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"मन आखिर है क्या?"

प्रश्न : आर्ट आफ़ लिविंग के एक शिक्षक ने कहा था कि, ‘ईशवर, उत्तम है। ईश्वर ने हमें बनाया है, इसलिये हम भी उत्तम हैं।’ यहाँ तक तो बात ठीक लगती है। पर जब हम उत्तम हैं, तो क्या एक इन्जीनियर का काम भी उत्तम नहीं होना चाहिये? पर ऐसा तो नहीं होता।

श्री श्री रवि शंकर : प्रश्न उत्तम है, और उत्तर और भी उत्तम है। सृष्टि में हरेक चीज़ उत्तमता के एक स्तर से दूसरे स्तर पर अग्रसर हो रही है। दूध उत्तम है, और जब वह दही बन जाता है, दही भी उत्तम है। आप दही से क्रीम निकाल सकते हैं, और वह भी उत्तम है। फिर आप मक्खन बनाते हैं और वह भी उत्तम है। ये एक दृष्टि हुई। दूसरी दृष्टि से देखें तो, दूध खराब हो गया तो आप ने उस से पनीर बनाया। जब दही खराब हो गया तो आप ने उस में से मक्खन निकाला। ये देखने का दूसरा तरीका हुआ। आप की दृष्टि पर निर्भर है कि आप कैसे देखें। अनुत्तमता से ही उत्तमता को महत्व मिलता है। है कि नहीं? आप किसी चीज़ को उत्तम कैसे कह सकते हैं?
किसी भी वस्तु को दोष रहित तभी समझ सकते हैं, जब कहीं पर दोष देख चुके हैं। इसलिये दोषयुक्त वस्तु का होना भी आवश्यक है, किसी दोषहीन उत्तम चीज़ को समझने के लिये। तो, दोष ही उत्तम को उत्तम बनाते हैं!

प्रश्न : मैं सोच रहा हूँ कि ये मन आखिर है क्या? क्या यह हमारे दिमाग में किसी एक जगह में है या यह पूरे जगत में व्याप्त है? हाँ, मैं यह भी कहना चाहता हूँ आप सर्वोत्तम हैं!

श्री श्री रवि शंकर : मन, ऊर्जा का स्वरूप है जो कि पूरे शरीर में व्याप्त है। हमारे शरीर के हर कोष से ऊर्जा प्रसारित होती है। आपके आस पास, पूरी ऊर्जा को सम्मिलित रूप से मन कहते हैं। मन, दिमाग के किसी एक भाग में नहीं स्थित है, अपितु शरीर में सभी जगह व्याप्त है।

चेतना विषयक ज्ञान बहुत गहरा है। हमें कभी कभी इस गहराई में जाना चाहिये। जितना गहराई में जायेंगे, उतना ही इसे समझ सकेंगे। जितना समझोगे, उतने ही चकित होते जाओगे! वाह!

तुम्हें पता लोगों का एक भूतिया हाथ होता है, जिसका अर्थ है कि सच में उनका हाथ नहीं है, पर उन्हें फिर भी उस हाथ में संवेदना होती है, पीड़ा और खुजली होती है! जो लोग अपना हाथ या पैर किसी दुर्घाटना वश खो देते हैं, उन्हें बाद में कभी कभी उस खोये हुये हाथ या पैर के अस्तित्व का अभास होता है। हालांकि वो सचमुच नहीं होता है। इस से ये साबित होता है कि मन, शरीर के किसी एक भाग में स्थित ना होकर, पूरे शरीर के इर्द गिर्द रहता है। शरीर का आभा-मण्डल ही मन है। हम सोचते हैं कि मन, शरीर के भीतर है, पर सत्य इसका उल्टा है - शरीर, मन के भीतर है। शरीर एक मोम्बत्ती की बाती की तरह है, और मन इसकी ज्योति है।

प्रश्न : गुरुजी, हम सब यहाँ मौन की गहराई की अनुभूति को समझने आये हैं। मुझे यहाँ बहुत अच्छा भी लग रहा है और मैं एकान्त व मौन में रहना पसंद करने लगा हूँ। पर जब मैं वापस ऑफ़िस या अन्य सामाजिक जगह पर जाऊँगा तो क्या बहुत मौन रखना वहाँ ठीक होगा?

