हम सब किसी तरह से बच्चे ही हैं। मेरी इच्छा है हम में एक व्यसक से अधिक बच्चे का रूप हो। एक बच्चा दिन में ४०० बार मुस्कुराता है, नवयूवक १७ बार और एक व्यसक मुस्कुराता ही नहीं है। दुनिया में संघर्ष कम हो जाएगा अगर हम केवल अधिक मुस्कुरा सकें। हम सुबह से हिंसा और दुनिया में चल रहे संघर्ष की बात कर रहे हैं। इसका इलाज क्या है? हम किस दिशा में आगे बड़ रहे हैं?
हम महात्मा गांधी के सिद्धांत सुनकर बड़े हुए थे। हम अहिंसा के साथ गर्व महसूस करते थे। पर दुर्भाग्य से आज गर्व को हिंसा के साथ जोड़ा जाता है। स्कूल और कालेजों में हिंसात्मक छात्र को हीरो की तरह देखा जाता है। हमें इस धारणा को बदलने की ज़रुरत है। हमे गर्व को शांत स्वभाव और समता के साथ जोड़ने की ज़रुरत है। हमे अपने बच्चों को हिंसामुक्त और तनाव मुक्त समाज की दृष्टि देने की आव्श्यकता है।
हम ऐसा पाँच बातों को ध्यान में रखकर कर सकते हैं:
१. पहला है नृत्य और संगीत।
२. दूसरा है खेल-कूद। कंप्यूटर खेल और वीडियो खेल के चलन से बच्चे अब बाहर जाकर नहीं खेलते जैसे वो पहले खेला करते थे। वे अपने को इन खेलों के साथ कमरों में बांध लेते हैं। हमें उनका झुकाव दोबारा खेल - कूद की तरफ़ करने की आवश्यकता है।
३. तीसरे नम्बर पर है - यात्रा। भारत, अमेरिका, पौलेंड, युरोप, जर्मनी, कभी कभी यूरोप और यहाँ बलैक फ़ोरेस्ट में भी हम ऐसे कार्यकम आयोजित करते हैं जिसमें सभी देशों से युवक एक सप्ताह के लिए इकट्ठा होते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि वो एक दूसरे की भाषा भी नहीं जानते पर केवल एक दूसरे के साथ में होने से बीच की दूरी समाप्त हो जाती है। हमें उन्हे अन्य धर्मों और सभ्यतायों के लोगों को मिलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
हमें बच्चों मे बहु धार्मिक और बहु सांस्कृतिक शिक्षा देने की आवश्यकता है। मेरे अनुसार हर बच्चे को दुनिया के प्रमुख धर्मों जैसे हिन्दू धर्म, जुडाइज़्म, ईसाई धर्म, शैन्टोइज़्म, बौद्ध धर्म, शाओइज़्म, कैथोलिसिज़्म का कुछ ज्ञान होना चाहिए। इस तरह से उनमें एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित होता है। अगर दुनिया में कोई एक भी हिस्सा ऐसा छूट जाए जो सोचे कि केवल उन्हीं के पास सही ज्ञान है तो इससे शेष दुनिया भी सुरक्षित जगह नहीं रहेगी। बच्चों और यूवकों में इस भावना का विकास ज़रुरी है कि चाहे हमारे रंग, भाषा, खान पान अलग हैं पर हम एक सार्वभौमिक परिवार का हिस्सा हैं।
४. चोथे नंबर पर बच्चों और यूवकों का किसी सेवा कार्यकम में जुड़ना। जब वे सेवा के काम में जुड़ते हैं तो भीतर से खिलते हैं।
५. फिर योगा और ध्यान। मैने इनको को इतना धर्म निरपेक्ष बनाया है कि किसी भी धर्म के व्यक्ति को इसे करने में कोई झिझक नहीं है। यह सिर्फ कुछ सांस की क्रियाएं और कुछ योगासन हैं जो किसी एक विशेष मान्यता यां धर्म से संबंधित नहीं हैं।
हमारी सांस हमारी भावनायों से जुड़ी है। हर भाव के लिए हमारे सांस की एक विशेष लय होती है। अगर हम सीधे अपनी भावनायों पर काबू नहीं कर सकते तो सांस के द्वारा हम ऐसा कर सकते है। अगर आप थिएटर की जनकारी रखते हैं तो आपको मालूम होगा कि क्रोध की भावना लाने के लिए निर्देशक अभिनेता से तेज़ गति से श्वास लेने को कहता है। और अगर कोई शांत यां प्रेम की भावना का दृष्य हो तो अभिनेता को धीमी गति से और आराम से श्वास लेने को कहा जाता है। हम मन पर विजय प्राप्त कर सकते हैं अगर हम अपनी सांस की गति को समझते हैं। ऐसे में हम किसी भी नाकारात्मक भाव से बाहर आ सकते हैं जैसे क्रोध, जलन, लालच, और हम अपने दिल से मुस्कुरा सकते हैं। मुझे लगता है हमे अपने जीवन में बच्चों की तरह भोलापन लाने की आवश्यकता है जो कि ईश्वर ने सबको दिया है।
भारतीय दूतावास को संबोधित करते हुए श्री श्री रवि शंकर द्वारा कहे शब्दों के कुछ अंश:
