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आत्मशक्ति किसी भी आकार और रूप से अधिक शक्तिशाली होती है !!!

३१ जुलाई, २०११
प्रश्न: नकारक विचारों को कैसे टाला जाये ? 
श्री श्री रवि शंकर: नकारक विचारों को आप क्यों टालना चाहते है ? उन्हें आने दीजिये और वे चले जायेंगे | उसे टालने का अर्थ हैं कि आपने उसे पकड़ने का प्रयास कर रहे है | यदि वे आते हैं उन्हें कहे “ओह आप आ गये हाय! बाय बाय!” और वे चले जायेंगे |

प्रश्न: जय गुरुदेव ! पिरामिड में ध्यान करना क्या किसी अन्य स्थान पर ध्यान करने से भिन्न है ?
श्री श्री रवि शंकर: पिरामिड एक बाहरी वातावरण है | परन्तु ऐसा नहीं है कि पिरामिड में आपका कुछ विशेष ध्यान लगेगा, नहीं | किसी गुम्बद (डोम) में आपका अच्छा ध्यान लग सकता है और खुले आकाश के नीचे आपका और अधिक अच्छा ध्यान लगेगा | आत्मशक्ति किसी भी आकार और रूप से अधिक शक्ति शाली होती है | आकार और रूप के प्रभाव का सीमित दायरा होता है और मंत्र की ध्वनि अत्यंत प्रभावकारी होती है | मंत्र आकार और रूप की तुलना में कई गुना अधिक प्रभावकारी होता है और मौन मंत्र से और अधिक प्रभावकारी होता है | और यह सब तभी प्रभावकारी हो सकते है जब ध्यान लग सके |

प्रश्न: श्रोताओं में से किसी ने यह प्रश्न किया परन्तु आवाज़ धीरे होने से सुना नहीं जा सका ?
श्री श्री रवि शंकर: आध्यात्म में होने से आपके मित्र आपका मजाक उड़ाते है ? मुस्कुराते हुये आप उनसे कहे कि “तुम को नहीं पता कि तुम कितनी महान चीज़ से वंचित हो रहे हो” | “वैसे भी एक दिन तुम भी इस पथ पर आ ही जाओगे, यह सिर्फ समय की बात है” | “पाँच वर्ष उपरान्त तुम भी ज्ञान के इस पथ पर आ जाओगे” | “मैं हर बार सबसे पहला व्यक्ति हूँगा, मैं पहले स्वाद लेता हूँ और फिर जो बच जाता है तुम उसे लेते हो” | यदि आपका कोई मज़ाक उड़ाता है फिर भी आप मुस्कुराते रहें और अपनी मुस्कराहट को न खोएं | उनसे कहे कि “यह सिर्फ कुछ वर्षों की बात है, तुम भी यही सब करोगे” | “तुम्हे तो बासा खाना खाने का शौक है, और मैं अभी ताज़े भोजन का लुफ्त उठा रहा हूँ |

The Art of living
© The Art of Living Foundation

आप जितने अधिक वैरागी बन जाते हैं, उतनी ही अधिक संकल्प शक्ति आपको प्राप्त होती हैं |

२९ जुलाई २०११
प्रश्न : प्रिय गुरूजी, जब आप कहते हैं कि मैं शरीर से भिन्न हूँ तो यह बात मेरे समझ में आती है परन्तु जब आप कहते हैं कि मैं मन से भी भिन्न हूँ तो मैं यह समझ नहीं पता | मैं मन से कैसे भिन्न हूँ ?
श्री श्री रवि शंकर : अभी आप आपके विचार हैं या विचार आपके हैं ? मन का अर्थ है विचार | विचार आते जाते रहते हैं | कई विचार आते हैं और कई विचार चले जाते हैं | आप उनमे से कई से सहमत होते हैं और कई से असहमत होते है और जिन विचारों से आप सहमत होते हैं कुछ समय उपरांत आप उन्ही से असहमत हों जाते हैं | आप बैठ कर अपने सभी विचारों को लिखें | कुछ समय बाद आप पाएंगे, क्या मैं वही व्यक्ति हूँ जो यह सब सोच रहा था ? आप आश्चर्य करेंगे, ठीक है ? इस तरह से आप अपने विचारों से भिन्न हैं | विचार आपमें आते जाते रहते हैं | यह आकाश मैं बादल के सामान हैं | आकाश बादल नहीं हों सकता परन्तु जब आकाश पर बहुत सरे गहरे बादल छाये हों तो आपको लगता है बादल ही आकाश है | जब आपने खुले हुए आसमान का स्वाद ले लिया हो तो आपको लगता है कि आकाश बदल से परे है और यही साधना कि सुंदरता होती है | जब आप पहली बार सुदर्शन क्रिया करते हैं तो क्या होता है ? कुछ क्षण आपको ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नहीं है | कुछ क्षणों में बादलों के माध्यम से आपमें सजगता आ जाती है | आप सोचते हैं कि बादल ही आकाश है परन्तु उन गहरे बादलों के मध्य में खाली स्थान बन जाये तो आपको उन गहरे बादलों के बीच में नीला आकाश स्पष्ट दिखने लगता है | क्या आपने यह अनुभव किया है ? अब आप कुछ पीछे मुड़कर देखें कि पहला कोर्स, पहला ध्यान या सुदर्शन क्रिया करने के पहले कैसे थे ? और अब आप क्या हैं ? आप में से ऐसे कितने व्यक्ति हैं जो अपने १० वर्ष पूर्व के व्यक्तित्व के साथ समानता नहीं पाते हैं ? (कई लोगों ने अपने हाथ उठाये) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आप सिर्फ विचार नहीं हैं | १० वर्ष पूर्व वाला व्यक्ति मन या विचारों का पुन्लिंदा ही तो था | परन्तु अब आपको मन के बाहर कि झलक मिल चुकी है जो कि मन नहीं है और आकाश तत्व है जो कि आप हैं | मन का विलीन होना ही ध्यान है | कभी कभी बादल और विचार आते हैं और चले जाते हैं और आप कुशलता पूर्वक उनके मध्य में केंद्रित रहें |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, जब लोग ज्ञान के सूत्र और आपका नाम लेकर अपने झूठ को झिपाते हैं या अपना काम करवाते है, तो क्या किया जाये?
श्री श्री रवि शंकर: इसके लिये आप क्या कर सकते हैं | मैं या आप उन्हें सिखा तो नहीं सकते | आप उन पर सिर्फ दया कर सकते हैं | उनको उनकी करनी और कर्म का फल अवश्य मिलेगा | करुणा के साथ उन्हें समझायें ‘ आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, ऐसा न करें | यदि आप की बात वे नहीं सुनते हैं तो आप क्या करेंगें ? आप क्रोधित नहीं हो सकते या भूख हड़ताल पर नहीं जा सकते ! आप क्या करेंगे ?उनके लिये प्रार्थना करे, उन्हें आशीर्वाद दीजिये, उन पर दया करे और उनसे दूरी बना लीजिये  और यदि आप में शक्ति हो तो उनका सामना करे | उनका सामना कैसे करे? इस के बारे में आप सोचें !!!

प्रश्न : पूजा का क्या महत्त्व हैं ? मूर्ती,प्रकृति और स्वयं की पूजा करना, क्या सब एक ही हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: हाँ ! मन को फूल के जैसा खिलने के लिये वातावरण का सृजन करना ही पूजा है |आपका दिल,मन और पूरी चेतना खिल जाती हैं | पूजा सिर्फ एक कृत्य हैं | इससे यह फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या कर रहे हैं |यह सब बाहरी रूप में हैं परन्तु सबसे मुख्य हैं आपके भीतर की भावनायें | इसलिये पूजा श्रेष्ठ होती हैं परन्तु मानस पूजा सर्वश्रेष्ठ होती है | मानस पूजा का तात्पर्य हैं पूजा को मन में करना |  मेरा दिल आपका सिंहासन हैं ; “रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैर्स्नानं च दिव्यांबरं,नानारत्नविभूषणं मृगमदामॊदाङ्कितं चन्दनम्” । इस पूरी मानस पूजा में सबकुछ आपका हैं, पूरा संसार भी आपका ही है | मेरा दिल और मन एक फूल हैं | और जब आप विश्राम करते हुये गहन विश्राम में चले जाते हैं; तो आपका मणिपुर चक्र बड़ा होकर खिल जाता हैं |मणिपुर चक्र को मध्य का मस्तिष्क भी कहते हैं और विज्ञानिकों ने पाया कि सामान्यताः मणिपुर चक्र करोंदे के जितना होता हैं और योगियों में यह मशरूम या बेर के जितना बड़ा हो जाता है |जो लोग नियमित रूप से योग और ध्यान करते हैं, उन्होंने पाया कि उनका मणिपुर चक्र बड़ा हो गया था | वह मूंगफली या करोंदे के छोटे आकार से बेर के जितना बड़ा हो जाता हैं | जब मध्य का मस्तिष्क या मणिपुर चक्र बड़ा हो जाता हैं तो  स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (आटोनोमस नर्वस सिस्टम) पर अधिक नियंत्रण आ जाता है | योग करने  से ऐसा होता है | इसलिये वे इसे पद्मनाभ कहते हैं | पद्मनाभ का अर्थ क्या हैं? वह योग निद्रा में विश्राम कर रहे हैं | उनकी नाभि फूल के जैसे बन गयी हैं | पद्म का अर्थ हैं कमल या फूल | जब आपकी नाभि फूल के जैसे खिल जाती हैं तो फिर क्या होता हैं ? यदि आप योगी हैं और आप पद्मनाभ हैं तो आप अत्यंत सृजनात्मक बन जाते हैं |आपके भीतर से सृजनकर्ता बहार आ जाते हैं | यह इसका भी प्रतीक हैं कि आपके नाभि से एक कमल आया और सृष्टिकर्ता उस पर आकर बैठ गये |इसका एक गहन अर्थ भी हैं | जब आप योग निद्रा या ध्यान कर रहे होते हैं और जब आप चेतना के चौथी अवस्था के गहन में चले जाते हैं, तो आपकी नाभि कमल या फूल के जैसे बन जाती हैं | पेट में सारी नकारक भावनायें  संग्रहित होती हैं | इसलिये जब आप भय में होते तब आपके पेट में कुछ होता हैं |जब आप चिंता में होते तब आपके पेट में कुछ होता हैं | आपमें से कितनों यह अनुभव किया हैं? चाहे वह भय, चिंता, नकारात्मक भावनायें, लालच या ईर्ष्या हो तब पेट में कुछ होता हैं | हानि होने का भय और दुःख होने से पेट में कुछ होता हैं | वह सिकुड़ कर छोटा हो जाता हैं वह पद्मनाभ नहीं हैं | जब नाभि खिल जाती हैं तो उदारता, प्रेम और सृजनात्मकता जैसे गुण आने लगते हैं | पद्मनाभ वह हैं जो अत्यंत  सृजनात्मक हैं | इसलिये भीतर की पूजा समर्पण हैं | सबकुछ आपका हैं, मेरा मन,शरीर,विचार,भावनायें,पूरा वातावरण आपका हैं और सब कुछ एक ही हैं |आप कह रहे हैं ‘मैं नहीं हूँ,आप भी नहीं हैं, और सिर्फ एक ही चीज़ हैं और वह पूजा हैं | आरती का अर्थ हैं, मेरे जीवन का प्रकाश दिव्यता के पास जाये  और मैं सम्पूर्ण ज्ञान को स्वीकार करता हूँ | मैं इस ज्ञान और विवेक को अपने भीतर समां लेता हूँ |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी संकल्प शक्ति को कैसे बढ़ायें ? वासनाओं से कैसे मुक्ति पायें ?
श्री श्री रवि शंकर: मौन के माध्यम से | आप जितने अधिक वैरागी बन जाते हैं, उतनी ही अधिक संकल्प शक्ति आपको प्राप्त होती हैं |

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अस्थायी सुखों के लिए वैरागी बने और परिवर्तन के लिए उत्साहित रहें !!!

६ जुलाई २०११, बर्लिन जर्मनी 

प्रश्न : वर्ल्ड कल्चर फेस्टिवल ( विश्व सांस्कृतिक उस्तव) के दौरान आप को किस बात में सबसे अधिक  आनंद मिला ?
श्री श्री रविशंकर : प्रत्येक क्षण में |

प्रश्न :  यदि हमको सारे  प्रयासों को छोड़ ही देना है तो हम प्रयास ही क्यों करें ? 
श्री श्री रविशंकर : ध्यान के दौरान सारे प्रयासों को छोड़ दीजिए परन्तु ध्यान के पूर्व आप को को प्रयास करने ही होंगे अन्यथा कुछ भी छोड़ने का प्रश्न ही नहीं होगा |

प्रश्न : मौन और एकांत  में रहने के दौरान  मेरा मनोभाव निराशाजनक हो जाता है और मैं स्वयं के प्रति खेद महसूस करता हूँ क्या यह सही है ?
श्री श्री रविशंकर : नहीं! अपने लिए खेद महसूस न करें |

प्रश्न : प्रत्येक समय जब मेरा आप से विलाप होता है तो मुझे दुःख होता है क्या आप एसे किसी ध्यान का सृजन करेंगे जिसमें यह कहा गया हो “ फिर से शीघ्र मिलेंगे” ?
श्री श्री रविशंकर : यह एक अच्छा विचार है | कुछ बातें अच्छी  होती है जैसे अच्छे  विचार |

प्रश्न : वैराग्य  और परमानंद का अनुभव करने के बाद भी मन सांसारिक बातों पर क्यों चला जाता है ?
श्री श्री रविशंकर : यह मन का स्वभाव है फिर भी कोई बात नहीं | मन तीन गुणों से बना होता है जैसे  सत्व(शुद्धि / स्पष्टता), रजस ( कृत्य / कार्यवाही ) और तमस  (अक्रियता ) | इन तीन गुणों के अनुरूप विभिन्न समय पर मन की अवस्था भिन्न होती है , इससे परेशान न होयें| सब कुछ आता जाता रहता है |

प्रश्न : मैं असफलता को सफलता में कैसे  परिवर्तित कर सकता हूँ ? 
श्री श्री रविशंकर : सिर्फ आगे बढते रहें और पीछे मुड कर न देखें | असफलता सिर्फ अतीत में हो सकती है , भविष्य  में  नहीं | यह सिर्फ घटनाक्रम को समझने जैसा है | यदि इसे आप बड़े द्रष्टिकोण से देखेंगे तो आप इसे बेहतर समझ सकेंगे |

प्रश्न : आज हमने मेडिटेशन इन मोशन ( ध्यान में कृत्य ) को किया . वह अत्यंत पीड़ादायक था | क्या आपने कभी इसे किया है ? 
श्री श्री रविशंकर : हाँ ! यह परमानंद का अनुभव करने जैसा है | पीड़ा के उपरांत ही परमानंद प्राप्त होता है |

प्रश्न :- क्या आप महिलाओं की भूमिका के बारे में कुछ कह सकते हैं ?आज कल  महिलाओं को भोग करने वाली वस्तु के जैसे देखा जाता है , क्या हम इसे परिवर्तित कर सकते है ?
श्री श्री रविशंकर : उन पर दया करें जो महिलाओं को भोग  की वस्तु के जैसे देखते है और उनकी प्रशंसा करें जो महिलाओं को इस द्रष्टि से देखते है जो समाज में परिवर्तन ला सकती है |

प्रश्न : हिंदू धर्म में शरीर  का दाह संस्कार अग्नि के द्वारा क्यों किया जाता है ?
श्री श्री रविशंकर : सारे विश्व की काफी अधिक जनसंख्या है | इसमें अत्यंत कम जगह की आवश्यकता पड़ती है और आज कल भूमि का मूल्य अत्यधिक बढ़ गया है| शरीर  प्रकृति के पास चला जाता है | सिर्फ आस्तियां रह जाती  जिसे पूज्य नदियों को अर्पित कर दिया जाता है  | जब  शरीर  का दाह संस्कार अग्नि से कर दिया जाता है तो ७०० ग्राम से लेकर १ किलो की  अस्थियां और भस्म ही रह जाती हैं| और आत्मा की मुक्ति हो जाती है |

प्रश्न :- मैं एक युवा हूँ और कभी कभी मैं अपने मित्रों के साथ शराब पीने के लिए बहार जाता हूँ इसमें मुझे कोई दोष नहीं दिखता , क्या यह सही है ?
श्री श्री रविशंकर : कभी कभी आप सामाजिक तौर पर शराब का सेवन करते है| फिर जब कभी भी आप दुखी होते है तो यह सामाजिक शराब का सेवन आप पर भारी पड़ने लगता है और आप इसका और अधिक सेवन करने लगते है | इसके कारण आप शराबी भी बन सकते है |इसे हमेशा नहीं कहें और इससे दूर रहें | इस बात के लिए दृढ़ रहें कि आप इसका सेवन नहीं करेंगे फिर आप सुरक्षित रहेंगे | यहाँ पर आने के बाद आप कभी भी शराबी नहीं बन सकते| मैंने ऐसे कई लोगों को देखा है जो इसी तर्क के कारण शराबी बन गए| उन्होंने कभी कभी इसका सेवन करते हुए इसकी शुरुवात की और फिर वे शराबी  बन गए | शराब आप के तंत्रिका तंत्र को अत्यंत हानि  पहुंचाता  है जो आपकी शुद्ध चेतना और वास्तविक सच्चाई में झलकता है | शराब से सुस्ती आती है | यह ब्रेक  लगाकर वाहन की सवारी करने के जैसा है |
यदि आप को जीवन में प्रगति करना है तो आप को कुछ प्रतिबंध अवश्य लगाने होगें जैसे तम्बाखू और धूम्रपान ३०-४० वर्ष पूर्व संस्कृति का हिस्सा माने  जाते थे परन्तु आज ऐसी स्तिथि नहीं है | हम कई वर्षों से इस बात को कह रहे है और इसमें कई जीवन समाप्त हो गये | और कई जीवन  बचाये जा सकते थे |
धूम्रपान, ड्रग और तम्बाखू का सेवन नहीं करे - यह तीन प्रतिबंध लगाने होंगे |