श्री श्री रवि शंकर : संतुलन! जीवन में संतुलन रखो। किसी भी चीज में अति करना ठीक नहीं है। बहुत बोलना भी ठीक नहीं और बहुत मौन भी ठीक नहीं है तुम्हारे लिये इस वक्त।

प्रश्न : हम जानते हैं कि जीवन में भाग्य महत्व रखता है। जीवन में सफलता और असफलता भाग्य से ही संबंधित हैं तो फिर हमारा कार्य भार क्या रह जाता है जीवन में?

श्री श्री रवि शंकर : तुम अपना भाग्य खुद बनाते हो। तुमने कल जो किया वह आने वाले कल का भविष्य होगा और तुम आज जो करोगे वह आने वाले कल के बाद के दिनों का भाग्य बनेगा।

प्रश्न : प्राचीन भारत का इतिहास भरा पड़ा है सिद्ध ज्ञानियों और योगियों की गाथाओं से जिनमें थीं अद्‍भुत अलौकिक शक्तियाँ और सजगता। पर इन कहानियों को कैसे समझा जाये- केवल पौराणिक कहानियों के रूप में या फिर कोई संकेत है कि हम सभी में इस दैवी शक्ति के छुपे होने की सम्भावना है?

श्री श्री रवि शंकर : क्या आप को सबसे पहले उड़ने वाले हवाई जहाज़ के बारे में पता है? सबसे पहले हवाई जहाज़ किसने उड़ाया था? (जवाब आया - राइट ब्रदर्स) यही हम सब किताबों में भी पढ़ते आ रहे हैं, पर यह गलत है। राइट ब्रदर्स से ५० साल पहले, बंगलोर के सुब्रय शास्त्री ने यह कार्य किया था।

वे ध्यान और मौन के बाद एक योगी से मिले थे जिनकी सहायता से और गहरे ध्यान में जाने के बाद उन्हें विमान बनाने का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होनें विमान बनाये। उसने ‘वैमानिक शास्त्र’ नामक पुस्तक भी लिखी थी और १८०० में एक पारसी व्यक्ति के साथ मिलकर पहला विमान उड़ाया था। पारसी लोग, ईरान से आकर भारत में बसने वाले लोग हैं जो जोरोस्ट्रियन धर्म को मानते हैं। उस पारसी व्यक्ति से मिली आर्थिक सहायता से वह पहला प्लेन बना था जिसमें उन दोनों ने उड़ान भरी थी चौपाटी पर मुम्बई (बॉम्बे) के समुद्र किनारे पर। यह खबर लंदन टाइम्स अखबार में भी छपी थी। परंतु अंग्रेजी हुकूमत के अंतर्गत दोनों को जेल में डाल दिया गया था, और विमान के सब नक्शे भी जब्त कर लिये गये थे। अभी हाल ही में टेलीविजन पर यह खबर दिखायी गयी थी लंदन के अखबार की छवि सहित, जिसमें विमान बनाने के नक्शे के साथ यह खबर छपी थी।

भारद्वाज वैमानिक शास्त्र’ विमान विज्ञान, जो कि ॠषि भारद्वाज द्वारा लिखा गया था उसमें पाँच अलग अलग तरह से विमान बनाने के तरीके आज भी मौजूद हैं। ऋषि भारद्वाज ने अलग अलग विमनों की इंजिन रचना बताई है - सीधा उड़ने वाले विमान हेलीकॉप्टर जैसे और अन्य विमान जो हवाई पट्टी पर दौड़ने के बाद उड़ान भरते हैं उन के लिये भी।

इसके बारे में आपको अधिक जानकारी www.bharathgyan.com वेबसाइट से मिल जायेगी।


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"प्रकृति के साथ हमारा संबंध"