आपको पता है हम जीवन में इतनी नीरसता क्यों अनुभव करते हैं? क्योंकि हम एक बहुत औपचारिक महौल में रह रहे हैं। हमारे शब्दों में भी औपचारिकता होती है। हम ऐसे माहौल में रह रहे हैं जहाँ केवल शब्द हैं पर उनके पीछे भावनाएं कम ही दिखती हैं। क्या आप संतुष्ट होते हैं यदि आप किसी के घर जाते हैं और वो आपको केवल औपचारिक तरीके से मिलते हैं। अगर आप भारत के गाँव में किसी के घर जाते हैं तो उनके व्यवहार में भावनाएं होती हैं। वो व्यवहार दिल को छूता है।हमारा अस्तित्व हमारे शब्दों से अधिक व्यक्त करता है। हमें सच में तृप्ति तभी मिल सकती है जब हम अपने केन्द्र से जुड़े होते हैं। और यह कैसे संभव हो सकता है? जब हम तनाव मुक्त होते हैं।
प्रश्न : आप शत्रुता मिटाने के लिए क्या दृष्टिकोण रखते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : बहुत बार जो शत्रु दिखाई पड़ते हैं वास्तव में उनमें शत्रुता नहीं होती। मैं आपको इराक में हमारे किए गए कार्य का उदाहरण देता हूँ। हमने वहाँ के पीड़ित युवायों को ध्यान और सुदर्शन क्रिया दिया। इससे उनमें बड़ा परिवर्तन आया। वहाँ के युवा मंत्री ने ५० युवायों को बैंगलोर आश्रम प्रशिक्षिण के लिए भेजा। शुरु में ऐसा करना चुनौती था पर एक महीने के समय में उनमें अद्भुत परिवर्तन था। इन लोगों ने वापिस जाकर हज़ारों लोगों को मन में शांति बनाए रखना सिखाया। ना ही घर में और ना ही स्कूल में किसी ने हमें नकारात्मक भावनाओं को संभालना सिखाया। मन में गुस्सा, लालच, परेशानी, उदासी इत्यादि भावनाएं उठती हैं पर इनको कैसे सम्भाला जाए और मन को कैसे शांत किया जाए, यह हमें किसी ने नहीं सिखाया।
मैं यह नहीं कहता कि हमारे पास दुनिया भर के संघर्ष को कल ही समाप्त करने का समाधान है। यह संभव नहीं है। पर हमें आक्रामक या दुश्मन लगने वाले व्यक्तियों में ध्यान से आए बदलाव को देखकर बहुत उम्मीद मिली है।
२००१ में कश्मीर में बड़ी मुश्किल परिस्थिति थी पर अब वहाँ हालात काफी बेहतर हैं। हम थोड़ा थोड़ा करके बदलाव ला सकते हैं। जहानाबाद में भी हमारे प्रयास का अच्छा परिणाम है। इससे मुझे दुनिया के तमाम संघर्ष क्षेत्रों में काम करने का प्रोत्साहन मिला है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक बड़ी चुनौती है।
जब कुछ लोग यह सोचते हैं कि केवल वो ही स्वर्ग में जाएंगे और बाकी सब नर्क में तो वो ओरों के किए नर्क बना देते हैं। हमें उन्हे एक व्यापक मानसिकता लाना आवश्यक है। हर बच्चे को दुनिया के अन्य धर्मों के बारे में थोड़ा थोड़ा ज्ञान होना चाहिए। हमें खाद्य पदार्थों के साथ साथ ज्ञान को सार्वभौमिक बनाने की आवश्यकता है। तनाव के कारण व्यक्ति यां तो आक्रमक हो जाता है यां आत्मघाती। दोनो का ही समाधान है कि व्यक्ति को मन शांत रखना सिखाया जाए। यह बहुत ज़रूरी है कि उन्हे नकारात्मक भावनाओं और तनाव से कैसे मुक्त होना है, यह सिखाया जाए। हमें देखना है कि हम उनका घाव कैसे भर सकते हैं। घाव भरना अत्याधिक आवश्यक है।
प्रश्न : कृप्या आप सदमे से बाहर आने की बारे में कुछ बताएं।
श्री श्री रवि शंकर : सुनामी के बाद मछुआरों को समुद्र के पास जाने से भी डर लगता था। वे किसी दूर स्थान पर जाने की प्रार्थना कर रहे थे। सारे जीवन काल में उन्होंने इसके इलावा कुछ और नहीं किया था। ध्यान के कुछ ही मिनटों और प्राणायाम से वे तीन दिनों में ही इस सदमे से बाहर आ गए। तीसरे दिन इन्ही लोगों ने समुद्र में वापिस जाने की इच्छा ज़ाहिर की। 9 / 11 की घटना के बाद भी यही देखा गया। ’आर्ट ओफ़ लिविन्ग’ के कई स्वयंसेवक ऐसे क्षेत्रों में शांति लाने के लिए समर्पित हैं।
प्रश्न : क्या आप बदलाव लाने में एक महिला के योगदान के बारे में बता सकते हैं?
प्र : गुरूजी, मैं अक्सर उलझन में पड़ जाता हूँ, मैं क्या करूँ?