प्रश्न : उसी द्वार पर बार बार दस्तक देना और उसे कब छोड देना यह कैसे मालूम होगा ?
श्री श्री रविशंकर : हाँ – आप को दोनों को करना होगा पहले दस्तक दीजिये और फिर छोड दीजिये और फिर छोडते हुए फिर से दस्तक दीजिये  |

प्रश्न : सकारात्मकता और नकारात्मकता दोनों को भगवान को कैसे अर्पित करूँ ?
श्री श्री रविशंकर : आप उस विचार को सिर्फ  छोड़ते चलें यदि इसमें आप को इसमें कठनाई हो रही हो तो और सिर्फ वर्तमान क्षण में रहें | अतीत बीत चुका है और भविष्य को अभी आना है |

प्रश्न : क्या ध्यान करना संभव होगा  जब आप का पडोसी खर्राटे ले रहा हो? (हंसी)
श्री श्री रविशंकर : इसके कई विकल्प है | उनको हिलाये और यदि फिर भी वे इसे जारी रखते है तो उसे स्वीकार करें | यदि इससे आपको और अधिक परेशानी हो रही हो तो कहीं और बैठ कर ध्यान करें |

प्रश्न : यह मेरा पहला एडवांस कोर्स है और अब तक यह मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक सुखदायक  था | मुझे चिंता है कि मैं हर  समय ध्यान करना चाहता हूँ, मुझे क्या करना चाहिए ? 
श्री श्री रविशंकर : घर जाते समय  आप को इसकी जानकारी प्रदान की जायेगी |
जीवन का आनंद लीजिए |जीवन को सहजता और गंभीरता से से व्यतीत करें | यदि आप जीवन को अत्यंत गंभीरता से लेगें तो वह उबाऊ बन जायेगा| यदि आप जीवन को पूरी तरह से विनोदपूर्ण लेगें तो वह तुच्छ और सामान्य बन जायेगा | जीवन मौन और उत्सव का मिलन होना चाहिए| वैरागी रहते हुए पूरी तरह से केंद्रित रहें और परिवर्तन लाने के लिए उत्साहित रहें | अस्थायी सुखों  के लिए वैरागी बने और परिवर्तन के लिए उत्साहित रहें- इन दोनों बातों से आप अत्यंत गहन व्यतितत्व  के व्यक्ति बन सकते है | यदि आप इस पथ  पर चल रहें है तो आपको किसी भी बात की कमी नहीं होगी क्योंकि सब कुछ समय पर होता जायेगा |The Art of living

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"बिना किसी के प्रश्न पूछे जवाब ना दें"

योरोपियन बिज़नेस ग्रूप
इम्पीरियल होटल, नई दिल्ली
१० अगस्त २०१०


श्री श्री रवि शंकर : मैं खुद ही आपको अपना परिचय देता हूं...इजाज़त है? मैं एक बालक हूं जिसने बड़े होने से इंकार कर दिया है। (हंसी) ये हुआ एक वाक्य में मेरा परिचय। मैंने देखा है कि हर व्यक्ति में बालवत स्वभाव है पर वह भूतकाल के अनुभवों और भविष्य की चिंताओं के बोझ तले दब जाता है।

हमारा या जो भी व्यक्ति समाज का भला चाहता है उसका कार्य है इस कूड़े कचरे के बोझ को हटाना ताकि प्रकृति ने हमें जो स्वाभाविकता उपहार स्वरूप दी है वो खिल सके – सहजता, स्वाभाविकता, मानवीय गुण, करुणा, सदभाव, दोस्ती...। इन गुणों की खेती नहीं करनी पड़ती है। ये हम में हैं हीं, इन्हें केवल पुष्ट करना है और उजागर करना है। मैं इसे ही आध्यात्म कहूंगा।

देखो, हम सभी जड़ और चेतन से बने हैं। जड़ – अमीनो ऐसिड्ज़, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, इत्यादि। चेतन – प्रेम, करुणा, अपनापन, सब के साथ एक होना, अपने बारे में, अपने जीवन के बारे में, विश्व के बारे में एक बृहद दृष्टिकोण - ये सब चेतन का अंश है। और जिस भी चीज़ से चेतना और आध्यात्मिक गुणों का उत्थान हो उसे मैं आध्यात्मिकता कहता हूं। आप की क्या राय है? हां। ये कोई कर्मकाण्ड या विचारधारा नहीं है। ये उससे कहीं ज़्यादा है। ये एक अच्छे इंसान का सार तत्व है। ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं है जो अपने जीवन में सुख, प्रेम और करुणा ना चाहता हो। इस पैमाने से हर व्यक्ति आध्यात्मिक है, चाहे वो इसे पहचाने या ना पहचाने।

तो, आज की इस शाम की बात करें – मैं चाहूंगा के आप मुझ से प्रश्न पूछें। आप जानते हैं कि प्राचीन भारत की एक कहावत है, कि बुद्धिमत्ता का पहला चिह्न है कि व्यक्ति मौन रहे (हंसी) और यदि पहला चिह्न आप में खो गया है तो दूसरा चिह्न है कि, बिना किसी के प्रश्न पूछे जवाब ना दें (हंसी)। इसीलिये, हमारे सभी शास्त्र एक प्रश्न से शुरु होते हैं।

आप चाहे भगवद गीता लें, पुराण लें या रामायण लें – आप कोई भी प्राचीन शास्त्र देखें तो पायेंगे कि किसी ने एक प्रश्न पूछा और फिर किसी ने उसका समाधान किया। ये संभाषण एक गुरु शिष्य के बीच हो, या पति पत्नि के बीच हो, साधकों और संत के बीच हो – ये हमेशा प्रश्न उत्तर के रूप में ही होता है। आप को कैसी लगी ये बात?

प्रश्न : आप भारतीय राजनीति के नेतृत्व को सत्यपरायण कैसे बनायेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
किसी भी प्रश्न का एक ही जवाब होता है, पर कुछ प्रश्नों का जवाब नहीं देना चाहिये – उस प्रश्न को ही पथ बना लेना चाहिये। एक सड़क पर कई बार चला जा सकता है। उसी तरह ये प्रश्न हमें अलग अलग स्थितियों में बार बार पूछना होगा। कोई व्यक्ति सत्यपरायण क्यों नहीं होता है? एक अपनेपन के अभाव में। क्या आप जानते हैं कि भ्रष्टाचार अपनेपन के दायरे के बाहर से ही शुरु होता है?

कोई अपने परिवार के साथ भ्रष्टाचार नहीं करता है। इस दायरे को थोड़ा बढ़ा दो तो अपने प्रियजनों के साथ कोई भ्रष्टाचार नहीं किया जाता। अपने मित्रों से वे भ्रष्टाचार नहीं करते। पर जब अपनी मित्रता के दायरे के बाहर जब वे एक सीमा रेखा खींच लेते हैं और उन्हें लगता है कि केवल उस रेखा की भीतर जो लोग हैं वही उनके अपने हैं, उसके बाहर के लोगों से अपनापन नहीं होता, और तभी भ्रष्टाचार शुरु होता है। हमें लोगों को इस अपनेपन के दायरे को बढ़ाने की सीख देनी है।

भ्रष्टाचार का दूसरा कारण है असुरक्षा की भावना। जिन लोगों के मित्र नहीं होते हैं वे धन में सुरक्षा ढूढते हैं। अरे! वे ये जानते ही नहीं कि धन से उन्हें सुरक्षा नहीं मिलने वाली। अच्छे लोगों की संगति से उनके जीवन में सुरक्षा बढ़ेगी। आप को पता है अगर आप किसी स्कूली बच्चे से पूछें कि उसके कितने मित्र हैं, तो अपनी उंगलियों पर अपने मित्र गिन सकें, इतनी संख्या होगी – २, ३, ४, ५। फिर मैं उनसे पूछता हूं, ‘देखो तुम एक कक्षा में ५०-१०० बच्चों के साथ ५-८ घंटे रहते हो – क्या तुम उन सब से दोस्ती नहीं कर सकते हो?’ और स्कूल कालेज से बाहर निकल कर तुम १ बिलियन लोगों के साथ, विश्व के ६ बिलियन लोगों के साथ कैसे रहोगे?

तो, मित्रता के भाव ने हमारे बच्चों के भीतर घर नहीं किया है। फिर क्या होता है? असुरक्षा की भावना अपने भीतर आ जाती है। और इस असुरक्षा से निबटने के लिये वह व्यक्ति उपाय खोजता है, ‘ठीक है, मुझे अधिक धन कमाना चाहिये। कैसे भी कर के धन का संग्रह करो, भ्रष्ट बनो।’

तो, सब से पहले हमें राजनीति में आध्यात्मिक्ता, व्यापार में सामाजिक कार्य, और धर्म मंक सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव लाना होगा। यदि हम ये तीन चीज़ें कर सके तो समाज बेहतेर होगा और हम एक बेहतर जीवन जी पायेंगे।

हर नेता को अपनी जाति और धर्म से आगे देखना चाहिये। उनकी दृष्टि में संपूर्ण मानवताअ के लिये स्थान होना चाहिये। एक हिंदु पुजारी को केवल हिंदुओं के लिये ही नहीं, समस्त मानवता के लिये प्रार्थना करनी चाहिये। इसी तरह, एक मुस्लिम इमाम और ईसाई पादरी को भी समस्त मानवता के लिये प्रार्थना करनी चाहिये, तभी हम धर्म के उद्देश्य को पूरा कर पायेंगे।

इसलिये, मैं कहूंगा कि सभी धर्मों का समान सम्मान हो, और व्यवसायों में सामाजिक कार्य जुड़ा हो। अगर हर व्यवसायिक संस्थान corporate social responsibility के तहत अपने मुनाफ़े का १, २, १०, या जो भी प्रतिशत, गांवों के विकास में लगायें तो मेरा यक़ीन मानो, इस ग्रह पर कहीं भुखमरी, बीमारी और निरक्षरता नहीं रह जायेगी। क्योंकि सरकारें अकेले ये कार्य नहीं कर सकती हैं। व्यवसायिक संस्थानों एवं ग़ैर सरकारी संगठनों के तालमेल से बहुत कुछ संभव है। इसलिये, व्यवसाय में सामाजिक कार्य जोड़ो, और राजनीति में आध्यात्मिकता लाओ। महात्मा गांधी के समय में अच्छे चरित्र की वजह से राजनेताओं का बहुत सम्मान था। आज की स्थिति उसके ठीक विपरीत हो गई है।

आप जानते हैंकि हमें राजनीति में आध्यात्मिकता लाने की आवश्यकता है। राजनेताओं को देश का ख़्याल होना चाहिये।
मैं अपने दादाजी के समय की एक कहानी सुनाना चाहूंगा। मेरे दादाजी जब महात्मा गांधी से मिले तो वे उनके साथ सेवाग्राम में २० साल रहे और उन्हें मेरी दादीजी का १०.५ किलो सोना दिया। मेरी दादी बहुत ही सुंदर थीं। उन दिनों महिलायें बहुत से सोने के आभूषण पहना करती थीं, किंतु मेरी दादी ने स्वेच्छा से अपने मंगलसूत्र को छोड़कर अनय सभी आभूषण देते हुये कहा, ‘मैं बच्चों की देखभाल करूंगी, आप जाकर देश की सेवा कीजिये।’ तो वो जाकर महात्मा गांधी के आश्रम में रहे।

आजकल देनें की भावना पर मान नहीं किया जाता है। अगर दान कर के व्यक्ति खुद को कृत्य कृत्य समझे तो बहुत फ़र्क आयेगा। दान पर गौरव, अहिंसा पर गौरव, ये दोनों ही आज की शिक्षा में शामिल नहीं हैं। अगर हम फ़िल्में देखें तो हीरो को गुस्सैल और अक्रामक दिखाया जाता है। जो शांत, सहनशील, दूसरा गाल भी आगे करने वाले व्यक्ति होते हैं, उन्हें हीरो नहीं समझा जाता। इन मूल्यों को बदलना होगा।

मैं अभी अभी अमरीका में था, और शिकागो में ज़िलों के स्कूली बच्चों के लिये एक कार्यक्रम था। वहां एक स्कूल था जहां पिछले साल २६८ अपराधिक कृत्य हुये थे। और जब हमने स्कूलों में ध्यान, प्राणायाम और मानवीय गुणों को सम्मिलित किया जैसे कि हर दिन एक नया दोस्त बनाओ, और करुणा करो – इससे अपराध की दर २६८ से गिर कर ६० पर आ गई। वे बड़े चकित थे, और स्कूलों के डिस्ट्रिक्ट काउंसिलर मेरा धन्यवाद करने के लिये आये। शिक्षा के क्षेत्र के ५० उच्चतम अफ़सरों ने कहा कि जो प्रक्रियायें हमने सिखाई हैं उनसे समुचित बदलाव आया है। नहीं तो, वहां के लोग सुरक्षित नहीं महसूस करते हैं – वे नहीं जानते कि कल क्या हो सकता है, उनका बच्चा बिना हड्डी पसली तुड़वाये, सही सलामत घर आयेगा कि नहीं।

हमें सुरक्षा की भावना को वापस लाना है – अपनेपन से, एक दूसरे की देखभाल से, बांटने से, और देने में गौरव अनुभव करने से।

प्रश्न : ‘जीवन जीने की कला’ से दान देने की कला – हमने सुना है कि जिन देशों को हम कम आध्यात्मिक समझते थे, वहां लोग दान अधिक देते हैं। हमने हाल ही में सुना है कि अमरीका में कुछ अरबपति अपनी ५०% संपत्ति सामाजिक विकास के लिये दे रहे हैं। क्या ऐसे अब भी ऐसे देश को कम आध्यात्मिक कह सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर
: मैं कहूंगा कि अमरीका बहुत ही आध्यात्मिक है। पिछले १० सालों में वहां आध्यात्मिकता में ५००% तरक्की हुई है। आप अगर कैलिफ़ोर्निया जायें तो पायेंगे कि वहां आध्यात्मिकता में, विशेषकर पूर्व से आई आध्यात्मिकता में बहुत बढ़ोतरी हुई है। भारत में ये बहुत पुरानी परंपरा रही है कि व्यापारियों द्वारा अस्पताल, धर्मशालायें, तालाब बनवाये जाते थे। व्यापारिक संगठन मंदिर बनवाते थे, ना कि सरकार।

भारत में अगर आध्यात्म अभी भी है तो वह व्यापारिक संगठनों की वजह से है, ना कि सरकार की वजह से। हां, कुछ सालों से दान देने में कमी आई है। ये आध्यात्म की कमी है। हो सकता है कि वे आध्यामिक गुणों में नीचे जा रहे हों।

हो सकता है कि कुछ स्थानों में लोग अधिक धार्मिक हो रहे हैं, पर आध्यात्मिक कम हो रहे हैं। ये भी एक कारण हो सकता है। पर आज भी अगर आप गांवों में जायें तो वहां के लोगों का मेल-जोल, मिल-बांट कर रहना अद्वितीय है। आप किसी भी गांव में जायें – यदि उनके पास एक ही गिलास लस्सी है तब भी वे आधा गिलास लस्सी आपको देंगे। वे बांट कर खाने के गुण को महत्ता देते हैं। गांवों में ऐसा है, पर शहरों में, जैसा कि आपने कहा, ये लुप्त होता जा रहा है। और, इसे वापस लाना है।

प्रश्न : मेरा प्रश्न है कि हम अपने कार्य को करने में जी जान से जुट जाते हैं, और उसके परिणाम से आसक्त हो जाते हैं। अगर परिणाम अच्छा हो तो हमें खुशी होती है पर यदि परिणाम अच्छा ना हो, तो अच्छे परिणाम में अपनी आसक्ति की वजह से हमें तनाव और दुख होता है। अपनी सीमित समझ के साथ मैं कहूंगा कि भगवद गीता में कहा है कि वैराग्य के साथ कर्म करो, पर अगर हम ऐसा करते हैं तो हो सकता है कि परिणाम अच्छा ना हो। इसका समाधान कैसे हो?

श्री श्री रवि शंकर :
हां, गीता की ये समझ कुछ फ़र्क है। असल में गीता से ये समझना है कि, ‘तुम मेहनत से काम करो, अपना १०० प्रतिशत दो, उद्देश्य को देखो, उद्देश्य को पूरा करने की ओर देखो, पर साथ ही श्रद्धा और विश्वास रखो, और विश्राम करो।’

आपको पता है कि कुछ भी पाने के लिये ३ तरह का विश्वास होना आवश्यक है? पहले तो, खुद पर विश्वास रखो, तब तुम्हें घबराहट नहीं होगी। ‘ये काम संभालना मेरे लिये सरल है। मैं ये कर सकता हूं।’ दूसरा, अपने आस पास के लोगों पर, समाज पर विश्वास रखो। अगर तुम जानो कि तुम्हारी टीम अच्छी है, और वे उद्देश्य की प्राप्ति कर ही लेंगे, या सामाजिक व्यवस्था सुचारू है और तुम्हारे साथ न्याय होगा। तुमने अगर अच्छा काम किया है तो तुम्हें अच्छा ही मिलेगा।

पर यदि आपको सामाजिक व्यवस्था पर विश्वास नहीं है, वह भ्रष्ट है इसलिये आप उस से पास नहीं हो पायेंगे। तो, हमें व्यवस्था पर विश्वास होना चाहिये। तीसरा विश्वास है उस उच्च शक्ति पर, परमात्मा पर जो करुणामय है, सब के लिये श्रेष्ठतम ही करता है। ये तीन प्रकार के विश्वास हमें चिंता से बचाते हैं। मैं कहूंगा, अपने लिये कुछ समय निकालो, विश्राम करो और पीछे मुड़ कर देखो कि पहले भी तुम कितनी बार तनावग्रस्त हुये थे, तुमने कुछ पराजयों का सामना किया था, और फिर प्राप्ति भी की थी। उसी तरह तुम अब भी प्राप्ति कर लोगे। इससे तुम्हें भीतरी शक्ति मिलती है, जिस की उस समय ख़ास आवश्यकता भी होती है।

ये एक सेलफ़ोन के जैसा है। सेलफ़ोन के लिये आपको एक सिम कार्ड चाहिये, ठीक है ना? और बैटरी भी चार्ज होनी चाहिये, और नियंत्रक टावर से नज़दीकी भी होनी चाहिये (हंसी)। रेंज के भीतर होना चाहिये। इन में से एक की भी कमी रह जाये तो आप फ़ोन मिलाते रहिये, हेलो कहते रहिये, पर कोई जवाब नहीं आयेगा।

प्रश्न : आध्यात्म की लगन को जैसे जागृत रखें, उसे दैनिक दिनचर्या में बुझने से कैसे बचायें? बिना अपनी ज़िम्मेदारियों से मुंह मोड़े अपने आप में आध्यात्म को कैसे जागृत रखें? एक आत्मज्ञानी होने के नाते से आप हमें क्या सलाह देंगे? आपने जो कहा, मुझे बहुत सुंदर लगा – खुशियां बांटों, स्वाभाविक, सादा जीवन, और दान।

श्री श्री रवि शंकर :
मैं तुम्हें तीन सलाह दूंगा। पहली तो ये कि अपने साथ कुछ १०-१५ मिनट बिताओ – तुम्हें क्या चाहिये? ये जीवन क्या है? मैं ५०-६० साल पहले कहां था और आने वाले ५० सालों में कहां हो‍ऊंगा? मैं कहां से आया हूं? मैं क्या हूं?