सत्य की खोज में आमतौर पर विज्ञान और आध्यात्म को एक दूसरे से भिन्न माना जाता है। दोनो का ही आधार स्तंभ है जिज्ञासा। आधुनिक विज्ञान वस्तुनिष्ठ विश्लेषण का तरीका अपनाता है, और आध्यात्म आत्मपरक विश्लेषण करता है। 'ये क्या है? जगत में ये क्या है?' इन प्रश्नों के साथ विज्ञान बाहरी जगत को जानने में रत रहता है। जबकि आध्यात्म की शुरुवात होती 'मैं कौन हूं?' प्रश्न से।

प्राचीन समय के जगत में इन दोनों प्रकार के ज्ञान में कोई संघर्ष नहीं था। मनुष्य का स्वयं के बारे में ज्ञान और ब्रह्माण्ड के बारे में ज्ञान, एक दूसरे के पूरक थे, और ये ज्ञान मनुष्य का सृष्टि के साथ एक सुदृढ़ और स्वस्थ संबंध बनाने का आधार था। इन दो प्रकार के ज्ञान को अलग मानने की वजह से आज विश्व के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

प्राचीन ज्ञान के मुताबिक मनुष्य के अनुभव में ५ परतें आती हैं, जो कि हैं – पर्यावरण, शरीर, मन, अंतर्ज्ञान और आत्मा।

पर्यावरण के साथ हमारा संबंध हमारे अनुभव की सर्वप्रथम और सब से महत्वपूर्ण परत है। अगर हमारा पर्यावरण स्वच्छ और सकरात्मक है तो हमारे अनुभव की बाकी सभी परतों पर इसका सकरात्मक प्रभाव पड़ता है, और वे संतुलित हो जाती हैं और हम अपने और अपने जीवन में आये व्यक्तियों के साथ अधिक शांति और जुड़ाव महसूस करते हैं।

मनुष्य की मानसिकता के साथ पर्यावरण का एक नज़दीकी रिश्ता है। प्राचीन समय की सभ्यताओं में प्रकृति को सम्मान के भाव से देखा गया है - पहाड़, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चँद्र...। जब हम प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ अपने संबंध से दूर जाने लगते हैं, तब हम पर्यावरण को प्रदूषित करने लगते हैं और पर्यावरण का नाश करने लगते हैं। हमे उस प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा जिससे की प्रकृति के साथ हमारा संबध सुदृढ़ बनता है।

आज के जगत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जो कि लालचवश, जल्द मुनाफ़ा और जल्द नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं। उनके कृत्य जगत के पर्यावरण को नुक्सान पँहुचाते हैं। केवल बाहरी पर्यावरण ही नहीं, वे सूक्ष्म रूप से अपने भीतर और अपने आस पास के लोगों में नकरात्मक भावनाओं का प्रदूषण भी फैलाते हैं। ये नकरात्मक भावनायें फैलते फैलते जगत में हिंसा और दुख का कारण बनती हैं।

अधिकतर युद्ध और संघर्ष इन्हीं भावनाओं से ही शुरु होते हैं। जिसके परिणाम में पर्यावरण को नुक्सान होता है, और उसे स्वस्थ करने में बहुत समय लगता है। हमें मनुष्य के मानसिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानसिकता ही प्रदूषण की जड़ है - स्थूल तथा भावनात्मक। अगर हमारे भीतर करुणा और परवाह जग जाते हैं, तो वे आधार बनते हैं एक गहरे संबंध का जिस में कि हम पर्यावरण की और व्यक्तियों की देखभाल करते हैं।

प्राचीन समय में अगर एक व्यक्ति एक वृक्ष काटता था तो साथ ही ५ नये वृक्ष लगाता था। प्राचीन समय में लोग पवित्र नदियों में कपड़े नहीं धोते थे। केवल शरीर के अग्नि-संस्कार के बाद बची हुई राख को नदी में बहाते थे ताकि सब कुछ प्रकृति में वापिस लय हो जाये। हमें प्रकृति और पर्यावरण को सम्मान और सुरक्षा के भाव से देखने वाली प्राचीन प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा।