श्री श्री रवि शंकर :ConFused – Fusion with the consciousness and cosmos. माने अंग्रेजी के confuse शब्द में - 'चेतना और ब्रह्माण्ड के साथ विलय' छुपा हुआ है| तो जब भी तुम उलझन में हो, समझ लो कि तुम्हारा विकास हो रहा है|
प्र : 'सब परिवर्तनशील है' - मैं यह समझता भी हूँ और इस बात से मुझे बड़ी राहत मिलती है| पर अगर सब कुछ बदलने वाला है तो मैं यहाँ किस वजह से हूँ? ऐसा कौन-सा कार्य है जो हमें करने की ज़रुरत है? जब तक मुझे इस सवाल का जवाब नहीं मिल जाता, मैं आगे नहीं बढ़ सकता|
श्री श्री रवि शंकर : ये जो प्रश्न या विचार है कि 'सब कुछ बदल रहा है' , इसने अपना काम कर दिया है| इसने आतंरिक जाँच कि भावना पैदा कर दी है| मैं यहाँ किस वजह से हूँ? ऐसा क्या है जो मुझे करना है? जीवन का उद्देश्य क्या है? ऐसे प्रश्न उठने चाहियें| ये दिमाग को खरोंचते हैं और तुम्हारे लिए एक नया मार्ग खोल देते हैं| इन प्रश्नों का उत्तर पाने की जलदी मत करो | अगर सब कुछ बदल रहा है तो ऐसा कुछ ज़रूर है जो कभी नहीं बदलता| इस ज्ञान का एहसास और इसके साथ जीना ही जीवन है| वही सन्दर्भ बिंदु है| तो इन प्रश्नों को लेकर विस्मित होना जारी रखो| ये जीवन से बेकार की बातों की चिंता हटा देगा, और तुम ईर्ष्यालु, लालची और क्रोधी बनने से बचे रहोगे|
प्र : प्रेम और सत्य क्या है? कोई रिश्ता बनाये रखूं या नहीं, इसका निर्णय कैसे लूँ?
श्री श्री रवि शंकर : प्रेम और सत्य के बीच में एक अनोखा सम्बन्ध है| यदि प्रेम और सत्य के बीच में स्पर्धा हो तो ज़रूर प्रेम की ही जीत होगी| प्रेम के खो जाने के डर से कोई उस व्यक्ति से झूठ बोलता है जिसे वो सबसे ज़्यादा प्रेम करता है| वे डरते हैं कि अगर वे सच बोलेंगे तो उनका प्रेम खो जायेगा| तो शक्तिशाली क्या है? प्रेम शक्तिशाली है, और होना भी चाहिए| प्रेम क्या है? अगर ये तुमने अब तक नहीं जाना है, तो उसे जानने का कोई रास्ता भी नहीं है| इस ग्रह का कोई भी प्राणी ये नहीं कह सकता कि उसे पता नहीं कि प्रेम क्या है| क्योंकि ये हमारा दूसरा अनुभव है| हमारा पहला अनुभव पीड़ा का था| पहले नौ महीने आसान थे| हमें आरामदेह, कुनकुने वातावरण में आहार दिया जाता था| फिर एकदम से तुम्हें एक तंग मार्ग से निकलना पड़ा जहाँ तुम्हारा सर अटक गया था, जो कि बहुत पीड़ादायक था| बच्चा इस पीड़ा के कारण रोता है| पहले कुछ दिन शिशु बड़े विनोदी हाव-भाव और चेहरे बनाता है क्योंकि उसे एक पर्वत को हिलाने जितना महान कार्य किया मालूम पड़ता है| इस दर्द के बाद वे माँ के चेहरे की ओर देखता हैं और माँ का प्यार समझने लगता है| वे एहसास करता है कि वे स्वयं प्रेम है, और ये जानता है कि प्रेम के आलावा और कुछ है ही नहीं| तीन साल के होते-होते वे ये सब भूलने लगता है| यही वक्त है जब उनकी बुद्धि विकसित होने लगती है, और वह १०१ सवाल पूछने लगता है| बच्चा प्रश्न पूछते ही चले जाता है| आधे समय तो वह जवाब सुनता भी नहीं| तो सत्य क्या है? ये बहुत परिपक्व प्रश्न है| तुम प्रेम को जान सकते हो पर सत्य क्या है ये बता नहीं सकते| सत्य वो है जो समय से अप्रभावित है| इस परिभाषा के मुताबिक जो तुम देख रहे हो वो सत्य नहीं है| ये ईमारत सत्य नहीं है, ये पहले नहीं थी और भविष्य में शायद न भी हो| ठीक ऐसे ही शरीर को ले लो| ये भूतकाल में नहीं था और भविष्य में रहने वाला नहीं| तो शरीर भी सत्य नहीं है| जो भी कुछ बदलता है वो सच नहीं है| सत्य वो है जिसका अस्तित्व था, है और रहेगा| ये जो आतंरिक जाँच की भावना है कि वो क्या है जो समय से प्रभावित नहीं होता, तुम्हें उस तत्व की ओर ले जाता है जो कभी नहीं बदलता|
प्र : मैंने एक डॉक्टर को दिखाया था| उन्होंने कहा कि टमाटर, आलू, शिमला मिर्च और बैंगन बड़े घातक हैं| उन्हें नहीं खाना चाहिए| क्या 'श्री श्री आयुर्वेद' भी इस तरह के विचार कि तालीम देता है? मुझे ये सब्जियां बहुत पसंद हैं, क्या करूँ?
