प्रश्न: गुरूजी जो कुछ भी याद रखने योग्य है, मैं उसे भूल जाता हूं और जो याद रखने योग्य नहीं है, उसे मेरी स्मृति याद करती रहती है, मन की यह कैसी विडम्बना है ? श्री श्री रवि शंकर: कम से कम आपको यह समझ तो आ गया है | कई लोगों को यह समझ में नहीं आता | आप अपनी पीठ को थपथपाएं | आपने सही दिशी में पहला कदम रख लिया है | थोड़े प्रयासों से यह बदल जाएगा | जब आप अतीत की समीक्षा करते हैं तो आपको इसका यही निष्कर्ष निकालना चाहिए कि सब कुछ अच्छे के लिए ही हो रहा है, क्योंकि आप गलत बातों से कुछ सीखते हैं | परन्तु इसे आपको भविष्य के लिये लागू नहीं करना है | अतीत को देखते हुए यह जान कर कि जो कुछ होता है उसके लिये पीछे एक अच्छा कारण होता है, यह सोच रख कर आप भविष्य में आगे बढ़ें | परन्तु वर्तमान में यह कहना कि ‘जो कुछ होता है, वह अच्छे के लिये होता है’ यह ठीक नहीं है |
प्रश्न: जब किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाती है तो उन्हें आप कैसे समझाते हैं ? उन्हें कैसे सांत्वना दें ? श्री श्री रवि शंकर: आपको समझाने की आवश्यकता ही क्यों है ? जब आपको किसी को सांत्वना देनी हो तो आप सिर्फ शान्ति से वहां अपनी उपस्थिति दीजिये, वहां आपकी मौजूदगी ही पर्याप्त है | हर किसी को आप शब्दों से सांत्वना प्रदान नहीं कर सकते | हर कोई यहां कुछ समय के लिए आया है, फिर उसे एक दिन ऐसे ही जाना है | कोई भी तर्क भावनाओं को सांत्वना नहीं दे सकता | इसमें तर्क की कोई भूमिका नहीं हो सकती | भावनाओं को तर्कपूर्ण निष्कर्षो या समझ से शांत करना कोई ठीक बात नहीं है |
यह बात सही है कि मन में ऐसे विचार आते है कि ‘ऐसा क्यों हुआ ?’ ऐसे प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं देना चाहिये | आप वहां पर शान्ति, प्रेम और करुणा के साथ रहे, फिर वातावरण अपने आप ही बदल जायेगा |
प्रश्न: जब किसी पौधे या पशु की प्रजाति लुप्त हो जाती है तो क्या उसका हम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ? क्या यह प्रजातियां किसी और अन्य गृह या समरूप गृह पर मौजूद होती हैं ? श्री श्री रवि शंकर: कुछ भी पूरी तरह से लुप्त नहीं होता, वह सिर्फ ऐसा प्रतीत होता है और उसकी संख्या ऊपर या नीचे होती रहती है | किसी भी प्रजाति को पूर्ण रूप से लुप्त होने के लिए बहुत समय लगता है | इसलिए आप चिंता न करे, कई अन्य गृह है परन्तु हमें इस गृह का ध्यान रखते हुए यही आनंद लेना और रहना है और वही पर्याप्त है |
प्रश्न: क्या समलैंगिकता पाप है? क्या मानवो में ऐसे प्रवृतियों को साधना और आध्यात्मिक अभ्यासों से बदला जा सकता है ? श्री श्री रवि शंकर: ऐसी प्रवृतियां आप में इसलिए आती है क्योंकि आप अपने माता और पिता दोनों से बने है, आप उन दोनों का संयोग है | हर किसी व्यक्ति में पुरुष और स्त्री के जीन होते है | जब पुरुष के गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हावी होते है या जब स्त्री के गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हावी होते है, तब इस तरह की प्रवृतियां आती जाती है | आपको अपने आप को इस तरह से कोई लेबल नहीं देना है, यह सब बदल जाएगा | इन प्रवृतियों के बदलने की पूरी संभावना है | आपको यह जान लेना है कि आप सिर्फ शरीर नहीं है | आप चमकती हुई उर्जावर्धक चेतना हैं | आप एक चमकता हुआ प्रकाश हैं और इसलिए अपने आप को उस उर्जा से और अधिक पहचानिये |
प्रश्न: मेरा आईना मुझे यह दिखाता हैं कि मैं बाहर से बड़ा हो रहा हूं, मेरी भीतर की आध्यात्मिक प्रगति को जानने के लिए मैं किस आईने का उपयोग करूं? श्री श्री रवि शंकर: क्या आप शांत, तृप्त और संतुष्ट होना महसूस करते हैं ? क्या अपने आप में फैलाव का अनुभव करते हैं ? अतीत में जाकर देखें कि आप कैसे थे और अब आप कैसे हैं | अपने स्वयं के प्रतिबिंब को इस तरह से देखने पर आपको इसकी अनुभूति होती है |
प्रश्न: गुरूजी मैं बहुत जल्दी से कुछ बनकर अपनी पहचान बनाना चाहता हूं | इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ता कि मैं अपने मन को कितने बार यह कहूं कि मेरे हाथ में कुछ नहीं है और मुझे सब कुछ स्वीकार कर लेना चाहिये, इससे मुझे और निराशा ही होती है | कृपया मेरा मार्गदर्शन करें | श्री श्री रवि शंकर: अपने आप को व्यस्त रखें | सिर्फ बैठ कर अपने बारे में न सोचें | अपनी स्वयं की छवि को बनाने की सोच आपकी प्रगति में बाधा बनाती है | आप खाली और खोखले हो जाएँ | और अधिक ध्यान करे |
प्रश्न: गुरूजी अपने आसपास के संकीर्ण मन या सोच रखने वाले लोगों से कैसे निपटा जाये ? श्री श्री रवि शंकर: उनके प्रति उदार रहें | उनके लिए सिर्फ मुस्कुराएँ | उनके लिए जैसे को तैसा वाला रुख न अपनाएं | इससे कोई लाभ नहीं होता है | उन्हें सहजता के साथ शिक्षा प्रदान करें और यह सुनिश्चित कर लें कि आप अपनी खुशी को उनके संकीर्ण मन या सोच के कारण नहीं खोयेंगे |
प्रश्न: पैसा, मन और ध्यान मेरे नियंत्रण में नहीं है ? पैसा आता नहीं है और मन ठहरता नहीं है इसलिए ध्यान भी नहीं लगता | मेरा क्या होगा गुरूजी ? श्री श्री रवि शंकर: आप ध्यान नहीं कर सके, ठीक है | पहले यह समझें कि आपका ध्यान क्यों नहीं लगता | आपके स्वयं का जो भाग पैसे और मन में उलझा हुआ है, उसे सुलझा कर मुझ में उलझा दीजिए | फिर ध्यान भी लगेगा और मन खुश रहेगा और पैसा भी अपने आप आने लगेगा |
प्रश्न: क्या प्रत्यक्ष पाप न करना नेक कार्य करने के समान है और क्या आवश्यक नेक काम को न करना पाप के समान है ? क्या मैं अपने कृत्य और अकृत्य के लिए जिम्मेदार हूं ? यदि मैं कुछ नहीं करता तो मेरी भूमिका क्या होगी ? श्री श्री रवि शंकर: कोई भी बिना कुछ करे रह ही नहीं सकता | और जब आप कुछ करते हैं तो उससे किसी को लाभ होगा और किसी को नुकसान होगा | कोई भी बिना कुछ करे १ पल भी नहीं रह सकता | आप किसी के बारे अच्छा या बुरा सोचने लगते हैं | इसलिए कुछ अच्छा करते रहें परन्तु उसके कारण आप में अहंकार नहीं आना चाहिये | “मैने इतने अच्छे कार्य किये है” | ‘नेकी कर और कुंए में ड़ाल’ इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं, और जब आप कुछ करते हैं तो यह देखें कि वह कृत्य सबको उठा या विकसित कर रहा है |
प्रश्न: क्या किसी के कर्म किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित होते हैं ? श्री श्री रवि शंकर: निश्चित ही हां | जब आप अच्छा व्यापार करते हैं और जब आप उसे अपने बच्चों को दे देते हैं तो आपके कर्म उनके पास हस्तांतरित हो जाते हैं | उसी तरह जब आप कोई बड़ी गडबडी करते हैं तो आपके बच्चों या पालकों को भी उसे सहन करना पड़ता है | कर्म निश्चित ही कोई एकल कृत्य नहीं है और उसका प्रभाव आपके परिवार और आस पास के लोगों और राष्ट्र पर भी होता है | कर्म के भी विभिन्न स्तर होते हैं |
प्रश्न : मेरे आस पास हो रहे अन्याय पर मुझे अक्सर क्रोध आता है, पर मैं यह समझता हूँ कि प्रेम और समझ की भी आवश्यकता है। मैं इन भावनाओं को संतुलित कैसे करूं?