तुरंत ही किसी जवाब की तलाश में मत रहो। खुद से ये प्रश्न करना कि, ‘जीवन क्या है?’ भी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाता है। इसे मैं ज्ञान कहता हूं। कुछ समय ज्ञान के साथ रहते हुये तुम कुछ किताबें पढ़ सकते हो जैसे कि योग वाशिष्ठ, अष्टावक्र गीता, या भगवद गीता। किसी भी अच्छे ज्ञान की किताब से कुछ पंक्तियां पढ़ो। और फिर १०-१५ मिनट का ध्यान करो।

अब हम सब थोड़ी देर के लिये ध्यान करेंगे।

एक १०-१५ मिनट के ध्यान से ही तुम में इतनी स्फूर्ति आ जायेगी की दिमाग़ और शरीर तरोताज़ा हो जायेगा। बहुत बढ़िया!

और तीसरी बात – कुछ सेवा कार्य करो। अपनी दिनचर्या से हट कर किसी के भी लिये कुछ सेवा कार्य करो। चित्रकला या संगीत के साथ कुछ समय बिताओ। ये तीनों चीज़ें करने से तुम्हें पूर्णता का अनुभव होगा और तुम तनाव से दूर रहोगे।

पिछले महीने तुमने News 24 चैनेल पर एक कार्यक्रम देखा होगा जिसमें महाराष्ट्र में नान्देद के पास काठियावाड गांव के बारे में बताया गया था। हमारे एक शिक्षक वहां गये, और तीन महीने उस गांव में रहे। उन्होंने पूरे गांव का कायापलट कर दिया। ७०० परिवार!

इस गांव में सभी ने अपने दरवाज़ों से ताले हटा दिये हैं। और वहां एक दुकान है जहां कोई दुकानदार नहीं है। लोग सामान लेते हैं और एक डिब्बे में पैसे डाल देते हैं। वह गांव बहुत ही स्वालंबी है। गांव में सभी ने जैविक खेती को अपनाया है।

रोज़ सभी लोग मिलकर सत्संग में गाते हैं। जाति पाति की सभी ताख्तियां हटा दी हैं। और यहां इस देश में फिर से जाति को राष्ट्रीय जनगणना में शामिल करने की बात हो रही है! इस गांव में सबसे पहले उन्होंने जाति की तख्तियां हटा दी – दलित, क्षत्रिय, ब्राहमण – सभी तख्तियां हटा दी।

भारत सरकार ने भी उस गांव को पुरुस्कृत किया। ये गांव अपराध-मुक्त है। ये गांव पहले बहुत ही बदनाम हुआ करता था, यहां अपराध के बहुत वाक्ये होते थे। आज, तीन सालो में ये गांव एक स्वालंबी गांव है। सभी के पास पानी है, सड़के हैं, हर घर में शौचालय है, और धूम्ररहित चूल्हे हैं। बहुत ही सत्यपरायण गांव है। इस गांव से ११८ गांवों ने प्रेरणा ली है।

इस गांव में एक भी व्यक्ति शराब-तंबाकू का नशा नहीं करता है। सभी ने शराब, तंबाकू, और नशीली ड्रग्ज़ को छोड़ दिया। इससे शिक्षकों और कार्यकर्ताओं में नई स्फूर्ति आ गई। महात्मा गांधी ने जिस रामराज्य का सपना देखा था, वो संभव है। जहां कोई डकैती ना हो, अपराध ना हो – आज ये संभव है। आप इस गांव के बारे में यूट्यूब में देख सकते हैं।

मेरी इच्छा है कि हम ऐसा कई गांवों में करें - अगर विभिन्न कौरपोरेट कंपनियां १०-१० गांव की ज़िम्मेदारी ले लें। इसमें ज़्यादा खर्च नहीं है। ये सिर्फ़ लोगों को शिक्षित करने की बात है, जागरूक करने की बात है साफ़ सफ़ाई के बारे में। अब वहां हर घर गुलाबी रंग का है।

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"ये मान लो कि तुम अपनी सम्पूर्ण क्षमता को नहीं जानते हो"

पिछली पोस्ट से आगे..

प्रश्न: जीवन और कार्यों के बीच संतुलन कैसे बनायें?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम साइकिल पर संतुलन कैसे बनाते हो? इसमे कुछ ‘कैसे’ नहीं है। ये बस हो जाता है।

प्रश्न : ध्यान में जो शांति मिलती है कि ‘सब ठीक है’, इसे बनाये कैसे रखें?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम रात में कैसे सोते हो? तुम बस सब कुछ छोड़ देते हो। जब तुम जागते हो तब तुम में स्थितियों से निपटने की शक्ति होती है। ध्यान से भी ऐसा ही होता है।

प्रश्न: मैं जब भी मुश्किलों का सामना करता हूँ, खुद को बेचारा समझने लगता हूँ। इस चक्र से कैसे बाहर आऊँ?

श्री श्री रवि शंकर :
जैसे ही तुम इस चक्र को पहचान जाते हो, वह टूट जाता है। तुम जान जाते हो कि तुम्हारा मन ही बार बार ऐसा चक्र बनाता है, और ये कई बार हो चुका है। ये समझ अपने समय से आती है। और जब ऐसा हो तो कृतज्ञता महसूस करना और प्रसन्न होना। कल्पना करो कि तुम ५-६ साल पहले कहां थे? क्या तुम बदले हो? तब से अब तक कितना अच्छा बदलाव हुआ है, उस पर ध्यान दो। हम जितनी कृतज्ञता महसूस करते हैं, जीवन में उतनी ही अधिक कृपा बरसती है।

आनंद की अनुभूति के लिए पहला कदम है विश्राम। चिंता और कल की महत्वाकांक्षा तुम्हें थका देती है। भूतकाल में आये क्रोध और नफ़रत भी तुम्हारे मन को बांध रहे हैं। इसी तरह, किसी इच्छा की पूर्ति के लिये ज्वरित होने से भी तुम्हारे उत्साह में कमी आती है। जब तुम गहरे विश्राम का अनुभव करते हो तो तुम्हें हरेक बात मज़ेदार लगती है।

प्रश्न :मैं अधिक अनुशासित कैसे बनूं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम अनुशासित क्यों होना चाहते हो? जिससे तुम अधिक खुश रहो? तुम्हारा स्वास्थ्य सुधर जाये? तो, मोटापे का डर या अस्वस्थ होने का डर तुम्हें अनुशासित रखेगा। प्रेम, भय या लालच से जीवन में अनुशासित रहने में मदद मिलती है। अगर कोई कहे कि यदि तुम अनुशासित रहो तो तुम्हें एक मिलियन डालर मिलेंगे, तो इस लालच से तुम अनुशासित बन जाओगे।

प्रश्न : मैं अपने जीवन में आपकी मौजूदगी और अधिक कैसे महसूस कर सकता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
वो तो तुम अभी भी महसूस करते हो। है कि नहीं?

प्रश्न : किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाने पर खुद को कैसे संभालें?

श्री श्री रवि शंकर :
जब किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाती है, तो उसे बर्दाश्त करो। उस क्षण के साथ रहो। समय के साथ तुम खुदबखुद उसमें से बाहर आ जाओगे। इसमें ‘संभालने’ जैसी कोई बात नहीं है। बस उस ज्ञान में रहो।

प्रश्न: क्या कला का कोई उच्च मक़सद है?

श्री श्री रवि शंकर :
कला का कोई मक़सद नहीं है। ये प्रसन्नता की अभिव्यक्ति है। कला को देखकर दृष्टा को सुकून और आराम मिलता है, पर कलाकार के लिये ये बस एक अभिव्यक्ति है।

प्रश्न : जब भी मैं कुछ पाना चाहता हूं, कई रुकावटों का सामना करता हूं। मुझे क्या करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम जो भी सोचते हो, वैसा ही सामने आता है। अपने आप पर लेबल मत लगाओ। ‘हमेशा’ जैसी बात मत सोचो। ये स्वीकार कर लो कि तुम्हें खुद अपनी क्षमता के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। जब तुम सोचते हो कि हमेशा ही तुम्हें रुकावटों का सामना करना पड़ता है, तो ऐसा सोचने से तुम नकरात्मक दिशा में खुद को ले जाते हो। बस ये जान लो कि जो तुम चाहते हो, वही होगा।

प्रश्न : क्रोध से कैसे छुटकारा पाऊं?

श्री श्री रवि शंकर :
सुदर्शन क्रिया करो। श्वांस प्रक्रियायें करो। गाओ और ध्यान करो। चिंता करने से कोई लाभ नहीं है। जीवन में आगे बढ़ो। कल जो हो चुका है उसके पीछे वर्तमान को व्यर्थ मत करो। जागो और कहो, ‘इस से निपटने की हिम्मत मुझ में है।’ यदि कोई और क्रोधित है तो तुम हर युक्ति का प्रयोग कर के उसे शांत करने की कोशिश करो और फिर सब ईश्वर पर छोड़ दो। शिक्षा दो और नज़रंदाज़ करो। उसे कुछ समय दो। माफ़ी मांग लो तो बहुत से लोग बीती बात भुला ही देते हैं। अगर तब भी माफ़ ना करें तो ये अज्ञान के कारण है।

प्रश्न : मुझे भय लगता है कि जीवन में जो कुछ भी मेरे पास है, मैं उसके योग्य नहीं हूं, इसलिये कहीं वो मुझ से छिन ना जाये। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
कृतज्ञ और प्रार्थनापूर्ण रहो। ये जान लो कि जिसने भी तुम्हें ये सब दिया है वो तुम्हारी देखभाल करता है, और तुम से उसे छीनेगा नहीं। सेवा करो। अपना ध्यान इस बात पर लगाओ कि तुम समाज को क्या दे सकते हो। ये भगवान को देना ही हुआ। अगर तुम्हारे मन में नकरात्मक, असुरक्षा के भाव और शक आयें तो ॐ नमः शिवाय का जप करो। इन सब से तुम सही रास्ते पर आ जाओगे। भूतकाल को भाग्य समझो और भविष्य को स्वतंत्र इच्छा। जो होना था, हो चुका है। हम लोग अक्सर इसका उल्टा करते हैं। लोग बेवकूफ़ी में भूतकाल को स्वतंत्र इच्छा से निर्मित समझते हैं और भविष्य को भाग्य समझते हैं। ऐसा करने से तुम केवल वर्तमान में दुखी हो जाते हो।

‘ॐ नमः शिवाय’ हज़ारों सालों से चला आ रहा है। इस की ध्वनि में पंचतत्वों का समावेश है। उदाहरण के लिये – ॐ का अर्थ है दिव्य प्राण शक्ति। मंत्र जप से हमारे भीतर शक्ति का संचार होता है। ये बहुत कारगर है और हमें नित्य ही इसका जप करना चाहिये। ऐसा करने से अवसाद हम से बहुत दूर रहेगा। इसे प्रयोग कर के देखो। तुम पाओगे कि जब भी तुम खुद को कमज़ोर महसूस करते हो, तो ॐ नमः शिवाय कहने से सारी नकरात्मकता मिट जाती है।

प्रश्न : माता पिता के लिये आपकी क्या सलाह है?

श्री श्री रवि शंकर :
घोड़े पर बैठना सीखो(हँसी)! जब तुम घोड़े पर बैठते हो तो उसके साथ चलना सीखो। तुम्हें उस की गति के साथ तालमेल रखना होगा, वर्ना तुम्हारी पीठ दुखेगी। माता पिता को ये तालमेल करना होगा। उनके साथ चलो, उन्हें जानो और धीरे से रास्ते पर ले आओ। कभी लगाम को कुछ कसना पड़ता है, कभी उसे ढीला छोड़ना पड़ता है। बच्चों के साथ भी ऐसा ही है। कभी कभी अपनी बात पर अटल रहो, पर कभी उन्हें आज़ादी भी दो।

प्रश्न : क्या आप बता सकते हैं कि मेरे लिये सही व्यवसाय क्या होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
चुनाव तुम्हारा, आशीर्वाद हमारा!

प्रश्न : मैं अपने जीवन में नकरात्मकता के चक्र से कैसे बाहर निकलूं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम खुद को ऐसे कार्य करते हुये पाते हो जो तुम्हें उस चक्र में ले जाते हैं, तो तुम उस में से निकलने की शुरुवात कर ही देते हो।

प्रश्न:आप कहते हैं कि चुनाव मेरा और आशीर्वाद आपका। मुझे ये कैसे पता चले कि मैंने सही चुनाव किया है?

श्री श्री रवि शंकर :
समय से मालूम हो जायेगा। अगर वो आशीर्वाद से आया है तो अच्छा ही होगा।

प्रश्न : मैं खुद में हिम्मत कैसे लाऊं?

श्री श्री रवि शंकर :
ठीक से विश्राम करो और अपना हृदय सही जगह रखो। हमे शारीरिक और मानसिक, दोनों प्रकार के विश्राम की आवश्यकता है। ये सोचने से कि, ‘ओह! मैंने बहुत काम किया है!’ तुम बोर हो जाओगे। बस इतना जान लो कि जो करने के लिये तुमने ये जन्म लिया है उसके लिये तुम्हारे पास पर्याप्त समय और ऊर्जा रहेगी।



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"हमें भीतर की संपन्नता तथा बाहर की कार्यशीलता की आवश्यकता है"

आज श्री श्री ने क्या कहा..

५ अगस्त, २०१०, वोबर्न, मैसाच्यूसेट्स, अमरीका

जब तुम ट्राफ़िक में फंस जाते हो तो क्या करते हो? (श्रोता अपना अपना मंतव्य देते है।) तुम ईश्वर से सच्ची प्रार्थना कर सकते हो कि वो ट्राफ़िक जाम हटा दें। तुम अपनी कार में बजते हुये संगीत का आनंद ले सकते हो। तुम बाहर निकलने का सबसे नज़दीकी रास्ता ले सकते हो। तुम सिर्फ़ ट्राफ़िक का आनंद ले सकते हो या फिर किसी मंत्र का जप कर सकते हो।

उस समय क्या नहीं करना चाहिये? शिकायत। बस शिकायत करना बंद कर दो और तुम पाओगे कि तुम अपना उत्साह बनाये रख सकते हो।

हम जन्म के साथ इस जीवन में बहुत उत्साह लाते हैं, पर धीरे धीरे वह कहीं खो जाता है। जैसे जैसे हमारी उम्र बढ़ती है, हम सकारात्मक दृष्टिकोण से नकारात्मक दृष्टिकोण की ओर खुद को मोड़ लेते हैं। तो ट्राफ़िक जाम को एक मौका समझो अपने दृष्टिकोण को मोड़ने के अभ्यास के लिये।

हर घटना एक मौका है अपने ज्ञान को और गहरा बनाने के लिये। कोई अप्रिय घटना कहीं ना कहीं उस ज्ञान को उजागर करती है जो कि जन्म से ही हमारे साथ है। सकरात्मक या नकरात्मक, हर घटना हमारे भीतर के ज्ञान को उजागर करती है। अगर कोई घटना हम पर हावी हो जाये तो हम अपनी बुद्धि खो देते हैं। तब हमें मदद की आवश्यकता पड़ती है। यहाँ सत्संग का महत्व है। हम सब साथ में मिल कर गाते हैं और बोझ हट जाता है। हरेक व्यक्ति को जीवन में कुछ समय निकालना चाहिये, जीवन के सत्य को जानने के लिये। ये सत्संग है। सत्य के संग रहना सत्संग है। जीवन में सत्य का संग करते चलो। कुछ ही पल काफ़ी हैं शांति, स्थिरता और ताक़त लाने के लिये।
कई लोगों के मन में ऐसी धारणा होती है कि ये उबाऊ होगा। उन्हें लगता है कि ज्ञान बड़ा गंभीर होता है। मैं कहता हूँ, ज्ञान की तरफ़ जाओ तो मज़ा तुम्हारा पीछा करेगा। पर, अगर मज़े का पीछा करोगे तो दुख ही हाथ लगेगा। आत्मज्ञान वो चीज़ है जो तुम्हें फिर से बच्चे जैसी मस्ती देता है। ये भीतर से उत्साह लाता है। यही आध्यात्म है।
ये महसूस करो कि सब ठीक है। तब तुम भीतर जाकर ध्यान कर पाओगे। ध्यान में उतरते वक्त यह रवैया अपनाना ज़रुरी है कि सब ठीक है। पर जब तुम ध्यान से बाहर आते हो तो पाते हो कि बहुत कुछ है जिसे ठीक करने की आवश्यक्ता है। तुम जीवन और विश्व में समस्याओं के प्रति फिर सजग हो जाते हो। और फिर ध्यान से जगी उर्जा का प्रयोग तुम्हें इस बारे में कुछ करने ले लिए करना चाहिये।

ध्यान का अर्थ है भीतर से मुस्कुराना, और सेवा का अर्थ है इस मुस्कुराहट को औरों तक पँहुचाना। तो, पहले तुम्हें ये जान कर भीतर जाना होगा, कि, ‘सब ठीक है।’ ये जान लो कि तुम सुरक्षित हो, और तुम्हारी देखभाल हो रही है। ये विश्वास ज़रूरी है। ये ध्यान है।

फिर जब तुम कर्मक्षेत्र में बाहर आओ तो तुम्हें नज़र आयेगा कि क्या ठीक नहीं है और तुम उसके लिये काम करोगे। किसी बाध्यता से कर्तव्य पूरा मत करो। उसे तुम्हारे स्वभाव से आने दो, ना कि कर्तव्य की बाध्यता से। अगर तुम कर्तव्य का बोझ महसूस करते हो तो उसमें सुंदरता नहीं रह जाती। बस, मुस्कुराओ और सेवा करो। अक्सर हम सेवा करते समय मुस्कुराते नहीं हैं। लोग थक जाते हैं और सेवा के नाम पर दूसरों को खिजा देते हैं। और अक्सर, जो लोग सुखी होते हैं, वे सेवा नहीं करते हैं! दोनों प्रकार के लोग सिर्फ़ एक पैर पर ही चल रहे हैं। तुम्हें दोनों गुणों की आवश्यकता है – भीतर की संपन्नता तथा बाहर की कार्यशीलता।

प्रश्न-उत्तर अगले पोस्ट में पढ़ियेगा..