श्री श्री रवि शंकर : फ़िक्र मत करो, तुम उन्हें खा सकते हो| आम तौर पर ऐसा कहा जाता है| लेकिन सिर्फ वही सब्जियां खाते मत रहना| उसे सेम, हरी सब्जी या दाल के साथ खाना| किसी भी चीज़ का अतिरिक मात्रा में होना हानिकारक है| बस ये सब ज़्यादा मत खाया करो| उसे रोज़मर्रा की दिनचर्या मत बना देना| हमारा ढांचा मज़बूत है| ये कम प्राण की वजह से होने वाले बुरे असर का मुकाबला कर सकता है|
प्र : आप पहली बार मेरा प्रश्न पढ़ रहे हैं| मैं कभी-कभी उदास हो जाती हूँ क्योंकि मुझे लगता है लड़के मुझे पसंद नहीं करते| किसी ने कभी मुझे बाहर ले जाने के लिए बुलाया नहीं है, और ना ही किसी को मुझसे रिश्ता जोड़ने में दिलचस्पी है और मुझे सचमुच एक प्यारा-सा रिश्ता चाहिए|
श्री श्री रवि शंकर : अच्छा, मुझे इन मामलों का कोई अनुभव नहीं है! क्या तुम्हें यकीन है तुम्हें किसी ने बाहर ले जाने के लिए नहीं बुलाया है?ऐसा भी हो सकता है कि वे शर्मीले हों और तुम भी| जब तुम ऐसा महसूस करते हो कि मैं निकम्मा हूँ, बेकार हूँ, तो उसी तरह कि तरंगें उठतीं हैं| असल में तुम जितना सोचते हो उससे तुम कहीं ज़्यादा लायक हो| सुन्दरता तुम्हारे आत्म-विश्वास और तुम्हारी मुस्कान में है, तुम्हारे भीतर जो शांति है वही सच्ची सुन्दरता है| अपने पर भरोसा रखो और ब्रह्मांड से जुड़े रहो, फिर देखो सब कुछ कैसे बदलता है|
प्र : मैं उन लोगों के प्रति सजग हो गया हूँ जो हमारे खाद्य और जल संचय को नियंत्रित करना चाहते हैं | इसके लिए क्या किया जा सकता है?
श्री श्री रवि शंकर : 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' इस पर बहुत ध्यान दे रही है| भारत में कुछ लोग आनुवांशिक रूप से परिष्कृत(Genetically modified plants) पौधों का उत्पादन करना चाहते थे| फ्रांस और अन्य देशों में इस पर प्रतिबन्ध लगाया गया है| 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' ने बड़ी दृढ़ता से साथ में खड़े होकर इसका विरोध किया, और सरकार को ये रोकना ही पड़ा| ऐसा कार्य आप अकेले नहीं कर सकते| इसके विरोध में आपको एक जन आन्दोलन के रूप में खड़ा होना पड़ेगा, और इस तरह धरती को न्याय दिलाना होगा| कुछ गिने-चुने लोगों का लालच उनके दिमाग पर चढ़ जाता है | हम वैज्ञानिक प्रयोगों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन ठीक से परिक्षण लिए बिना, इसकी साइड एफ्फेक्ट है कि नहीं इसकी जाँच किये बिना व्यापारिक उद्देश्य के लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन करना स्वीकार्य नहीं है| जैसे कि आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास की पहले साल में तीन गुना अधिक उपज हुई| दूसरे साल में भी फसल अच्छी हुई | हालाँकि इससे तीसरे साल में पूरी फसल नष्ट हो गयी और कई सारे किसानों ने आत्महत्या की| 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' ने किसानों की आशा जगाने के लिए कार्य किया और उन्हें अपने जीवन की कीमत समझने में मदद की| पशु जिन्होंने आनुवंशिक रूप से संशोधित कपास खाया वे मर गए| इन फसलों से फैली वाइरस ने पेड़ों पर बुरा प्रभाव डाला| इससे सारा क्षेत्र अनुपजाऊ बन गया| कंपनी को बहुत सारा मुनाफा हुआ| ये आर्थिक हिंसा है| आतंक के कई रूप हो सकते हैं| आर्थिक हिंसा तब होती है जब कुछ लोगों का लालच बाकी सब लोगों को पीड़ित करता है| वे सारी अर्थ-व्यवस्था को अस्त -व्यस्त कर देते हैं और न जाने कितने घरों को उजाड़ कर रख देते हैं|
प्र : आप अद्भुत हैं| सिर्फ आप के साथ कुछ ही मिनट बिताने से मेरी सारी परेशानियाँ दूर हो गयीं| इन सब के लिए आपका बहुत-बहुत शुक्रिया| आप यीशु(Jesus) और उनके सन्देश के साथ कैसे एकाकार होते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : उनका सन्देश प्रेम का था| 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' भी उसी के बारे में है| यीशु ने सेवा करने को कहा था, और 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' भी सेवा से ही सम्बंधित है| ये यीशु के सन्देश के साथ १०० प्रतिशत बैठती है| हो सकता है ये चर्च की कार्यप्रणाली के अनुकूल न हो पर यीशु के विचारों के साथ ये यक़ीनन बैठती है| यीशु ने ये कभी नहीं कहा, "तुम पापी हो|" पहले के समय में जब लोग अशिष्ट थे, चर्च ने लोगों में भय और अपराध की भावना जगाने की कार्यप्रणाली अपनाई जो शायद इस युग के लिए उचित नहीं है| आज के युग में हम आधुनिक और मैत्रीपूर्ण हैं, हमें अपराध भाव और उदासी ले कर घुमने की ज़रुरत नहीं| हम यीशु के विचारों के साथ १०० प्रतिशत अनुकूल हैं| सबसे पहली प्राथमिकता है - दूसरों को और खुद को दोष मत दो| अगर तुम ऐसा करते रहोगे तो अपने मन को कभी स्थिर नहीं कर पाओगे, तुम लोगों से दूर भागोगे और खुद से भी| अपने आप को दोष देना बंद करो और दूसरों को भी|
प्र : भूतकाल को छोड़ना और समर्पित करना इतना मुश्किल क्यों है? मैं क्या करूँ?
