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सारी दुनिया एक ही चेतना,एक ही उर्जा और एक ही तत्व से बनी है !!!


२६ मई २०११, बैंगलुरू आश्रम 
जब भगवान श्री कृष्ण समाधी में बैढे तो उन्होंने भगवत गीता सुनाई | युद्ध के उपरांत अर्जुन ने उनसे कहां आपने जो मुझे सुन्दर उपदेश युद्ध के दौरान प्रदान किया मैं उसे भूल गया क्योंकि  युद्ध भूमि में बहुत भीड़  और झंझाल था और मैं आप को ठीक से सुन नहीं पाया | आपने जो वहां पर कहा था उसे फिर से सुनाये | भगवान श्री कृष्ण ने कहां मैं वह तुम को फिर से नहीं सुना सकता क्योंकि उस समय मैं समाधी में था, और मैने तुम्हे बिठाकर वह सब सुनाया जो कुछ मुझे ज्ञात हुआ और मैं वह फिर से नहीं सुना सकता | जो कुछ भगवान श्री कृष्ण ने कहां वह कोई व्यक्ति के रूप में नहीं बोल रहे थे, परन्तु वह सम्पूर्ण ज्ञान समष्टि के द्वारा बोला जा रहा था, और यह सारा उपदेश शिव तत्व और आत्म तत्व के द्वारा आया |

उन्होंने कहा मैं ही सूर्य,वर्षा,सत्य और असत्य हूं और सबकुछ मैं ही हूं | यह एक गहरी बात है |
सबकुछ एक ही तत्व और अणु से बना  हैं | आपके माता, पिता किस तत्व से बने है | सबका शरीर एक ही मिट्टी और उसी अनाज से बना है, अनाज ग्रहण करने से शरीर बनता है |  जो कोई भी उसे खाता है उससे वे और शरीर बनता है | सभी कोई एक तत्व,शक्ति और उर्जा से बना है | वे कह रहे हैं कि सारी दुनिया एक ही चेतना,एक ही उर्जा और एक ही तत्व से बनी है |

यदि आप पंखा, माइक और लाइट को देखेंगे वे सब एक ही विद्युत तरंग के कारण चल रहे हैं | परन्तु ऐसा प्रतीत होता हैं कि पंखा, माइक और लाइट अलग अलग है | वे अलग अलग प्रतीत होते हैं लेकिन वे सब एक ही चीज से बने है | उसी तरह यदि सूर्य नहीं होता तो पृथ्वी नहीं होती | यदि पृथ्वी नहीं होती तो पौधे,पेड़ और मानव भी नहीं होते ? तो हमारा स्रोत क्या है? भौतिक स्तर पर हमारा स्रोत पृथ्वी है; उसका और सूक्ष्म स्वरुप है सूर्य| फिर सूर्य का स्रोत क्या है ? वह समष्टि उर्जा ; और फिर भगवान श्री कृष्ण कहते है कि वह समष्टि उर्जा मैं हूं |

वह आत्मा आप है, मैं हूं और सबकुछ इसी समष्टि उर्जा से बना हुआ है और आज विज्ञानिक भी यही कहते है | जो लोग क्वांटम भौतिकी पढ़ते हैं वे कहते सारी सृष्टि एक ही उर्जा से बनी हुई है | पहले कहा जाता था कि अलग अलग अणु और परमाणु  होते है और उनसे सारे कृत्य होते है, लेकिन अब वे कहते हैं कि यह सब एक ही उर्जा से होता है और सबकुछ एक ही  तरंग का कृत्य है | जिसे हम वस्तु समझते है वास्त्व में वह वस्तु नहीं है, वह शक्ति और यह सब सिर्फ उर्जा है और यह बात कई वर्षों पहेले भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहीं |

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तानुमाश्रितम् परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम | ये लोग मुझे अनंत शक्ति न जानकार मनुष्य समझते है, मैं मनुष्य योनी  में तो हूं पर मुझमे जो चैतन्य है, वह परम चैतन्य है | लोग मुझे गलत समझते हैं, मैं कोई व्यक्ति नहीं, मैं शक्ति हूं |

प्रश्न: शुरुवात में जब हम कोई जप मंत्र लेते है तो वह अत्यंत विशेष लगता है | लेकिन कुछ समय उपरान्त वहीं भावना नहीं रहती| उसी भावना को कैसे बरक़रार रखा जाए और अपने मंत्र को कैसे प्रभावकारी बनाया जाए ?
श्री श्री रवि शंकर: कुछ भी बनाने का प्रयास न करे | जब भी उसे याद करे, यह मान कर चले कि वह अत्यंत पवित्र और विशेष है | जब आप गंगाजी के ठन्डे पानी में पहली बार डुबकी लगाते है, तो पानी ठंडा लगता है लेकिन जैसे ही आप पानी में उतर जाते हैं तो फिर पानी उतना ठंडी नहीं महसूस होता हैं क्योंकि शरीर ने उसे स्वीकार कर लिया है और पानी को फिर से ठंडा लगने के लिए आपको फिर से बहार आना होगा | आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है, आपको जब भी कृतज्ञता लगे तो उसे विशेष समझे | कृतज्ञता तरंग या लहरों के रूप में आती है |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, इतने सारे मंत्र हैं, क्या आप कुछ विशेष मंत्र जैसे विष्णु सहस्त्रनाम,ललित सहस्त्रनाम और श्री विद्या मन्त्र के प्रभावों के बारे में बताएंगे ?
श्री श्री रवि शंकर: इतना अधिक विस्तार में ना जाए | विष्णु सहस्त्रनाम में कहा गया है “सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशय:” और एक शब्द सोऽहम् में  ही सब कुछ आ गया है | राम शब्द और सोऽहम् में विष्णु जी  के एक हज़ार नाम लिखे गए है कभी कभी आप विष्णु सहस्त्रनाम को सुन कर उस पर ध्यान कर सकते है सभी मन्त्रों के कुछ प्रभाव होते है पर ध्यान सबसे महत्पूर्ण है | मन्त्रों से परे जाना भी आवश्यक होता है, और सब कुछ से परे हो जाना मन को शांति प्रदान करता है |