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"गुरु पूर्णिमा २०१० - गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर का संदेश"

हार्टफ़ोर्ड, अमरीका

वर्ष की १२-१३ पूर्णिमाओं में से वैशाख पूर्णिमा, बुद्ध को समर्पित है (उनके जन्म और बुद्धत्व को), ज्येष्ठ पूर्णिमा पृथ्वी माता को समर्पित है, तथा आषाण पूर्णिमा गुरुओं की स्मृति में समर्पित है।

इस दिन शिष्य अपनी पूर्णता में जागृत होता है, और इस जागृत अवस्था में वह आभार प्रकट किये बिना रह ही नहीं सकता। ये आभार द्वैत का ना होकर, अद्वैत का है। ये एक नदी नहीं है जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा रही है, ये एक सागर है जो अपने भीतर ही रमण करता है। कृत्ज्ञता, गुरु पूर्णिमा पर पूर्णता की अभिव्यक्ति है।

गुरु पूर्णिमा के उत्सव का ध्येय यह देखना है कि पिछले एक वर्ष में जीवन में कितना विकास हुआ है। एक साधक के लिये गुरु पूर्णिमा का दिन नव वर्ष के दिन की तरह महत्वपूर्ण है। इस दिन अवलोकन करें कि साधना के पथ पर आप ने कितनी तरक्की की है, और अगले वर्ष में जो करना चाहते हैं उसके लिए संकल्प लें। जैसे पूर्णिमा का चँद्रमा उदय और अस्त होता है, आभार के अश्रु बहते हैं। अपने अनंत विस्तार में विश्राम करें।

आप जानते हैं कि हमारे शरीर में लाखों कोषिकायें हैं, और हर एक कोषिका का अपना जीवन क्रम है। कई कोषिकायें प्रतिदिन जन्म ले रहीं हैं, और कई कोषिकायें मर रही हैं। तो, आप एक चलता फिरता शहर हैं! इस पृथ्वी पर कितने ही शहर हैं, और ये पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगा रही है। उसी तरह आपके भीतर कितनी ही कोषिकायें और जीव जंतु हैं और आप चलायमान हैं। आप एक चलता फिरता शहर हैं। जैसे एक मधुमक्खी के छत्ते में कई मधुमक्खियां आकर बैठती हैं, पर रानी मक्खी चली जाये तो सभी मधुमक्खियां छत्ता छोड़ देती हैं। रानी मक्खी की ही तरह, हमारे शरीर में एक परमाणु है। अगर वो ना हो, तो बाकी सब चला जाता है। वह सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है, वही आत्मा है, ईश्वर है। वो सब जगह व्याप्त है, फिर भी कहीं नहीं है।

तुम भी वही हो। वही परमात्मा है और वही गुरु तत्व है। जैसा मातृत्व होता है, पितृत्व होता है, गुरुत्व भी होता है। आप सब भी किसी ना किसी के गुरु बनो। जाने अनजाने आप ऐसा करते ही हैं,लोगों को सलाह देते हैं, उन्हें रास्ता दिखाते हैं, प्रेम देते हैं और देखरेख करते हैं। पर ऐसा करने में अपना १०० प्रतिशत दें और बदले में उनसे कुछ ना चाहें। यही है अपने जीवन में गुरुत्व को जीना, अपनी आत्मा में जीना। आप में, परमात्मा में, और गुरु तत्व में कोई अंतर नहीं है। ये सब उस एक में ही घुल जाना हैं, लुप्त हो जाना है।

ध्यान का अर्थ है विश्राम करना और उस अतिसूक्ष्म परमाणु में स्थित रहना। तो उन सब चीज़ों के बारे में सोचें जिनके लिये तुम आभारी हो, और जो चाहते हो वो मांग लो। और सब को आशीर्वाद दो। हमें बहुत कुछ मिलता है, पर लेना ही काफ़ी नहीं है। हमें देना भी चाहिये। उन्हें आशीर्वाद दें, जिन्हें इसकी ज़रूरत हो।


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"सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं, और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें"

जुलाई १०, वेनकोवर, कैनेडा :

कोई भी तकनीक काम नहीं करती! वो तुम हो जिसके कारण तकनीक काम करती है, तुम्हारी श्रद्धा। जब तुम्हारा इरादा है और उस पर तुम ध्यान देते हो तो वैसा होने लगता है। अगर तुम्हारा इरादा नहीं है, तो वो काम नहीं करेगी। सुदर्शन क्रिया का प्रभाव होता है क्योंकि उसके पीछे इरादा है। किसी भी काम की पूर्ति के लिए उसके लिए इरादा, फिर उस पर ध्यान देना और वो होने लगता है।

अब हम कुछ प्राणायाम करते हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम से शुरु करते हैं। जब हमारी बाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का दाहिना हिस्सा सक्रिय होता है, और जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का बाहिना हिस्सा सक्रिय होता है। दिमाग का दाहिना हिस्सा संगीत है और दिमाग का बाहिना हिस्सा तर्क। तो जिनकी दाहिनी नासिका सक्रिय है वो मुझे बेहतर समझ सकते हैं। और अगर दोनो सक्रिय हैं तो आप ध्यान में है। केवल दाहिनी नासिका सक्रिय होने से ध्यान नहीं होता। जब भी आप अपनी आँखे बंद करते हैं यां खोलते हैं तो आपकी स्थिति बदल जाती है। भोजन के बाद दाहिनी नासिका सक्रिय होनी चाहिए। जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो पाचन प्रक्रिया ५० प्रतिशत तेज़ होती है।

बाहिनी यां दाहिनी नाड़ी की सक्रियता बदलती रहती है क्योंकि हम प्राणों के सागर में रहते हैं।किस समय कौन सी नासिका सक्रिय होगी यह स्थान और वातावरण पर निर्भर करता है। अगर आप किसी मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च यां किसी भी ऐसी जगह के पास जाते हैं जहाँ आध्यात्मिक उर्जा अधिक है तो दोनो नासिकाएं सक्रिय होती हैं। जब किसी पूजा के स्थान पर लोग पूर्ण भक्ति में होते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक गुरु से मिलते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं तो आपकी आवाज़ आपको स्वयं बता देगी।

प्रश्न : गुरुजी हमे वादा कीजिए कि आप हर साल वेनकौवर आएंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
आपको पता है, मेरे लिए साल में ७०० दिन हैं!

प्रश्न : आप कहते हैं ध्यान में बैठते समय कोई प्रयत्न नहीं करना, पर मन का एक हिस्सा कुछ प्रयत्न करना चाहता है क्योंकि कुछ ना करने का भाव मन में उठता है। उस भाव के साथ क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
भस्त्रिका और आसन करो। उसमे प्रयत्न लगाओ। जब आप ध्यान के लिए बैठते हैं तो कोई प्रयत्न लगाने की आवशयकता नहीं है। जैसे ट्रेन पकड़ने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है पर एक बार जब आप ट्रेन में बैठ गए तो केवल आराम से बैठना ही होता है। ट्रेन में भागने से आप अपने लक्ष्य पर जल्दी नहीं पहुँचते। एक बार चढ़ने के बाद आप केवल विश्राम करते हैं।

प्रश्न : इच्छाओं पर नियंत्रन कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर :
इस क्षण में रहो। इच्छा का अर्थ है किसी आने वाले क्षण में सुख मिलने की चाह। अभी इसी क्षण में खुश और आनंदित रहो, बच्चों की तरह। अगर आप एक बच्चे से पूछते हैं कि उन्हें क्या चाहिए तो वो सहज ही कहता/कहती है - ’कुछ नहीं’, क्योंकि वो वर्तमान क्षण से खुश हैं।

प्रश्न : क्या आप लोगों का औरा देख सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
इसमें कौन सी बड़ी बात है? तुम भी देख सकते हो।

प्रश्न : सिर दर्द और थकान से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
योगा और प्राणायाम से।

प्रश्न : आप कैसे जान सकते हैं कि कोई उत्तर भीतर से आ रहा है यां तर्कसंगत मन से?

श्री श्री रवि शंकर :
इसका कोई मापदंड नहीं है।मन जितना शांत होता है, तुम्हे सही उत्तर मिलता है।

प्रश्न : नकारात्मक विचारों के प्रवाह को कैसे रोक सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
नकारात्मक विचार तीन कारणों से होते हैं - अगर रक्त का प्रवाह सही नहीं है,लसीका प्रणाली (lymphatic system) सही नहीं है यां मल त्याग (bowel moment) अनियमित है। आप फल आहार से अपनी आत्रें साफ कर सकते हैं। प्राणायाम से भी मदद मिलेगी। कुछ दिनों के लिए त्रिफला (आयुर्वेदिक परिशिष्ट) ले सकते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान करो। तुम्हे फर्क अवश्य महसूस होगा। सामुहिक साधना से भी मदद मिलेगी।

प्रश्न: विचार अंदरूनी हैं यां बाहरी?

श्री श्री रवि शंकर :
विचार मन में है। मन तुम्हारे चारों और है - अंदर भी और बाहर भी।

प्रश्न : हम ईश्वर के सामने रोते क्यों हैं? हम स्वयं को ईश्वर के पास कैसे ला सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम आंसु बहाते हो तो तुम्हे राहत महसूस होती है। मन की छाप धुल जाती है।
ईश्वर से निकटता के लिए तुम्हे कोई चेष्टा करने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर तुम्हारे सब से पास है। तुम खुद को कुछ भी मानते हो - अच्छा यां बुरा, ईश्वर तुम्हारे चारों और है। जैसे हवा तुम्हारे चारों और है। ईश्वर से कोई बचाव नहीं है, जैसे हवा तुम्हारे चारों और है चाहे तुम जाग्रित हो यां सुप्त हो। जब तुम्हे गर्मी लगती है तो तुम पंखे के सामने खड़े हो जाते हो। पंखा केवल उसी हवा को प्रवाह में लाता है जो वहाँ पहले से ही है। सत्संग पंखे की तरह हैं। मास्टर यां गुरु पंखे की तरह है। उसी से तुम हवा का प्रवाह महसूस करते हो।

प्रश्न : कृप्या सत चित आनंद का अर्थ बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
सत का अर्थ है ’जो है’, चित वो है जो जानता है और आनंद का अर्थ है भीतरी खुशी।

प्रश्न : कोई अपने बचपन की छाप से कैसे बाहर आता है?

श्री श्री रवि शंकर :
उसकी छाप पहले ही जा चुकी है। अगर तुम सोचत्ते हो कि उसकी छाप अभी भी मन पर है, तो उसे झाड़दो। स्मृति से दर्द को अलग करो। पर अगर तुम ऐसा करने के लिए प्रयत्न करते हो तो तुम स्मृति में उसे वापिस लकर आते हो। पर ध्यान में तुम दर्द को किसी घटना से जुड़ा हुआ नहीं बल्कि एक स्पंदन के रूप में अनुभव करते हो। जीवन का पहला अनुभव दर्द का ही था जब, एक छोटे से रास्ते के ज़रिए, माँ के गर्भ से बाहर आए थे। उससे पहले आप संपूर्ण आनंद में थे, आपको कुछ खाने की भी ज़रुरत नहीं पड़ती थी। फिर अचानक आप रोते हुए बाहर आए। आपने एक नए जन्में शिशु के चेहरे का भाव देखा है? यह ऐसा है जैसे वो १० घंटे के कड़े श्रम के बाद बाहर आया होता है। पहला अनुभव दर्द का होता है। और फिर बच्चा अपनी माँ की आँखों में देखता है और प्रेम का अनुभव करता है। तो दर्द को किसी घटना के साथ मत जोड़ो।

प्रश्न: किसी से बिछड़ने के दर्द से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
उज्जई श्वास।

प्रश्न : जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो रिश्ते का क्या होता है? क्या उसी व्यक्ति से कोई रिश्ता अगले जन्म में फिर बनता है?

श्री श्री रवि शंकर :
दोनों संभावनाएं हैं। कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं और कुछ अगले जन्म तक चलते हैं।

प्रश्न : हम मन में चल रहे हाँ और ना के द्वंद से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
केवल मुस्कुराओ। जैसे परिस्तिथि आती है उसे स्वीकार करो।

प्रश्न : क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम बच्चे को जन्म दें? यां यह हम ईश्वर की इच्छा पर छोड़ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर आप संतान चाहते हैं तो यह आप पर है। यह बहुत सीधा है। संतान चाहने का विचार भी सृष्टि के किसी नियम के आधार पर आ सकता है।

प्रश्न : कोई हमेशा प्रतिबद्ध कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
क्या आपको उत्तर चाहिए? क्या उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं? चलो देखते हैं आप कितनी देर उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध रह सकते हैं? आपको पता है, केवल एक प्रतिबद्धता जैसा कुछ नहीं है। समय समय पर आपको प्रतिबद्धताएं लेनी होती हैं जीवन में। यह आपके स्वभाव का हिस्सा है। अगर आप कमज़ोर हैं तो आप हर रोज़ अपनी प्रतिबद्धता तोड़ते हैं। अगर आप मज़बूत हैं तो आप उस पर डटे रहते हैं। कोई मज़बूत कैसे होता है? प्राणायाम और ध्यान से।

प्रश्न : ध्यान में नींद आ जाना गलत है क्या?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तक आप खर्राटे नहीं लेते और औरों को परेशानी नहीं होती, तब तक ठीक है! ध्यान गहरा विश्राम है। समाधि क्या है? एक मिलियन वर्षों के विश्राम जितना है यह। अगर एक क्षण के लिए भी ध्यान होता है, और आप उससे पहले यां बाद में सोए भी रहें तो कोई बात नहीं।

प्रश्न : कृप्या अपने और दूसरों के प्रति क्षमा भाव के बारे में बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम्हे लगता है कि क्षमा करना मुश्किल है तो मत करो। जो आसान लगे उसे करो। अगर माफ करना मुश्किल है तो कभी माफ मत करो। अगर किसी के प्रति कोई शिकायत है तो सारा जीवन उसे अपने अंदर रखो। फिर तो तुम्हे उस भाव के साथ खुश रहना चाहिए। क्या किसी के लिए घृणा के भाव से तुम खुश रह सकते हो? अगर किसी ने कोई गल्ती की तो यह उनकी मुश्किल है, तुम्हारी नहीं। तुम्हे जो आसान लगे वो करो।
संघर्ष तब है जब हम क्षमा करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते। हमे हर अपराधी को एक विपत्ति - ग्रस्त यां हालात के शिकार के रूप में देखना चाहिए। अगर किसी ने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया तो निश्चय ही वो खुश नहीं था। नहीं तो उसने वैसा नहीं किया होता। वो तुम्हारी तरह सभ्य और परिष्कृत नहीं था। यह किसकी गल्ती है? अगर उसमें ज्ञान होता तो वो वैसा नहीं करता। इसलिए करुणा का भाव रखो।

प्रश्न : घरेलु हिंसा के बारे में बताएं औए कोई इसके साथ कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
घरेलु और सामाजिक हिंसा, दोनो ही तनाव के कारण होती हैं। लोगों को कभी यह नहीं सिखाया गया कि तनाव से किस तरह मुक्त हों। किसी को आध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया गया। क्या आपको नहीं लगता ध्यान और सुदर्शन क्रिया का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए? अहिंसा का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए?
लोगों तक यह ज्ञान पहुँचाना है। आप घरेलु हिंसा को ऐसे ही स्वीकार नहीं सकते। लोगों में ज्ञान लेकर आओ, उन्हे शिक्षित करो। इसके लिए अपना शत प्रतिशत लगादो। फिर आप देखेंगे उनका पूर्ण व्यवहार बदल गया है।

भारत में ७०० परिवारों का एक गाँव है नान्देड़। उसमें गाँवों में होने वाली आम चुनौतियाँ थी - शराब, कर्ज़ा आदि। एक ’आर्ट ऑफ लिविंग’ के अध्यापक ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और छोटे समुहों में कोर्स लेने शुरु किए। कुछ ही महिनों में गाँव में एक विशाल बदलाव आया। अब सब लोग इकट्ठा होकर वहाँ सत्संग करते हैं। कोई भी शराब, सिगरेट यां किसी तरह का नशा नहीं करता। वहाँ किसी तरह का कोई जुर्म नहीं है। गाँव में एक दुकान है जो विश्वास पर चलती है, उसमें कोई दुकानदार नहीं है और लोग ज़रुरत का सामान लेकर पैसे डिब्बों में छोड़ जाते हैं। यह पिछले तीन साल से बिना किसी चोरी के ऐसे चल रहा है। सारा गाँव ऑरगैनिक है, और वहाँ कोई भी बिना रोज़गार के नहीं है। सारे गाँव में किसी दरवाज़े पर लौक नहीं है। एकता दर्शाने के लिए सभी घरों में गुलाबी रंग का पेंट है। गाँव में सभी स्वावलंबी हैं और वातावरण के प्रति सम्मान रखते हैं। उन्हें सबसे आदर्श गाँव का इनाम भी मिला। कर्नाटक में १८० गाँव और कुल ५०० गाँव इसी राह पर चल रहें हैं।

प्रश्न : मृत्यु के भय से कैसे बाहर आएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम एकांत होकर केवल अपने बारे में ही सोचते रहोगे तो तुम्हे मृत्यु का भय लगेगा। जब तुम एक बार सेवा में लग जाते हो तो मृत्यु का कोई भय नहीं रहता। एक आतंकवादी किसी ध्येय के लिए प्रतिबद्ध होता है, इसलिए वो मत्यु से नहीं डरते। अगर तुम दूसरों का भला करना चाहते हो, तो इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता इस भय से तुम्हे दूर रखेगी।

प्रश्न : पृथ्वि पर रहने वालों के लिए आपकी क्या सलाह है? हम किस तरह रह सकते हैं कि ५० - १०० साल बाद भी ताज़ा हवा उपल्ब्ध हो?