प्रकृति के पास संतुलन बनाये रखने के अपने तरीके हैं। प्रकृति को ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो पंचतत्व इसका आधार हैं, उनका मूल स्वभाव एक दूसरे के विरोधात्मक है। जल अग्नि का नाश करता है। अग्नि वायु का नाश करती है...। और प्रकृति में कई प्रजातियां हैं - पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी...। भिन्न प्रजातियां एक दूसरे से वैर रखती हैं, फिर भी प्रकृति एक संतुलन बना कर रखती है। प्रकृति से हमे ये सीखने की आवश्यकता है कि अपने भीतर, अपने परिवेश में और जगत में विरोधी शक्तियों का संतुलन कैसे बनाये रखें।

सबसे अधिक आवश्यक है कि हमारा मन तनाव मुक्त हो और हम इस खुले मन से जगत का अनुभव कर सकें। ऐसी मनस्थिति से हम इस सुंदर पृथ्वी का संरक्षण करने के उपाय बना सकेंगे। आध्यात्म से हमे अपने असल स्वभाव का अनुभव होता है और खुद से और अपने परिवेश से एक जुड़ाव का एहसास होता है। अपने असल स्वभाव के साथ परिचय होने पर नकारात्मक भावनायें मिट जाती हैं, चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और पूरी पृथ्वी की देखभाल के लिये एक दृढ़ संकल्प उपजता है।

हमारी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने में और अपने आप से और अपने परिवेश से अपने संबंध को सुदृढ़ करने के लिये क्या करना चाहिये? ये कुछ सक्षम सूत्र हैं -
  1. उप्युक्त भोजन : भोजन से हमारे मन पर असर पड़ता है। जैन परंपरा में मन पर भोजन के प्रभाव के विषय में बहुत शोध किया है । आयुर्वेद, चीनी चिकित्सा पद्दति एवं विश्व की अन्य कई प्राचीन परंपराओं में भोजन से होने वाले मन पर प्रभाव को पहचाना था। आधुनिक विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि भोजन से हमारी भावनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भावनात्म्क रूप से परेशान बच्चे अधिक भोजन लेते हैं और मोटापे के शिकार हो जाते हैं। एक संतुलित आहार का हमारी भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव होता है और इसका असर हमारी चेतना पर होता है।
  2. हल्का या मध्यम व्यायाम|
  3. पंचकर्म : आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा परंपरा में भीतरी सफ़ाई की एक प्रक्रिया है जिसे पंचकर्म कहते हैं। पंचकर्म में शामिल होती हैं - मालिश प्रक्रिया, निर्धारित भोजन, और शरीर की भीतरी सफ़ाई। इससे हज़ारों लोगों को तनाव से मुक्त होने में और अपने व्यवहार में आये विकारों से मुक्त होने में सहायता मिली है। साथ ही, ये कई बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  4. योग, ध्यान और प्राणायाम : योग, ध्यान और प्राणायाम। अपने शरीर और पर्यावरण को सम्मान की दृष्टि से देखने में ये बहुत सहायक हैं। ये अपने शरीर और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने में सहायक होता है और भावनात्मक असंतुलन से भी मुक्त करता है।
  5. संगीत और नृत्य : इनसे शरीर और मन में तारतम्यता और समतुलना आती है। खासतौर पर उस संगीत से जो कि बहुत तेज़ और कोलाहलपूर्ण ना हो। शांतिदायक संगीत हमारे मन और शरीर में एक स्पंदन पैदा करता है जो कि समतुलना लाता है, जैसे कि शास्त्रीय और लोक संगीत।
  6. प्रकृति : प्रकृति के साथ समय बिताना, मौन रहना, प्रार्थना करना..ये बहुत सहायक हैं अपने मन के साथ रहने में।
  7. और फिर सेवा। यह जीवन में संतुष्टि के लिए अनिवार्य है।

संदर्भ..


