल में एक बार पितरों के लिए ऐसा किया जाता है | भारत मे प्राचीन काल में अमावस की रात को पितरों को याद किया जाता था और पूर्णिमा पर दिव्यता की विभिन्न अभिव्यक्तिओं को याद किया जाता है | इसका यह अर्थ नहीं है कि प्रत्येक अमावस्या की रात को कुछ किया जाये परन्तु उनको याद करके उनकी स्मृति में कुछ अच्छा कार्य करना अच्छा होता है |

प्रश्न: गुरुजी आप ने हमें बताया है की गुरु का काम शिष्य को भ्रमित करना होता है | फिर हम उत्तर प्राप्त करने के लिए किसके पास जाएँ ?
श्री श्री रवि शंकर: आप वैसे भी कहां जा सकते हैं ? आप जहां भी जायेंगे वहां और भी भ्रमित होंगे | जहां से भ्रम मिला है वहीं से उत्तर या समाधान मिलेगा |

प्रश्न : गुरु जी कभी कभी हमारे मन की अवस्था ऐसी होती है कि हम किसी से कभी भी बात कर सकते हैं और कभी ऐसा नहीं होता | मन की अवस्था वैसी ही होने के लिए क्या कर सकते हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: आप का मतलब है घर मे पत्नी के साथ ? ऐसा होता है और लोग शिकायत करते हैं कि, मेरा पति घर पर मुझसे बात ही नहीं करता, लेकिन घर पर कोई अतिथि आते हैं तो वह बहुत बातें करते हैं | और जब मैं उनके साथ घर मे अकेली होती हूं तो वे मुझसे बिलकुल बात नहीं करते ; यही समस्या है ना ? आप का मन ऐसा ही है – कभी कभी आप बोलना चाहते हैं और कभी कभी आप इतना अधिक बोल कर थक जाते है | इसीलिए आप बोलना ही पसंद नहीं करते और फिर बोलने के लिए आप के प्राण को उच्च स्तर पर लाना  होगा, यह प्रकृति है | बोलने के लिए आप को अपने आप पर जोर नहीं डालना चाहिए और मुक्त रहना चाहिए |

प्रश्न : जय गुरुदेव, आप इतने आकर्षक हैं क्या यह मेरे इस पथ पर बाधा है ? यदि मैं आकार में ही फँस गया तो मैं आकार से परे देखने के लिए क्या करूं ?
श्री श्री रवि शंकर: आप अपने आप को हर बात से पृथक कर लें | फिर यह भी अपने आप गायब हो जायेगा | फिर आप मुझको और अधिक देख सकेंगे जो आकार से भिन्न है |

प्रश्न : गुरुजी देवदूत के बारे मे कुछ चर्चा करें उनकी भूमिका और उद्देश्य क्या होता है | क्या हर किसी व्यक्ति का कोई देवदूत पालक होता है जो उनका ध्यान रखता है ?
श्री श्री रवि शंकर: हां, देवदूत सकारात्मक उर्जा होते हैं |

प्रश्न : स्वर योग क्या होता है कृपया करके इसे समझाएं ?
श्री श्री रवि शंकर: सबसे पहले नाडी शोधन प्राणायाम करें और प्राणायाम के द्वारा स्वयं के गहन में उतर कर देखें फिर आप महसूस कर सकेंगे कि दिन भर में दोनों नासिकाओं के मध्य मे कैसे श्वास बदलती रहती है |

प्रश्न : गुरुजी क्या जीवित रहते हुए हम स्वयं के लिए के तर्पण कर सकते हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: ध्यान के द्वारा तृप्त हो जाओ, यही तर्पण है |

प्रश्न : प्रारब्ध और संचित कर्म के बारे मे कुछ बताएं ?
श्री श्री रवि शंकर: संचित कर्म भक्ति के द्वारा कम किया जा सकता है जबकि प्रारब्ध कर्म का कुछ अंश सहन करते हुए अनुभव करना पड़ता है |