प्रश्न : गुरुजी सारे मंत्र संस्कृत मेंमैं क्यों है? संस्कृत में  क्या विशेष है ?
श्री श्री रवि शंकर: संस्कृत की उत्पत्ति बाद में हुई, मंत्र पहले से ही थे | मन्त्रों के शब्द  पहले से ही थे बाद में  भाषायें उत्पन्न हुई | सिर्फ संस्कृत ही नहीं परन्तु यदि आप सभी भाषाओं के गहन में जायेंगे तो इन सभी  मंत्रो को पायेंगे  |

प्रश्न : गुरुजी मंत्र और यन्त्र में क्या सम्बन्ध है ? 
श्री श्री रवि शंकर: एक मंत्र  है और एक तंत्र है | मंत्र में शब्द और यन्त्र में चित्र होता है| मंत्र में ध्वनि और यन्त्र में आकार होता है|

प्रश्न : गुरुजी इतने सारे  मंत्र है यह कैसे मालूम होगा कि मेरे लिए कौन सा मंत्र उचित है ?
श्री श्री रवि शंकर: आप सहज समाधी ध्यान सीखें और आप के शिक्षक जो भी मंत्र देंगे वह आप के लिए उचित होगा|

प्रश्न : अच्छे  शिष्य  के क्या गुण है?
श्री श्री रवि शंकर: इसे आप अपना होम वर्क अभ्यास क्यों नहीं मान लेते? आप इन्हें  लिखें और मुझे बताएं | कल हम एक कागज लगा देगें  और उस पर हर कोई जा कर एक गुण लिखे | दो दिन आप इन सभी गुणों को लिखें यदि किसी ने कोई गुण को पहले से ही लिख रखा है तो उसे फिर से  पुनः  ना लिखें और कोई अन्य गुण लिखें | आपको को भी गुण लिखने का मन करे, उसे लिखे | जो लोग इस कार्यक्रम को इन्टरनेट पर देख रहे है वे भी अपने विचार भेजें कि आदर्श भक्त या शिष्य  के क्या गुण होना चाहिए|

प्रश्न : कौन सी प्राथना सबसे उत्तम है ? जिसमें तुरंत उत्तर देने के अलाबा भगवन के पास कोई विकल्प ना रह जाये ? वह प्राथना क्या है ?
श्री श्री रवि शंकर: शांति और मौन में  रहें और यह जान ले कि दिव्यता सब बात का ध्यान रख रही है वही सबसे उत्तम प्रार्थना है, ध्यान सबसे उत्तम प्राथना है |

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, क्या आप  भूत और प्रेत के बारे  में बता सकते है, क्या वे सही में होते हैं ? यदि वे आपको बहुत पसंद करने लगे तो उनसे कैसे छुटकारा पाया जाये?
श्री श्री रवि शंकर:  यह एक गंदे तालाब  में उतरने के बाद उसमें से निकलने का प्रयास करने जैसा है | जितना आप उसमें उतरेंगे उतना ही उसमें डूबेंगे | इसीलिए सबसे उतम यह होता है कि आप अपनी साधना करें और आप के आस पास के लोगों का ध्यान रखें कुछ सेवा कार्य करें , भजनो का गान करें उससे सब बातों का  ध्यान रखा जायेगा | अपना ध्यान भूत और प्रेतों के तरफ बिलकुल केंद्रित न करें |

प्रश्न :- प्रिय गुरु जी, मैं जानना चाहता हूं कि यदि मैं किसी को आशीर्वाद देता हूं तो क्या उनकी नकारात्मकता मुझ मैं आ जाती है, यदि हां तो उसका क्या समाधान है ?
श्री श्री रवि शंकर: नहीं! आप चिंता ना करें | सिर्फ जय गुरु देव कहें |

प्रश्न :गुरुजी, केंद्रीय मंत्री मंडल में कई अपराधी है , हम किस ओर  बढ़ रहे है, हमारा देश किस ओर बढ़  रहा है?
श्री श्री रवि शंकर: इसके लिए भारी परिवर्तन की आवश्यकता है और इन मंत्रियों को हटाने के लिए भारी  परिवर्तन की आवश्यकता है | हम सब को भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेना चाहिए, सब कुछ और परिस्थितियां बदलेगी  |

प्रश्न : गुरुदेव एक समय इस देश में किसान धनी ओर संपन्न होते थे | वही किसान  जो सारे  देश का पेट भरते है, उनको खुद को खाली  पेट सोना पड़ता है , उनसे क्या गलती हुई और हम इसमें कैसे सुधार ला सकते है ?
श्री श्री रवि शंकर: वह मंत्री जो किसानो का शोषण कर रहा है उसे कुछ सदबुद्धि आनी चाहिए या उसे उस पद से हटा देना चाहिए |मैं भी इसी विषय पर विचार कर रहा था | जब से इस मंत्री ने अपने इस पद को संभाला है, उसने कुछ भी अच्छा कार्य नहीं किया जिससे आकाल और अनाज की कमी उत्पन्न हुई और यह आकाल प्रकृति की वजह से नहीं पड़ा |  या तो उसके पास दिल या दिमाग नहीं है या फिर तो दोनों ही नहीं है | या तो कुछ गढ़बढ़ है | कुछ भी हो जाये उन्हें कुछ भी चिंता ही  नहीं होती, उन्हें तो सिर्फ धन से मतलब होता है |इन्होने लाखों करोडो रूपये विदेश भेजा है ओर आतंकवादियों से संपर्क बनाये है | और  उन्होंने  इस देश को लूटा है |यह बहुत आवश्यक है कि इसके खिलाफ हम अपनी आवाज उठायें |