श्री श्री रवि शंकर : जब कई तिनके मिलाकर एक झाड़ू बनाया जाता है तब वह एक बड़े कमरे की सफ़ाई उन अलग अलग तिनकों से बेहतर कर सकता है। उसी तरह, एक संघ में रह कर आप अधिक प्रभावी कार्य कर सकते हैं, बजाये कि कोई काम अकेले करने के। चाहे सेवा कार्य हो या अन्याय के विरोध में कार्य करना हो, आपको मिलकर काम करना चाहिये। ये बहुत आवश्यक है।
अन्याय तो है। इस स्थिति को बदलना आपका काम है। चीनी भाषा में ‘मुसीबत’ और ‘नये अवसर’, दोनों ही शब्दों के लिये एक ही शब्द है। अगर आप केवल समस्या देखेंगे तो निराश हो जायेंगे। ये अच्छा नहीं है। मिलकर इस पर काम कीजिये और देखिये कि आप क्या कर सकते हैं। दुनिया के कई भागों में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ है। हर काम के लिये धन खर्च होता है। हमारे संघ ने भ्रष्टाचार का विरोध कर के काफ़ी उपलब्धि प्राप्त की है।
हमारे युवाओं ने रिश्वत देने से इंकार कर दिया। जब अफ़सरों ने इस तरह का रवैया देखा, तो उनके लिये भी यह एक नई बात थी। आखिर वे भी इंसान हैं। आयुर्वेद की परियोजनाओं के लिये हमें १० लाइसेंसों की आवश्यकता थी। लोगों ने कहा कि उन्हें पाने में २ साल लग जायेंगे! हमने इन लाइसेंसों के लिये मांग पत्र भरा और रिश्वत ना देने का संकल्प किया। हम ने निश्चय किया कि आवश्यकता पड़ने पर हम ५० चक्कर लगाने को तैयार थे, पर रिश्वत देने के लिये तैयार नहीं थे। एक महीने के भीतर हमें सभी १० लाइसेंस मिल गये! तो, अन्याय के विरोध में ज़रूर लड़ो, पर बिना क्रोध के। शांत मन से लड़ो। भगवदगीता में भी ऐसा ही कहा गया है।
प्रश्न : मेरे पिता का देहान्त हुये अभी कुछ ही समय हुआ है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि वे कैसे हैं, कहाँ हैं, और मेरे बारे में क्या सोचते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : जो लोग दूसरी तरफ़ जा चुके हैं, वे आप पर आशीर्वाद बरसाते हैं। वे आपको नाप तौल की दृष्टि से नहीं देखते हैं, और ना ही आपके बारे में चिंता करते हैं। वे जानते हैं कि आप सुरक्षित रहेंगे।
प्रश्न : इच्छाओं को त्यागना चाहिये, पर क्या मुक्ति की इच्छा रखना ठीक है? ये इच्छा कब छूटेगी?
श्री श्री रवि शंकर : हाँ। मुक्ति की इच्छा होना ठीक है।
प्रश्न : अगर ईश्वर हमारे भीतर है, तो वे हमें सदा ही अच्छे कार्यों की तरफ़ प्रेरित क्यों नहीं करता है? विश्व में इतनी हिंसा और गुनाह क्यों है?
श्री श्री रवि शंकर : एक फ़िल्म की कल्पना करो जिस में कोई विलेन ना हो। कल्पना करो कि केवल एक हीरो है, जो खाता है, सोता है, और बस यूं ही रहता है, कोई काम नहीं करता है! क्या तुम ऐसी फ़िल्म देखोगे? विरोधाभासी मूल्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। कांटे और पंखुड़ियां, दोनो ही हैं। आप दोनों में से किसी को भी चुन सकते हैं।
ईश्वर आपके भीतर हैं। कभी वे सोते हैं, कभी छुप जाते हैं, कभी जागृत होते हैं और कभी नाचते हैं। थोड़ी साधना के बाद ईश्वर जागृत हो जाते हैं। तब वे चैतन्य होते हैं। अपने भीतर के देवी देवता को जगाओ!
एक पत्थर, महसूस नहीं कर सकता है पर एक मनुष्य महसूस कर सकता है। अपने भीतर के देवत्व को जगाना अति आवश्यक है। इीलिये भारत में सुबह कुछ स्तोत्र गाये जाते हैं, ‘हे ईश्वर, आप जागे और हमें आशीर्वाद दें!’ एक स्तर से ये अजीब लगता है क्योंकि बच्चे को जगाना माता पिता का कार्य है, परंतु यहाँ मनुष्य, ईश्वर के लिये गाते हैं कि जागो और सृष्टि को आशीर्वाद दो। इस विरोधाभास में अस्तित्व का गहरा रहस्य छुपा है।
प्रश्न : प्रेम हमेशा आसक्ति के साथ क्यों आता है? क्या ये संभव है कि आप अपने जीवन साथी को प्रेम भी करें पर साथ ही वैराग्य भी रहे?
श्री श्री रवि शंकर : आसक्ति से पीड़ा आती है, पर पीड़ा के बिना तो कुछ भी नहीं है। हम इस दुनिया में पीड़ा के साथ ही आते हैं। जन्म की प्रक्रिया ही बहुत पीड़ादायक होती है। नौ महीनों तक हम आराम से थे। अचानक हमारे आस पास का सागर गा़यब हो गया और हमें बाहर आना पड़ा! आसक्ति तब होती है जब आप अपने अस्तित्व पर केन्द्रित ना होकर बाहर की दुनिया को देखते हैं। नियंत्रण करने की इच्छा, प्राप्त करने की इच्छा, संचय करने की इच्छा, पीड़ा लाती है। जब हम विश्राम में होते हैं, संतुष्ट होते हैं, तब प्रेम ही आनंद में परिवर्तित हो जाता है। मांग और नियंत्रण केवल पीड़ा लाते हैं। प्रेम के साथ ज्ञान ही इसकी काट है।
प्रश्न : मैं क्रोध को कैसे काबू में करूं?
श्री श्री रवि शंकर : उत्तमता के प्रति तुम्हारे प्रेम से ही क्रोध का जन्म होता है। अपने जीवन में तृटियों के लिये स्थान रखो। उन सब बातों की एक सूची बनाओ जो तुम्हें खराब लगती हैं। फिर अपने आस पास के लोगों से कहो कि वे उस सूची में लिखी सभी बातें करें! जब तुम क्रोधित हो जाओ तो उस संवेदना को महसूस करो। देखो तुम्हारे दांत कैसे भिंच जाते हैं। मन कैसा हो जाता है। कुछ लंबी गहरी सांसे लो और देखो अगर पहले की संवेदना से कुछ फ़र्क है। हालांकि क्रोध के मामले में मेरा अनुभव नहीं है, क्योंकि मुझे ये समस्या कभी नहीं हुई है। तो मेरी सलाह, अच्छी नहीं भी हो सकती है! तुम और लोगों से पूछो। यहाँ कई ऐसे लोग हैं जो तुम्हें बता सकते हैं। सुदर्शन क्रिया के नियमित अभ्यास से क्रोध शांत पड़ जाता है।
प्रश्न : जीवन का उद्देश्य क्या है? हम जन्म लेते हैं, पढा़ई करते हैं, काम करते हैं, और एक दिन मर जाते हैं। मैं जीवन के प्रति आसक्ति को खोता जा रहा हूँ।
श्री श्री रवि शंकर : अच्छा है। तुम ठीक रास्ते पर हो। जो तुम कह रहे हो वो हमारी intro talk की तरह है। कल्पना करो कि हम ८० साल तक जीते हैं, तो उस में से २०-२५ साल तो सोने में चले जाते हैं। १० साल बाथरूम में गुज़र जाते हैं। १० साल ट्राफ़िक में गुज़र जाते हैं। फिर कितने साल हम दुखी रह कर बिताते हैं। अंत में केवल २-३ साल ही हम प्रार्थना, सेवा इत्यादि में बिताते हैं।
ये अच्छा है कि तुम इस बारे में सोच रहे हो। तुम सही रास्ते पर हो।
प्रश्न : अगर कोई ऩज़दीकी व्यक्ति किसी बीमारीवश मृत्यु की ओर अग्रसर हो, तो क्या करें?
श्री श्री रवि शंकर: उन्हें आशीर्वाद दो। जीवन चलने दो, गाओ, नाचो, ध्यान करो। अगर तुम बीमारी के बारे में अधिक सोचोगे तो तुम्हारी ऊर्जा कम हो जाती है। बदलाव कभी भी आ सकता है। चिकित्सा की आवश्यकता है, पर विश्वास भी रखो। दैवी कृपा हर वक्त तुम्हारे साथ है। कभी भी कुछ भी हो सकता है।
प्रश्न : क्या ये संभव है कि हम सभी को आत्मज्ञान हो जाये?
श्री श्री रवि शंकर : हाँ। कभी भी! बीज तो है, वो कभी भी अंकुरित हो सकता है। वो कभी भी एक बड़ा पेड़ बन सकता है।
प्रश्न : १५ साल से मैं एक ही नौकरी कर रहा हूँ, और मेरा अधिकारी मेरी इज़्ज़त नहीं करता है। क्या मैं नौकरी छोड़ कर, अपना व्यवसाय शुरु करूं? कृपया मेरी मार्गदर्शन कीजिये।
श्री श्री रवि शंकर : ये चुनाव तुम्हें करना है, आशीर्वाद मुझे देना है।
प्रश्न : वैदिक ज्ञान में सृष्टि के नियमों का सत्य दिया गया है। क्या आधुनिक विज्ञन भी इसका एक अंश है?
श्री श्री रवि शंकर : हाँ। ज्ञान अनंत है। कई ऋषि, आज के वैज्ञानिक बन कर आये हैं। वे ब्रह्माण्ड की खोज में लगे रहते हैं। हर चीज़ को आदर देना चाहिये, चाहे नई हो या पुरानी। आजकल Quantum Physics की कई खोजें सामने आ रही हैं। इनमें वैदिक ज्ञान से बहुत समानता है। उदाहरण के रूप में, Dark matter तथा String Theory, दोनों के ही बारे में प्राचीन ज्ञान में बताया गया था। एक वैज्ञानिक Dr.Hans-Peter Dürr, नें मुझे बताया कि वे जब भी व्याख्यान देते हैं, उन्हें लगता है कि वे वेदान्त की बात कर रहे हैं। ये पूरा विश्व एक ही वस्तु से बना है। कोई दूसरा नहीं है। यह वेदान्त है। प्राचीन ऋषि तथा आधुनिक वैज्ञानिक, दोनों ही एक ही बात कहते हैं।
प्रश्न : पंडित, ज्योतिषाचार्य और मनोवैज्ञानिकों के भविष्य कथन को कितना महत्व देना चाहिये?
श्री श्री रवि शंकर : इसको हल्के रूप में लेना चाहिये क्यों कि सब बदल रहा है। आप को ज्योतिषी जो भी बताये उसे पूरी नहीं मान लेना चाहिये। ज्योतिष शास्त्र विज्ञान है, पर सब ज्योतिषी वैज्ञानिक नहीं हैं, इसलिये सोच समझ कर मानना चाहिये।
प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैं पिछले बीस साल से अपनी आमदनी का एक हिस्सा समाज के उद्धार के लिये देता आ रहा हूँ। क्या आप आध्यात्मिक पथ पर दान के महत्व पर प्रकाश डालेंगे?