श्री श्री रवि शंकर : कुछ मत करो| बस अतीत में रहो| भूतकाल में जीना इतना आसान नहीं है| उसे स्वीकार करो, उसका सामना करो| तुम ठीक जगह पर हो| अतीत को समर्पित करना, उससे भागने की कोशिश करना नहीं है| ठीक है, आगे बढ़ो| अतीत को दोनों हाथों से गले लगाओ| अनुभवों से गुज़रने में कोई हर्ज़ा नहीं है | उनसे डरो मत| तुम उन्हें संभाल सकते हो| उसे टालते रह कर या उससे नफरत करके तुम उसे दूर नहीं भगा सकोगे|
कोई एक पुस्तक तैयार कर रहा है जिसमें समर्पण के पांच स्तरों का वर्णन है| तुम समर्पण की क्या परिभाषा करोगे? कई बार समर्पण शब्द का दुरुपयोग हुआ है| पहले प्रकार का समर्पण असफलता के समय आता है| जब तुम हार जाते हो, तब दुखी हो जाते हो और सब कुछ छोड़ देते हो| जब जीवन ज़्यादा करके किसी हार को लेकर एक बोझ हो, तब जैसा है वैसे छोड़ देते हैं, ये एक तरह का समर्पण है| दुसरे प्रकार का समर्पण प्रेम से आता है जैसे माँ का प्रेम होता है| माँ के लिए और किसी चीज़ का महत्त्व नहीं है| अगर उसे खुद के और बच्चे के सुख के बीच में चुनना हो तो वह बच्चे का सुख चुनेगी| पति-पत्नी के बीच प्यार का रिश्ता होता है, वे एक दुसरे के साथ बिलकुल आराम से, निडर और बेफिक्र होते हैं| माँ बच्चे से इतनी जुडी हुई होती है, वो बच्चे से इतना प्यार करती है कि बच्चे के लिए वह छोटी-छोटी सुविधाएं और अपने सुख ख़ुशी से छोड़ देती है| तीसरे प्रकार का समर्पण ज़्यादातर ज्ञान से आता है| आपको पता है कि वैसे भी कुछ नहीं है| आप जब इश्वर को समर्पण कर देते हो तब ऐसा होता है| चौथे प्रकार का समर्पण है - ये जानना कि सब भ्रम है| ये सोचना कि तुम्हें कुछ छोड़ना है जो तुम्हारे पास है ही नहीं, ये भ्रम ही है| ये बुद्धिमता का समर्पण है| ये एक आराम की स्थिति है जिसमें हम जानते है कि सब कुछ एक का ही है| इस तरह के समर्पण की स्थिति एक ही जगह पहुंचाती है - जहाँ छोटा मन तुम्हारे विशाल 'स्वरूप' की ओर खुलता है|
प्र : क्या कोई ऐसा अभ्यास है जिसका पालन करने से हमारे पीड़ा के कारण ख़तम हो जाएँ? क्या कोई ऐसी आनंद दायक पद्धति है?
प्रश्न : हम दूसरों की गलती के पीछे उनका इरादा कैसे ना देखें?
श्री श्री रवि शंकर : हम अकसर लोगों की गलती के पीछे उनका गलत इरादा देखते हैं| अगर हम एक विशाल दृष्टिकोण से देखें तो हर अपराधी हालात का शिकार है| हर अपराधी के अंदर मदद की पुकार करता एक व्यक्ति है| उन्होने सही ज्ञान यां जानकारी के अभाव में, तनाव में यां अपनी संकुचित सोच के कारण अपराध किया हो सकता है| हम केवल अपराध ही देखते हैं पर उस के पीछे सही वजह नहीं देखते|
हर बच्चे को अन्य धर्मों का कुछ ज्ञान होना चाहिए| अगर लोगों को यीशु, कुरान, वेद, जैन धर्म, सिख धर्म, इस्लाम, उपनिष्द और अन्य धर्मो की कुछ जानकारी हो तो दुनिया में एक भी आतंकवादी ना हो| केवल अपने धर्म को सही समझना और अन्य धर्मों के ज्ञान को अस्वीकार करना ही आंतकवाद का मूल कारण है| हम ने सारी दुनिया के खाद्द पद्धार्थ जैसे पेप्सी इत्यादि तो स्वीकार कर लिया पर ज्ञान के मामले में हम अपनी सोच संकीर्ण कर लेते हैं| हर देश में बच्चों के लिए बहु सांस्कृतिक और बहु धार्मिक शिक्षा अनिवार्य है| फिर दुनिया में एक भी व्यक्ति आतंकवादी नहीं होगा|
प्रश्न : आत्मबल को कैसे बढ़ा सकते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : ध्यान और श्वास की क्रिया से भीतर की शक्ति बढ़ती है| इनके अभ्यास से हम अपने केन्द्र से जुड़ते हैं| आत्मबल तीन तरह से आता है - जब तुम प्रेम में होते हो तो प्रतिबद्धता का पालन सहज ही होता है|
जब तुम्हे कोई भय यां लालच होता है तो भी तुम प्रतिबद्धता का पालन करते हो| प्रतिबद्धता का पालन करने के लिए प्रेम सबसे श्रेष्ठ मार्ग है|
प्रश्न : भगवान किस जगह है?