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तृप्त होने के लिए विज्ञान और ज्ञान दोनो चाहिए

कोलकता (भारत), १२ फ़रवरी २०१०

रुद्र पूजा शुरु करने से पहले, श्री श्री ने शिव तत्व और शिवरात्रि का सार बताया:

आइये हम सब शिव तत्व के बारे में थोड़ा जानने का प्रयास करते हैं। थोड़ा ही जान सकते हैं। इसे समझने के लिए बुद्धि को संतुष्ट और शुद्ध भावनाओं का उदय करने की ज़रुरत है।

हमें विज्ञान और ज्ञान, दोनों से तृप्त होना है। ईश्वर की खोज के लिये लंबी तीर्थयात्राओं पर जाना आवश्यक नहीं है। जहां तुम हो, वहां तुम्हें ईश्वर की प्राप्ति न हो, तो कहीं और भी नहीं हो सकती। जब मन लीन हो जाता है, वही शिव है। जहां तुम हो, वहीं स्थिर हो जाओ। जैसे ही तुम अपने भीतर के केन्द्र में स्थिर हो जाते हो, तुम ईश्वरीय दिव्य शक्ति को हर जगह पाते हो। यही ध्यान है।
शिव का एक नाम विरूपाक्ष है। इसका अर्थ है कि वह निराकार है, परंतु सब को देख रहा है। हम जानते हैं कि वायु हमारे इर्द गिर्द सभी जगह व्याप्त है। हम वायु को महसूस कर सकते हैं।अगर वायु भी हमको महसूस करने लगे, तो? हम आकाश तत्व से घिरे हैं, और उसे पहचानते हैं। अगर आकाश भी तुम्हें देखने और महसूस करने लगे, तो? ऐसा होता है। बस, हम इसके प्रति सजग नहीं है। विज्ञान की भाषा में इसे Theory of Relativity कहते हैं। देखने की प्रक्रिया में दृष्य और दृष्टा, दोनों पर कुछ प्रभाव पड़ता है। ईश्वर की दिव्य शक्ति चारों ओर से तुम्हें देख रही है। ये निराकार दिव्य शक्ति है। ये निराकार तत्व ही सृष्टि के अस्तित्व का मूल है और लक्ष्य भी। दृष्टा भी वही है, दृष्टि और दृश्य भी। ये निराकार दिव्य शक्ति शिव है। इस तत्व को अपने भीतर जगाना और इसे अनुभव करना ही शिवरात्रि है।

आमतौर पर उत्सव के जोश में हम होश खो देते हैं। शिवरात्रि उत्सव में गहन विश्राम के साथ सजगता का समन्वय है। शिवरात्रि में हम सजगता के साथ विश्राम करते हैं। कहा गया है कि जब सब सो रहे हों, तब भी योगी सचेत रहता है। एक योगी के लिये हर दिन शिवरात्रि है। भगवान शिव की व्याख्या आदि शंकराचार्य ने बड़े सुन्दर भाव से इन पंक्तियों में की है... (श्री श्री उनमें से कुछ पंक्तियां गाते हैं।)
आदिय्न्तहीनं – जिस का ना आदि है ना अंत। भोलेनाथ, जो सभी लोगों के भोले नाथ हैं। और सर्वदा सभी जगह उपस्थित हैं। हम सोचते हैं कि शिव गले में सर्प डाल कर कहीं बैठे हैं। ऐसा नहीं है। यह केवल चित्रकारों की एक कल्पना है। शिव वो है जिस में सृष्टि का जन्म हुआ है, जिसमें इस समय सब मौजूद हैं, और जिसमें सृष्टि लीन होती है। तुम जगत में जितने भी आकार देखते हो, सब उसी शिव के आकार हैं।

समस्त सृष्टि में शिव समाये हैं। शिव अजन्मा है, और उनका अंत भी नहीं है। शिव चेतना की चौथी अवस्था हैं; तुरीया अवस्था, ध्यान की अवस्था - जो जाग्रत, सुषुप्त और स्वप्नावस्था से ऊंची है।

ये अद्वैत चेतना सब जगह उपस्थित है। इसीलिये शिव की पूजा शिवमय होकर करनी चाहिये। चिदानंदरूप – शिव सत चित आनंद है।