श्री श्री रवि शंकर :
कुदरत की देखभाल करो। कुदरत के लिए सम्मान रखो जैसे हर देश के मूल समुदाय कुदरत का सम्मान करते हैं। वातावरण का सम्मान करो। एक जगह ऐसी है जहाँ एक पेड़ काटो तो उसके बदले अगले ४० दिनो में ५ पेड़ लगाने की ज़िम्मेदारी ली जाती है। हमे कुदरत का सरंक्षण करना ही है।

प्रश्न : ऐसे में क्या करना चाहिए जब आप किसी से प्रेम करें पर वो आपसे प्रेम ना करे?

श्री श्री रवि शंकर :
उन्हे यह पूछने की बजाए कि वो आपसे प्रेम क्यों नहीं करते, आप यह पूँछे कि वो आपसे इतना प्रेम क्यों करते हैं। आप उनसे कहें कि जितना प्रेम वो आपसे करते हैं आप उसके लायक नहीं हैं। जीवन में किसी भी मुश्किल का सामना एक अंदाज़ से करें।

पूरा जीवन एक खेल की तरह हैं। जीवन संघर्ष नहीं है। कुछ भी आपको खत्म नहीं कर सकता। आप अमर हैं। आपकी आत्मा अमर है। अगर अभी यह समझ नहीं आ रहा तो कोई बात नहीं। मैं वही कहुँगा जो मुझे पता है और किसी दिन आप भी इससे सहमत हो सकें। किसी भी चीज़ से डरने की ज़रुरत नहीं है। हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है।

प्रश्न : आप पाकिस्तान में तीन सेंटर स्थापित करने में कैसे सफल हो सके?

श्री श्री रवि शंकर :
पाकिस्तान में लोग बहुत अच्छे हैं। वो बस सुदर्शन क्रिया करते हैं। हमारे अध्यापक हैं वहाँ। जब आप किन्ही धारणाओं में फंस जाते हैं तो यह एक पिजरें में कैद हो जाने जैसा है। जब आपका अनुभव होता है तभी आप पिंजरे से बाहर आ पाते हैं।

प्रश्न : कृप्या हमें बताएं कि २०१२ में क्या होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
वर्ष 2012 एक आकर्षण का केन्द्र बन गया है। यह एक सनसनी बन गई है। कोई भी ख़बर बिना सनसनी के अच्छी नहीं मानी जाती। हमारे पास और काम होगा करने को। लोग और आध्यात्मिक होंगे। यह एक फैशन ही नहीं पर एक ज़रुरत होगी। सुनहरा समय आ ही गया है।

मुझे लगता है मैने अब सब कह दिया है। बहुत बातें बिना शब्दों के कही जाती हैं। कुछ बातें शब्दों से भी नहीं कही जाती, कही भी जाएं तो समझ में नहीं आएगा।

जब आप घर जाएं तो यह सोचकर जाएं कि आप बहुत भाग्यशाली हैं। आप बहुत सुंदर हैं। इस ज्ञान को याद रखें और मुस्कुराहट फैलाएं। चिंता कम करके सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं। आप यह काम करें और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें|


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"मन की उत्तमता का अर्थ है मन को शांत रखना"

ग्रेटर वेनकोवर,
ब्रिटिश कोलम्बिया, जुलाई ९:

लक्ष्मी नारायण मंदिर में श्री श्री रवि शंकर द्वारा दिए गए ज्ञान के अंश :


हमारी आवाज़ दृढ़ होनी चाहिए। सत्य और धर्म की आवाज़ धीमि है। जब हिंसा की आवाज़ मज़बूत होती है तो वो मुश्किल का कारण बनती है। जब प्रेम की आवाज़ मज़बूत और हिंसा की आवाज़ धीमि होती है तो उसे सत्युग कहते हैं। श्री राम की आवाज़ रावण की आवाज़ से अधिक दृढ़ होनी चाहिए, तभी सत्य की विज्य होती है। श्री कष्ण के साथ भी ऐसा ही है।
जब जीवन संघर्ष लगे तो हमे ज्ञान में केन्द्रित होने की ज़रुरत है। यहाँ तक कि अर्जुन को भी शुरु में ध्यान करने के लिए और ज्ञान मे रहने के लिए कहा गया था। उसके बाद ही हमे काम करना चाहिए। हमेशा ज्ञान मे रहकर काम करो।

तीन तरह की उत्तमता है :


१. मन की उत्तमता है मन को शांत रखना।
२. बोली की उत्तमता है केवल आवश्यक्ता होने पर ही बोलना। लड़ाई में पड़ने की कोई ज़रुरत नहीं है।
३. फिर कृत में उत्तमता। कृत में शत प्रतिशत उत्तमता संभव नहीं है।

पर साधना, सेवा और सत्संग से मन और वाणी में उत्तमता लाई जा सकती है। एक बार मन और वाणी उत्त्म हो जाएं तो कृत में सहज ही उत्तमता आ जाती है।

मैं बहुत खुश हूँ कि यहाँ मंदिर की देखरेख करने वाले अधिकारी भारतीय सभ्यता का संरक्षण कर रहे हैं। सबको साथ में लेकर चलना और गले लगाना भारत की सभ्यता में है। कोई भी अलग नहीं है। हमने सबको अपना बनाया है। उदाहरण के लिए गुरु ग्रंथ साहिब में ब्रह्मज्ञान को आसान शब्दों में बताया है। यह भारत की विशेषता है। हमे ज्ञान केवल अपने तक सीमित ना रखकर सबके साथ बांटना चाहिए, जिससे सबका हित हो सके। यह भी बहुत ज़रुरी है।
अक्सर लोग पूछते हैं हम इतने देवी यां देवताओं की पूजा क्यों करते हैं। परमात्मा एक है पर फिर भी उसे बहुत नामों से बुलाते हैं। जैसे उसी आटे से कभी हम नूडल्ज़ और कभी समोसा बनाते हैं। पर है तो वो वही आटा। इसी तरह वो एक ही परमात्मा है जिसे हम विभिन्न रूप और रंग में जानते हैं।

आरती का अर्थ है पूर्ण आनंद। जब हमारे जीवन की ज्योति ईश्वर के इर्द गिर्द होती है तो हम पूर्ण खुशी अनुभव करते हैं। हमे रीति-रिवाज़ों के गहरे अर्थ को समझना चाहिए और तभी हम स्वयं खुश रह पाएंगे और औरों को भी खुश कर सकेंगे। हमें दुख और अप्रसन्नता से बाहर आना ही है। हम सबको प्राणायाम करना चाहिए। हमे अपने श्वास पर रोज़ कुछ मिनट ध्यान देना चाहिए। इसे प्राणायाम और क्रिया कहते हैं। इससे लोग आनंद अनुभव कर सकते हैं। भीतर से आनंदित रहना पूर्ण विश्राम है। क्रिया हमे सेहतमंद रहने में, और मन, भावना और बुद्धि को शुद्ध रखने में भी सहायक है। यह हमे ग्लानि से बाहर लाती है और वर्तमान क्षण में रहने में सहायक होती है।

क्या आप मोबाइल का इस्तेमाल करते हैं? अगर आप अंक दबाते रहें पर अंदर सिम कार्ड ना हो तो क्या कोई फायदा होगा? अगर सिम कार्ड है पर रेंज नहीं है तो क्या कुछ होगा? अगर रेंज भी है पर बैटरी नहीं है तो क्या कुछ होगा? साधना सिम कार्ड है, रेंज श्रद्धा है। अगर आप प्रार्थना करते हैं और आपको लगता है कि ईश्वर आपकी प्रार्थना नहीं सुन रहे तो आपके पास सिम कार्ड ही नहीं है। किसी प्रार्थना का असर नहीं होगा ऐसे में। सत्संग चार्ज की तरह है। मंदिर और गुरुद्वारा सोकेट की तरह हैं जहाँ बैटरी चार्ज होती है। अगर हम मंदिर यां गुरुद्वारों में ही झगड़ा करते हैं तो वो शुद्ध चेतना तो रह ही नहीं जाती। वहाँ ईश्वर का वास कैसे होगा?

जहाँ सब खुश होते हैं, वहाँ ईश्वर का वास होता है। जब मन खुश होता है तो हमारा भी काम होता है और हम में दूसरो को ब्लेस करने की क्षमता भी आती है। आत्मा में सब गुण निहित हैं। आत्म ज्ञान से यह सब गुण उजागर होते हैं। अगर आप लोगों को ब्लेस करते हैं, लोगों का शुभ चाहते हैं तो सब होने लगता है।
अगर आपके पास मोबाइल है पर आप नंबर नहीं मिलाते तो क्या कुछ होगा? आपको अपने को प्रकृति से, परमात्मा से और अपनी आत्मा से जोड़ना है। और फ़िर सब कुछ होने लेगेगा।
इसलिए हमने बहुत से लोगों को बलेसर्ज बनाया है जिन्होने ब्लेसिंग कोर्स किया है। वो खुश ही होते हैं और लोगों को ब्लेस कर सकते हैं।

महाराष्ट्र में एक गाँव अपनी बुराई के लिए कुख्यात था और आज वही एक आदर्श गाँव बना है। पहले लोग वहाँ जाने से डरते थे और आज वहीं पर ६०० लोग एक साथ रोज संत्संग कर रहें हैं। उस गाँव मे किसी तरह की कोई बुराई नहीं है। वहाँ कोई नशे नहीं लेता। वहाँ एक दुकान हैं जहाँ कोई दुकानदार नहीं है। लोग वहाँ से सामान लेते हैं और अपने आप पैसे छोड़ देते हैं। वहाँ सब कुछ जैविक(ऑरगैनिक) है। कोई रासायनिक खेती नहीं है और सब के पास रोजगार है। पिछले तीन साल से यह गाँव ऐसा चल रहा है। १८० गाँव इसी दिशा में चल रहे हैं।

हम इस स्वपन को सच का रूप दे सकते हैं। हमारे पास इसे संभव करने के लिए सब कुछ है। आप सब यहाँ इतने खुश हैं। आप इसी खुशी के साथ वापिस जाएं। आप यहाँ अपनी चिन्ताओं के साथ आ तो सकते हैं पर वापिस नहीं ले जा सकते। एक ही शर्त है कि आप अपनी सब चिंताएं यहीं छोड़ कर मुस्कुराते हुए घर जाएं। मैं आपको यह याद दिलाने के लिए हूँ कि ईश्वर हैं और आपके बहुत अपने हैं।

केवल ३० मिनट के ध्यान से ही आप इतने खिल जाते हैं। हम सबको रोज़ ३० मिनट ध्यान करना चाहिए। हम सबको मंदिर जाकर कुछ समय आंखे बंद करके ध्यान करना चाहिए। मंदिर से बिना ध्यान किए वापिस ना जाएं।


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"प्रकृति के साथ हमारा संबंध"

सत्य की खोज में आमतौर पर विज्ञान और आध्यात्म को एक दूसरे से भिन्न माना जाता है। दोनो का ही आधार स्तंभ है जिज्ञासा। आधुनिक विज्ञान वस्तुनिष्ठ विश्लेषण का तरीका अपनाता है, और आध्यात्म आत्मपरक विश्लेषण करता है। 'ये क्या है? जगत में ये क्या है?' इन प्रश्नों के साथ विज्ञान बाहरी जगत को जानने में रत रहता है। जबकि आध्यात्म की शुरुवात होती 'मैं कौन हूं?' प्रश्न से।

प्राचीन समय के जगत में इन दोनों प्रकार के ज्ञान में कोई संघर्ष नहीं था। मनुष्य का स्वयं के बारे में ज्ञान और ब्रह्माण्ड के बारे में ज्ञान, एक दूसरे के पूरक थे, और ये ज्ञान मनुष्य का सृष्टि के साथ एक सुदृढ़ और स्वस्थ संबंध बनाने का आधार था। इन दो प्रकार के ज्ञान को अलग मानने की वजह से आज विश्व के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

प्राचीन ज्ञान के मुताबिक मनुष्य के अनुभव में ५ परतें आती हैं, जो कि हैं – पर्यावरण, शरीर, मन, अंतर्ज्ञान और आत्मा।

पर्यावरण के साथ हमारा संबंध हमारे अनुभव की सर्वप्रथम और सब से महत्वपूर्ण परत है। अगर हमारा पर्यावरण स्वच्छ और सकरात्मक है तो हमारे अनुभव की बाकी सभी परतों पर इसका सकरात्मक प्रभाव पड़ता है, और वे संतुलित हो जाती हैं और हम अपने और अपने जीवन में आये व्यक्तियों के साथ अधिक शांति और जुड़ाव महसूस करते हैं।

मनुष्य की मानसिकता के साथ पर्यावरण का एक नज़दीकी रिश्ता है। प्राचीन समय की सभ्यताओं में प्रकृति को सम्मान के भाव से देखा गया है - पहाड़, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चँद्र...। जब हम प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ अपने संबंध से दूर जाने लगते हैं, तब हम पर्यावरण को प्रदूषित करने लगते हैं और पर्यावरण का नाश करने लगते हैं। हमे उस प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा जिससे की प्रकृति के साथ हमारा संबध सुदृढ़ बनता है।

आज के जगत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जो कि लालचवश, जल्द मुनाफ़ा और जल्द नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं। उनके कृत्य जगत के पर्यावरण को नुक्सान पँहुचाते हैं। केवल बाहरी पर्यावरण ही नहीं, वे सूक्ष्म रूप से अपने भीतर और अपने आस पास के लोगों में नकरात्मक भावनाओं का प्रदूषण भी फैलाते हैं। ये नकरात्मक भावनायें फैलते फैलते जगत में हिंसा और दुख का कारण बनती हैं।

अधिकतर युद्ध और संघर्ष इन्हीं भावनाओं से ही शुरु होते हैं। जिसके परिणाम में पर्यावरण को नुक्सान होता है, और उसे स्वस्थ करने में बहुत समय लगता है। हमें मनुष्य के मानसिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानसिकता ही प्रदूषण की जड़ है - स्थूल तथा भावनात्मक। अगर हमारे भीतर करुणा और परवाह जग जाते हैं, तो वे आधार बनते हैं एक गहरे संबंध का जिस में कि हम पर्यावरण की और व्यक्तियों की देखभाल करते हैं।

प्राचीन समय में अगर एक व्यक्ति एक वृक्ष काटता था तो साथ ही ५ नये वृक्ष लगाता था। प्राचीन समय में लोग पवित्र नदियों में कपड़े नहीं धोते थे। केवल शरीर के अग्नि-संस्कार के बाद बची हुई राख को नदी में बहाते थे ताकि सब कुछ प्रकृति में वापिस लय हो जाये। हमें प्रकृति और पर्यावरण को सम्मान और सुरक्षा के भाव से देखने वाली प्राचीन प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा।

प्रकृति के पास संतुलन बनाये रखने के अपने तरीके हैं। प्रकृति को ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो पंचतत्व इसका आधार हैं, उनका मूल स्वभाव एक दूसरे के विरोधात्मक है। जल अग्नि का नाश करता है। अग्नि वायु का नाश करती है...। और प्रकृति में कई प्रजातियां हैं - पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी...। भिन्न प्रजातियां एक दूसरे से वैर रखती हैं, फिर भी प्रकृति एक संतुलन बना कर रखती है। प्रकृति से हमे ये सीखने की आवश्यकता है कि अपने भीतर, अपने परिवेश में और जगत में विरोधी शक्तियों का संतुलन कैसे बनाये रखें।

सबसे अधिक आवश्यक है कि हमारा मन तनाव मुक्त हो और हम इस खुले मन से जगत का अनुभव कर सकें। ऐसी मनस्थिति से हम इस सुंदर पृथ्वी का संरक्षण करने के उपाय बना सकेंगे। आध्यात्म से हमे अपने असल स्वभाव का अनुभव होता है और खुद से और अपने परिवेश से एक जुड़ाव का एहसास होता है। अपने असल स्वभाव के साथ परिचय होने पर नकारात्मक भावनायें मिट जाती हैं, चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और पूरी पृथ्वी की देखभाल के लिये एक दृढ़ संकल्प उपजता है।

हमारी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने में और अपने आप से और अपने परिवेश से अपने संबंध को सुदृढ़ करने के लिये क्या करना चाहिये? ये कुछ सक्षम सूत्र हैं -
  1. उप्युक्त भोजन : भोजन से हमारे मन पर असर पड़ता है। जैन परंपरा में मन पर भोजन के प्रभाव के विषय में बहुत शोध किया है । आयुर्वेद, चीनी चिकित्सा पद्दति एवं विश्व की अन्य कई प्राचीन परंपराओं में भोजन से होने वाले मन पर प्रभाव को पहचाना था। आधुनिक विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि भोजन से हमारी भावनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भावनात्म्क रूप से परेशान बच्चे अधिक भोजन लेते हैं और मोटापे के शिकार हो जाते हैं। एक संतुलित आहार का हमारी भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव होता है और इसका असर हमारी चेतना पर होता है।
  2. हल्का या मध्यम व्यायाम|
  3. पंचकर्म : आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा परंपरा में भीतरी सफ़ाई की एक प्रक्रिया है जिसे पंचकर्म कहते हैं। पंचकर्म में शामिल होती हैं - मालिश प्रक्रिया, निर्धारित भोजन, और शरीर की भीतरी सफ़ाई। इससे हज़ारों लोगों को तनाव से मुक्त होने में और अपने व्यवहार में आये विकारों से मुक्त होने में सहायता मिली है। साथ ही, ये कई बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  4. योग, ध्यान और प्राणायाम : योग, ध्यान और प्राणायाम। अपने शरीर और पर्यावरण को सम्मान की दृष्टि से देखने में ये बहुत सहायक हैं। ये अपने शरीर और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने में सहायक होता है और भावनात्मक असंतुलन से भी मुक्त करता है।
  5. संगीत और नृत्य : इनसे शरीर और मन में तारतम्यता और समतुलना आती है। खासतौर पर उस संगीत से जो कि बहुत तेज़ और कोलाहलपूर्ण ना हो। शांतिदायक संगीत हमारे मन और शरीर में एक स्पंदन पैदा करता है जो कि समतुलना लाता है, जैसे कि शास्त्रीय और लोक संगीत।
  6. प्रकृति : प्रकृति के साथ समय बिताना, मौन रहना, प्रार्थना करना..ये बहुत सहायक हैं अपने मन के साथ रहने में।
  7. और फिर सेवा। यह जीवन में संतुष्टि के लिए अनिवार्य है।

संदर्भ..