श्री श्री रवि शंकर : भगवान के लिए कोई जगह ढूंढना व्यर्थ है क्योंकि भगवान हर जगह है| भगवान सम्पूर्ण सृष्टि का जोड़ है| भगवान वो उर्जा है जिसमें हम सब हैं| भगवान स्वर्ग में कोई पुरुष नहीं जो तुम्हे सज़ा देने के लिए बैठा है| भगवान की ऐसी कलपना केवल कुछ किताबों में हो सकती है| भगवान प्रेम है और संपूर्ण जगत हर तरह से प्रेम से भरा हुआ है| जब तुम्हारा मन अपने केन्द्र में विश्राम करता है तो तुम इस उर्जा का अनुभव करते हो|
प्रश्न : अगर खुशी का स्रोत हमारे भीतर है तो आध्यात्मिक गुरु की हमें क्या आवश्यकता है?
श्री श्री रवि शंकर : तुमने अपने प्रश्न में ही उत्तर भी दे दिया | अगर प्रश्न ना होता तो उत्तर की भी आवश्यकता ना होती| जिस समय तुम्हारे भीतर प्रश्न उठा तुम उत्तर ढूंढते हो और जो तुम्हे उत्तर देता है वो तो गुरु बन ही गया| अगर कोई उत्तर दे और कहे वो गुरु नहीं यां तुम प्रश्न पूछो और कहो कि तुम शिष्य नहीं तो दोनो ही ईमान्दार नहीं हुए| यह ऐसा ही है जैसे एक डॉक्टर तुम्हे कहता है कि वो दवा तो देता है पर डॉक्टर नहीं है यां तुम कहो, " मैं दवा तो लेता हूं पर मैं रोगी नहीं हूं"|
प्रश्न : हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है?
श्री श्री रवि शंकर : यह प्रश्न हर किसी को स्वयं से पूछना चाहिए| अगर कोई तुम्हे उत्तर देता भी है तो उसे स्वीकार मत करो| जिसे पता है वो तुम्हे नहीं बताएगा और जो बताते हैं उन्हे वास्तविक्ता में पता नहीं है| 'जीवन का क्या उद्देश्य है?' – यह बहुत कीमती प्रश्न है| अगर यह सवाल तुम्हारे मन में उठा है तो तुम खुद को बधाई दे सकते हो| इससे हमारे मन के भ्रम दूर हो सकते हैं| इसका कोई एक उत्तर नहीं है| यह एक रास्ता है जिस पर हमें यात्रा करने की आवश्यकता है| 'मैं कौन हूं?', 'मुझे क्या चाहिए?' और 'मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है'? - यह प्रश्न हमें जीवन में आगे ले जाते हैं| बहुत से लोग इस प्रश्न के बारे में सोचते भी नहीं|
प्रश्न : भगवान को पाने के लिए कौन से गुण चाहिए?
श्री श्री रवि शंकर : मुस्कराओ और सेवा करो| अपने मन की चंचलता पर मुस्कराओ| मन के साथ मत बहो | अपनी क्षमता के अनुसार सेवा करो| जितना तुम कर सकते हो उतना ही करो| जो तुम नहीं कर सकते उसकी तुमसे उम्मीद भी नहीं की जाती| अगर तुम डॉक्टर नहीं हो तो तुमसे कोई ईलाज कराने की उम्मीद भी नहीं करता| समाज के हित के लिए सोचो|हम जो भी कमाते हैं उसका कुछ हिस्सा समाज को वापिस जाना चाहिए|
जब मैं स्कूल में था तो सादगी और समता के साथ गर्व जोड़ा जाता था| समता होने से मुस्कान और करुणा बनी रहती है| हिंसक व्यवहार को बुरा और तुच्छ समझा जाता था| आज आक्रामकता और हिंसा के साथ गर्व जोड़ा जाता है| टी वी में हीरो और कॉलेज में हिसंक छात्र आदर्श बन जाते हैं |आदर्श में यह बदलाव दुनिया भर में एक समस्या है| हमें आध्यात्म को वापिस लाने की आवश्यकता है| संतुलित मन और सबके लिए करुणा का भाव रखो|
प्रश्न : हमे धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार का सामना कैसे करना चाहिए?