- आपका आभारी और स्नेही
श्री श्री रवि शंकर : हाँ। हाँ, समाज को किसी भी रूप में कुछ वापस लौटाना बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। एक कहावत है - ‘एक बूँद घी, चावल को पवित्र कर देता है’। जैसे थोड़ा सा घी चावल को पवित्र कर देता है, वैसे ही दान भी धन को पवित्र कर देता है। जब आप अपने अर्जित धन का एक हिस्सा किसी अच्छे कार्य हेतु दान में देते हो, तो आपका जो बचा हुअ धन रहता है, वह पवित्र होता है। इसी तरह तन शुद्ध होता है स्नान से, मन शुद्ध होता है प्राण शक्ति से - प्राणायाम व ध्यान से, और बुद्धि शुद्ध होती है ज्ञान से। हम जब ज्ञान की बातें सुनते हैं तो पवित्र होते हैं।
जब तुम ज्ञान की बातें सुनते हो, जैसे योग वशिष्ठ, अष्टावक्र गीता आदि, तो अंदर से एक ‘वाह!’ का स्फुरण होता है। तो जैसे बुद्धि पवित्र होती है ज्ञान से, वैसे जीवन पवित्र होता है समर्पण से।
प्रश्न : प्रिय गुरुजी, हम कई लोग जो आध्यात्म के पथ पर हैं, केवल अपने लिये ही दिव्यता नहीं चाहते, समाज के अन्य लोगों के लिये भी चाहते हैं। क्या ऐसा दिव्य मानवों का समाज इस धरती पर कभी हुआ है और क्या हम ऐसे समाज की कल्पना अपने भविष्य के लिये कर सकते हैं? क्या यह सपना एक पागलपन होगा?
श्री श्री रवि शंकर : तुम्हें पागल बन कर ही कल्पना करनी चाहिये, हरेक व्यक्ति को कोई स्वप्न देखना चाहिये। जानते हो, जो भी तुम्हे असम्भव लगे, उसका तुम्हें स्वप्न देखना चाहिये और उसे सम्भव में परिवर्तित करना चाहिये। हमने ऐसा एक गाँव में कर दिखाया। यह एक बदनाम ग्राम था, जहाँ कोई भी पाँच-छह बजे के बाद नहीं जाता था। वहाँ चोरी, लूट और अन्य अपराधों का बोल बाला था। वहाँ हमारे एक आर्ट ऑफ लिविंग टीचर ने जाकर तीन महीनों में उस ग्राम का नक्शा ही पलट दिया! उस ग्राम को अपना कर, सबको कोर्स कराया । हैरानी की बात यह कि अब वहाँ छोटे, बड़े, सब गाते, नाचते हैं सत्संग में और उन्होने खुद नियम बना लिया है कि वहाँ नशेबाजी करने वाले को दंड भुगतान करना होगा। परिणाम स्वरुप यह पूरा ग्राम अब नशामुक्त है और लोग रासयनिक मुक्त खेती भी करते हैं। मैं उस ग्राम की एक सी.डी. लाया हूँ यहाँ।
मेरे पिछले दौरे के समय स्वमी प्रज्ञापाद्जी ने मुझे बताया कि इस गांव में एक दुकान है जहाँ पर कोई दुकानदार नहीं होता और दुकान ठीक रूप से चलती भी है। लोग सामान लेते हैं और पैसे वहाँ पड़ी टोकरी में डाल देते हैं। अन्य लोग आश्चर्यचकित हैं कि यह ग्राम ऐसे ढाई साल से इसी तरह चल रहा है, जहाँ कोई पहरेदार नहीं, कोई चोरी नहीं! और वहाँ कोई ताला भी अब नहीं लगाता है - किसी भी घर के दरवाजे पर ताला नहीं है। ऐसा ग्राम जहाँ दरवाजे बिना ताले के हैं, यह ग्राम स्वावलंबी और आत्मनिर्भर ग्राम बन गया है। यहाँ पूरे ग्राम के पीने के लिये शुद्ध पानी की व्यवस्था है, पूरा ग्राम गुलाबी रंग से पुता हुआ है। सबने एकता दिखाते हुये गुलाबी रंग से ही अपने मकानों को रंगना मंजूर किया। भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने इस ग्राम को पुरस्कार स्वरूप धन राशि देकर और सर्वश्रेष्ठ आदर्श ग्राम की उपाधि से सम्मानित किया है। और आप जिसे पागलपन का स्वप्न कहते हैं, वैसा ही एक स्वप्न, सिर्फ एक टीचर ने देखा और उसे साकार भी कर दिखाया!
इस ग्राम के परिणाम को देख कर अब हमारे साथ १८० ग्राम, आदर्श ग्राम बनने की कतार में लग गये हैं!
नई दिल्ली में कुछ अपने स्वयंसेवियों ने [common-wealth games कामनवेल्थ] एशियन गेम्स के पहले नगर की सफाई करने की सोची, क्योंकि वहाँ लोग कचरा कूड़ा आदि निकाल कर सड़कों पर ड़ाल देते हैं जिससे बहुत गंदगी फैली हुई है। तो इन सेवकों ने इस विचार को फलीभूत करने की सोची।
लोग अक्सर सरकार को दोष देते रहते हैं पर कार्य नहीं करते।सरकार पर निर्भर होने के बदले में इन मुठ्ठीभर आर्ट ऑफ लिविंग स्वयंसेवकों ने कार्य करना शुरु किया | उन्होंने लाखों लोगों को झाड़ू लेकर आने और प्लास्टिक व अन्य कचरा हटाकर, पूरे नगर की सफाई करने के लिये प्रेरित किया! १२ सितम्बर से चल रहा है यह कार्य और १० लाख लोगों को शामिल कर लिया है इस अभियान में। दिल्ली की सरकार जो अब तक आर्ट ऑफ लिविंग के किसी कार्य में सहायता देने में रुचि नहीं दिखा रही थी, किसी समारोह में शामिल नहीं होती थी, अब अचानक जागी है उनकी मदद के लिये! अब सरकार घोषणा कर रही है आर्ट ऑफ़ लिविंग के सुंदर कार्य का!
इसलिये जो तुम चाहते हो उस पर जरुर सोचो, विचार करो, और स्वप्न देखो कि क्या करना चाहते हो। यह शायद तत्काल फलीभूत ना हो पाये पर समय के साथ होगा!
प्रश्न : मैं अपनी शारीरिक इच्छाओं पर कैसे विजय पाऊँ?
श्री श्री रवि शंकर : य़ह तुम्हारी उम्र पर निर्भर करता है। यदि तुम नव-वयस्क हो, तो यह भावनाएं उठना स्वाभाविक है। तुम उसके लिये ज्यादा कुछ नहीं कर सकते हो। अपने आप को कार्य में व्यस्त रखो। जब ज्यादा खाली समय पास में होता है, तो मन कामवासना की ओर भागता है। क्या तुमने इस बात पर गौर किया है, कि जब परीक्षा का समय होता है या अत्यन्त व्यस्त होते हो, या जब कुछ हासिल करना हो, किसी खेल कूद में भाग लेना हो या मन किसी अन्य विचार में उलझा हो तो आपको कामवासना का विचार नहीं सूझता है और ना ही कामवासना हावी होती है दिमाग पर। पर जब तुम खाली, बेकार बैठे रहते हो तब यह भूत जैसे सवार हो जाती है दिमाग पर। देखो, सम्भोग क्रिया कोई खराब बात नहीं है पर इसी में सब समय ध्यान लगा रहे, यह खतरनाक है। किसी समय एक तरह के सम्भोग में तृप्ति न होने पर दूसरे तरीकों पर जाने लगते हैं लोग, और मन में अनेक विभिन्न भ्रान्तियाँ और विकृतियाँ जन्म लेने लगती हैं।
सबसे अच्छा और सरल उपाय है प्राणायाम, जिसके करने से राहत मिलती है। और, अपने भोजन पर ध्यान देना। यदि तुम बहुत अधिक खाते हो तो अधिक शक्ति भी एकत्रित हो जाती है, जो फिर किसी और रूप में बाहर होने का रास्ता ढूँढती है। और यदि तुम किसी भी सृजनात्मक कार्य में व्यस्त नहीं रहते हो तब तो अवश्य ही अर्जित शक्ति दूसर रास्ता अपनायेगी। तो थोड़ा ध्यान भोजन की ओर देना। इसीलिये यह कहावत है कि, यदि जीभ पर काबू नहीं तो जननेन्द्रियों पर भी काबू नहीं, क्योंकि जननेंद्रिय और जीभ का एक दूसरे से संबंध है। भोजन और कामवासना का ताल-मेल है। कामवासना के विकारों से बचने का उपाय है हल्का और संयमित भोजन और प्राणायाम। प्राणायाम से अधिक मात्रा में उठने वाली प्रवृतियों पर काबू पाया जा सकता है।
संगीत, नृत्य आदि में रुचि, कुछ सृजनात्मक कार्य, चित्रकारी, लेखन, सुंदर वस्तुओं में रुचि आदि, ये सब भी सहायक होते हैं। जब तुम प्रसन्न रहते हो तब मन में काम वासना कम रहती है। पर यदि तुम दुखी, बैचेन, व्याकुल रहते हो तो तुम्हारा झुकाव कामवासना की ओर ज्यादा होगा। इसलिये ये सब बातें ध्यान में रखते हुए और अपने को व्यस्त रखकर तुम आसानी से सब दुविधाओं से पार हो सकते हो।
क्योंकि काम वासना में बहुत रुझाव रखने पर भी बात में अच्छा नहीं लगता और, इस प्रवृति को पूरा छोड़ने पर भी विक्षिप्त सी अवस्था में पड़ सकते हो। यह वयस्कपन की दुविधापूर्ण समस्या है, जिसका कोई आसान हल नहीं सिवाय अपने आप को खूब व्यस्त रखने के।
फिर इसके बाद है अधेड़ आयु के लोगों की मुश्किल!