प्रश्न : गुरुजी, मैंने  दसवी कक्षा उत्तीर्ण कर ली है और दसवी कक्षा उत्तीर्ण कर लेने के वाद मैंने बारहवी कक्षा भी उत्तीर्ण कर ली है | इस दुनियां में अपनी बुद्धि को सिद्ध करने के लिए मुझे कितने बार उत्तीर्ण होना होगा ?
श्री श्री रवि शंकर: जिनके पास कुछ नहीं होता है उन्हें लगता है दूसरों के पास भी कुछ नहीं है | यहां तक मुझे भी अपने आप को बार बार सिद्ध करना पड़ता है, इसीलिए आप अपने आपको कुछ और समय तक सिद्ध करते रहें | अपनी परीक्षा को क्रीड़ा के जैसे समझे फिर उसकी चिंता आपको नहीं सताएगी | आप को अपने परीक्षा में  अच्छे से अध्ययन करके अच्छे से उत्तीर्ण करनी चाहिए | सीढ़ी टेढ़ी हो तो आप क्या करते है? आपको भी थोडा अपने आपको झुका कर उस पर कैसे भी चढना पड़ता है | यदि आपने चढ़ते समय सीढ़ी को सीधा करने का प्रयत्न किया तो फिर आप उसमें फंस सकते है | सीढ़ी यदि टेढ़ी हो  तो रेलिंग का सहारा लेकर उस पर चढें और एक बार आप जब आगे बढ़ जाते है तो सीढ़ी को ठीक करने के बारे में विचार कर सकते हैं|

प्रश्न :- गुरुजी कौनसी इच्छाओ को भगवान के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए और कौनसी इच्छाओं को स्वयं के प्रयासों के द्वारा पूरा किया जा सकता है ? इसे कैसे समझें ?
श्री श्री रवि शंकर: प्रयास और समर्पण एक साथ चलते है, इसीलिए आप प्रयास करें और उसे समर्पित कर दीजिए | हम संकल्प  लेकर  उसे छोड़ देते हैं | पूजा में हम क्या करते है ? हम चावल, पानी ओर फूल को अपने हाथ में लेकर संकल्प लेते है और उसे छोड़ देते है | हम फूल को अपने हाथ में  पकड़ कर नहीं रखते | जब आप सिनेमा देखने जाते है तो आप पहले टिकिट खरीदते है और जब आप  सिनेमा घर में प्रवेश कर रहे होते हैं तो वह टिकिट आपको वापस कर देना पड़ता है | ३० -४० वर्ष पूर्व निश्चित ही टिकिट वापस देनी पड़ती थी |अभी भी आप को उसे वापस देना पड़ता है | इसीलिए संकल्प और समर्पण को हमें इस तरह से देखना चाहिए | आप अपना १०० प्रतिशत दीजिये और फिर उसे भगवान की इच्छा मान लीजिए |

प्रश्न : नैतिक मूल्यों के बारे में आध्यात्मिक गुरुओं की क्या भूमिका होती है ?
श्री श्री रवि शंकर: उनकी पूरी भूमिका होना चाहिए | सिर्फ दूसरों को मूल्यों के बारे में बताना पर्याप्त नहीं है | परन्तु यह बताना कि इन मूल्यों को आपको अपने जीवन में कैसे उतरना चाहिए, यह भी सिखाना भी आवश्यक है |  इन मूल्यों के साथ कैसे जीना इसे भी समझदारी के साथ बताना चाहिए | यदि कोई फिसल जाये तो फिर समझदारी  से उन्हें आगे बढ़ने के लिए  प्रोत्साहित करना चाहिए | यही इसका कौशल है |

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"अष्टावक्र भी यही कह रहे हैं – कोई तृष्णा, कोई द्वेष, कोई राग आत्मज्ञान को ढक नहीं सकता"

बैंगलोर आश्रम, भारत

पिछली पोस्ट के शेष अंश..

प्रश्न : मैं आप के साथ कुछ समय बिताना चाहता हूँ, बैठ कर आप से बातें करना चाहता हूँ। आपके साथ यात्रा करना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

श्री श्री रवि शंकर : जो इच्छाएं तुम पूरी कर सकते हो, वो पूरी कर लो, और जो इच्छाएं समर्पित कर सकते हो, उन्हें समर्पित कर दो। किसी भी इच्छा की पूर्ति में समय और प्रयास लगता है। जब तुम अपनी इच्छाओं को समर्पित कर देते हो, वो अपने आप ही पूरी हो जाती हैं। कुछ इच्छाएं बहुत लंबे समय तक इच्छा करने पर पूरी होती हैं। और कुछ इच्छाएं तब भी पूरी नहीं होती हैं। कई बार तुम पाते हो कि किसी इच्छा का पूरा ना होना तुम्हारे हित में था। इस विश्वास के साथ चलो कि ईश्वर जानता है तुम्हारे लिए क्या उत्त्म है। ना तो इच्छाओं की आलोचना करो, और ना ही उनके साथ बह जाओ। ठीक है? ये बीच का रास्ता है। जैसे ही तुम सजग होते जाते हो, बाकी सब अपने आप ही शांतिपूर्ण हो जाता है।