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"कोई घटना तुम्हारे केन्द्र को छू नहीं सकती"

वैन्कूवर,
१० जुलाई


कुछ क्षण अपने साथ बैठे व्यक्ति के साथ पहचान करते हैं। हम शब्दों से ज़्यादा अपनी मौजूदगी से अभिव्यक्त करते हैं। शब्दों से ज़्यादा हम अपनी उर्जा से अभिव्यक्त करते हैं। कई बार हम कहते हैं - मुझे अच्छा स्फुरण महसूस नहीं हो रहा। यह बात सत्य है, सही में हम उर्जा का लेन देन ही करते हैं। मैं यहाँ दो घंटे खड़ा होकर प्रेम के विषय में व्याख्या दे सकता हूँ पर हो सकता है वह किसी के दिल में उतरे ही नहीं। पर शिशु की एक नज़र सब कुछ कह जाती है। इसी प्रकार जब हम क्रोधित होते हैं, तनाव में होते हैं तो वही तरंगें दूसरों को प्रतिपादित करते हैं। न घर में और न बाहर किसी ने हमें इन तरंगों को शुद्ध रखने की शिक्षा दी। अपनी उर्जा को शुद्ध रखने के लिए जीवन को विशाल रूप से देखने की आव्श्यकता है। हमारे शरीर में प्रतिदिन लाखों नए कोष पैदा होते हैं और मरते हैं। जब आप मुँह रगड़ कर धोते हो तो मरे हुए कोष दूर करते हो। इतने कोष प्रतिदिन मरते और पैदा हैं पर आप वही रहते हैं।

ऐसे ही, संसार को भी एक बदलते हुए दृश्य स्वरूप देखो। जीवन घटनाओं का क्रम है जिसमें घटनाएँ आती हैं, विलीन होती हैं, तुम अछूते उनमें से गुजर जाओ। तुम एक अनमोल हीरा हो। तुम्हें कोई घटना हिला नहीं सकती, तुम्हारा प्रेम नष्ट नहीं कर सकती। हम घटनाओं से ऊपर हैं, उनसे बढ़कर हैं। चाहे प्रशंसा हो यां निंदा - तुम्हें कुछ छू नहीं सकता, तुम अछूते हो।
तुम एक प्रज्जवलित दीपक हो, एक ऐसा फूल जो सदा सुगंधित है। क्या आप सब यहीं पर हैं? सुन रहे हैं, यां ये बातें काल्पनिक लग रही हैं? ये बातें स्वपन स्वरूप, मिथ्या जैसी लग सकती हैं पर सत्य हैं।
हम सब एक दूसरे के साथ इस सृष्टि में जुड़े हुए हैं, चाहे लोग माने यां न माने, तुम विश्व की आत्मा हो, तुम सृष्टि के केन्द्र हो। और आध्यातमिकता यही है - अपने आप को समस्त सृष्टि से जुड़ा पाना। तुम छोटा अहम नहीं हो, तुम विशाल चेतना हो जिसकी कोई सीमा नहीं, वह असीम चेतना तुम हो।

यह विशाल चेतना हम सब में शिशु रूप में जन्म के साथ होती है, किंतु हम समय के साथ अपने आप को छोटी बड़ी उपाधियों के आवरण से ढकते जाते हैं। हमे आवरण के परे अपना सच्चा स्वरूप देखना होगा, और इसको हासिल करने के लिये उत्तम साधन है, ध्यान।

क्या आप लोगों का ध्यान इधर ही है? अब क्या चल रहा है मन में? और कुछ सुनना है, आगे क्या होगा आदि।

सच्चा ज्ञान वह नहीं जो हम शब्दों से व्यक्त करते हैं। क्या आप लोग सुन रहे हैं? शब्दों से प्रतिपादन केवल घटना मात्र है, अंतराल भरने का माध्यम।

ध्यान के लिये तीन स्वर्णिम नियम हैं :


१) पहले सुखपूर्वक शरीर को ढीला छोड़ कर बैठ जायें। अगले कुछ मिनट में सिर्फ इस एक विचार से बैठें, ’मुझे कुछ नहीं चाहिये’, अगर आपके मन में उठा- मुझे प्यास लगी है, पानी पीना है इत्यादि, तो आप ध्यान नहीं कर रहे।

२) दूसरा नियम यह कि अगले १०-१५ मिनट के लिए ’मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ’।

३) और तीसरा - ’मैं कुछ नहीं हूँ’। अगले १०-१५ मिनट के लिए मैं कुछ नहीं हूँ। यदि तुम समझते हो तुम बहुत बुद्धिमान हो तो ध्यान के बारे में भूल जाओ, और अगर समझते हो कि बेवकूफ़ हो तो भी आप उसी किश्ती में स्वार हैं। अगले कुछ क्षंणों के लिए सब धारणाएं जैसे मैं अमीर हूँ, गरीब हूँ, बहुत धार्मिक हूँ यां पापी हूँ इत्यादि सब भूल जाओ, तो आप कुछ नहीं हो!

तुम्हें कुछ नही चाहिये-(अचाह), तुम कुछ नहीं कर रहे हो (अप्रयत्न), और तुम कुछ नहीं हो (अकर्ता)- ये तीन उपाय हैं ध्यान करने के लिये।

प्रश्न : इस ईर्ष्या और घृणा से भरे जगत में विनम्रता और शांति के पथ पर कैसे चला जाये?

श्री श्री रवि शंकर : जगत को ऐसी मान्यता और उपाधि से मत बाँधो। कुछ लोग वैसे हो सकते हैं, उन पर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ जाओ। वे अपनी ईर्ष्या में जलते हैं तो जलने दो, तुम उस पर ध्यान न दो। तुम जिस पर ध्यान देते हो, महत्व देते हो - वही बात बढ़ने लगती है। किसी भी संकल्प पर ध्यान देने से वो फलीभूत होने लगता है।

मैंने अपने ५५ साल के जीवन में किसी के लिये अपशब्द नहीं कहे हैं। यह मेरा स्वभाव है। अधिकतम किसी को बेवकूफ कहा होगा पर किसी को बुरा न कहा है, न बुरा चाहा है। यदि तुम्हारा उद्देश्य ठीक है तो मै कहता हूँ, तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता है।

यदि कोई ईर्ष्या करे तो क्या करें? आगे बढ़ते जाओ। तुम्हारा ध्यान विशालता की ओर हो, अपने विकास कि ओर हो।

प्रश्न : मैंने आपके सानिध्य में रहने वालों को उनकी क्षमता से भी अधिक विकसित होते देखा है। आप कैसे इन सब लोगों को प्रभावित करते है, प्रेरणा देते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : वर्ल्ड बैंक के प्रैज़ीडेंट ने भी यह सवाल मुझसे पूछा था, ’आपकी इतनी सारी योजनाएँ सफलता कैसे पाती हैं? हम भी बहुत से प्रयोजन करते हैं पर हर किसी को सफलता नहीं मिलती।’
सफलता केवल धन पर ही नहीं, अपितु आपके सही उद्देश्य, उस पर ध्यान देने से और स्पष्टता पर निर्भर करती है। हम अपनी दृष्टि को बदल कर देखें तो पायेंगे सब कुछ भीतर से उत्पन्न हो रहा है। अगर मन के भीतर का वातावरण सुखद है, तो बाहर भी अच्छा लगेगा। तो तुम ही इस बदलाव के प्रतिनिधि (कार्यकर्ता) बनो।

प्रश्न : शरीर को आवश्यक्ता से अधिक चलायमन मन के विचारों से कैसे मुक्त किया जाये?

श्री श्री रवि शंकर : सुदर्शन क्रिया, ध्यान, योग और सही भोजन आदि करने से यह ठीक हो सकता है।

प्रश्न : आपने मुझ पर जो इतनी कृपा की है, मैं उसका आभारी हूँ। पर मैं जब भी आपसे मिलता हूँ तो बहुत आँसूं निकलते हैं। ऐसा क्यों होता है?

श्री श्री रवि शंकर : हे भगवान! तुम तो मेरी ये प्रतिष्ठा खत्म कर रहे हो कि जो भी मुझे देखता है वह मुस्कराता है! जब दिल खिलता है तो आँसू निकल पड़ते हैं।प्रेम और आभार के आँसू बहुत कीमती हैं।

प्रश्न : जीवन का उद्देश्य क्या है, इसे कैसे जाना जा सकता है?

श्री श्री रवि शंकर : शांतचित्त होकर अपनी अंतरात्मा को सुनो। आप सबके पास मोबाइल फोन है न? उसको काम में लाने के लिये क्या क्या होना चाहिये? अगर सिम कार्ड नहीं है तो कार्य करेगा क्या? सिम कार्ड है पर तुम बहुत दूर हो तब सिग्नल नहीं पकड़ता है तो क्या वो काम करेगा? और तुम्हें सिम कार्ड, सिग्नल ठीक पकड़ने के साथ यह भी देखना होगा कि बैट्री पूरी है। तो तीनों चीज़ें चाहिये- बैट्री, सिम कार्ड व टावर की नज़दीकी। पर यह तीनों के होने के बाद भी यदि तुम नंबर नहीं लगाओगे तो भी काम नहीं चलेगा। तो ये सब करना पड़ेगा तुम्हें - आध्यात्मिक संबंध टावर समान है, आपका अपना प्रयत्न नंबर घुमाने समान है और ध्यान करना बैट्री चार्ज करने समान है। ये सब हो तो प्रार्थना की सुनवाई होती है। तुम्हारे में भी दूसरों को आशीर्वाद देने और दूसरों की मनोकामना पूरी करने की क्षमता हो सकती है यदि मन शांत और स्थिर हो।

प्रश्न : मुझे कई लोगों के साथ अटपटा सा लगता है, व्यग्रता महसूस होती है, चाहे वो अजनबी ही हों। ऎसा क्यों होता है?

श्री श्री रवि शंकर : इसे एक परीक्षण के रूप में लो और ध्यान करो। ध्यान की गहराई में जाकर देखोगे कि ये व्यग्रता मिट जायेगी। तुम इस संवेदना को अधिक महत्व देते हो। यह जान लो कि तुम इन सब से अधिक विशाल हो। जब तुम अपना दृष्टिकोण बदल लोगे तो ये संवेदनाएँ भी मिट जायेंगी।

प्रश्न : आत्मसम्मान खोने पर जीने का उद्देश्य कैसे ढूँढा जा सकता है?

श्री श्री रवि शंकर : आत्मा नहीं खोई है तो अत्मसम्मान भी कैसे खो सकता है! उठो जागो! तुम को कई अनेक स्वीकार करते हैं और प्रेम करते हैं। तुम इस धरती के एक कीमती फूल हो। कुछ उपयोगी कार्य करो। हर समय केवल अपने बारे में ही विचार मत करो।

प्रश्न : क्रोध क्यों आता है?

श्री श्री रवि शंकर : सब कार्य में निपुणता की इच्छा रखना ही क्रोध का कारण होता है। कुछ हद तक दोष भी स्वीकार करो। किसी भी कार्य में परिपूर्णता असंभव है। किसी भी कार्य में केवल ९५ प्रतिशत पूर्णता हासिल हो सकती है। हाँ, वचन और विचार में १०० प्रतिशत पूर्णता हासिल हो सकती है।

प्रश्न : अफगानिस्तान में शांति के लिये क्या मार्ग है?

श्री श्री रवि शंकर :ये याद रहे कि वहाँ पहले बौद्ध और हिन्दू धर्म के लोग रहते थे, व अफगानियों के पूर्वज योग और ध्यान के साधक थे। यह बात समझने पर लोग कट्टरपंथि भाव छोड़कर विशाल दृष्टिकोण रख सकते हैं। उनका यह सोचना कि ’वे ही स्वर्ग में जायेंगे और अन्य लोग नरक में’, दूसरों के लिये नरक उत्पन्न कर देता है। सबको विशाल दृष्टिकोण रखना होगा। प्रत्येक विध्यार्थी को थोड़ा बहुत उपनिषद, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब आदि का ज्ञान होना चाहिये। जैसे सिख धर्म के गुरु ग्रन्थ सहिब में उपनिषदों का सार है। यह महत्वपूर्ण है कि सब बच्चे इसके बारे में जाने, तब वे विशाल भाव रख सकेंगे। जो बलिदान सिख गुरुओं ने दिया वह अवर्नणीय है। उसके बिना योग और ध्यान इस भूमी से कब के मिटा दिये जाते। सिख गुरुओं ने बलिदान का जीवन बिताया। उन्होंने इस ब्रह्मज्ञान की सुरक्षा की जो सम्पूर्ण विश्व के लिये है। सब को हर धर्म के बारे में थोड़ी जानकारी अवश्य होनी चहिये।

प्रश्न : ध्यान लगाने में सहायक क्या बातें हो सकती हैं?

श्री श्री रवि शंकर : किसी भी अच्छी बात की शुरुआत के लिए ये तीन बातें सहायक हो सकती हैं: लोभ, भय और प्रेम।

कोई आपको लोभ दे कर कहे कि आपको साधना नियमित करने पर लाख डालर मिलेंगे, तो आप करोगे क्या? यह सुन आप पाँच दिन ज्यादा भी करने को तैयार हो जाओगे!

जिससे प्रेम करते हो वह यदि सिगरेट पीने को मना करे, तो आप तैयार हो जाओगे, उनकी बात रख लोगे। भय से भी आप सिगरेट पीना छोड़ दोगे। यदि डाक्टर ने कहा सिगरेट पीना छोड़ दो वर्ना मर जाओगे, तो आप क्या करेंगे? इन तीनों उपायों में से मैं प्रेम का उपाय बेहतर समझता हूँ।

गुरु प्रेम और प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

प्रश्न : स्त्री-पुरुष का सम्बंध कैसे मजबूत हो सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :मैं कुछ सुझाव दे सकता हूँ।
पहले महिलाओं के लिये: आप सब तैयार हैं? तो पहिली बात, अपने पति के अहम पर कभी चोट न पहुँचायें। कभी यह न दरशायें कि वे किसी काम के नहीं है। यदि आप ऐसा कहती हैं तो वे वैसे ही बन जायेंगे। सब समय प्रशंसा करो और कहो वे सबसे उत्तम हैं, उनकी सराहना करो।

अब पुरुषों के लिये: कभी भी स्त्री की भावना पर चोट न पहुँचायें, न ही उसके परिवार के ऊपर टिप्पणी करें। वो चाहे अपने परिवार के बारे में शिकायत करे, आप चुप ही रहना बेहतर समझें। जिस क्षण आपने अवहेलना में साथ दिया वो पलट कर आप पर ही क्रोध कर सकती है। उसकी भावनाओं का सम्मान करें। उसे खरीददारी पर यां किसी आध्यात्मिक सम्मेलन में जाने से मना ना करें। खरीदारी पर जाना चाहें तो अपना क्रेडिट कार्ड देदें! उसकी भावनओं का ध्यान रखें।
अब पुरुष और महिलाओं के लिए: प्रेम का प्रमाण न माँगें, जैसे-क्या तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो? सोचो कितना बोझिल है यह सिद्ध करना कि तुम किसी से प्रेम करते हो, सच्चा प्यार करते हो। अगर आपको लगे भी कि आप के पति यां पत्नि का प्रेम कम हो गया है तो भी आप यही कहें कि ’तुम मुझे इतना प्रेम क्यों करते हो?’ तब रिश्तों मे मुर्झाहट आ भी गयी हो तो फिर से खिलाहट आजायेगी। प्रश्न वही पूछो जो उपयोगी हो। कभी भी किसी से प्रेम का प्रमाण नहीं मांगो, इसे मान कर चलो कि प्रेम है!

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"हर दिन एक नया अध्याय है"

प्रश्न : एक दिन आपने पंचतत्व के बारे में बताया था। क्या आप पंचतत्वों के बारे में और प्रकाश डालेंगे?