मैं सब आयु के लोगों को ध्यान में रखते हुए इस समस्या का उपाय बता रहा हूँ। और ये सब बताये उपाय भी काम में नहीं आयें तो बस फिर वक्त का इन्तजार करो! जैसे जैसे उम्र बढ़ेगी, ये इच्छायें भी कम होती जायेंगी। तो समय खुद इसका समाधान कर देगा, हो सकता है जब तुम ६०, ७० या ८० वर्ष के हो जाओ| तब तुम चेतना का एक नयापन अनुभव कर सकोगे, मन शांत होगा ही और नई चेतना महसूस करोगे।
प्रश्न : हम बार बार जन्म और मृत्यु का अनुभव क्यों करते हैं?
श्री श्री रवि शंकर : शायद धरती को गले लगाने के लिये!
प्रश्न : गुरूजी,यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण हो सकता है परन्तु मुझे धन की समझ नहीं है| क्या आप मेरे लिए इसका वर्णन करेंगे? यह कितना महत्वपूर्ण है? मुझे यहाँ लाने के लिए धन्यवाद|
श्री श्री रवि शंकर : वेदों के साहित्य में लिखा है धर्म सच्चाई है| तब अर्थ आता है जिसका मतलब है माध्यम। धन एक माध्यम है| तब इच्छाएं आती है| और फ़िर मोक्ष आता है| इस तरह धर्मस्य मूलं अर्थ| इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है| यदि सभी समृद्ध होंगे तो कोई भी चोरी नहीं करेगा| धर्म का आधार समृद्धि है| और धन का आधार राष्ट्र है| इस तरह ये सब सम्बंधित है| धन महत्वपूर्ण है परन्तु धन केवल एक साधन है| यह सब कुछ नहीं है| धन को कभी भी ख़ुशी से नहीं जोड़ना चाहिए| यदि आप देखो तो पाओगे यहाँ तक कि गरीब से गरीब लोग भी खुश होते हैं | वास्तव में वे ज्यादा खुश हैं| धन सुरक्षा की एक गलत धारणा बन जाता है| आप सोचते हो यदि आपके पास धन है तो सब कुछ है।
धन का ख्याल आराम के लिए है| आप धन क्यों चाहते हो? आराम के लिए| परन्तु धन आपको केवल एक तरह का आराम दे सकता है| आराम के तीन प्रकार हैं| शरीरिक आराम,भावात्मक और मानसिक आराम, और अध्यात्मिक आराम यां आन्तरिक आराम| जबकि धन केवल एक तरह का आराम दे सकता है| यह भावनात्मक और अध्यात्मिक आराम नहीं देता| यह आवश्यक है| जैसे हम जीवित रहने के लिए खाते हैं, परन्तु यदि हम केवल खाने के लिए जीवित रहे (हंसी) तो हमारे साथ बुनियादी तौर पे कुछ गलत है|
ग्रन्थ और प्राचीन लोग बड़ी खूबसूरती से बताते हैं कि आपको अपने धन को इस्तेमाल कैसे करना चाहिए। आप धन को २०% के पांच भागों में बाँट लो| एक भाग आप अपने इस्तेमाल के लिए रखो| एक भाग आप बचा लो| २०% आप तुरंत ज़रुरतों पर खर्च कर लेते हो| २०% आप परिवार के लिए खर्च करते हो जिससे मेरा मतलब है तत्काल जरूरतों के लिए| २०% आप समाज के लिए इस्तेमाल करते हो| एक वह है जिसे आपद धन कहतें हैं जो आपातकालीन,भविष्य की जरूरतों के लिए होता है| २०% जो आप बचाते हो, उसे बाद में अपने मित्रों,परिवार या अपने वंशजों को दे देते हो|
एक और विचारधारा है जो कहती है १०% दान करो| ३०% बचत करो| ६०% को जैसे चाहो इस्तेमाल करो|
मैं कहूँगा आपको १०% भी दान देने की जरुरत नहीं है| कम से कम २% या ३% अपनी आमदनी से अलग रख दो| यदि आप बिलकुल भी दान नहीं देते तो आपका पैसा कचेहरी में मुकद्दमों और अस्पतालों में खर्च होगा| इसलिए आपके धन का कुछ हिस्सा २% या ३% अलग रखा जाना चाहिए| यहाँ तक कि १% भी चलेगा| २% फिर ३| २ से १०%दुनिया के लिए अलग रखो| तब आपके मन में लालच नहीं आएगा| लालच आदमी को खत्म करता है और बाद में उसके व्यापर को भी खत्म कर देता है|
परन्तु लक्ष्य ठीक है| आपके पास लक्ष्य होना चाहिए| आप में और धन कमाने की कामना होनी चाहिए| और अधिक धन बनाना एकदम गलत नहीं है| धन कमाओ| समझ गए आप?इस तरह से धन के लिए संतुलित रवैया होना चाहिए| धन ही जीवन में सब कुछ नहीं होना चाहिए| यह आपको बनाये रखने के लिए और शरीर को आराम देने के लिए होना चाहिए| यह केवल आध्यात्मिकता है जिससे पूर्ण विश्राम मिलता है| और यदि मानसिक और अध्यात्मिक आराम होगा, जब आप ईश्वर से जुड़े हों तो आप धन के बारे में सोचते भी नहीं| चीजें अपने आप आती हैं|
इस आश्रम को अगले साल २० साल हो जायेंगे| उससे पहले ५ बर्ष तक जब मैं उत्तरी अमेरिका में आता था तो हम यहाँ वहां किराये पर जगह लेते थे| बहुत सारे लोग आते थे| हमें शाकाहारी भोजन के लिए रसोई चाहिए थी| होटल में अडवांस कोर्स करने में मुश्किल होते थे| तब मैंने कहा अगली बार जब मैं आयूँ तो हमारे पास अपना स्थान होना चाहिए जहाँ हम पवित्र वातावरण रख सकें, ऐसे स्थान पर ध्यान लगता है और स्थान का भाव अधिक सात्विक,अधिक अनुकूल और प्रकृति के साथ लय में होता है| तब हमारे कुछ भक्त लोग यहाँ आये और स्थान के लिए छान बीन करने लगे परन्तु हमारे पास इतने पैसे नहीं थे| पर हमें बिलकुल भी चिंता नहीं हुई| हम केवल योजना बनाते हैं और बाकि सब बातो का ध्यान अपने आप रखा जाता है| सभी ने थोड़ा थोड़ा कुछ करना शुरू किया| और यह जगह सुंदर बन गई। इसे ही सिद्धि कहतें हैं| सिद्धि का मतलब है आपको जो चाहिए समय में मिल जाता है|
भारत में एक कहावत है - आप बादाम खाना चाहते हो और ये आपको तब मिलते हैं जब आपके सारे दांत गिर जाते हैं| (हंसी) आप बादाम के लिए प्रार्थना करते हो और जब आपको बादाम मिलते हैं आपके दांत जा चुके होतें हैं| इसका कोई फायदा नहीं| इस तरह सिद्धि का मतलब है समय से पहले जरूरत से ज्यादा मिल जाना|
हम कभी यह चिंता नहीं करते कि काम कैसे होगा? इसे ही सिद्धि कहते हैं। जब आध्यात्मिक उर्जा होती है तो काम सहजता से ही पूर्ण होते चले जाते हैं। इस आत्म विश्वास के साथ चलो| पर हमे ज़्यादा हवा में भी नहीं रहना चाहिए। थोड़ा सा व्यवहारिक भी होना चाहिए| जब तक आप उस अंदरूनी अध्यात्मिक निर्भरता,अध्यात्मिक ऊंचाई तक नहीं पहुँच जाते,आपको तर्कसंगत होना चाहिए,और तर्कसंगत तरीके से जागरूक होकर आपको पैसों का प्रबंध करना है। और यह आप कैसे कर सकते हो? जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा एक उपर उठा होगा| इस तरह यह एक नाच की तरह है| नाच कैसे होगा? यदि दोनों पैर कीचड़ में दबे होंगे तो क्या आप नृत्य कर सकते हो? और यदि दोनों पैर उपर हवा मैं होंगे तो भी आप गिर जाओगे| दोनो परिस्थितियों में नाच नहीं हो सकता| नाच तभी हो सकता है जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा और दूसरा उपर हवा में| यही सम्पूर्ण ज्ञान है - व्यवहारिक लेकिन सूक्ष्म,अध्यात्मिक दृष्टिकोण से|
परन्तु मैंने कुछ लोगों को देखा है जो बहुत अधिक काल्पनिक होतें हैं| वे कोई काम नहीं करते परन्तु बैठे रहतें हैं,'मुझे २० मिलियन डॉलर चाहिए, मुझे १०० मिलियन डालर चाहिए|' वे थोड़े पैसों के लिए भी नहीं सोचते| :हंसी) केवल मिलियन के लिए सोचतें हैं| हर दिन इसके लिए प्रार्थना करते हैं| कुछ देर बाद आप जाते हो,खाना पकाते हो और भूल जाते हो| यह सही नहीं है|
इस संतुलन को जानो|
प्रश्न : गुरूजी मुझे लगता है मैं अपने परिवार में किसी की मृत्यु के शोक से नहीं निकल पाया हूँ और यह मुझे अपने सम्बन्धों और अपना निजी परिवार की ओर चलने से रोक रहा है| मैं इस ओर आगे बढ़ना चाहता हूँ परन्तु ऐसे लगता है मैं स्वयं ही अपना शत्रु हूँ| गुरूजी कृपया मेरी मदद करें| मैं धैर्यपूर्वक आपके जबाब का इंतजार कर रहा हूँ|
श्री श्री रवि शंकर : जब आप ध्यान करते हो,भजन करते हो तो इसकी उर्जा उन तक पहुँच जाती है| आप शांत हो तो शांतिपूर्ण भावनाएं उन तक जाती है| इसीलिए आध्यात्मिकता को संस्कृत में साधना भी कहतें हैं,इसका मतलब है असली दौलत,असली मुद्रा जो यहाँ वहां जा सकता है|(हंसी) दूसरी डालर मुद्रा दूसरी तरफ़ नहीं चल सकती|इसीलिए हम कहतें हैं जब आप सत्संग करते हो,गाते हो,ध्यान करते हो,ये सकरात्मक भाव उन तक जाते हैं| और जब ऐसे भावनाएं आती है उनका निरीक्षण करो,ध्यान से देखो| वे आयेगीं और लुप्त और गायब हो जायेंगीं| हाँ? आगे बढ़ो|
प्रश्न : गुरूजी, क्या आप दूसरे ग्रहों पर जीवन के बारे में कुछ बताएँगे? क्या उनके पास प्रेम है जैसे हमारे पास पृथ्वी पर प्रेम। जय गुरुदेव|
श्री श्री रवि शंकर : प्राचीन लोगों को १४ ब्रह्मांडों का पता था| १४ में से हम बीच में हैं-७ उपर ७ नीचे| अनंत ब्रह्मांड है, अनंत ग्रह है केवल एक ही नहीं है| यहाँ पर भी अस्तित्व के अलग अलग स्तर हैं| जो हम देखते हैं वह केवल एक भाग है| भौतिक विज्ञान भी यही कहता है।यहाँ पर भी बहुत से स्तर हैं| हाँ? परन्तु यह एक ब्रह्मांड हमारे लिए बहुत अच्छा और पर्याप्त बड़ा है| (हंसी)अभी इसी के बारे में सोचते हैं।
प्रश्न : गुरूजी, यह इतना सुंदर ज्ञान देने के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ| मुझे बहुत जिज्ञासा होती है कि यह अंतर्दृष्टि कहाँ से आती है| जब मैं ध्यान करता हूँ कभी कभी इसके बाद शांत हो जाता हूँ और प्रभावकारी भी,परन्तु ब्रह्मांड के रहस्य अपने आप नहीं पता चलते| इसकी बजाय मैं इसी तरह के नाटक या आत्म सम्मोहन में फंस जाता हूँ| यह रास्ता मेरे लिए अच्छा है| इसका मुझे विश्वास है|परन्तु मुझ में धैर्य नहीं है|मुझे आपके प्रकृति और ईश्वर के बारे में कहे हुए शब्द शहद जैसे लागतें हैं जिनके लिए मुझे भूख है| क्या आप इसी विषय में कुछ कहेंगे| मैं प्रकृति के साथ गहरा सम्बन्ध महसूस करता था| आजकल मैं रोबोट की तरह महसूस करता हूँ| क्या मुझ में अनुग्रह नहीं रहा या कोई और बात है?