श्री श्री रवि शंकर : अपनेपन की भावना के अभाव से भ्रष्टाचार होता है| मित्रता की कमी से धोखाधड़ी होती है| हम अपने दोस्तों को धोखा नहीं देते| मित्रता ना हो तो डर रहता है और धोखे की संभावना होती है| डर और केवल अपने बारे में सोचने के कारण भ्रष्टाचार होता है| इसलिए मित्रता और अपनेपन का भाव जगाना आवश्यक है| राजनीति में आध्यात्म, व्यापारिक कम्पनियों में सामाजिक दायित्व की भावना और धर्म में धर्मनिरपेक्षता अनिवार्य है|
प्रश्न: क्या हमें सच में जीवन में उद्देश्य चाहिए यां हम ऐसे ही खुश रह सकते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : तुम ने खुश रहना अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है| तुम्हारे पास तो पहले ही उद्देश्य है| पर क्या तुम खुश रह सकते हो जब तुम्हारे आसपास के लोग खुश नहीं हैं? जब तुम अपने दृष्टिकोण का विकास करते हो तो तुम सब में अपने आप को पाते हो| अगर तुम्हारे आसपास के लोग खुश नहीं हैं तो तुम खुश नहीं रह सकते| तुम जितना अपने केन्द्र में जाते हो तुम दुनिया में सबके साथ एक महसूस करते हो| तुम इंसान, वनस्पति और जानवरों के साथ भी एकता महसूस करते हो| तुम वातावरण की देखभाल करना भी शुरु कर देते हो|
प्रश्न : हम निस्वार्थ कैसे हो सकते हैं? मैं स्वयं में संशय करना कैसे त्याग सकता हूं?
आज महासत्संग में उन तीनों तत्वों का समन्वय था, जो कि एक आर्ट आफ़ लिविन्ग उत्सव का समग्र हिस्सा हैं - गान, ग्यान और ध्यान। पाश्चात्य और भारतीय संगीत में निपुण गुणीजनों ने संगीत प्रस्तुत किया। तदुपरान्त, श्री श्री ने सबको संबोधित किया और सामूहिक ध्यान कराया।
किसी भी समय में गान, ध्यान और ध्यान का बड़ा महत्व है।
सत्य को आप ना नज़रअंदाज़ कर सकते हैं , ना नकार सकते हैं।
प्रेम वही है जिसे आप पूरी तरह छुपा भी नहीं सकते, जता भी नहीं सकते।
सौंदर्य को आप बांध कर नहीं रख सकते, उसका त्याग भी नहीं कर सकते।
प्रश्न: शरीर में मन किस स्थान पर रहता है? श्री श्री: यह प्रश्न पूछने वाला कौन या क्या है? और वो क्या है जो इस प्रश्न का उत्तर सुनेगा? बुद्धि उत्तर को दर्ज करेगी, पर वस्तुतः वो मन है जो इस उत्तर की तलाश में है।
प्रश्न: पांचों इन्द्रियों को कैसे जीतें? क्या आप एक वाक्य में बतायेंगे? श्री श्री: सूर्य के प्रकाश के आगे मोमबत्ती का महत्व नहीं रहता। वैसी ही अन्य चीज़ें निरर्थक हो जाती हैं।
प्रश्न: ये हम कब जान पाते हैं कि हम प्रेम से ही बने हैं? श्री श्री: प्रेम को जाना या समझा नहीं जा सकता। इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। एक बच्चा अपनी मां से नहीं पूछता कि, "तुम्हारी योग्यता क्या है? तुम क्या करते हो? तुम्हारे मित्र कौन हैं? मुझे बताओ। तब मैं तुम्हें प्रेम करूंगा।" जैसे हमारा शरीर कार्बोहाईड्रेट्स और अमीनो ऐसिडस से बना है, हम एक ऐसे तत्व से बने हैं जो कि प्रेम है। क्रोध, लालच, ईर्ष्या ये सब प्रेम के ही विकृत रूप हैं।
प्रश्न: आतंकवाद का नियंत्रण कैसे करें? श्री श्री: समस्त संसार में सभी धर्मों में यही चर्चा चल रही है कि आतंकवाद को कैसे रोकें। भारत के आध्यात्म और ज्ञान में इतनी ताकत है जिससे कि आतंकवाद और धर्मांधता को नियंत्रित किया जा सकता है।
प्रश्न: क्या ज्योतिष एक विज्ञान है? श्री श्री: हां, यकीनन ज्योतिष एक विज्ञान है। पर इसका अर्थ ये नहीं कि सभी ज्योतिषी वैज्ञानिक हैं!