तपोयोगम्य – जिसे तप और योग से जाना जा सकता है। शिव तत्व को वेदों के ज्ञान में अनुभव किया जा सकता है, शिवोहं (मैं शिव हूं), शिवकेवल्योहं (केवल शिव ही है) की अवस्था तक जीव पंहुच जाता है।

शिवरात्रि का दिन आनंद और संतोष के अनुभव के लिये है। योग के बिना शिव तत्व का अनुभव नहीं हो सकता। योग का अर्थ केवल योगासन नहीं है। योग का अर्थ है शिव तत्व की अनुभूति जो प्राणायाम और ध्यान से होती है - जब हम भीतर से ‘वाह’ अनुभव करते है।

शंभो शब्द भी उसी मूल से आया है – ये अनुभव करना कि दिव्यता, यह सृष्टि, और अपना खुद का स्वरूप कितना सुंदर है! ये एक आश्चर्य है कि वही दिव्य चेतना इस जगत के हरेक जीव के भीतर है! इससे बड़ा कोई आश्चर्य नहीं है। वह एक अनेक कैसे बना? शिवरात्रि हमें अनेक से एक की ओर ले जाती है। इसके लिये योग और ध्यान आवश्यक हैं। ध्यान के बिना मन शांत नहीं होता।

भजन और ध्यान शिवरात्रि के उत्सव का अंग हैं। पूर्ण हृदय से सभी इस में सहभागिता करते हैं। सभी को गाना चाहिये।

शिव सभी कारणों के कारण हैं। शिव के कारण ही सब हो रहा है। शिव के कारण ही सब है – पेड़ उग रहे हैं, सूर्योदय हो रहा है, हवा चल रही है...हर कार्य का कारण शिव है। शिव के बिना कुछ नहीं होता।
पंचमुख यां पंचतत्व – शिव के पांच मुख हैं – जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश। इन पांच तत्वों को जानना तत्वज्ञान है।
फिर शिव की उपासना अष्टमूर्ति (आठ आकारों) में होती है – मन, चित्त और अहंकार इसी में आते हैं। यह शिव का साकार और निराकार रूप हुआ।

शिव की उपासना का अर्थ है, शिव तत्व में लीन होकर शुभ कामना करना। क्या कामना करें? उदार हृदय से विश्व के कल्याण के लिये कामना करें। कोई दुखी ना रहे। सर्वे जनः सुखिनो भवन्तु।
हां, इस मौके पर एक संकल्प कर सकते हो। ऐसा संकल्प जो तुम्हारी सांस की तरह, तुम्हारे हृदय की धड़कन की तरह बार बार तुम्हारे ज़हन में आये। जब तुम ऐसा संकल्प दिव्य शक्ति को समर्पित करते हो, तो वह अवश्य पूरा होता है।

हम प्रकृति की भी उपासना करते हैं। इस धरती पर जो कुछ भी है, उसमें दिव्य शक्ति का समावेश है। वृक्ष, पहाड़, नदियां, पृथ्वी और उस पर रहने वाले सब लोग - इन सब का आदर किये बिना पूजा पूर्ण नहीं होती। सब का सम्मान करना, दक्षिणा है। दा का अर्थ है, देना। दक्षिणा का अर्थ है, जिसे देने से हमारे भीतर की अपवित्रता दूर हो जाती है। दक्षिणा के बिना पूजा अधूरी है।
जब हम समाज में दक्षता से, और मन की भ्रांतियों से मुक्त होकर कार्य करते हैं, तो नकरात्मक वृत्तियां, जैसे क्रोध, चिंता और दुख नष्ट हो जाते हैं।

मैं कहूंगा अपनी समस्यायें, चिंता और दुख, मुझे दक्षिणा में दे दो। ये कैसे होता है? साधना, सेवा और सत्संग (सत्य का संग) से।


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"ध्यान में बैठना सर्वोत्तम पूजा है"