श्री श्री रवि शंकर : नहीं नहीं| मुझे लगता है आपके पास बहुत समय है| आप बैठकर अपने बारे में बहुत सोचते रहते हो| व्यस्त हो जाओ| आप जानते हो जितना अच्छा काम आप करते हो, अपने आसपास सकरात्मक वातावरण और भाव बनाते हो| जब आप सकरात्मक भाव बनाते हो तो आपको अपने भीतर गहरे जाने में मदद मिलती है| यह आवश्यक है कि दूसरों का ध्यान रखा जाए और जो आप के पास है दूसरों के साथ बांटा जाए| जिस तरह भी आप कर सकते हो करो| किसी प्रोजेक्ट में शामिल हो जाओ| ध्यान करो| बैठ कर चिंता मत करो,'ओह आज मुझे यह अनुभव हुआ| कल क्या होगा|' यह तो आते जाते रहेंगे| आप इन सब अनुभवों से ज्यादा हो।
एक साधक को क्या करना होता है ,जो भी अनुभव हो, चाहे सबसे अच्छा अनुभव हो, को भी सवीकार करो और उसका समर्पण करो।
स्वीकारना और समर्पण करना, दोनो ही ज़रुरी हैं। यदि आप केवल त्यागने की कोशिश करते हो तो आप उनको रोकने की कोशिश कर रहे हो| यदि आप केवल स्वीकार करते हो तो आप उनको पकड़ लेते हो| इसीलिए आपको दो हाथ दिए गए हैं| एक तरफ़ से आप स्वीकार करते हो और दूसरी तरफ़ आप समर्पण कर देते हो।यह अनुभव तो आते जाते रहतें हैं ,कोई बड़ी बात नहीं|
प्रश्न : गुरूजी, कल रात आपने कहा था कि ,'यदि आप जो कर सकते हो नहीं करते हो तो आपकी चेतना में आपको पीड़ा होती है। मुझे पता है मुझमें बहुत सी योग्यताएं हैं,परन्तु कभी कभी यह बहुत कठिन काम लगता है| मैं हमेशा अपनी तरफ से अच्छा कार्य करती हूँ,हमेशा सेवा करती हूँ| मैं सेवा को बिना बोझ समझे कैसे कर सकती हूँ?
श्री श्री रवि शंकर : केवल उतना ही करो जितना तुम कर सकते हो| कभी कभी आप प्रतिबद्धता लेते हो| उस क्षण यह बहुत अधिक लगता है| परन्तु यह समाप्त हो जाता है| उस प्रतिबद्धता को पूरा करो और फ़िर उसके बारे में सोचो भी मत| आपको पता है यदि आप सोचोगे ,'मैंने कितना सारा काम कर लिया' तब वह बोझ लगने लगता है| हर रोज आप में नई शक्ति आ जाती है| अगर हम देखें हमने कितना हवा,पानी और भोजन का उपभोग किया है तो हम हैरान रह जाएंगे। इसकी कोई गिनती ही नहीं है| इसलिए आप जो सेवा करते हो उसे गिनो मत| जो आपने उपभोग किया है उस सब के मुकाबले में यह बहुत कम है|
प्रश्न : जब मुझ पर करो या मरो जैसा दबाव होता है तो मेरे अंदर जो भी अच्छा है बाहर आ जाता है| यह वह समय होता है जब अपनी इच्छाओ और इरादों को पूरा करने के लिए मेरे पास प्रकाश की किरण की तरह तेज जैसी एकाग्रता,मानसिक शांति,नियन्त्रण और प्रेरणा होती है| परन्तु जब मैं खुश,विश्राम में और आनंद में होता हूँ तो मुझ में वह मानसिक शांति और अपनेआप को प्रेरित करने की शक्ति नहीं होती| मैं इस पैटर्न को कैसे बदल सकता हूँ?
श्री श्री रवि शंकर : तो किसी को आप पर ऐसा दबाव डालने के लिए कहो।सुनो यदि आपको लगता है 'मेरा अच्छा तभी बाहर आता है जब मैं खतरे में हूँ, यां दबाव में हूँ’ तो आपने ऐसा इरादा बना लिया है,ऐसा विचार मन में बना लिया है| इसलिए ऐसा ही होता रहा है|
आप तब भी उतनी ही उर्जा और एकाग्रता से काम कर सकते हैं जब आप खुश होते हो,जब आप आनंद में होते हो,जब आप मुक्त होते हो। इसलिए जब आप इस पैटर्न के प्रति सजग हो जाते हो तो यह आपकी जिम्मेवारी है कि आप इससे बाहर आएं| कोई और आपकी मदद नहीं कर सकता। केवल आप अपनी मदद कर सकते हो| आप कह सकते हो 'अभी आज मैं खुश हूँ, मैं ऐसा करने जा रहा हूँ!'
प्रश्न : गुरूजी,यह पहली बार है मैं आपकी धन्य महिमा देख रहा हूँ| क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मैं स्वयं को सम्मानित और प्रेम करना कैसे सिखा सकती हूँ?मैं अपने शरीर को दुःख देती हूँ क्योंकि मैं अपने आप को किसी योग्य नहीं समझती| मुझे क्या करना चाहिए?आपका जबाव बहुत महत्वपूर्ण है| जय गुरुदेव|
श्री श्री रवि शंकर : सबसे पहले यह मत सोचो कि आप खुद से प्यार नहीं करते| यह किसने कहा? यहाँ तक जो व्यक्ति आत्महत्या करते हैं वे भी खुद से प्यार करते हैं| वे अपने आप से बहुत प्यार करते हैं और इसलिए पीड़ा नहीं चाहते| पीड़ा सहन नहीं कर सकते| पीड़ा से छुटकारा चाहते हैं| इसलिए जब लोग पीड़ा या दुःख सहन नहीं कर सकते,वे ख़ुशी चाहते हैं,वे आत्महत्या कर लेते हैं| इसलिए कि वे खुद को बहुत प्यार करते हैं| वे दूसरों से प्यार नहीं करते| यदि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपनी माता या पुत्री या पत्नी या और कोई प्रिय को प्रेम करे तो आत्म हत्या कैसे कर सकता है?यदि आपको दूसरों की फ़िक्र होगी तो आप कभी आत्महत्या नहीं कर सकते|
उन्हें पता होता है कि यदि वे खुद को फंदा लगा लेंगे, वे अपने प्रिय जनो के लिए समस्या खड़ी कर देंगे| वे बहुत दुखी हो जायेंगे।
उनका यह सोचना, "मैं उन्हें उदास नहीं कर सकता,मैं उन्हें रुलाना नहीं चाहता| मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ| यदि मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ तो मैं खुद को दुःख क्यों दूँ? मैं केवल अपनी ख़ुशी के बारे में सोच रहा हूँ,अपनी तकलीफ के बारे में सोच रहा हूँ| मैं आराम चाहता हूँ,ख़ुशी चाहता हूँ| मैं खुद को बहुत अधिक प्यार करता हूँ| तभी मैं खुद को फंदा लगाता हूँ" उन्हे कभी ऐसा कदम उठाने नहीं देगा।
इस तरह अपने लिए अपने प्यार पर शंका मत करो| कौन कहता है आप खुद को प्यार नहीं करते? यह असम्भव है क्योंकि आप स्वयं प्रेम हो|यह केवल कहीं खो गया है| कहीं आप इसे महसूस नहीं कर पा रहे हो| और आप सही जगह पर हो|अभी तक कोई भी माँ इस ग्रह पर बुरी पैदा नहीं हुई है| एक माँ के रूप में ऐसा मत सोचो कि आप बुरी या कुछ और हो। यह असम्भव है| हाँ? विश्राम में रहो और अपना काम करते आगे बढ़ो|
जो हो गया उसके बारे ज्यादा विश्लेषण मत करो। क्योंकि धरती पर कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरी तरह दोष से मुक्त हो| हर कार्य में कहीं ना कहीं कुछ दोष होता ही है। और बुरे से बुरे कार्य में भी कुछ अच्छा होता है। अच्छे से अच्छे कार्य में भी २ प्रतिशत दोष होता है। इसलिए दोष पर इतना ध्यान मत दो।
प्रश्न : जो कुछ भी आज तक मैने आप से पाया है, उसके लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद। मुझे पता है कि आप चौबीस घंटे उपलब्ध है! मदद मांगने में शर्म आ रही है। जब किसी के परिवार में किसी का देहान्त हो जाये तो आप उस व्यक्ति की मदद कैसे कर सकते हैं कि वो शांति से जी सके और आप भी शांति की अनुभूति करें? धन्यवाद गुरुजी।
श्री श्री : किसी के प्रियजन का देहान्त हुआ है और आप सांतवना देना चाहते है तो मौन रहें। ज़्यादा शब्दों का यहां कोई अर्थ नहीं होता। कोई दुखी है तो आप उनके साथ रहें। अपने दिल में शांति की अनुभूति करें। आप शांत होंगे तो वो भी शांति महसूस करेंगे, आराम महसूस करेंगे। जब आप शांत होते हैं तो आपसे शांति प्रसारित होती है, और उससे वे भी भीतर की शांति महसूस करेंगे। आपको ये कहने की ज़रूरत नहीं है, "ओह! बेचारा। ये तुम्हारे साथ क्या हो गया! ऐसा नहीं होना चाहिये था।" ऐसी बातें करने से ना आपको मदद मिलेगी ना ही उनको। आप सिर्फ़ उनके साथ रहें और कहें, "ईश्वर आपको शक्ति देंगे"। आप को इतना ही करना चाहिये। या जो व्यक्ति गुज़र गया है, उसका नाम लेकर कहें कि वो आपको शक्ति देगा इस मुश्किल समय से गुज़रने के लिये। एक दो शब्द कहना काफ़ी है। ज़्यादा बात ना करें, सिर्फ़ उनके साथ रहें। आपका कुछ क्षण का साथ उनकी मदद करेगा। ठीक है?