श्री श्री रवि शंकर : पूर्ण सृष्टि पाँच तत्वों से बनी है।
नदियों का सम्मान करने की एक महान परंपरा रही है। नदी नहीं चाहती कि तुम उसे फूल यां फल दो। ये पूजा का तरीका नहीं है। और नदी में कूड़ा और गंदगी के नाले डाल कर, तुम ये कैसे कह सकते हो कि तुम नदी की पूजा कर रहे हो? पूजा का अर्थ है सम्मान देना। और हम तभी सम्मान दे पाएंगे जब हम नदियों में गंदे नाले, कूड़ा, प्लास्टिक डालना बंद करेंगे। कुछ साल पहले तक, नदी से जल लेकर सीधे ही पी सकते थे। पर आज, किसी भी नदी का जल अपने उद्गम स्थान से १०० किलोमीटर दूर भी पीने लायक साफ़ नहीं है!पहले समय में अपने उद्गम स्थान से हज़ारों किलोमीटर दूर भी नदी का पानी पीने लायक साफ़ हुआ करता था। इस देश में लोग बर्तन साफ़ करने के लिये लकड़ी की राख का प्रयोग करते थे, ना कि साबुन का। हल्दी और दूसरी प्राकृतिक वनस्पतियों का प्रयोग होता था जो कि bio-degradable होती हैं। हम नदियों में बहुत ज़्यादा औद्योगिक कूड़ा डाल रहे हैं। ये जल तत्व के प्रति असम्मान दर्शाता है।

पृथ्वी तत्व का सम्मान करने का अर्थ है कि हम धरती में प्लास्टिक, विषैली खाद और रसायन डाल कर प्रदूषण ना करे। पर्यावरण के लिये सजग होना, पृथ्वी का सम्मान करना है।
फिर वायु तत्व आता है। हमें स्वच्छ ऊर्जा चाहिये। हमने महाराष्ट्र के गाँवों में धूम्ररहित चूल्हों का इंतज़ाम किया है, जो एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा। हमे वायु का सम्मान करना है और इसके स्वच्छ वायु के लिये हमें जो भी करने की आवश्यकता हो, करें।

आकाश तत्व है जो कि अमूर्त है। आप आकाश को पकड़ नहीं सकते हैं। जब आप अपने मन को नकारात्मक भावों से बचाते हैं तो आप इर्द गिर्द आकाश को आनंद से भर रहे हैं। तब आसपास की वायु भी आनंदित हो जाती है। तुम एक स्थान को अविश्वास, क्रोध, लालच, और खुदगर्ज़ी से भर सकते हो, यां एक एक ऐसा स्थान बना सकते हो जहाँ मस्ती हो, आत्मविश्वास हो, आपसी समझ हो, अपनापन हो। अगर तुम हर समय गल्तियों के बारे में नकारात्मक भाव व्यक्त करते रहोगे तो तुम इस पृथ्वी पर कहीं भी नहीं जी पाओगे। हर किसी में कोई ना कोई दोष है।
जब हम दूसरों में देखने का प्रयास करते हैं तो हम अपनी कमियों को देखना भूल जाते हैं।

पंचतत्व, सृष्टि का हिस्सा हैं। और इस सुंदर सृष्टि को बनाये रखने के लिये हमे इनका सम्मान करना होगा।

प्रश्न : मैं ऐसी बहुत सी चीज़े पाता हूँ जो मुझे ठीक नहीं लगती। मुझे नहीं पता कि जो मुझे ठीक नहीं लगता, उसे मैं कैसे ठीक करूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर : जब तुम कहते हो, ‘ये ठीक नहीं है,’ तो तुम्हारे मन में इस ‘ये ठीक नहीं है’ का बीज घर कर जाता है जो मन को विश्राम नहीं करने देता है। जब तुम बेचैनी को पकड़ कर बैठे हो, तो मन को चैन कैसे आयेगा? जो जैसा है तुम्हें उसे वैसा ही स्वीकार करना होगा। ‘ये ठीक नहीं है, ये ठीक नहीं है,’ तुम्हें बाहर रखता है। जो दोष तुम्हें दिख रहा है वो किसी कारण से है। वो ठीक हो जायेगा, कुछ समय लगेगा।

इस वक्त जो जैसा है, ठीक है। भविष्य में भी वो ठीक होगा। जो भूतकाल में हुआ है, वो भी ठीक था।
जब तुम ये समझ जाओगे, तुम विश्राम कर सकोगे, और उस विश्राम में तुम ध्यान कर सकोगे। जब तुम विराम लेते हो तो ये निवृत्ति है, और जब तुम उस विराम से बाहर आते हो तो वह प्रवृत्ति है। तब तुम कर्म कर सकते हो। जब तुम थके हुये हो और तुम इस बात पर केंद्रित हो कि, ‘ये ठीक नहीं है,’ तब तुम विश्राम नहीं कर सकते हो। जब तुम मस्ती में होते हो, तो क्या कहते हो? ‘सब बढ़िया है!’ नहीं तो तुम मस्त नहीं हो सकते हो, कर्म नहीं कर सकते हो - ये ना प्रवृत्ति है और ना ही निवृत्ति।

ध्यान योग निवृत्ति है। कर्म योग प्रवृत्ति है। बहुत से लोग, ‘ये ठीक नहीं है,’ विचार को पकड़े हुये हैं जिस वजह से वे विश्राम नहीं कर पाते है, जीवन में आनंदित नहीं हो पाते हैं, मस्त नहीं हो पाते हैं। वो व्यक्ति, सरकार, शासन, सब कुछ ठीक नहीं है।’ तब ये तुम्हारे अंदर भी आ जाता है - ‘मैं ठीक नहीं हूँ।’ सूक्ष्म रूप से ये भाव तुम में समा जाता है कि, ‘मैं ठीक नहीं हूँ।’ तब तुम्हें ऐसा महसूस करना अच्छा नहीं लगता है, और तुम उसे छिपाने की कोशिश करते हो, मन में कई सफ़ाइयां गढ़ लेते हो, और मन भ्रमित हो जाता है।

अगर तमोगुण अधिक हो तो तुम प्रवृत्ति यां निवृत्ति नहीं जानते हो। जब सत्व गुण अधिक होता है तो तुम जानते हो कि तुम्हें क्या करना है, कब करना है, कार्य करना है यां नहीं करना है। जब रजोगुण बढ़ जाता है तो ये बीच का बिंदु है - तुम कर्म करते हो और फिर पछताते हो। हम में से कई लोग कर्म करते हैं और फिर पछताते हैं। मां अपने बच्चे को डांटती है और बाद में पछताती है, और फिर बच्चे से अच्छा व्यवहार करती है।
सत्वगुण में तुम पछताते नहीं हो, विराम और विश्राम करते हो, और तुम्हारी सोच एकदम साफ़ और पारदर्शी होती है।

रजोगुण में भ्रम और अस्तव्यस्तता होती है।

तमोगुण में एकदम आलस और कर्म करने की अनिच्छा होती है।

इन तीनों गुणों के बीच कोई गहरी रेखा नहीं है, ये आपस में घुल मिल जाते हैं, और हम एक गुण से दूसरे गुण में सहज ही आ जाते हैं।

प्रश्न : अपने मन की रक्षा कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर : ये बहुत बड़ा काम है। गीता में कहा गया है कि बहुत बुद्धिमान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं कि क्या करें और क्या ना करें, और मन को कैसे संभाले। मन की रक्षा करना एक बहुत बड़ा काम है, और इसके लिये हमें ज्ञान की आवश्यकता है। ये देखो कि आज के इस क्षण तक जो भी कुछ हुआ है, वो सब चला गया है!
जागो!

जब तुम प्राण से भरे हुये होते हो तो तुम अचानक ये देखते हो कि सब चला गया है. अभी! जो भी कुछ हो गया, ठीक था। ये सोचो कि अब क्या करना है। कभी कभी जो भी तुम करते हो १००% सफल होता है, कभी ऐसा नहीं भी होता है। एक किसान जानता है कि वो जो बीज उगाता है, उन में से हर बीज अंकुरित नहीं होता है। वो बीज लेकर खेत में बो देता है और ये नहीं सोचता कि ये बीज उगेगा यां नहीं उगेगा।

इसी समय से एक नया अध्याय शुरु हुआ है। हर दिन एक नया अध्याय है। ये जागरूकता बार बार अपने भीतर लाओ। ये पूरा विश्व मेरी ही आत्मा से भरा है। ये सब मैं ही हूँ। एक ही चेतना है। ये एक चेतना एक व्यक्ति के भीतर एक तरह से अभिव्यक्त होती है, किसी दूसरे व्यक्ति से दूसरी तरह अभिव्यक्त होती है। ये एक सागर की लहरों के समान है। अगर ये बात तुम्हें ५ सेकंड के लिये भी समझ आ गयी तो तुम्हारे शरीर और मन में समूल परिवर्तन आ जायेगा। तब तुम अनुभूत करोगे, ‘अहो!’ सब चिंतायें धुल जायेंगी। बस एक सेकंड के लिये ये पहचान लो कि मेरे दुश्मन में भी मैं ही हूँ। मैंने ही ये खेल शुरु किया है। ये समझ लो लेकिन ऐसा करने के लिए मूड बनाने की आवश्यकता नेहीं है।ये समझ केवल निवृत्ति में रखनी है, प्रवृत्ति में नहीं। अगर हम व्यवहार में अद्वैत को ले आयेंगे तो इससे भ्रम और बढ़ेगा। प्रवृत्ति में हम द्वैत को देखते हैं। द्वैत के बिना मानव शरीर धारण करना असंभव है। कितनी प्रवृत्ति और कितनी निवृत्ति होनी चाहिये ये एक नाज़ुक विषय है। जब प्रवृत्ति अधिक हो जाती है तो नकारात्मक भाव बढ़ जाता है और व्यक्ति को निवृत्ति में जाने को कहा जाता है।

प्रश : मैं एक नया काम हाथ में ले रहा हूँ। कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये।

श्री श्री रवि शंकर : मैं बिना किसी रोक के बहुत आशीर्वाद देता हूँ। ये तुम पर है कि तुम कितना लेना चाहते हो। यहाँ बहुत पानी है। तुम्हारे पात्र की जो क्षमता है, तुम उतना ही ले पाओगे।

प्रश्न : गुरुजी, यहाँ पर इतनी संदर गौशाला है, वहाँ जाकर ऐसा लगता है मानो प्राचीन भारत में आ गए हों। पर अन्य जगह हम देख रहे हैं कि गायें विलुप्त होती जा रही हैं। हमे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर : प्रति १००० व्यक्ति पर हमारे पास १२० गायें रह गयी हैं। १२० गायें १००० व्यक्तियों के लिये पर्याप्त दूध नहीं दे सकती। जब भारत आज़ाद हुआ था तब १००० व्यक्तियों के लिये ४५० गायें थी। अब ये संख्या गिर कर १२० हो गयी है। दो-तीन सालों में से संख्या २० हो जायेगी। ये आज की आवश्यकता है कि गायों की रक्षा की जाये। लोगों को इस बारे में जागरूक होना चाहिये, नहीं तो भारत के लोग दूध, दही, घी की कमी झेलेंगे। हमें गायों का संरक्षण करना होगा।


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"हमारे लिए जो ज़रूरी है वो हमको मिलता है"

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बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : गुरुजी, महात्मा गांधी के अहिंसावादी सिद्धांत को जीवन में कितना उतारना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
अहिंसा का सिद्धांत अत्यंत प्राचीन समय से चल रहा है। जीवन में अहिंसा तो रहनी ही चाहिए। कभी किसी के भले के लिये अगर उसे थप्पड़ भी मारना पड़ता है, तो मुस्कुराते मुस्कराते मारना चाहिए। देखो, भैंस को आगे बढ़ाने के लिये उसे छ्ड़ी से धक्का भी देना पड़ता है। गाय तो केवल आवाज़ से चल पड़ती है।पर भैंस और गधे के लिये लाठी ज़रुरी हो जाती है। इसे हिंसा नहीं मानते। हिंसा किसे कहते हैं? जब भीतर आक्रोश है, द्वेश है, क्रोध है, उससे जो काम करते हैं वो हिंसा होता है।

प्रश्न : क्या कोई हमें थप्पड़ मारे तो क्या हमें दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर वह व्यक्ति संवेदनशील है, तो दूसरा गाल भी आगे कर दो, वह तुम्हें दोबारा थप्पड़ नहीं मार पायेगा। पर अगर कोई असंवेदनशील हो तो तुम भी उसे दो-तीन लगा सकते हो!

प्रश्न : कभी कभी लोग पूछते हैं कि तुम सिर्फ़ भगवान को क्यों नहीं मानते, गुरु को क्यों मानते हो? मेरा जवाब होता है कि मेरे गुरु ही मेरे भगवान हैं। पर क्या भगवान और गुरु में कोई अंतर है?

श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है, तुम्हें लोगों को सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है। बस मुस्कुराओ। तुम कह सकते हो, ‘क्या तुम नहीं जानते कि आत्मा, भगवान और गुरु, एक ही हैं।’ ये पूरा ब्रह्माण्ड एक ही तत्व से बना है। जैसे, बिजली तो एक ही है, पर वह अलग अलग उपकरणों में अलग दिखती है - बल्ब, पंखा, वातानुकूल, इत्यादि। वैसे ही अलग अलग शरीर और तौर तरीके हो सकते हैं, पर हम सब एक ही तत्व से बने हैं।

प्रश्न : अगर भगवान हमारी कोई प्रार्थना पूरी नहीं कर रहे हैं, तो क्या क्रिया और साधना में मज़बूत करने से वो पूरी हो जायेगी?

श्री श्री रवि शंकर :
धीरज रखो। आशा रखो कि वह पूरी हो सकती है। हमारे लिए जो ज़रूरी है वो हमको मिलता है।

प्रश्न : कभी कभी अपने आप पर मेरा नियंत्रण ढीला पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा कभी कभी होता है तो कोई बात नहीं है। ऐसा हर समय तो नहीं होता है ना? तुम पीछे मुड़कर देखो। (प्रश्नकर्ता अपने पीछे मुड़ कर देखता है, और सभी लोग हँसने लगे।) अभी नहीं! अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखो - एक साल, दो साल, तीन साल पहले जाकर देखो कि तुम तब क्या थे और आज क्या हो। तुमने कोई फ़र्क देखा? कितना फ़र्क देखा? तुम कह रहे हो एक महीने में जब से तुम सुदर्शन क्रिया कर रहे हो तुमने बहुत फ़र्क देखा है। तुम आगे भी बहुत फ़र्क देखोगे।

प्रश्न : Art of Living में हम कौन से योग का अभ्यास करते हैं - हठ योग, राज योग, कर्म योग यां ध्यान योग?
श्री श्री रवि शंकर : Art of Living में सब है। सब योग मिलकर Art of Living में हैं। भक्ति योग, कर्म योग, ध्यान योग सब हैं।

प्रश्न : क्या मैं हठ योग का अभ्यास कर सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम जिस भी योग का अभ्यास करो, सहजता और असानी से करो। अपने शरीर को बहुत कष्ट देने की आवश्यकता नहीं है। साधारण और सहज रहो। हठ योग के अभ्यास के लिये कई सावधानियां बरतनी पड़ती हैं।

प्रश्न : गुरुजी, मैं बहुत सारा काम करना चाहता हूँ, पर वह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर आता है। क्या फिर भी मैं इस बारे में सोचूं और स्वप्न लूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, तुम्हें ऐसा स्वप्न रखना चाहिये।

प्रश्न: हम राष्ट्र के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने के लिये क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर :
अपने राष्ट्र के प्रति अपना प्रेम और कृतज्ञता दर्शाने के लिये तुम्हें समाज में बहुत काम करना चाहिये ताकि हमारे गाँव विकास करे और स्वावलंबी बने। समाज को भ्रष्टाचार और हिंसा से मुक्त करने के लिये हमें पूरे दिल से काम करना है। ठीक है?

प्रश्न : मैंने अपने अंतिम साल की परीक्षा दी है और मैं आगे और पढ़ना चाहता हूँ। मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ, पर एकाग्रता से पढ़ाई नहीं कर पाता हूँ। मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम एकाग्रता से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हो तो इन तीन बातों पर ध्यान दो -

१. तुम्हारा भोजन. अपने भोजन पर ध्यान दो। इस पर ध्यान दो कि तुम क्या खाते हो।

२. क्या तुम कोई शारीरिक व्यायाम करते हो? अगर तुम केवल बैठ कर टी वी देखते रहते हो या कम्प्यूटर पर इन्टरनेट पर काम करते रहते हो, तो शरीर में ऊर्जा का संचार कम होता है। तब तुम आलसी हो जाते हो, और पढ़ने में मन नहीं लगता। तो, कुछ शारीरिक व्यायाम करना आवश्यक है।

३. योग, प्राणायाम, ध्यान और सत्संग में भाग लेना, इत्यादि। इतना करने से तुम्हारे शरीर की सभी आवश्यकतायें पूरी हो जायेंगी। और फिर तुम बैठ कर पढ़ने के लिये अच्छा समय दे सकते हो। इससे तुम्हारी समझने की शक्ति और याद्दाश्त भी बढ़ जायेगी, और तुम कम समय में अधिक ग्रहण कर सकोगे। आगे पढ़ने की तुम्हारे इच्छा है तो पढ़ो, निर्णय तुम्हारा है, और मेरा आशीर्वाद है।

प्रश्न : भगवान शंकर और कृष्ण में क्या फ़र्क है? कुछ लोग शिव की पूजा करते हैं और कुछ लोग कृष्ण की।

श्री श्री रवि शंकर : नाम और रूप अनेक हैं, पर सब एक ही है।

प्रश्न : इनमें से क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं - हमारे संस्कार या जाति? जो लोग जातिवाद और धर्मवाद का समर्थन करते हैं, अन्तर्जातीय विवाह का विरोध करते हैं। दोनों में क्या अधिक महत्वपूर्ण है - मानवीय गुणं या व्यक्ति का धर्म और जाति?

श्री श्री रवि शंकर :
मानवीयता को अधिक महत्व देना चाहिये।

प्रश्न: क्या विवाह संबंधों से पहले जन्म-पत्री मिलानी चाहिये? क्या इस में विश्वास करना चाहिये? क्या मांगलिक होने से कोई फ़र्क पड़ता है?

श्री श्री रवि शंकर :
> ये विज्ञान है, पर ये इस पर निर्भर करता है कि बताने वाला कैसा है। कई बार ज्योतिष के नाम पर लोग ठग लेते हैं। जन्म-पत्री मिलाने में कुछ तो है, अगर तुम्हे लगे तो कर सकते हो । ॐ नमः शिवाय का जप करना सब कमियों का उपाय है।

प्रश्न : आप हमारे Art of living के गुरु हैं, पर परिवार में भी गुरु हैं, पारंपरिक धार्मिक क्रियायें हैं, उपासना की अलग पद्दति है, क्या हमें उन्हें भी निभाना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
देखो, अगर परिवार में एक परंपरा चली आ रही है बहुत समय से तो उसे करने में क्या हर्ज है? पारिवारिक परंपराओं को निभाना चाहिये।

प्रश्न : असफलता को कैसे स्वीकार करें?