बैंगलोर आश्रम, ४ सितंबर २००९

प्रश्न : लाखों लोग आध्यात्म के पथ पर चलते हैं, पर कोई कोई व्यक्ति ही लक्ष्य तक पहँच पाता है। क्या मैं उन भाग्यशाली व्यक्तियों की गिनती में आ सकता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये कोई नई बात नहीं है। भगवद गीता में भगवान कृष्णः ने कहा था कि विश्व की इतनी जन्संख्या में से कुछ ही लोग इस पथ पर चलते हैं।

जैसे प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिये कई लोग चुनाव लड़ते हैं, पर अंत में एक ही चुना जाता है। जैसे कई लोग IPS, IAS अफ़सर बनना चाहते हैं..। आध्यात्म के पथ पर ये अच्छी बात है कि हर व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँच सकता है।

बुद्ध के काल में दस हज़ार लोगों ने मुक्ति प्राप्त की। आज भी लाखों लोग साधना कर रहें हैं और उन में से कई लक्ष्य को पा लेंगे।

सागर के पास कुछ लोग जाते हैं ताज़ी हवा खाने के लिये। कुछ लोग सागर से मोती निकालने जाते हैं। कुछ लोग सागर से तेल निकालने के लिये जाते हैं। हमारी पात्रता ये निर्धारित करती है कि हम कहां पहुँचेंगे। इस पथ पर एक भी कदम बेकार नहीं जाता है। वो तुम्हें आगे ही ले जायेगा।

एक बार तुम प्रेम में पीड़ा का अनुभव कर लेते हो तो तुम मुक्ति चाहते हो। शांति और प्रेम के बिना, आनंद अधूरा है। आनंद हमारा स्वभाव है। वहाँ पहुँचने में कोई व्यवधान नहीं है। ये ना सोचो कि तुम वहाँ पहुँच पाओगे या नहीं। अगर तुम ऐसा चाहते हो, तो ये होगा – आज या कल।

प्रश्न : ईसाई धर्म में ‘फ़ैसले के दिन’ का क्या रहस्य है?

श्री श्री रवि शंकर :
ईसाई धर्म कहता है कि फ़ैसले का दिन आयेगा। उस दिन सभी मुर्दे धरती से बाहर आ जायेंगे, और उनसे उनके अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब लिया जायेगा, जिसके हिसाब से उन्हें स्वर्ग यां नर्क में भेजा जायेगा।

आज जो ‘फ़ैसले के दिन’ का मतलब समझा जाता है, वो उसका असल रूप नहीं है। समय के फेर और भिन्न व्याख्याओं से इसका अर्थ वो नहीं रहा जो कि असल में था। जिस भौगोलिक स्थान पर ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म का जन्म हुआ था, वहाँ लकड़ी की कमी थी। वहाँ की धरती पहाड़ी और पथरीली थी। वहाँ मुर्दों को दफ़न करना बेहतर विकल्प था, और ये महंगा भी नहीं था।

भारत में लकड़ी की तादाद बहुत थी, तो यहां मृत शरीर को जलाने की प्रथा चली। जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म जहाँ जन्में वहाँ मुर्दों को जलाना संभव नहीं था। तो, स्थान के अनुसार लोग प्रथा बनाते हैं।

‘फ़ैसले के दिन’ की लोक प्रचलित व्याख्या ये है कि मरे हुये लोग अपनी समाधि से बाहर आयेंगे। पर ऐसा नहीं है।

बाइबल में ईसा ने कहा है, ‘Judge not and ye shall not be judged.’ ईसा कहते हैं, किसी व्यक्ति की आलोचना मत करो। निर्णय का काम भगवान पर छोड़ दो। एक दिन (फ़ैसले के दिन), भगवान अपना निर्णय उस व्यक्ति को देंगे।

भारत में हम कर्म पर विश्वास करते हैं, जिसका अर्थ है कि तुम अपने सभी कर्मों का फल भोगोगे। अच्छे कर्म सुख लायेंगे और बुरे कर्म दुख लायेंगे। इसी तरह, ईसाई धर्म में कहा कि किसी के कर्म की आलोचना मत करो, सबको अपने कर्मों का सलीब उठाना ही है।

