भगवद गीता (Bhagwath Geeta) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भगवद गीता (Bhagwath Geeta) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सारी दुनिया एक ही चेतना,एक ही उर्जा और एक ही तत्व से बनी है !!!


२६ मई २०११, बैंगलुरू आश्रम 
जब भगवान श्री कृष्ण समाधी में बैढे तो उन्होंने भगवत गीता सुनाई | युद्ध के उपरांत अर्जुन ने उनसे कहां आपने जो मुझे सुन्दर उपदेश युद्ध के दौरान प्रदान किया मैं उसे भूल गया क्योंकि  युद्ध भूमि में बहुत भीड़  और झंझाल था और मैं आप को ठीक से सुन नहीं पाया | आपने जो वहां पर कहा था उसे फिर से सुनाये | भगवान श्री कृष्ण ने कहां मैं वह तुम को फिर से नहीं सुना सकता क्योंकि उस समय मैं समाधी में था, और मैने तुम्हे बिठाकर वह सब सुनाया जो कुछ मुझे ज्ञात हुआ और मैं वह फिर से नहीं सुना सकता | जो कुछ भगवान श्री कृष्ण ने कहां वह कोई व्यक्ति के रूप में नहीं बोल रहे थे, परन्तु वह सम्पूर्ण ज्ञान समष्टि के द्वारा बोला जा रहा था, और यह सारा उपदेश शिव तत्व और आत्म तत्व के द्वारा आया |

उन्होंने कहा मैं ही सूर्य,वर्षा,सत्य और असत्य हूं और सबकुछ मैं ही हूं | यह एक गहरी बात है |
सबकुछ एक ही तत्व और अणु से बना  हैं | आपके माता, पिता किस तत्व से बने है | सबका शरीर एक ही मिट्टी और उसी अनाज से बना है, अनाज ग्रहण करने से शरीर बनता है |  जो कोई भी उसे खाता है उससे वे और शरीर बनता है | सभी कोई एक तत्व,शक्ति और उर्जा से बना है | वे कह रहे हैं कि सारी दुनिया एक ही चेतना,एक ही उर्जा और एक ही तत्व से बनी है |

यदि आप पंखा, माइक और लाइट को देखेंगे वे सब एक ही विद्युत तरंग के कारण चल रहे हैं | परन्तु ऐसा प्रतीत होता हैं कि पंखा, माइक और लाइट अलग अलग है | वे अलग अलग प्रतीत होते हैं लेकिन वे सब एक ही चीज से बने है | उसी तरह यदि सूर्य नहीं होता तो पृथ्वी नहीं होती | यदि पृथ्वी नहीं होती तो पौधे,पेड़ और मानव भी नहीं होते ? तो हमारा स्रोत क्या है? भौतिक स्तर पर हमारा स्रोत पृथ्वी है; उसका और सूक्ष्म स्वरुप है सूर्य| फिर सूर्य का स्रोत क्या है ? वह समष्टि उर्जा ; और फिर भगवान श्री कृष्ण कहते है कि वह समष्टि उर्जा मैं हूं |

वह आत्मा आप है, मैं हूं और सबकुछ इसी समष्टि उर्जा से बना हुआ है और आज विज्ञानिक भी यही कहते है | जो लोग क्वांटम भौतिकी पढ़ते हैं वे कहते सारी सृष्टि एक ही उर्जा से बनी हुई है | पहले कहा जाता था कि अलग अलग अणु और परमाणु  होते है और उनसे सारे कृत्य होते है, लेकिन अब वे कहते हैं कि यह सब एक ही उर्जा से होता है और सबकुछ एक ही  तरंग का कृत्य है | जिसे हम वस्तु समझते है वास्त्व में वह वस्तु नहीं है, वह शक्ति और यह सब सिर्फ उर्जा है और यह बात कई वर्षों पहेले भगवान श्री कृष्ण ने भगवद गीता में कहीं |

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तानुमाश्रितम् परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम | ये लोग मुझे अनंत शक्ति न जानकार मनुष्य समझते है, मैं मनुष्य योनी  में तो हूं पर मुझमे जो चैतन्य है, वह परम चैतन्य है | लोग मुझे गलत समझते हैं, मैं कोई व्यक्ति नहीं, मैं शक्ति हूं |