श्री श्री रवि शंकर :
ये जान कर कि ये भविष्य में सफलता की तरफ़ एक कदम है।

प्रश्न : कोर्स करने के बाद आप तीन बार मेरे सपने में आये। दूसरी बार जब आप सपने में आये तो मैंने देखा कि अब आप इस दुनिया में नहीं रहे।

श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अभी उस बात को होने में बहुत समय बाकी है!

प्रश्न : Art of Living में बहुत सारे अध्यापक हैं जो कि प्रेरणास्रोत हैं। अच्छा अध्यापक होने के लिये क्या योग्यता चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : हाँ, टीचर्ज़ ट्रेनिंग ले लो, और अच्छी तरह से अपने आप को तैयार कर लो।

प्रश्न : मेरे गुरु होने के लिये धन्यवाद। मैं एक सिख हूँ, और हमारे धर्म में हमारे अंतिम गुरु ने कहा था कि अब कोई गुरु नहीं होगा, गुरु ग्रंथ साहिब ही गुरु का स्वरूप है। तो, मेरे परिवार के लोग नहीं चाहते कि मैं किसी को गुरु मानूँ। मैं उन्हें कैसे समझाऊं?

श्री श्री रवि शंकर :
सब ठीक है। वाहे गुरु वाहे गुरु कहो। जो भी धर्म है उन्हें वो निभाने दो, पर वो कोर्स कर सकते हैं और सब से मित्रता कर सकते हैं।

प्रश्न : Art of living के कुछ स्वयंसेवी आपके आशीर्वाद से राजनीति में जाना चाहते हैं।

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, ठीक है। उन्हें राजनीति में जाना चाहिये। राजनीति की सफ़ाई करनी चाहिए जैसे कि Art of Living के स्वयंसेवियों ने यमुना की सफ़ाई की!


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ध्यान करने से समस्त वातावरण में उस ऊर्जा का स्पंदन होता है

पिछली पोस्ट के शेष अंश :

हमारे युवाचार्य एक फ़ैक्टरी के लिये लाइसेंस लेने गये, और उन्होंने रिश्वत देने से मना कर दिया। बिना किसी क्रोध के, आत्मविश्वास से उन्होंने कहा, ‘हम Art of Living के सिद्धांतों पर चलते हैं, और हम रिश्वत नहीं देंगे। आप चाहते हैं तो हम आप के पास ५० चक्कर लगायेंगे, पर रिश्वत नहीं देंगे।’ उस व्यक्ति ने बड़ी आसानी से उन्हें लाइसेंस दे दिया। मैं चाहूंगा कि तुम सब ऐसे ही समुह में आगे बड़ो।
यहाँ तुम सब के पास समय और मौका है अपने व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिये। अपनी प्रतिभा को बढ़ाओ। हमें योग, प्राणायाम और ध्यान के साथ साथ अपनी प्रतिभा को बढ़ाना है। हम ये करेंगे।
...वाद-विवाद का अभ्यास, पत्रकारिता...कुछ टोलियों को Talk show का अयोजन करना चाहिये। जो लोग सार्वजनिक भाषण देना नहीं जानते, उन्हें यहाँ जन समूह के सामने बोलना चाहिए। जो अच्छे गायक नहीं हैं, उन्हें यहाँ माइक पर आकर गाना चाहिये। जो हम करना जानते हैं, वो तो करते ही रहते हैं। उसमें कोई मज़ा नहीं है। जो काम करना तुम नहीं जानते हो, उसकी शुरुवात करो। जिन्हें खाना बनाना नहीं आता, उन्हें खाना पकाने दो। पर तब उन्हें कुछ समस्या हो सकती है जो खाना खाना जानते हैं! इस तरह हमें जो कार्य करना नहीं आता है, उसके अभ्यास को चुनौती की तरह स्वीकार करना चाहिये।

तुम में से कितनों ने आश्रम में दाखिल होते ही एक ऊर्जा का अनुभव किया? तुम में से बहुत से लोग बहुत लंबी यात्रा कर के आये हैं। कई लोग ३-४ दिन की यात्रा कर के यहाँ पहुंचे हैं। तुम में से कितनों को ये अनूठा लगा कि किसी जगह अंदर आते ही उर्जा से भर गए तुम? तुम्हें पता है ऐसा क्यों हुआ?(गुरुजी, आप की वजह से!)

ऐसा इसलिये है क्योंकि यहाँ लोग ध्यान करते रहे हैं। ध्यान करने से समस्त वातावरण में उस ऊर्जा का स्पंदन होता है। ये ध्यान, ज्ञान और भक्ति का प्रभाव है। तो, हमें यहाँ की ऊर्जा को अच्छा बनाये रखना है, और ऐसा करने के लिये सुबह के कार्यक्रमों में भाग लेना मत भूलना। यहाँ कई तरह के योग होंगे - खेल कूद वाला योग, गांव की महिलाओं वाला योग, नृत्य वाला योग, जानवरों वाला योग, बाल योगा और ज्ञान योग। अपनी और वातावरण की उर्जा बनाए रखने के लिए बहस, चुगली और निंदा से दूर रहना। अगर मन में कोई परेशानी हो, तो उसे लिख कर botheration basket में डाल दो। अगर तुम्हारे कमरे में किसी के खर्राटों से तुम्हें परेशानी हो! ३-४ दिन तक खर्राटों वाले कमरे में रात बिताना मुश्किल हो सकता है! यां तो तुम ear plugs का इस्तेमाल करो, यां फिर हम सभी खर्राटे लेने वाले व्यक्तियों को एक ही कमरे में रखेंगे - और खर्राटों के सुरों की महफ़िल होगी! खर्राटे लेना बुरी बात नहीं है। खर्राटें लेने वाले व्यक्ति आत्मग्लानि ना करें। अगर कई लोग खर्राटे लेते हैं तो उन सब को इक्कठा कमरों में रखेंगे। हां, एक बात का ध्यान रखना होगा कि सभी एक समय पर सो जायें - तभी तो सुरों का संगम संभव है! (सब लोग हंसते हैं।)

यहाँ कोई मेहमान नहीं है। तुम सब मेज़बान हो, और तुम्हें वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, मेहमान जैसा बर्ताव नहीं। ये जगह तुम्हारी है। तुम्हें घर जैसा माहौल बनाना है। ऐसा माहौल यहाँ है ही, पर तुम्हें उसमें रमना है, उसे महसूस करना है। तो, यहाँ सब मेज़बान हैं, केवल मैं ही मेहमान हूँ!
इसे अपना घर समझो और पूर्ण विश्राम का अनुभव करो। वैसे भी तुम सब ये जानते ही हो, किसी को कहने की आवश्यकता नहीं है।
जो लोग कवितायें और लेख लिखना चाहते हैं, उन्हें यहाँ रहते हुये ये सब ज़रूर करना चाहिये। बाकी सब तुम्हारे लिए surprise है।


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"पूर्ण रूप से वर्तमान क्षण में रहकर भविष्य के लिए बेहतर दृष्टिकोण मिलता है"


प्रश्न : मैं अपने आप को भय से कैसे मुक्त कर सकता हूँ जो कि बहुत वर्ष पहले मेरे भीतर बैठ गए थे? मैं समझता हूँ कि वो बेबुनियादी हैं और केवल मेरे मन में ही हैं, पर फ़िर भी भय बार बार सामने आता है। वो मुझे बाँध के रखे हैं।

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान करो यां किसी मंत्रों का संगीत सुनो। यह सब सहायक होगा। ध्यान, प्राणायाम, क्रिया, कुछ व्यायाम, उज्जई श्वास भय से मुक्त होने में बहुत सहायक है। यह मत सोचो भय तुम्हारी गहराई में है। यह psychology की गलत धारणा है जिसके अनुसार भय और गलानि तुम्हारी गहराई में है। तुम्हारे भीतर गहराई में केवल खु:शी और आनंद है। और उस केन्द्र में कोई भय, लालच, वासना, क्रोध, यां गलानि तुम्हे छू नहीं सकता। तुम भीतर में अद्‍भुत हो। इसलिए यह मत सोचो कि तुम में यह सब गलत भावनाएं हैं। जो कहते हैं तुम्हारे भीतर गहराई में कुछ गलत है वो अंधे हैं। कोई भी बुरा गुण केवल बाहरी सतह पर है। अगर कोई उसे गहरा कहता है तो मैं कहूँगा और गहराई में जाओ। अपने केन्द्र की गहराई में तुम केवल आनंद स्वरूप हो। अपने भीतर गहराई में कुछ गलत है, ऐसा सोचना अज्ञानता की निशानी है। इस को सच जानते हो तो इससे मुक्त होना मुश्किल हो जाता है। यह भाव और स्थिर हो जाते हैं।

प्रश्न : मन को शांत कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मन को शांत करने की इच्छा ही बहुत तरह से कार्य करती है। सुदर्शन क्रिया और ध्यान इसमें बहुत सहायक हैं।

प्रश्न : ध्यान करने की कोई सीमा है?

श्री श्री रवि शंकर :
जितना चाहिए उतना ही करो। ज़रुरत से ज़्यादा करने की कोई आव्श्यकता नहीं है। ध्यान स्नान लेने जैसा है। तुम शरीर को स्वच्छ रखने के लिए सुबह स्नान करते हो। पर तुम सारा दिन स्नान नहीं करते रहते। मन को साफ़ और निर्मल करने के लिए ध्यान है। एक बार मन स्वछ हो जाने पर तुम प्रसन्न महसूस करते हो।

प्रश्न : ध्यान करते दौरान एकाग्रता कैसे बनाएं?

श्री श्री रवि शंकर :
एकाग्रता ध्यान नहीं है। ध्यान एकाग्रता का उलटा है। मन को ढीला छोड़ना ध्यान है। ध्यान से मन शांत हो जाता है, और तुम्हे सुखद अनुभूति होती है। पर रोज़ाना की जीवन शैली में हमें कई काम करने होते हैं, जैसे बिल का भुगतान...। इस दौरान भी हम मन को कैसे शांत रखें? तुम ध्यान करते हो और मन शांत होता है। फिर तुम अपने कार्य में लग जाते हो। उस दौरान भी मन को शांत रखना इतना आसान नहीं होता, पर निरंतर ध्यान के अभ्यास से तुम ऐसा कर सकते हो।

प्रश्न : गुरुजी, मन में चल रहे संघर्ष का क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम यह एहसास करते हो कि मन में इतना संघर्ष है तो तुम्हारी आँखे खुलती हैं। प्राणायाम और ध्यान से इससे मुक्ति मिल सकती है।

प्रश्न : मन को केन्द्रित रखकर और वर्तमान क्षण में रहते हुए हम भविष्य के लिए दृष्टि कैसे रख सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
भविष्य के लिए एक दृष्टि होना और वर्तमान क्षण में रहना एक दूसरे के विरोध में नहीं हैं। तुम दृष्टि रखते हुए भी वर्तमान क्षण में रह सकते हो। पूर्ण रूप से वर्तमान क्षण में रहकर भविष्य के लिए बेहतर दृष्टिकोण मिलता है।

प्रश्न : मृत्यु के भय से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान से।

प्रश्न : मैं अपने अहंकार के कारण गिरा हूँ। मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। अगर तुमने पहचाना कि तुम गिरे हो तो तुम उससे अधिक ऊपर उठोगे। तुमने जाना कि तुम में अहंकार है, यह बहुत है। इससे लड़ने का प्रयत्न मत करो। इसे जहाँ है वहीं रहने दो, और इससे छेड़ छाड़ मत करो।
अगर तुम्हे अहंकार नहीं पसन्द तो इसे मुझे दे दो। मगर मैं चाहूँगा तुम इसे अपने पास रखो। हमारा अहंकार को मिटाने की चेष्टा करना, एक और बड़ी समस्या बन जाती है। तुम्हारे पास पहले ही और समस्याएं हैं सुलझाने के लिए।


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"कोई काम आनंद की अभिव्यक्ति में करना या उस काम को आनंद की उम्मीद में करना - दोनों में अंतर है"


डार कोंसीटीच्युशन हॉल
वाशिंगटन डी सी,
अप्रैल २५,२०१०

'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में हम एक योजना को लागु करने के लिए इन्तजार नहीं करते| हम काम करना शुरू कर देतें हैं और जो भी आवश्यक होता है अपने आप आने लगता है| इसे सिद्धि या पूर्णता कहतें हैं - जब जो कुछ भी आवश्यक होगा, मिल जाएगा| प्राणायाम और ध्यान की फिर यहाँ भूमिका है| इस से आप ऐसे बन जाते हो कि कोई कमी ही महसूस नहीं होती| हमें वापिस इस अवस्था में आने की आवश्यकता है| वातानुकूलित कमरे और सब तरह के ठाट का क्या फायदा यदि इससे साथ अनिद्रा और मुधुमेह जैसे रोग हों? इसलिए हमें अपने आसपास सकरात्मक उर्जा पैदा करने की जरूरत है| ये चिंतित रहने यां सोचते रहने से नहीं हो सकता| मैं आपको कार्य करने के दो तरीके बताना चाहूँगा| एक तो यह कि आप कुछ करते हो क्योंकि आप को कुछ चाहिए होता है, आप उस कार्य की पूर्णता से खुशी की उम्मीद करते हो| दूसरा, आनंद की अभिव्यक्ति के साथ कुछ करना ,आप एक कार्य करते हो क्योंकि आपके पास कुछ है| आनंद की अभिव्यक्ति के साथ कुछ करना और आनंद पाने के लिए कुछ करना , दोनों में बहुत अंतर है| आज दुनिया में बहुत से लोग अवसाद से पीड़ित हैं| आंकड़े बतातें हैं कि आने वाले दशक में यह संख्या बढ़ कर ५० प्रतिशत हो जायेगी| दुनिया की आधी जनसंख्या - यह बहुत दुःख की बात है| हमें इसे बदलना होगा| psychiatric दवाएं लेना समाधान नहीं है| ध्यान और प्राणायाम से ही यह बदला जा सकता है|

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"बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है"

बैंगलोर आश्रम

तुम्हें प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये। तुम प्रतिदिन दांत मांजते हो। शरीर को स्वच्छ रखने के लिये नहाते हो। वैसे ही, प्रतिदिन थोड़ा ज्ञान सुनो और ध्यान करो। बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है। वो ज्ञान जो तुम्हें बोध कराता है कि यहां सब कुछ नाशवान है। संगीत और समरसता भावनाओं को शुद्ध बना कर हृदय को संपन्न बनाते हैं। कुछ देने से हृदय शुद्ध होता है। ज्ञान और ध्यान से सब शुद्ध हो जाता है।

प्रश्न : गुरुजी, किसी का देहांत होने पर ‘राम नाम सत्य है’ क्यों कहते हैं?

श्री श्री : किसी के देहांत पर तुम ये समझ जाते हो कि यही सत्य है। एक दिन हर किसी की मृत्यु होगी। जीवित रहते हुए तुम इस सत्य से अन्भिग्य रहते हो। तुम बेकार बातों में फंसे रहते हो।
सत्य को तुम टाल नहीं सकते। सौंदर्य का त्याग नहीं हो सकता। प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
ये तीन बातें ही याद रखने के लिये बहुत हैं। इन्हें पचाओ।

प्रश्न : यज्ञ के क्या क्या अंग होते हैं?

श्री श्री : किसी भी यज्ञ में ध्यान, दान, ज्ञान और गान होता है। गान दिमाग के दायें भाग को पुष्ट करता है। ज्ञान दिमाग के बायें भाग को पुष्ट करता है। ध्यान से दिमाग के दोनों भाग पुष्ट होते हैं। यज्ञ से हमारा विकास होता है।

प्रश्न : गुरुजी, अपना जीवनसाथी चुनते समय हमें उस में किन किन गुणों को परखना चाहिये?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुये) मुझे इस का अनुभव नहीं है! उन से पूछो जिन्हें अनुभव है। तुम यहाँ वैवाहिक विभाग से भी मदद ले सकते हो।
तुम्हें पता है ये क्यों कहते हैं कि ‘विवाह स्वर्ग में पूर्वनिश्चित किये जाते हैं’? क्योंकि, तुम्हारे लिये चुनाव हो चुका है। तुम्हें सिर्फ़ उसे लेना है और आगे बढ़ना है। तुम चुनाव की प्रक्रिया से मुक्त हो। जो तुम्हारी थाली में आये, उसे लो और आगे बढ़ो।
तुम्हें पता है, सबसे अच्छी बात होगी कि तुम अपने जीवनसाथी की कमियों पर ध्यान ना दो। किसी भी रिश्ते में अगर दोनों व्यक्तियों का ध्यान आध्यात्म पर होगा तो वे समांनांतर रेखाओं की तरह बिना किसी टकराव के अनंत तक साथ साथ आगे बढ़ पायेगें। जिस क्षण आध्यात्म से ध्यान हटा और एक दूसरे पर गया तो टकराव होंगे। आध्यात्म के पथ पर रहना बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न : गुरुजी, विशालाक्षी मण्डप का निर्माण कैसे हुआ?

श्री श्री : मनुजी (एक शिष्य) ने कहा, "गुरुजी, एक सभा कक्ष होना चाहिये जहां लोग ध्यान कर सकें।" तो मैनें एक चित्र बनाया और उसे बनाया गया। पहले कोई सभा कक्ष नहीं था। अष्टावक्र गीता की व्याख्या ऐसी जगह की गई थी, जहां बारिश का पानी भीतर आ जाता था।
जब हमने विशालाक्षी मण्डप का उद्घाटन किया, तो इतने लोग आये कि वो उसी वक्त छोटा पड़ गया! तुम्हें पता है, जब लोग एक साथ ध्यान करते हैं तो वो ऊर्जा विशव में प्रसारित होती है।

प्रश्न : गुरुजी, इस स्थान का रहस्य क्या है?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुए) रहस्य यहाँ है (अपने हृदय को इंगित करते हुए)।


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