प्रश्न : लोगों को आप पर बहुत विश्वास है। अगर आप कहें कि आप गुरु नहीं हैं तो उनके विश्वास का क्या होगा? मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा है पर मैं एक स्थिति दर्शाने की कोशिश कर रहा हूँ जो कि मेरी जीवन में घट चुकी है। अगर कोई कहे कि मैंने जिसपर विश्वास किया वो गलत है, तो मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : तुम ने मन में एक कल्पना बनाई है और एक जो अस्तित्व से तुम्हारा मन कहता है। विश्वास वही है जो संशय से हिलता नहीं है। संशय आसमान में छाये बादलों की तरह आ कर चला जाता है। कितने भी बादल हों पर आसमान को अधिक देर के लिए ढक नहीं सकते। १०० परिक्षा भी हो पर दिल कहीं तो कहता है क्या सत्य है।
अगर तुम्हारे पैर में दर्द हो और मैं भी तुम से कहूं कि तुम्हारे पैर में दर्द नहीं है, तो क्या तुम मान लोगे? जीवन में कुछ ऐसे अनुभव होते हैं चाहे पूरी दुनिया कहदे गलत है पर मन नहीं मानता।
एक प्रकार से, संशय करना अच्छा है। एक तरह से पकने के लिए प्रभु की कृपा हो गया। संशय की अग्नि से तुम्हें मज़बूत बनने का मौका मिलता है।

प्रश्न : गायत्री मंत्र में कहा है, ‘धियो यो ना प्रचोदयात:’ इसका क्या अर्थ है?

श्री श्री रवि शंकर : बुद्धि में दिव्यता का प्रवाह हो। बुद्धि में केवल अच्छे विचार ही आएं।

प्रश्न : योगी होने का क्या अर्थ है?

श्री श्री रवि शंकर : योगी होने का अर्थ है फिर एक बच्चे की तरह हो जाना। अष्टावक्र भी यही कह रहे हैं – कोई तृष्णा, कोई द्वेष, कोई राग आत्मज्ञान को ढक नहीं सकता।

प्रश्न : इच्छा और संकल्प में क्या अंतर है?

श्री श्री रवि शंकर : जीवन में हर कार्य संकल्प से होता है। तुम्हारे मन में ये संकल्प उठा कि तुम यहाँ आओ, तभी तुम यहाँ आ सके। अगर कोई चीज़ तुम्हारे मन में बार बार आती रहे, तो वह इच्छा है। ये मत सोचो कि मन में कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए। बड़े बड़े काम करने के संकल्प करो। अधिक काम की ज़िम्मेदारी लो, पर कभी कभी उन्हें किनारे रख कर विश्राम भी करो।

प्रश्न :मन को एकाग्र कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : तुम्हारा मन प्रेम से स्थिर हो जाता है। लालच और भय भी मन को स्थिर करते हैं। मैं प्रेम को बाकी दोनों उपायों से श्रेष्ठ मानता हूँ।

प्रश्न : आपकी उपस्थिति में इतनी शांति और आनंद मिलता है कि मैं हमेशा उसी आनंद में रहना चाहता हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर : चाहे तुम विश्व में कहीं भी हो जब तुम इन अनुभवों को याद करते हो, तो तुम उस आनंद को अनुभव कर लेते हो। संसार के बाकी सभी छाप इस अनुभव से धुल जाती हैं।


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मंत्र किसी धर्म विशेष के ना होकर सार्वलौकिक हैं

बैगलोर आश्रम, ८ फ़रवरी २०१०

प्रश्न : गुरुजी, सत्संग में गाये जाने वाले भजनों और मंत्रों का क्या महत्व है? हालांकि हम इनसे सकरात्मक ऊर्जा पाते हैं, फिर भी कई लोग भजन गाने में कुछ संकोच करते हैं। वे सत्संग के असली महत्व और मंत्रो के गहन अर्थ को नहीं जानते। इसके बारे में कुछ बताएं।

श्री श्री रवि शंकर :
ॐ नमः शिवाय मंत्र में पंचतत्वों का समावेश है – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। हज़ारों वर्षो से इन मंत्रों का उच्चारण हो रहा है। मंत्र वो ध्वनियां हैं जिन्हे ध्यान में भीतर की गहराई में सुना गया। मंत्रों का उद्देश्य तुम्हें अपने स्तोत्र तक वापस ले जाना है। मंत्रों में कुछ ऊर्जा निहित है। ये मंत्र किसी धर्म विशेष के ना होकर सार्वलौकिक हैं।
लैटिन अमरीका के चर्चों में भी ‘मारा: नाथ’ मंत्र का उपयोग होता है। इसका संस्कृत और लैटिन में अनुवाद बहुत मिलता जुलता है। नाथ संस्कृत में भगवान को कहते हैं। मारा: का अर्थ हुआ, मेरे। ’मारा: नाथ’ का अर्थ हुआ - My Lord।
इस तरह चर्च में इस्तेमाल होने वाले, ‘मारा: नाथ’ का मूल संस्कृत भाषा में है।
संस्कृत मंत्रो का उच्चारण लाभकारी है। संस्कृत मानव सभ्यता की सबसे पुरानी भाषा है। संस्कृत का हमारी चेतना पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है।
हम सभी भजनों का स्वागत करते हैं – जापानी, कोरियन, स्पैनिश...आप कोई भी भजन गाना चाहें, आपका स्वागत है। दक्षिण अमरीका में सत्संग में हम कई स्पैनिश और पुर्तगाली भजन गाते हैं। भारत में सभी लोग मंत्रों से आसानी से संबंध बना लेते हैं। किसी भी भाषा में गाओ, साथ में संस्कृत मंत्र भी गाओ।
आप में से कितने लोग मंत्रों के उच्चारण और गायन से उत्पन्न हुई ऊर्जा को महसूस करते हैं? (बहुत से लोग हाथ उठाते हैं।) ये प्रत्यक्ष है।
वैदिक मंत्रो के उच्चारण का कभी- कभी अर्थ समझ नहीं आता, पर उसका सकरात्मक असर महसूस होता है।
आज सुबह हमनें जो रुद्राभिषेक किया, ये हज़ारों सालों से चला आ रहा है। हम स्फटिक(crystal), दूध, दही, फूल, इत्यादि का उपयोग करते हैं। इस सब का कुछ सकरात्मक असर होता है।

प्रश्न : हम शिवरात्रि के बारे में बहुत कुछ सुन रहे हैं। शिवरात्रि का क्या महत्व है?