प्रश्न : गुरु जी मेरा बॉस चाहता है की मैं व्यवहार कुशल बन जाऊं क्योंकि उसे लगता है कि यह संपर्क बनाने के लिए बहुत महत्म्पूर्ण है परन्तु मैं एक सीधा साधा व्यक्ति हूँ और व्यवहार कुशल नहीं बन सकता | इसमें क्या करना ठीक है ?
श्री श्री रवि शंकर: अपने सिर पर कोई लेवल क्यों अंकित कर लेते हो, ‘मैं एक सीधा सच्चा  व्यक्ति हूं’  एक सीधे सच्चे व्यक्ति को व्यवहार कुशल क्यों नहीं होना चाहिए | एक सच्चे साधे  व्यक्ति को हर समय अशिष्ट होने की आवश्यकता नहीं है और इसीलिए आप सीधे सच्चे होते हुए इस तथ्य को छिपाएँ कि आप अशिष्ट हैं | और अपनी अशिष्टता को उचित ठहराने का यह कोई उचित तरीका नहीं है | सरलता और व्यवहार कुशलता दोनों आवश्यक है और यह दोनों आप में होना चाहिए | जब आप किसी अंधे व्यक्ति से मिलते हैं तो आप उस व्यक्ति से यह नहीं कह सकते कि ‘आप अंधे व्यक्ति हो’| आप कहेंगे मैं तो सीधा सच्चा व्यक्ति हूं और मैं सही बात कह रहा हूं, लेकिन आप को ऐसा नहीं करना चाहिए | व्यवहार कुशलता जीवन के अंश हैं और यह कौशल आपमे होना चाहिए | व्यवहार कुशलता का अर्थ यह नहीं है कि कोई सीधा सच्चा नहीं है क्योंकि यह सीधे सच्चे का विरोधाभास है, इन दोनों बातो को साथ मे चलना होता है |

प्रश्न : गुरुजी आप को कैसे पता पड़ता है कि हमारे मन मे क्या चलता है जबकि आप हम से हजारों किलो मीटर दूर होते हैं | आप हमारी इच्छाओं को कैसे पूरा करते हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: यह मेरा रहस्य है | यदि आप ब्लेसिंग कोर्स मे भाग लेगें तो यह आप भी कर सकते हैं |

प्रश्न : गुरुजी अमावस और दीवाली के दौरान हमें यह बताया जाता है कि हमें रात मे सैर नहीं करना चाहिए और नुकीले औजारों का प्रयोग नहीं करना चाहिए, इसके पीछे क्या मंशा है ?
श्री श्री रवि शंकर: चंद्र का मन पर गहरा प्रभाव होता है पूर्णिमा पर आप की मन की स्थिति अलग होती है और अमावस पर भी आप के मन की स्थिति अलग होती है | अमावस की रात काफी काली होती है इसीलिए प्राचीन काल मे यह कहा जाता था कि नुकीले औजारों का प्रयोग न करें क्योंकि उससे आप को ही चोट लग सकती है परन्तु आज विद्युत होने के कारण इसका महत्व नहीं रह गया है |

प्रश्न : गुरुजी जो पत्र आप के पास आते हैं उनका क्या होता है ?
श्री श्री रवि शंकर: आप चिंता मत करो वे सब मेरे पास पहुंच जाते हैं |

प्रश्न : गुरुजी कुछ लोग कहते हैं कि अंतिम संस्कार में नहीं जाना चाहिए और कुछ लोग कहते हैं कि अंतिम संस्कार में जाना चाहिए, इन दोनों में से क्या ठीक है ?
श्री श्री रवि शंकर: आप अंतिम संस्कार मे जा सकते हैं, यह एक सामाजिक जिम्मेदारी है | अंतिम संस्कार मे जाने में कोई समस्या नहीं है | सामान्यतः अंतिम संस्कार से लौटने के बाद आप स्नान करते हैं क्योंकि उर्जा का स्तर बदल जाता है |

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मेरे जीवन में ज्ञान का प्रकाश सदैव रहे