प्रश्न : हम दुनिया को कैसे सिखा सकते हैं कि दुनिया में सबके लिये बहुत भोजन है, बहुत प्यार है? हमें कमी के भय के कारण लालची नहीं होना चाहिये।
श्री श्री : इसके लिये हमें आध्यात्म को फैलाना होगा। लोगों को आध्यात्म का महत्व मह्सूस कराना होगा। लोगों को ध्यान करना होगा। सिर्फ़ ध्यान से ही वो भीतर की अमीरी, भीतर की पूर्णता जान पायेंगे। आप जो भी भीतर महसूस करते हैं वही बाहर आता है। अगर आपके भीतर भय है तो आप बाहर भी भयभीत दिखेंगे। अपने भीतर कमी, गरीबी महसूस करेंगे तो बाहर भी वही पायेंगे। प्रचुरता का अहसास भीतर से लाना है। इसके लिये ध्यान करना होगा।
प्रश्न : जब गुरु पर संदेह हो तो क्या करें? इस संदेह से ऊपर कैसे उठें? संदेह को जगने से रोकें कैसे?
श्री श्री : आपको पता है कि आपका संदेह हमेशा अच्छी बात पर होता है? आप सच पर संदेह करते हो, झूठ पर कभी संदेह नहीं करते। आप खुशी पर संदेह करते हैं, अवसाद(depression) पर नहीं। अगर आप अवसाद में हो, और आपसे कोई पूछे, "क्या आप अवसाद में हो?" आपको विश्वास होता है कि आप दुखी हो। आप ये नहीं कहते, "शायद।" जब आप खुश होते हैं तो कहते हैं, "मुझे पक्का पता नहीं है कि मैं खुश हूं या नहीं।" हम प्रेम पर संदेह करते हैं। जब कोई कहता है, "मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं।" तो आप कहते हैं, "सच?" अगर कोई कहे, "मैं तुमसे नफ़रत करता हूं।" आप कभी नहीं पूछते, "सच?" हमारा संदेह हमेशा किसी सकरात्मक बात पर होता है। संदेह तो आते हैं, जाते हैं। और संदेह करो। मैं नहीं कहूंगा कि संदेह मत करो। जितना ज़्यादा हो सके, संदेह करो। मैं आपको बताता हूं, संदेह अपने आप छूट जाता है। संदेह टिक नहीं सकता। एक गुरु तो शिष्य को संदेह करने के लिये प्रोत्साहित करेगा। गुरु संदेह को नहीं मिटायेगा। गुरु का काम है संदेह को बढ़ाना ताकि आप खूब पक जाओ और एकदम ठोस हो जाओ। क्योंकि, आज नहीं तो कल आपको संदेह होगा ही। तो बेहतर है कि आज ही संदेह कर लो। जितना हो सके संदेह करो। एक ही संदेह बार बार नहीं आता। अलग अलग संदेह उठते हैं। जब संदेह आये तो उससे कतराओ नहीं। उसके साथ रहो। एक समय आयेगा जब आप बिलकुल ठोस हो जाओगे। इससे आप पहले से ज़्यादा मज़बूत, शक्तिवान, केन्द्रित और ज़िम्मेदार बनोगे। मैं कहूंगा, गुरु के बारे में संदेह हुआ है, आने दो। उस संदेह के साथ पको। संदेह एक ऐसा ईधन है जो मन को पका सकता है। आप देखोगे कि आप संदेह से ज़्यादा ताकतवर हो। आपका विश्वास, आपका सौंदर्य, आपका सच, किसी भी संदेह से सौ गुना ज़्यादा शक्तिशाली है। विश्वास सूरज के समान है। संदेह बादल के समान है। कितने भी बादल हों, सूरज को ज़्यादा देर तक नहीं ढक सकते। संदेह के बादल आते हैं, जाते हैं। हां, किसी किसी दिन बादल ज़्यादा देर रह सकते हैं। उसे रहने दो। अंततः सूरज फिर चमकेगा।
प्रश्न : गुरुजी, मुझे नई नौकरी मिली है, जिससे कि मुझे आर्थिक और सामाजिक प्रतिष्ठा मिली है। ये अच्छा है। काम का वातावरण प्रदूषित है। मेरे साथ काम करने वाले भी मुझ में अवसाद और झूठ का ज़हर घोलते हैं। फिर भी मैं अपने काम को सौ प्रतिशत करता हूं और एक अच्छी मिसाल देता हूं। पर मुझे लगता है कि ये स्थिति मेरे लिये अच्छी नहीं है। आप क्या सुझाव देंगे?
श्री श्री :ऐसी स्थिति में तुम अपने आप को रेगिस्तान में एक छोटे जल के स्रोत की तरह जानो। सोचो, अगर रेगिस्तान से वो भी गायब हो जाये तो लोग कैसे जियेंगे? तुम्हारा वहां होना लोगों पर एक अच्छा प्रभाव डालता है। ऐसे ही अच्छा प्रभाव डालते रहो और देखो कि उसी माहौल में क्या तुम अपने जैसे एक, दो, तीन या चार व्यक्ति बना सकते हो। माहौल बदल सकता है। तुम में वो शक्ति है कि तुम अपने माहौल को बदल सकते हो।
व्यवसायिक माहौल से आये तुम्हारे जैसे लोगों की मांग पर हमने एक कोर्स बनाया है। इसे हम APEX कोर्स कहते हैं। वर्ल्ड बैंक और कई और संस्थान इसे कर रहे हैं और उपयोगी पा रहे हैं।
प्रश्न : गुरुजी, मुझे ऐसा लगने लगा है कि अब आपके पास आना मेरे लिये एक अह्म की बात हो गया है। मैं आपके पास इस आशा से आने लगा हूं कि आप मुझसे कुछ कहेंगे, मुझ पर ध्यान देंगे, ना कि इसलिये कि मैं आपसे गहरा प्रेम करता हूं, या आपका शुक्रगुज़ार हूं। मैं पहले जैसे प्रेम और शुक्राने का भाव चाहता हूं। मै उसी भाव से आपकी सेवा करना चाहता हूं।
श्री श्री : तुम्हें पता है, भावनायें तो बादलों जैसी होती हैं! सागर की सतह पर लहरों की तरह भावनायें उठती हैं, आती हैं, जाती हैं। ये बदलती हैं। हमें अपनी भावनाओं के आधार पर ज़्यादा नहीं रहना चाहिये। क्या तुम समझ रहे हो? जीवन committment से चलता है, ना कि सिर्फ़ भावनाओं से। प्रेम एक उपहार है। तुम किसी को प्रेम मह्सूस करने के लिये बाध्य नहीं कर सकते। तुम प्रेम में डूबना चाहते हो, यह इच्छा ही प्रेम में डूबनें में रुकावट डालती है। विश्राम करो। भक्ति-सूत्र में इस बारे में मैने बताया है। जब तुम प्रेम चाहते हो, यह इच्छा ही प्रेम के प्रागट्य में देरी का कारण बनती है। प्रेम महसूस करने का प्रयत्न छोड़ दो, विश्राम करो। तुम पाओगे कि तुम्हारा स्वरूप ही प्रेम है। प्रेम तो हमेशा है। प्रेम प्रकट होगा जब उसके प्रकट होने की आवश्यक्ता होगी। जैसे सूरज हर समय चमकता है, पर अपने समय से ही हमारे लिये दिन में प्रकट होता है।
सूरज चौबीसों घंटे है, पर हर समय हमें दिखता नहीं है। किसी अन्य स्थान पर तो वो है!
वैसे ही, जीवन की सभी सुन्दर भावनायें तुम्हारे पास हमेशा हैं, पर तुम उन्हें ज़बरदस्ती प्रकट नहीं कर सकते। वो जीवन में अलग अलग समय में प्रकट होती रहती हैं। इसलिये तुम विश्राम करो, और सहज रूप में जब वो सुन्दर भावनायें आये तो आने दो।
प्रश्न : कभी कभी मुझे बहुत गुस्सा आता है, जैसे कोई भूत मेरे अंदर घुस गया हो। मैं इस गुस्से से कैसे छुटकारा पाऊं?