श्री श्री रवि शंकर :
हमारी चेतना इन तीन में से किसी एक अवस्था में होती हैं – जागृत, सुषुप्त या स्वप्न। चेतना की चौथी अवस्था शिव है – ध्यान की अवस्था। शिवरात्रि के दिन लोग उत्सव मनाते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस दिन जो भी मनोकामना हो, वो पूरी होती है। साधारण लोगों के लिये शिवरात्रि की रात उत्सव की रात है। साधक के लिये हर दिन और हर रात उत्सव है।

प्रश्न : हम अपने पिछले जन्मों का वजूद कैसे भूल जाते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये जानना कठिन नहीं है। Eternity process में तुम ये जान सकते हो।

प्रश्न : गुरुजी, हम सब रजत जयंती(silver jubilee) समारोह से बड़ा उत्सव कब देखेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
क्या रजत जयंती महोत्सव से बड़ा उत्सव करें? (दर्शकों ने एक स्वर मे कहा, ‘हां’।) हां, क्यों नहीं! अगले साल, २०११ में आर्ट आफ़ लिविंग के ३० साल पूरे हो जायेंगे - तीन दशक। कुछ विचार करते हैं। तुम भी सोचो। हम विचारों को इकट्ठा कर लेते हैं...|


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"यदि तुम अपनी भावनाओं को अपनी जिम्मेदारी बनाते हो, तुम्हें कोई भी सुखी या दुखी नहीं कर सकता|"

प्रश्न : हम कैसे जानें कि सच्चा प्यार क्या है?

श्री श्री रविशंकर : हम कैसे जाने कि झूठा प्यार क्या है? मेरे प्रिय ! प्यार प्यार है, तुम इसे सच्चा या झूठा नहीं कह सकते| प्रेम पर संदेह मत करो| हम घृणा पर संदेह नहीं करते| क्या गारंटी है कि लोग तुमसे घृणा करते हैं? हो सकता है कि उस समय वे तुमसे गुस्सा हों ! प्रेम हमारा स्वभाव है| इच्छाओं और लालच के कारण कभी-कभी प्रेम छिप जाता है| प्रेम के बिना कोई प्राणी नहीं है| प्राण उर्जा प्रेम से ही बनी है| हज़ारों परमाणु मिलकर शरीर का निर्माण करते हैं| प्रेम(प्राण उर्जा) के बिना ये सभी परमाणु अलग-अलग हो जायेंगे और वह मृत्यु के सिवा कुछ नहीं है| जब प्राण शरीर को प्रेम करते हैं, तो शरीर में रहते हैं और जीवन होता है| जब उस प्रेम का अंत हो जाता है, मृत्यु होती है| हमें भावनाओं को प्रेम नहीं समझना चाहिए। प्रेम हमारी प्रकृति है। भावनाओं और प्रेम में अलगाव को जानो|

प्रश्न : अप्रसन्नता क्यों होती है?

श्री श्री रविशंकर : ताकि परमात्मा कुछ कार्य कर सके| एक बुद्धिमान व्यक्ति ईश्वर का खेल समझता है| यह एक कठपुतली के खेल में होने जैसा है| जब तुम ज्ञान में होते हो, तुम परमात्मा के हाथों में तार की तरह हो| इस ज्ञान के बिना तुम कठपुतली हो जाते हो|

प्रश्न : ज्योतिर्लिंग का क्या महत्व है? (भारत में १२ वर्णित तीर्थ-स्थल ज्योतिर्लिंग कहलाते हैं)