प्रश्न: शुरुवात में जब हम कोई जप मंत्र लेते है तो वह अत्यंत विशेष लगता है | लेकिन कुछ समय उपरान्त वहीं भावना नहीं रहती| उसी भावना को कैसे बरक़रार रखा जाए और अपने मंत्र को कैसे प्रभावकारी बनाया जाए ?
श्री श्री रवि शंकर: कुछ भी बनाने का प्रयास न करे | जब भी उसे याद करे, यह मान कर चले कि वह अत्यंत पवित्र और विशेष है | जब आप गंगाजी के ठन्डे पानी में पहली बार डुबकी लगाते है, तो पानी ठंडा लगता है लेकिन जैसे ही आप पानी में उतर जाते हैं तो फिर पानी उतना ठंडी नहीं महसूस होता हैं क्योंकि शरीर ने उसे स्वीकार कर लिया है और पानी को फिर से ठंडा लगने के लिए आपको फिर से बहार आना होगा | आपको इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है, आपको जब भी कृतज्ञता लगे तो उसे विशेष समझे | कृतज्ञता तरंग या लहरों के रूप में आती है |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, इतने सारे मंत्र हैं, क्या आप कुछ विशेष मंत्र जैसे विष्णु सहस्त्रनाम,ललित सहस्त्रनाम और श्री विद्या मन्त्र के प्रभावों के बारे में बताएंगे ?
श्री श्री रवि शंकर: इतना अधिक विस्तार में ना जाए | विष्णु सहस्त्रनाम में कहा गया है “सोहऽमेकेन श्लोकेन स्तुत एव न संशय:” और एक शब्द सोऽहम् में  ही सब कुछ आ गया है | राम शब्द और सोऽहम् में विष्णु जी  के एक हज़ार नाम लिखे गए है कभी कभी आप विष्णु सहस्त्रनाम को सुन कर उस पर ध्यान कर सकते है सभी मन्त्रों के कुछ प्रभाव होते है पर ध्यान सबसे महत्पूर्ण है | मन्त्रों से परे जाना भी आवश्यक होता है, और सब कुछ से परे हो जाना मन को शांति प्रदान करता है |

प्रश्न : गुरुजी सारे मंत्र संस्कृत मेंमैं क्यों है? संस्कृत में  क्या विशेष है ?
श्री श्री रवि शंकर: संस्कृत की उत्पत्ति बाद में हुई, मंत्र पहले से ही थे | मन्त्रों के शब्द  पहले से ही थे बाद में  भाषायें उत्पन्न हुई | सिर्फ संस्कृत ही नहीं परन्तु यदि आप सभी भाषाओं के गहन में जायेंगे तो इन सभी  मंत्रो को पायेंगे  |

प्रश्न : गुरुजी मंत्र और यन्त्र में क्या सम्बन्ध है ? 
श्री श्री रवि शंकर: एक मंत्र  है और एक तंत्र है | मंत्र में शब्द और यन्त्र में चित्र होता है| मंत्र में ध्वनि और यन्त्र में आकार होता है|

प्रश्न : गुरुजी इतने सारे  मंत्र है यह कैसे मालूम होगा कि मेरे लिए कौन सा मंत्र उचित है ?
श्री श्री रवि शंकर: आप सहज समाधी ध्यान सीखें और आप के शिक्षक जो भी मंत्र देंगे वह आप के लिए उचित होगा|

प्रश्न : अच्छे  शिष्य  के क्या गुण है?
श्री श्री रवि शंकर: इसे आप अपना होम वर्क अभ्यास क्यों नहीं मान लेते? आप इन्हें  लिखें और मुझे बताएं | कल हम एक कागज लगा देगें  और उस पर हर कोई जा कर एक गुण लिखे | दो दिन आप इन सभी गुणों को लिखें यदि किसी ने कोई गुण को पहले से ही लिख रखा है तो उसे फिर से  पुनः  ना लिखें और कोई अन्य गुण लिखें | आपको को भी गुण लिखने का मन करे, उसे लिखे | जो लोग इस कार्यक्रम को इन्टरनेट पर देख रहे है वे भी अपने विचार भेजें कि आदर्श भक्त या शिष्य  के क्या गुण होना चाहिए|

प्रश्न : कौन सी प्राथना सबसे उत्तम है ? जिसमें तुरंत उत्तर देने के अलाबा भगवन के पास कोई विकल्प ना रह जाये ? वह प्राथना क्या है ?
श्री श्री रवि शंकर: शांति और मौन में  रहें और यह जान ले कि दिव्यता सब बात का ध्यान रख रही है वही सबसे उत्तम प्रार्थना है, ध्यान सबसे उत्तम प्राथना है |