श्री श्री : अंदर कोई भूत नहीं है! ना। अगर कोई तुमसे ऐसा कहता है, तो उसकी बात ना सुनो। समझे? तुम पवित्र प्रकाश हो। प्रकाश से तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम्हे सिर्फ़ जागने की ज़रूरत है। थोड़ा और मौन, थोड़ा और ध्यान...। शरीर और मन में हो रहे स्पंदन के प्रति जागरूक हो जाओ। हां? ऐसे ही, गुस्से की एक लहर आती है, फिर शांत हो जाती है। थोड़ा समय लगेगा फिर गुस्से की लहर उठेगी ही नहीं। जैसे जैसे वैराग्य बढे़गा, हम केन्द्रित होंगे, वैसे वैसे गुस्सा कम होता जायेगा।
गुस्से का कारण है उत्तमता की चाह। उत्तमता की इच्छा ही क्रोध का कारण है। इच्छा हमारे में क्रोध लाती है। जब तुम दृष्टा हो कर ये देखते हो, इच्छा शांत हो जाती है। तुम अंदर से लचीले हो जाते हो। तुम अंदर से खिल जाते हो। तुम पाओगे कि बहुत कम स्थितियां ऐसी आयेंगी कि तुम्हें गुस्सा आये। कभी कभी गुस्सा होने में कोई हर्ज नहीं है।
प्रश्न : मैं मनोरोग चिकित्सक बनना चाहता हूं। पर आध्यात्म में आने से मुझे अब यह लगता है कि पाश्चात्य मनोविग्यान पूर्ण नहीं है। मैं पूर्व और पश्चिम के मनोविग्यान का समन्वय कैसे कर सकता हूं?
श्री श्री : हां, ज़रूर! तुम्हे ये करना चाहिये। पाश्चात्य मनोविज्ञान में व्यवहार का संबन्ध मन पर पडी़ छाप और मानसिक रसायनों के मुताबिक बताया जाता है। जबकि पूर्व का मनोविज्ञान चेतना का अध्ययन करता है। अगर तुम इन दोनों को ही पढ़ो तो अच्छा होगा। तुम पूर्व का मनोविज्ञान पढ़ो, फिर पश्चिम का मनोविज्ञान पढ़ना, ताकि तुम उन्हें समझा सको कि पूर्व का मनोविज्ञान क्या कहता है। क्योंकि, पूर्व का मनोविज्ञान कालांतर में परीक्षित हो चुका है। ये पुरातन है। दस हज़ार सालों से ये प्रयोग में लाया जा रहा है। ये काम तुम्हें बड़ा रुचिकर लगेगा। जैसे कि, अगर तुम प्रेम को ही लो, और जानों कि पूर्व और पश्चिम के मनोविज्ञान में प्रेम के बारे में क्या कहा है। ये बहुत रुचिकर है।
प्रश्न : प्रिय गुरुजी, वेद कितने पुराने हैं? क्या सभी वेद आज भी हमारे पास हैं? मैनें सुना है कि उस ज्ञान का कुछ हिस्सा लुप्त हो गया है।
श्री श्री : तुम सही कह रहे हो! चार मुख्य वेद हैं। वेद का अर्थ है कविता, वो शब्द जो ऋषि मुनियों ने गहरे ध्यान की अवस्था में सुने। उन्होनें जो अनुभव किया अपने शिष्यों को शब्दों में बताया। ये शब्द सत्य के स्वरूप को दर्शाते हैं। इन्हें ब्रह्मांडीय चेतना से download किया गया है। उन दिनों में भी download करने की प्रकिया थी। ये प्रकिया है -- आंखे बन्द करो, ध्यान करो। ध्यान में जो तुम्हें ज्ञात हो, click कर के उसे download करो। Surfing! Surfing around and downloading. तो इस तरह वेदों को download किया गया। ऋषि का अर्थ है, जिसने देखा, या जिसने सुना। ऐसे एक हज़ार से भी अधिक ऋषि रहे। उन्होंने अपने आप नहीं लिखा। उन्होंने अपने शिष्यों को सुनाया, और शिष्यों ने कालांतर में अपने शिष्यों को सुनाया। बहुत लंबे समय तक ये ज्ञान ऐसे ही मौखिक रूप में प्रसारित होता रहा।
इसलिये इस ज्ञान का नाम हो गया श्रुति। मूलतः वेदों को चार भाग में बांटा गया। ऋगवेद में मूलतः २१ शाखायें थी, पर अब केवल ३ ही प्राप्त हैं। इसी प्रकार, सामवेद में हज़ारों ऋचायें थी, कई शाखायें थी। पर अब केवल ३ ही प्राप्त हैं। बाकी सब लुप्त हो गया। मध्य काल में जब भारत पर कई आक्रमन हुये तो वेद के वो सभी हिस्से लुप्त हो गये।
प्रश्न : किस वेद में चिकित्सा संबंधी जानकारी है?
श्री श्री : उसे आयुर्वेद कहते हैं। ये चारों वेदों की उपशाखा है। आयुर्वेद, ऋगवेद और अथर्वेद - पहले और आखिरी, दोनों ही वेदों से संबंधित है। इसीलिये, आयुर्वेद की सभी कथायें बड़ी सुन्दर हैं। कहा जाता है कि एक साथ में एक हज़ार ऋषि बैठ कर ध्यान कर रहे थे तभी एक ने भारद्वाज ऋषि से कहा, "तुम जागते रहो। हम सब ध्यान में जा रहें हैं। गहरे ध्यान में जो ज्ञान हमें प्राप्त होगा उसे हम बतायेंगे। उस समय उस ज्ञान को लिखने के लिये तो कोई होना चाहिये।" इस तरह महर्षि भारद्वाज ने एक एक ऋषि के पास जाकर इस ज्ञान को संग्रहित किया। इस तरह से आयुर्वेद की किताबें लिखी गई। इसलिये इतने हज़ारों वषों बाद भी आयुर्वेद आज भी माइने रखता है। यह Materia medica है। इसमें लिखा है किस वनस्पति का शरीर के किस भाग पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस में स्वास्थ्य सें संबन्धित पूरी जानकारी है, क्या करना, क्या नहीं करना, शरीर की कार्य प्रणाली, औषधि...
भारत पर अंग्रेज़ों के राज के समय अंग्रेज़ी शासन के प्रतिनिधि ने इंगलैंड की महारानी विक्टोरिआ को पत्र में लिखा, "यहां भारत में आकर लोगों को प्लास्तिक सर्जरी का अध्ययन करना चाहिये। नाक को कैसे सुन्दर बनायें, त्वचा को, पैरों को...।"
ये आश्चर्यजनक बात है कि जब इंगलैंड में ज्ञान शून्य या नहीं के बराबर था, उसी समय भी भारत में ज्ञान कितना समृद्ध था!
लौर्ड मकौले ने पार्लियामेन्ट में अपना मत रखा, " अगर भारत पर राज करना हो, तो सर्वप्रथम भारत के आध्यात्म को मिटाना होगा।" मकौले के वक्तव्य पर बहुत कुछ कहा जा चुका है। मकौले ने ये भी कहा," मैनें भारत में पूरे देश में भ्रमण किया और पाया कि यहां कोई भिखारी नहीं है, कोई दरिद्र नहीं है। यहां के लोग विज्ञान और चिकित्सा शास्त्र के बारे में बहुत अच्छी जानकारी रखते हैं। केवल दक्षिण भारत में ही ८८,००० चिकित्सा संस्थान हैं।" तो, अंग्रेज़ों ने योजनाबद्ध तरीके से चिकित्सा संस्थानों को बन्द किया। सभी शास्त्र संस्कृत भाषा में थे, इसलिये सभी संस्कृत विद्यालयों को बन्द किया ताकि अगली पीढ़ियों तक ये ज्ञान ना पहंच सके। ऐसा ही हुआ।
मकौले ने एक विस्तृत अध्य्यन प्रस्तुत किया था कि भारत पर कैसे राज किया जा सकता है। ये सब तो अब इतिहास है। मैं ये कह रहा हूं कि आयुर्वेद का ज्ञान आज भी बहुत कार्यकारी है। आज भी आयुर्वेद एक विज्ञान है। हालांकि आयुर्वेद के कई शास्त्र अब लुप्त हो चुके हैं, क्योंकि उन्हें जला दिया गया था।
एक समय भारत में एक सनकी राजा हुआ, औरंगज़ेब। अपने पिता को जेल में डाल कर उसने राजगद्दी को हथिया लिया था। औरंज़ेब ने भारत में नालंदा जैसे ज्ञान के भंडारों में आग लगवा दी। इतिहास में ऐसा कहा है कि नालंदा के पुस्तकालय की पुस्तकें छ: महीनों तक जलती रही। नालंदा के पुस्तकालय में हज़ारों वर्षों से ज्ञान संग्रहित था - बौद्ध, सनातन, जैन एवं सिख दर्शन शास्त्र यहां थे। चिकित्सा शास्त्र, पुरातन शास्त्र, ज्योतिष, धातु-शोधन, निर्माण, विज्ञान...सभी विषयों पर पुस्तकें थी। सब जला दी गई। जो कुछ भी लोग बचा सके और कंठस्थ कर सके वही बच पाया। ये सब इतिहास है।
प्रश्न : मुस्लिम देशों में सोहम शब्द को लेकर कुछ प्रतिरोध है। कुछ नये अध्यापक भी इस गिनती में आते हैं। किसी ने इन्टर्नेट पर सोहम का अनुवाद पाया, "मैं भगवान हूं।" ये मान्यता इस्लाम के मुताबिक सही नहीं है। क्या आप सोहम शब्द का अर्थ और प्रयोजन बतायेंगे?