श्री श्री रविशंकर :
लिंग प्रतीक है| ज्योति प्रकाश है| ज्योतिर्लिंग प्रकाश का प्रतीक है| आदि-कालीन ऋषियों और साधुओं ने इन स्थानों पर ध्यान और तपस्या की, और इन स्थानों पर वो उर्जा प्रकट हुई| यहाँ (विशालाक्षी मंटप में) एक ज्योतिर्लिंग है| वह तुम्हें दिखाई नहीं देता, लेकिन वहाँ प्रकाश है| स्वयाम्ही तिर्तानी पुनाम्ही सन्तः -जहाँ कोई संत रमता है, वहीँ तीर्थ (पवित्र स्थल) होता है| प्रत्येक तीर्थ-स्थल वह स्थान है, जहाँ किसी संत ने ध्यान किया, तपस्या की और फिर अपनी शक्ति को पत्थर, पानी आदि में प्रेषित किया और वह स्थान उस चेतना से प्रकम्पित हो उठा| जब किसी स्थान में आध्यात्मिक ऊर्जा कम होती है, तब संघर्ष बढ़ता है| वहाँ ध्यान, पूजा, सेवा और आध्यात्मिक जीवन होना चाहिए| तब चैतन्य-शक्ति (आध्यात्मिक ऊर्जा) बढ़ती है|
प्रश्न: पानी भी भाप बनने में एक निश्चित समय लेता है| मेरी अज्ञानता दूर होने में कितना समय लगेगा|
श्री श्री रविशंकर: ‘मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ| मेरे लिए यह कैसे संभव है?’ ऐसा मत सोचो| केवल एक साधारण व्यक्ति ही यह ज्ञान प्राप्त कर सकता है| एक पात्र खाली होने में कितना समय लेता है? चाहे वह चांदी, कीचड़ या सोने से भरा हो, यह खाली होने में उतना ही समय लेता है| कीचड़ भरने में कम समय लगता है, सोना भरने में अधिक| तुम्हें बहुत प्रयास करना पड़ता है| लेकिन खाली होने में कोई समय और कोई प्रयास नहीं लगता| ईश्वर को प्राप्त करने के लिए किसी योग्यता व किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है|
अकिंचन- मैं कुछ नहीं हूँ।
अप्रयत्न- मैं कुछ नहीं करता।
अकाम- मैं कुछ नहीं चाहता।
जब तुम देखते हो कि किसी ने बड़ी तपस्या की और तब उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया, तो जानो कि ताप स्वयं को खाली करने के लिए था|
जब रजस शांत हो जाता है,सारी बेचैनी दूर हो जाती है| तब उसमें दैवी चेतना का अनुभव होता है| मत सोचो कि कोई प्रकट होगा और यह और वह बतलायेगा! वह केवल भ्रमित होना होगा| बस विश्राम करो| आराम और विश्राम में कोई दूरी नहीं है| ईश्वर तुम्हारे बिलकुल पास है| तो थोड़ी देर के लिए ध्यान करो| और महसूस करो कि तुम्हारा कुछ भी नहीं है| यदि तुम मंत्र-जाप करते हो, तो यह तुम्हें ध्यान में जाने में सहायता करता है| किसी भी पूजा में पहले ध्यान होता है| पूजा समाप्त होने पर भी ध्यान होता है| यह परम्परा छोड़ दी गयी है| इसके बिना यह चाबुक के बगैर घोड़े पर सवारी करने जैसा है| तुम घोड़े को कैसे नियंत्रित करोगे?
एक बार मुल्ला नसीरुद्दीन को एक ऐसे ही घोड़े की पीठ पर बिठाकर शहर के चारों ओर घुमाया जा रहा था| किसी ने मुल्ला से पूछा कि वे कहाँ जा रहे हैं| तो उन्होंने उत्तर दिया,‘घोड़े से पूछो|’
हमारा दिमाग भी ऐसा ही हो गया है| जहाँ कहीं हमारा दिमाग दौड़ता है, वहीं हम भी दौड़ते हैं| किसी को तुम्हारे बारे में सोचने की फुर्सत नहीं
है-कि तुम खुश हो या नहीं| यह ज्यादातर सिर्फ पूछने के उद्देश्य से है| वास्तव में कोई भी इसका उत्तर नहीं चाहता कि तुम कैसा महसूस कर रहे हो और तुम्हारा मन कैसा है, इसको खुश रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है| यदि तुम अपनी भावनाओं को अपनी जिम्मेदारी बनाते हो, तुम्हें कोई भी सुखी या दुखी नहीं कर सकता| जहाँ तुम्हें ईश्वर को बसाना है, वहाँ कूड़ा-करकट क्यों भरते हो? मन साफ़ रखो- यही ध्यान है| इसे आसक्ति और विरक्ति (लालसा और घृणा) से दूर रखो| यह शिष्य-वृत्ति है| एक शिष्य में घृणा का स्थान नहीं होना चाहिए| वहाँ केवल गुरु के लिए स्थान है|
मन निर्मल है|तुम्हारे संतुलन को बिगाड़ने का प्रयत्न करने वाली १,००,००० चीजें होंगी| अपनी घृणा का समर्पण कर दो, मन से इसे पूरी तरह निकाल दो यही अग्निहोत्र है| काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा अन्य सभी बुरे आशायों (इरादों) – इन सबको इस आग में जल जाने दो| अपने भीतर निर्मल ज्योति (दोष-रहित शुद्ध प्रकाश) जलने दो| पुन: पुन: ज्ञान में रहने से तुम्हारा मन और बुद्धि को शुद्ध होता है | तुम्हारे और ईश्वर के बीच बुद्धि है| ज्ञान से इस अलगाव को दूर (नष्ट) किया जा सकता है| समर्पण, ज्ञान, भक्ति और ध्यान से, अलगाव मिट जाता है|

प्रश्न : मुझे कैसे और कब मन्त्रों का प्रयोग करना चाहिए?

श्री श्री रविशंकर : मंत्र का उच्चारण बिना प्रयास के और स्वाभाविक ढंग से करो| तुम्हें एक दिन में २४ घंटे जप नहीं करना है| थोड़ी देर जाप करो और ध्यान करो| तम्हें साफ़ होने के लिए २४ घंटे नहाना नहीं पड़ता ! कुछ मिनटों की सफाई तुम्हें पूरे दिन या कम से कम आधा दिन तारो-ताज़ा रखने के लिए काफी है| उसी प्रकार मंत्र-स्नान महत्त्वपूर्ण है|

प्रश्न : गुरु जी, मैं क्या करूँ, मैं नास्तिक बनूँ या आस्तिक?

श्री श्री रविशंकर : तुम अपने आप पर ठप्पा क्यों लगाना चाहते हो? एक दिन नास्तिक हो और एक दिन आस्तिक| क्या तुम ऐसा करने के लिए तैयार हो? जो भी तुम बनो, सच्चे बनो| आजकल तथाकथित नास्तिक सच्चे नहीं हैं| नास्तिक कहते हैं, ‘ऐसा कुछ भी नहीं जिसे मैं नहीं जानता|उसी का अस्तित्व है जो मुझे दिखता है, अन्य किसी का नहीं|’ आस्तिक कहता है, ‘मैं जानता हूँ कि जो मैं जानता हूँ उससे परे भी बहुत कुछ अज्ञात है|’
सृष्टि में किसी भी चीज़ के अस्तित्व को नकारने के लिए तुम्हें सृष्टि में प्रत्येक चीज़ को जानने की आवश्यकता है| अब इस सृष्टि के बारे में प्रत्येक चीज़ कौन जानता है? तुम केवल यह कह सकते हो कि ‘मैं नहीं जानता कि इस चीज़ का अस्तित्व है या नहीं|’ बिना समय और अंतरिक्ष की पूरी जानकारी के, किसी वस्तु के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। इस सृष्टि में, इस समय और अंतरिक्ष में क्या तुम हर चीज़ को जानते हो?
तुम्हारी अनभिज्ञता के प्रति तुम्हारी स्वीकृति तुम्हें एक नास्तिक बनने की इज़ाज़त नहीं देती| इसलिए तुम एक सच्चे नास्तिक नहीं बन सकते|

प्रश्न : गुरु जी, मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?