प्रश्न : कभी कभी मैं अपने भीतर कई विकार पाता हूं, और ये महसूस करता हूं कि मैं आध्यात्म के पथ पर चलने लायक नहीं हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
आत्मग्लानि से छुटकारा पाओ। अभी तक तुम आत्मग्लानि में तप रहे थे और तुम्हें ये पता तक नहीं था। अब जब तुम ये जान गये हो, तो इसे और नहीं सह पाओगे। इससे तुम साधक बन गये। कितने लोगों ने अपने विकार छोड़ दिये हैं। सत्संग और सेवा करते रहो और ध्यान की गहराई में जाओ – इस से तुम्हारे सब विकार और पुराने संस्कार मिट जायेंगे। अगर तुम एकदम नाकारा होते तो तुम्हें यहाँ, सत्संग में, इस पथ पर आने का सौभाग्य नहीं मिलता। तुमने कुछ अच्छे कर्म किये हैं। अपने अच्छे कर्मों पर भी ध्यान दो।

प्रश्न : क्या समाधि से आगे भी कुछ है?

श्री श्री रवि शंकर :
समाधि से आगे है बोध मात्र शुद्ध सत्ता।

ऐसी सजगता जो ना भीतर की है और ना बाहर की। बेहोशी नहीं है। शुद्ध चेतना है। कोई फ़र्क नहीं पड़ता चाहे आंखें खुली हों या बंद – सब एक जैसा ही लगता है।

प्रश्न : समाधि क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
जब मन केन्द्रित और विश्राम में होता है, तब समाधि की एक झलक मिलती है। सुदर्शन क्रिया के बाद जब तुम लेटते हो तो ये अनुभव तुम्हें होता है। जब तुम्हें लगता है – मुझे पता नहीं मैं कहाँ हूं, पर मैं हूं।

प्रश्न : आप कहते हैं कि भगवान के सभी रूप चित्रकार की कल्पना से बने है। फिर मंत्रजाप से इनका क्या संबंध है?

श्री श्री रवि शंकर :
कांचीपुरम के कामाक्षी मंदिर में एक सुंदर स्वरूप है। वहाँ तुम्हें प्रसाद मिलता है। पर ऐसा कहा जाता है कि इस का फल तुम्हें तब तक नहीं मिलेगा जब तक तुम इसे मंदिर के पीछे अरूप लक्ष्मी को अर्पित नहीं करते। अरूप लक्ष्मी से तुम्हें फिर प्रसाद मिलता है।

इसका अर्थ बहुत गहरा है। ये एक प्रथा है जिसकी जड़ वेदांत में है। तुम्हें रूप से अरूप तक ले जाया जाता है। पहले तुम रूप की पूजा करते हो, फिर शालिग्राम (काले रंग का गोलाकार पत्थर) की। मन, जब रूप में केंद्रित हो जाता है, तब उसे गोल पत्थर में केंद्रित किया। जब वहाँ मन लग जाये तो उससे आगे मंत्र आता है।

भगवान कहीं आसमान में नहीं हैं, बल्कि स्पंदन में है – हमारी चेतना है। ध्यान में बैठना सर्वोत्तम पूजा है। उस में मंत्रों को भी समर्पित कर देते हैं। मंत्र का उपयोग भी कुछ कुछ रूप जैसा ही है (केंद्रित करने के लिये)। ये एक पड़ाव है।

प्रश्न : प्रसाद का वैज्ञानिक महत्व क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
प्रसाद वही है, जिसके मिलने से मन प्रसन्न हो जाता है। कर्नाटक के एक संत ने लिखा है कि, ये समय जो हमें मिला है, ये प्रसाद है, हमारी सांस, शरीर, मन, प्राण और भाव, सभी प्रसाद हैं। हमें जीवन में जो भी मिला है वो प्रसाद है। जो मैंने बिछाया है वो प्रसाद है, और जिससे मैंने अपने आप को ढका है, वो भी प्रसाद है।


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