श्री श्री :सोहम हमारी सांस की स्वाभाविक ध्वनि है। जब तुम सांस बाहर छोड़ते हो, तो स्वाभाविक आवाज़ आती है, हं। इसे तुम उल्टा कर के देखो तो शब्द का अर्थ हुआ, जो ऊपर उठाये, तैराये, विवेक लाये। वो चेतना जो सही और ग़लत में फ़र्क दिखाये, नित्य और अनित्य का अंतर बताये, सुन्दर और कुरूप में अंतर दिखाये - चेतना।
सोहम का अर्थ, "मैं भगवान हूं," नहीं है। सोहम का अर्थ है, "मैं वही हूं।" ‘वही’ क्या है? ‘वही’ प्रेम है। ‘वही’ सत्य है। ‘वही’ सुन्दर आकाश है। ‘वही’ मैं असल में हूं। पहले मुझे विचार आता है कि मै केवल विचार हूं, भाव हूं, मन हूं। लेकिन यथार्थ अनुभूति में जानते है कि, "मैं विचार नहीं हूं। मैं शरीर नहीं हूं। मैं ‘वही’ हूं। ‘वही’ क्या है? ये अनुभूति शब्द के परे है। वह सत्य समझ से परे है। वह सुन्दरता कल्पना से परे है।वह सत्य जिसे तुम पूरी तरह समझ नहीं सकते। मैं ‘वही’ प्रेम हूं। और अगर प्रेम ही ईश्वर है, और ईश्वर ही प्रेम है, और मैं प्रेम हूं, तो मैं भी ईश्वर हूं। जीसस ने कहा है, "प्रेम ही परमात्मा है।" और कहा, "मैं प्रेम हूं!मैं वही हूं! मैं हूं!" ऐसा बाइबल में भी कहा है। तुम भी वही हो। पर अर्थ इतना महत्व का नहीं है जितना का कि सोहम शब्द का स्पंदन। सोहम शब्द का ब्रह्माण्ड में एक निश्चित स्पंदन होता है जो कि हमें खिलने में सहायता करता है। यही इसका प्रयोजन है।
प्रश्न : प्रिय गुरुजी, आपके साथ यहां बैठ कर मैं आज ये जान रहा हूं कि जीवन में अभी तक के मेरे जो अनुभव रहे वो ज़रूरी थे ताकि मैं वो अनुभव कर सकूं जो आज कर रहा हूं...पूर्णता, प्रेम, आभार, उत्साह, प्रेरणा। ये सिर्फ़ इसलिये सम्भव हुआ है क्योंकि आपने इतना कुछ दिया है इस दुनिया में। क्या गुरु की शक्ति इस बात में निहित है कि वे एक पिता के रूप में हमारे उन ज़ख्मों को भरते हैं जो कि हमारे अस्ली पिता से हमें मिले हों?
श्री श्री : ज़ख्मों को भरने की ज़रूरत है। ज़ख्म भरना मुख्य है। रिश्ते को तुम जो भी नाम दो इतना महत्व नहीं रखता। संसार को नये नज़रिये से देखो। जिस किसी ने तुम्हे कभी दुख पंहुचाया हो, ये जान लो कि उन्होनें ऐसा इसलिये किया क्योंकि उन्हें ज्ञान नहीं था। वे आध्यात्मिक ज्ञान से वंचित थे, इसीलिये ऐसा व्यवहार कर रहे थे। उनके हाथों में हथकड़ी थी। उनकी आंखों पर पट्टी थी। वे स्वयं विपत्ति-ग्रस्त थे, शिकार थे। उन्हें इस दृष्टि से देखो तो तुम्हें उनसे सहानुभूति होगी, और अपने जीवन में तुम्हें जो मिला है उस कृपा को महसूस कर सकोगे। हां?
प्रश्न : कृपया ये समझाइये कि हम जो महसूस कर रहे हैं उसके लिये हम कैसे ज़िम्मेदार है? जैसे कि, एक सुन्दर लड़की देखी तो मन में एक विचार आया, फिर सुख की अनुभूति हुई।
श्री श्री : शायद तुम भूल रहे हो, जब तुम पांच, छ:, सात या आठ साल के थे, तब तुम्हें सुन्दर लड़की आकर्षित नहीं करती थी। तब तुम सुन्दर भोजन से आकृष्ट होते थे! मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूं। इस में तीन पीढ़ी के लोग, पिता, पुत्र और दादा, एक साथ छुट्टी मनाने गये। परिवार का सबसे छोटा सदस्य खुश हो गया, उसे बढि़या भोजन जो मिला। उसके पिता खुश थे, कैम्प में मौजूद सुन्दर सुन्दर लड़कियां देख कर। दादाजी बोले, "मुझे यहां बहुत आराम मिला! कितना अच्छा हुआ हम छुट्टी मनाने यहां आये! आज मेरा पेट अच्छी तरह साफ़ हुआ। ऐसा कभी नहीं हुआ! कितना अच्छा लग रहा है!" और वे आगे बोले, "तुम दोनों कितनी बचकानी बातें कर रहे हो! ये भोजन से खुश हो और तुम सुन्दर लड़कियां देख कर खुश हो! मेरी उम्र में आओगे तो असली खुशी जानोगे।" किसी बुज़ुर्ग का पेट ठीक से साफ़ हो जाये, या उन्हें अच्छी नींद आ जाये, उनके लिये ये स्वर्ग के सुख जैसा है। अभी कुछ समय और रुको तो जानोगे कि जीवन में और अधिक सुंदर क्या है।
प्रश्न : प्रिय गुरुजी, आज जब विडियो में चक्रों की ऊर्जा के बारें में बात हो रही थी, तो मन में एक प्रश्न आया। मैं अपने दूसरे चक्र में लगातार ऊर्जा का अनुभव करता हूं, पर मुझे sex में रुचि नहीं है। Sex के बाद मैं थकावट और तमस महसूस करता हूं। पर दूसरी ओर, मेरी सृजनात्मक शक्ति उजागर नहीं हो पा रही है। मैं सृजन करना चाहता हूं, लिखना चाहता हूं, गाना चाहता हूं, नाचना चाहता हूं। मेरा मार्गदर्शन कीजिये कि मैं मेरी सृजनात्मक शक्ति जागृत हो।
श्री श्री : हां, ध्यान करते रहो। अगर कोई एक चक्र बहुत ज़्यादा प्रयोग में रहा हो, तो स्वतः वहां ज़्यादा ऊर्जा जाती है। ऊर्जा चलती रहेगी। निश्चित रूप से चलती रहेगी। तुम नाभि चक्र पर ज़्यादा ध्यान केन्द्रित करो और फिर नाचो, गाओ। नृत्य और गायन तो हमारी साधना पद्दति में है ही। ये कई तरह से तुम्हें ऊपर उठाता है।
तुम्हें प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये। तुम प्रतिदिन दांत मांजते हो। शरीर को स्वच्छ रखने के लिये नहाते हो। वैसे ही, प्रतिदिन थोड़ा ज्ञान सुनो और ध्यान करो। बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है। वो ज्ञान जो तुम्हें बोध कराता है कि यहां सब कुछ नाशवान है। संगीत और समरसता भावनाओं को शुद्ध बना कर हृदय को संपन्न बनाते हैं। कुछ देने से हृदय शुद्ध होता है। ज्ञान और ध्यान से सब शुद्ध हो जाता है।
प्रश्न : गुरुजी, किसी का देहांत होने पर ‘राम नाम सत्य है’ क्यों कहते हैं?
श्री श्री : किसी के देहांत पर तुम ये समझ जाते हो कि यही सत्य है। एक दिन हर किसी की मृत्यु होगी। जीवित रहते हुए तुम इस सत्य से अन्भिग्य रहते हो। तुम बेकार बातों में फंसे रहते हो।
सत्य को तुम टाल नहीं सकते। सौंदर्य का त्याग नहीं हो सकता। प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
ये तीन बातें ही याद रखने के लिये बहुत हैं। इन्हें पचाओ।
प्रश्न : यज्ञ के क्या क्या अंग होते हैं?
श्री श्री : किसी भी यज्ञ में ध्यान, दान, ज्ञान और गान होता है। गान दिमाग के दायें भाग को पुष्ट करता है। ज्ञान दिमाग के बायें भाग को पुष्ट करता है। ध्यान से दिमाग के दोनों भाग पुष्ट होते हैं। यज्ञ से हमारा विकास होता है।
प्रश्न : गुरुजी, अपना जीवनसाथी चुनते समय हमें उस में किन किन गुणों को परखना चाहिये?
श्री श्री : (मुस्कुराते हुये) मुझे इस का अनुभव नहीं है! उन से पूछो जिन्हें अनुभव है। तुम यहाँ वैवाहिक विभाग से भी मदद ले सकते हो।
तुम्हें पता है ये क्यों कहते हैं कि ‘विवाह स्वर्ग में पूर्वनिश्चित किये जाते हैं’? क्योंकि, तुम्हारे लिये चुनाव हो चुका है। तुम्हें सिर्फ़ उसे लेना है और आगे बढ़ना है। तुम चुनाव की प्रक्रिया से मुक्त हो। जो तुम्हारी थाली में आये, उसे लो और आगे बढ़ो।
तुम्हें पता है, सबसे अच्छी बात होगी कि तुम अपने जीवनसाथी की कमियों पर ध्यान ना दो। किसी भी रिश्ते में अगर दोनों व्यक्तियों का ध्यान आध्यात्म पर होगा तो वे समांनांतर रेखाओं की तरह बिना किसी टकराव के अनंत तक साथ साथ आगे बढ़ पायेगें। जिस क्षण आध्यात्म से ध्यान हटा और एक दूसरे पर गया तो टकराव होंगे। आध्यात्म के पथ पर रहना बहुत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न : गुरुजी, विशालाक्षी मण्डप का निर्माण कैसे हुआ?
श्री श्री : मनुजी (एक शिष्य) ने कहा, "गुरुजी, एक सभा कक्ष होना चाहिये जहां लोग ध्यान कर सकें।" तो मैनें एक चित्र बनाया और उसे बनाया गया। पहले कोई सभा कक्ष नहीं था। अष्टावक्र गीता की व्याख्या ऐसी जगह की गई थी, जहां बारिश का पानी भीतर आ जाता था।
जब हमने विशालाक्षी मण्डप का उद्घाटन किया, तो इतने लोग आये कि वो उसी वक्त छोटा पड़ गया! तुम्हें पता है, जब लोग एक साथ ध्यान करते हैं तो वो ऊर्जा विशव में प्रसारित होती है।
प्रश्न : गुरुजी, इस स्थान का रहस्य क्या है?
श्री श्री : (मुस्कुराते हुए) रहस्य यहाँ है (अपने हृदय को इंगित करते हुए)।