श्री श्री रविशंकर : तुम बहुत भाग्यशाली हो| कितने लोग यह प्रश्न पूछे बिना ही जीवन जीते रहते हैं| इसका पोषण करो| यह प्रश्न तुम्हारे दिल
में है, तुम बहत भाग्यशाली हो| मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ| वह जो इस प्रश्न का उत्तर जनता है, तुम्हें बतलायेगा नहीं और जो तुम्हें बतलाएगा,
वह जानता नहीं|


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प्रत्येक संकट तुम्हें सजग करता है कि सबकुछ अस्थायी है

बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : गुरु जी, आजकल बहुत पति - पत्नि अलग हो रहे हैं । ऐसा क्यों है?

श्री श्री : जब लोग अपने निजी तनाव और नकारात्मक भावों के साथ समझौता नहीं कर पाते, वे अपने सबसे नज़दीकी लोगों पर आरोप लगाते हैं, साधारणतः पति या पत्नी। यदि एक का मन शांत है और भाव संयत है, तो वहाँ प्रेम और समझ हो सकती है,जो किसी भी वैवाहिक सम्बन्ध के लिए ज़रूरी है।

प्रश्न : समर्पण के साथ तृष्णा (चाह) का संतुलन कैसे करें?

श्री श्री : चाह स्वतः उत्पन्न हो जाती है। इस पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है। यह आपकी आज्ञा नहीं लेती। इसे किसी प्रवेश-पत्र की आवश्यकता नहीं होती। तो, बस कहो, जैसा ईश्वर चाहे वैसा हो जाए।

प्रश्न : क्षेत्रों को ब्लेस कैसे करें (आशीर्वाद कैसे दें)जैसे-महामारी से प्रभावित क्षेत्र?

श्री श्री : प्रत्येक क्षेत्र ब्लेस्ड (आशीष-प्राप्त) है। प्रत्येक क्षेत्र ईश्वर का है।

प्रश्न : गुरु जी, महामारी से पीड़ित लोगों से हम क्या कहें?

श्री श्री : उनसे कहो कि वे अपनी सारी चिंताएं मुझे सौंप दें। देवी-आपदा और महामारी में भी कुछ अच्छा निहित है। वे लोगों को एक-साथ लाती है। प्रत्येक विनाश के बाद नव-निर्माण होता है। कुछ भी स्थाई नहीं है। प्रत्येक
संकट में एक अवसर है। प्रत्येक संकट तुम्हें मुस्कराने की याद दिलाता है, सबकुछ अस्थायी है - इसके प्रति सजग करता है।
तो बैठने और दोषारोपण के बजाय देखो कि हम कैसे आगे बढ़ सकते हैं, पुनर्निर्माण तथा दूसरों की सहायता कर सकते हैं।

प्रश्न : गुरु जी, ॐ नमः शिवाय का क्या अर्थ है? मंत्रोच्चारण से क्या होता है?

श्री श्री :ॐ जीवनी-शक्ति है। ध्वनि ऊर्जा है। जब पूरे दिल से ध्वनि की जाती है, तो इसका बहुत सकारात्मक प्रभाव होता है। नमः शिवाय में पांच तत्त्व हैं – न - मः – शि - वा – य : पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश।

प्रश्न : गुरु जी, आप हमेशा इतने लोगों से घिरे रहते हो, आप अपनी शक्तियों को कैसे संतुलित रखते हो?

श्री श्री : वे स्वयं संतुलित होती हैं ! जो मेरी प्रकृति में नहीं है, मैं वैसा कुछ नहीं करता। जैसे हवा चलती रहती है, कभी थकती नहीं क्योंकि यह उसकी प्रकृति है।


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"थोड़ा सा त्याग करने से भी व्यक्ति का व्यक्तित्व खिल उठता है"

बैंगलोर आश्रम, १ सितंबर २००९

प्रश्न: हम मे से हरेक के पास विश्व के लिये एक संदेश है, पर वह माया से ढक जाता है। उस संदेश को बाहर कैसे लायें?

श्री श्री:
जब हम शांत और अनासक्त होते हैं, तो हमारा संदेश खुद ही बाहर आ जाता है।

प्रश्न: संकल्प का क्या महत्व है, और इसे कैसे शक्तिशाली बनायें? क्या विश्व संकल्प के बल पर ही चलता है?

श्री श्री:
मन में संकल्प और विकल्प भरे हुये हैं। हर काम संकल्प से ही पूरा होता है। अपना हाथ हिलाने की प्रक्रिया के पहले हाथ हिलाने का संकल्प आता है। अगर मन में एक साथ २० संकल्प उठें तो कोई काम नहीं होता। जब हमारा मन शांत और विश्राम की स्थिति में हो तो हमारा संकल्प शक्तिशाली बनता है।

एक कमज़ोर मन का संकल्प कमज़ोर होता है, और शक्तिशाली मन का संकल्प शक्तिशाली होता है। हम अपने मन को साधना और ज्ञान से शक्तिशाली बना सकते हैं। तब संकल्प भी शक्तिशाली होगा। एक ज्ञानी व्यक्ति ५० दिनों के बाद एक संकल्प करता है और एक अज्ञानी व्यक्ति एक दिन में ५० संकल्प करता है।

प्रश्न: अगर विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक होते हैं, तो क्या मैं अच्छा हूं या बुरा, या दोनो ही?