बैगलोर आश्रम, भारत

यह शुक्ल पक्ष का समय ईश्वर आराधना के लिये विशेष रहा है। हम प्रति दिन पूजा करते हैं। आज अंतिम दिन है और शरद पूर्णिमा भी है। हर पूर्णिमा की तिथि का एक विशेष ऐतिहासिक महत्व है।


ैशाख मास (अप्रैल/मई) में आने वाली बुद्ध पूर्णिमा, गौतम बुद्ध के जन्म, आत्मज्ञान पाने और महासमाधि की तिथि है। आषाण पूर्णिमा, महर्षि वेद व्यास को समर्पित है। व्यास जी भौतिक  और आध्यात्मिक, दोनों ही विषयों के महाज्ञानी थे। वे जगत को भी जानते थे और आत्मा को भी। वेद व्यास जी ने सभी प्रकार के ज्ञान को सुव्यवस्थित  किया।


पिछली पूर्णिमा अनंत को समर्पित थी। अनंतता का उत्सव - कोई दीवार नहीं, कोई आदि या अंत नहीं।

यह पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा है - सबसे उज्ज्वल, कोई दाग नहीं, ये लंबी भी चलती है, पूर्ण चन्द्र का उत्सव। हज़ारों साल पहले भगवान श्री कृष्णः ने इसी शरद पूर्णिमा के अवसर पर गोपियों के साथ नृत्य (रास) किया था। गोपियों के भक्ति का आचार्य कहा गया है। शरद पूर्णिमा नृत्य और उत्सव के लिये जाना जाता है। सभी भक्त भगवान श्री कृष्णः के साथ नृत्य करना चाहते थे। नाचते हुये सभी ने उन्हें अपने साथ ही पाया। शरद पूर्णिमा का चन्द्रमा, सौंदर्य का भी प्रतीक है। आकाश साफ़ है, और बड़ा सा पूर्ण चन्द्र चमकता है। हमारा मन भी चन्द्रमा से संबंध रखता है। जब चन्द्रमा पूर्ण हो तो मन भी पूर्ण होता है। इस दिन ऊर्जा बहुत अधिक होती है, और उत्सव से ये और अधिक हो जाती है। परंतु, इस ऊर्जा का सही प्रयोग आवश्यक है।


हर पूर्णिमा पर हम उत्सव का कोई ना कोई प्रयोजन ढूंढ लेते हैं। आध्यात्मिक उत्सव। यह शुक्ल पक्ष एक दैवी समय था। हमने पूजा और यज्ञ किये। पूजा क्या है? जो ईश्वर हमारे लिये करते हैं, उसी का अनुकरण करना, पूजा है। भगवान सूर्य और चन्द्र को हमारे चारों तरफ़ घुमाते हैं, हमें बारिश, फल-फूल, इत्यादि देते हैं, तो हम भी इस ईश्वरीय प्रेम की अभिव्यक्ति का अनुकरण करते हैं। पूजा, अपनी कृतज्ञता और सम्मान दर्शाने का सब से स्वाभाविक तरीका है। हम पूजा में बिताये गये इस शुक्ल पक्ष के सुंदर समय की पूर्णाहुति, हृदय के उमड़ते आनंद के साथ इस संकल्प से करें कि, ‘मेरे जीवन में प्रकाश रहे और मेरे आस पास ज्ञान हमेशा रहे। मैं जीवन के प्रकश को अपने भीतर ग्रहण करूं। मैं प्रेम और ज्ञान को स्वीकार करूं।’


दिव्य शक्ति हर जगह है, जैसे कि हवा हर जगह है। पर, पंखे के पास हवा का विशेष अनुभव होता है। उसी तरह, दिव्य शक्ति हर जगह है, पर पंखे के पास उसका विशेष अनुभव होता है। ज्ञान, यज्ञ और गुरु उस पंखे की तरह हैं, जिस के पास आने पर उस दिव्य शक्ति का विशेष अनुभव होता है।
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