प्रश्न: ऐलोपैथी में कैंसर या क्षयरोग का इलाज नहीं है। क्या आयुर्वेद या सिद्ध चिकित्सा पद्दति में इनका इलाज है? श्री श्री: अवश्य है। तुम्हें पता है, सिद्ध चिकित्सा पद्दति केवल तमिल नाडू में ही उपलब्ध है। आयुर्वेद पूरे देश में उपलब्ध है।
प्रश्न: क्या २०१२ में दुनिया का अंत हो जायेगा? क्या ये सच है? श्री श्री: १९९९ में लोग कहते थे कि नई सह्स्त्राब्दि के पूर्व दुनिया का विनाश हो जायेगा। कनाडा में तो कुछ लोगों ने छः छः महीने का राशन भी संग्रहित कर के रख लिया था! (हंसी)
२०१२ में एक सकरात्मक बदलाव आयेगा, और ये आध्यात्मिक होगा। तुम्हें पता है, दक्षिण ध्रुव के पास टेर डेल फ़िआगो में और उत्तरी ध्रुव के पास नौर्वे में लोग ध्यान कर रहे हैं, शाकाहारी हो रहे हैं, भारतीय परंपराओं को अपना रहे हैं और ॐ नमः शिवाय का जप कर रहे हैं।
प्रश्न: गुरुजी, हमारी दो बिनती हैं। आप चेन्नई में क्यों नहीं आते और यहां पर एक आश्रम क्यों नहीं शुरु करते? श्री श्री: कल से यहाँ एक ध्यान केन्द्र खुलने जा रहा है। तुम सब यहाँ आकर ध्यान किया करना।
प्रश्न: हम ’आर्ट आफ़ लिविन्ग’ का एक टी वी चैनेल क्यों नहीं शुरु करते, ताकि ज्ञान सब तक पंहुचे? श्री श्री: इसे सिर्फ़ एक चैनेल तक सीमित क्यों रखें? ये सभी चैनेलों पर होना चाहिये। (हंसी)
यदि तुम एक चैनेल शुरु करना चाहते हो तो मैं तुम्हारा प्रोत्साहन करता हूं। उस चैनेल में सिर्फ़ ध्यान और संगीत ना होकर आध्यात्मिक ज्ञान भी हो, और दुनिया में क्या हो रहा है उसकी भी खबर हो।
एक आखिरी बात, जब भी तुम्हें कोई चिंतायें सतायें, तुम पत्र या कोरियर के द्वारा मुझे दे दो। कुछ ऐसा करो जो तुम्हारे आसपास के लोगों के लिये उपयोगी हो। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हारे बाकी सब विषयों की देखभाल हो जायेगी।
१८ नवंबर, २००९ को परम पूज्य श्री श्री रवि शंकर ने बैंगलोर आश्रम में पधारे जर्मनी के मंत्री-राष्ट्रपति श्री गुन्थर ह. ओएट्टिंगर एवं उनके साथ पधारे राजनैतिक प्रतिनिधिमंडल का स्वागत किया। इस प्रतिनिधिमंडल में जर्मनी के वित्त एवं अर्थशास्त्र के राज्य मंत्री एवं अन्य संसद सदस्य शामिल थे। इस उपल्क्ष्य में कर्नाटक प्रदेश के उद्योग मंत्री श्री मुरुगेश रुद्रप्पा निरानी एवं फ़ेडरेशन आफ़ करनाटक चेंबर आफ़ कौमर्स एण्ड इन्डस्ट्री के अध्यक्ष श्री क्रास्टा भी मौजूद थे।
श्री श्री ने कहा:
आप सब का स्वागत है। हमें बहुत खुशी है कि आप जर्मनी के अपने घर से इस घर में आये। ये भी आपका घर है। इस देश में आपका स्वागत है। इसे अपना ही घर जान कर आराम करें।
इस देश की पुरातन विचारधारा रही है, "ये विशव एक ही परिवार है।" हम सब एक ही परिवार का अंश हैं। ऐसा परिवार जहां मानवीय गुणों की सत्ता का सर्वोच्च महत्व हो। मानवीय गुणों की आवश्यकता व्यापार, राजनीति और सामाजिक जीवन में भी है। किसी भी क्षेत्र में आप देखें, अगर वहां मानवीय गुण हैं, एक जुड़ाव है, सामंजस्य है तो समाज जीवित रहता है। १० वर्षों में कम्यूनिज़्म ढह गया। १० महीनों से भी कम समय में पूंजीवाद ढह गया। मानवीयता के अभाव में कोई भी वाद चल नहीं सकता। कुछ लोगों के लालच के कारण ही आज पूरी दुनिया एक वित्तीय संकट से जूझ रही है।
ये पुरानी बात है कि सब अलग अलग कक्षों में काम करें। समाज अलग था। राजनीति अलग थी। व्यापार का क्षेत्र अलग था। धर्म और आध्यात्म अलग थे। समाज के सर्वांगीण विकास के लिये समाज के सभी अलग अलग हिस्सों को एक ताल में सामंजस्य स्थापित कर के, एक दूसरे को सहयोग देते हुए काम करना होगा।
नैतिकता ही व्यापार की रीढ़ की हड्डी है। व्यापार से विश्व का पोषण होता है। व्यापार से ही विश्व से भुखमरी जायेगी और समाज में आत्मविश्वास जगेगा।
मुझे खुशी है कि भारतीय और जर्मन व्यापार मंडल यहां आये हैं। मैं चाहता हूं कि आप लोग आपस में बात करें और भारत, जर्मनी और यूरोप के बीच हमारी पुरानी परंपरा पुष्ट करें।
हम सब एक ही परिवार का अंग हैं। स्वस्थ शरीर, सौम्य समाज और प्रसन्न मन हरेक का जन्मसिद्ध अधिकार है। आइये, हम सब साथ मिलकर एक सुखी समाज के लिये काम करें । धन्यवाद।