श्री श्री:
तुम अपने आप पर अच्छे या बुरे होने का लेबल क्यों लगाना चाहते हो? लेबल को छोड़ो और सहज हो कर रहो। शांति से रहो। जब हम किसी दुर्गुण को अपना समझते हैं तो हम आत्मग्लानि से भर जाते हैं। जब हम किसी सदगुण को अपना समझते हैं तो हम घमंड से भर जाते हैं। ये दोनों ही स्थितियां मन की अस्वस्थता दिखाती हैं। सदगुण और दुर्गुण, दोनों ही परमात्मा को समर्पित कर दो।

एक समर्पित व्यक्ति अच्छा ही होगा। समर्पण से जीवन केंद्रित और चरित्रवान हो जाता है। इन दोनों के बिना जीवन को दिशा नहीं मिलती।

थोड़ा सा त्याग करने से भी व्यक्ति का व्यक्तित्व खिल उठता है। त्याग के बिना तेज नहीं आता। त्याग से जीवन में लंबा सा दुखी चेहरा लटकाकर नहीं रहना होता। विरक्त आनंद में रहते हैं, जबकि कामी लोग दुख के बोझ से दबे रहते हैं। अपने आप को खाली कर देना, समर्पण है, साधना है।

प्रश्न: क्या आत्मसाक्षात्कार के लिये दिन में एक घंटे की साधना काफ़ी है?

श्री श्री:
२४ घंटे भी काफ़ी नहीं हैं और दस या दो मिनट की समाधि भी काफ़ी है। साधना समय सापेक्ष नहीं है। अपने पूरे जीवन को साधना बना लो। पर, साधना ना करने के लिये ये बहाना नहीं बनाना! और ये भी मत सोचना कि दिन में एक घंटे साधना कर लेने पर तुम बाकी समय मनमानी कर सकते हो।

प्रश्न: मैं परमात्मा पर केंद्रित हूं, फिर भी बेचैनी है। हालांकि बाहर से सब एकदम ठीक लगता है।

श्री श्री:
हरेक साधक के जीवन में ऐसा समय आता है जब दिल बेचैन हो जाता है। पश्चिमी देशों में इसे कहते हैं - आत्मा के लिये काला दिन।

ऐसा समय आता है जब सत्वगुण कम हो और रजोगुण और तमोगुण अधिक हो, तो बेचैनी का जन्म होता है। तीन तरह की ताप जीवन में आते हैं, जिनमें से एक है, आध्यात्मिक ताप। पर ये थोड़े समय के लिये ही होता है। इसीलिये सत्संग बहुत आवश्यक है, खासतौर पर तब जब तुम्हारा मन सत्संग करने का बिल्कुल नहीं होता। १२ वर्षों में एक बार आध्यात्म में कमी आती है। तब अपने आप पर, साधना के मार्ग पर और गुरु पर शंका होती है। शास्त्रों में ऐसा बताया है। इसीलिये कुंभ मेला १२ साल में मनाया जाता है और तब सब संत मिलकर अपने सभी पाप धो लेते हैं। ये परंपरा बहुत पुरानी है। जिस स्थान पर साधक सत्संग करते हैं और जहाँ वेदों का उच्चारण होता है, वहां कलियुग कभी नहीं आता।

प्रश्न: कोई कार्य करने से पहले मुहूर्त देखने का क्या महत्व है?

श्री श्री:
ज्योतिष को ज्ञान की आंख कहा गया है। पर आजकल के ज्योतिषियों पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर सकते हैं। ज्योतिष के पीछे दौड़ो मत। ज्योतिष ज्ञान का एक क्षेत्र है, शास्त्र है, और सत्य है। ज्योतिष एक विज्ञान है पर हर ज्योतिषी विज्ञानी नहीं है। साधना में बहुत शक्ति होती है। शिवजी, महाकाल हैं। जैसा भी काल हो, बस ॐ नमः शिवाय कहो। शिव में सभी पंचतत्व आ जाते हैं। शिव के बाहर कुछ नहीं है। ये बहुत शक्तिशाली मंत्र है।

जब तुम मंत्र का जप करो तो ये मत समझ लेना कि शिव यानि पूरे शरीर पर भस्म लगाये, हाथ में त्रिशूल लिये कहीं बैठें हैं...ये सिर्फ़ एक चित्रकार की कल्पना है। शिव, चैतन्य तत्व है, हमारी आत्मा है, हर जगह वर्तमान है, ऊर्जा का क्षेत्र है।

तुम्हें पता है कि हम माथे पर भस्म क्यों लगाते हैं? हमारे माथे पर तीन प्रकार के mites होते हैं, जो कि हमारे अंगूठे के निशान की तरह हर व्यक्ति में दूसरों से अलग होते हैं। इन mites को इनके स्थान में रखने के लिये हम माथे पर तीन रेखायें बनाते हैं।

रूस में हुये एक अध्य्यन में ये पाया गया कि गाय के गोबर या अग्निहोत्र की भस्म से लिपे हुये स्थान पर Chernobly disaster के दौरान परमाणु radiation से हुये बुरे असर बहुत कम हो गए थे।

प्रश्न: मै आश्रम में अपने आप को सुरक्षित महसूस करता हूं। बाहर की दुनिया में वापिस जाने के विचार से ही मुझे भय लगता है। मैं क्या करूं?

श्री श्री:
ठीक है, भय को रहने दो। जोश को जागृत करो। जो भी हो उसे होने दो। कम से कम ये विश्वास रखो कि तुम अकेले नहीं हो। दिव्य शक्ति तुम्हारे साथ है।

इस बात पर गौर करो कि भय के स्पंदन को तुम शरीर में कहां मह्सूस करते हो? हृदय में, कंठ में, शरीर के अन्य भागों में? प्राणायाम, भस्त्रिका और सुदर्श्न क्रिया करो। अपने आप को व्यस्त रखो, खाली बैठकर सोचने का समय ना दो। तब भय के लिये कहां समय है?


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