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, क्या आप  भूत और प्रेत के बारे  में बता सकते है, क्या वे सही में होते हैं ? यदि वे आपको बहुत पसंद करने लगे तो उनसे कैसे छुटकारा पाया जाये?
श्री श्री रवि शंकर:  यह एक गंदे तालाब  में उतरने के बाद उसमें से निकलने का प्रयास करने जैसा है | जितना आप उसमें उतरेंगे उतना ही उसमें डूबेंगे | इसीलिए सबसे उतम यह होता है कि आप अपनी साधना करें और आप के आस पास के लोगों का ध्यान रखें कुछ सेवा कार्य करें , भजनो का गान करें उससे सब बातों का  ध्यान रखा जायेगा | अपना ध्यान भूत और प्रेतों के तरफ बिलकुल केंद्रित न करें |

प्रश्न :- प्रिय गुरु जी, मैं जानना चाहता हूं कि यदि मैं किसी को आशीर्वाद देता हूं तो क्या उनकी नकारात्मकता मुझ मैं आ जाती है, यदि हां तो उसका क्या समाधान है ?
श्री श्री रवि शंकर: नहीं! आप चिंता ना करें | सिर्फ जय गुरु देव कहें |

प्रश्न :गुरुजी, केंद्रीय मंत्री मंडल में कई अपराधी है , हम किस ओर  बढ़ रहे है, हमारा देश किस ओर बढ़  रहा है?
श्री श्री रवि शंकर: इसके लिए भारी परिवर्तन की आवश्यकता है और इन मंत्रियों को हटाने के लिए भारी  परिवर्तन की आवश्यकता है | हम सब को भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लेना चाहिए, सब कुछ और परिस्थितियां बदलेगी  |

प्रश्न : गुरुदेव एक समय इस देश में किसान धनी ओर संपन्न होते थे | वही किसान  जो सारे  देश का पेट भरते है, उनको खुद को खाली  पेट सोना पड़ता है , उनसे क्या गलती हुई और हम इसमें कैसे सुधार ला सकते है ?
श्री श्री रवि शंकर: वह मंत्री जो किसानो का शोषण कर रहा है उसे कुछ सदबुद्धि आनी चाहिए या उसे उस पद से हटा देना चाहिए |मैं भी इसी विषय पर विचार कर रहा था | जब से इस मंत्री ने अपने इस पद को संभाला है, उसने कुछ भी अच्छा कार्य नहीं किया जिससे आकाल और अनाज की कमी उत्पन्न हुई और यह आकाल प्रकृति की वजह से नहीं पड़ा |  या तो उसके पास दिल या दिमाग नहीं है या फिर तो दोनों ही नहीं है | या तो कुछ गढ़बढ़ है | कुछ भी हो जाये उन्हें कुछ भी चिंता ही  नहीं होती, उन्हें तो सिर्फ धन से मतलब होता है |इन्होने लाखों करोडो रूपये विदेश भेजा है ओर आतंकवादियों से संपर्क बनाये है | और  उन्होंने  इस देश को लूटा है |यह बहुत आवश्यक है कि इसके खिलाफ हम अपनी आवाज उठायें |

प्रश्न : गुरुजी, मैंने  दसवी कक्षा उत्तीर्ण कर ली है और दसवी कक्षा उत्तीर्ण कर लेने के वाद मैंने बारहवी कक्षा भी उत्तीर्ण कर ली है | इस दुनियां में अपनी बुद्धि को सिद्ध करने के लिए मुझे कितने बार उत्तीर्ण होना होगा ?
श्री श्री रवि शंकर: जिनके पास कुछ नहीं होता है उन्हें लगता है दूसरों के पास भी कुछ नहीं है | यहां तक मुझे भी अपने आप को बार बार सिद्ध करना पड़ता है, इसीलिए आप अपने आपको कुछ और समय तक सिद्ध करते रहें | अपनी परीक्षा को क्रीड़ा के जैसे समझे फिर उसकी चिंता आपको नहीं सताएगी | आप को अपने परीक्षा में  अच्छे से अध्ययन करके अच्छे से उत्तीर्ण करनी चाहिए | सीढ़ी टेढ़ी हो तो आप क्या करते है? आपको भी थोडा अपने आपको झुका कर उस पर कैसे भी चढना पड़ता है | यदि आपने चढ़ते समय सीढ़ी को सीधा करने का प्रयत्न किया तो फिर आप उसमें फंस सकते है | सीढ़ी यदि टेढ़ी हो  तो रेलिंग का सहारा लेकर उस पर चढें और एक बार आप जब आगे बढ़ जाते है तो सीढ़ी को ठीक करने के बारे में विचार कर सकते हैं|

प्रश्न :- गुरुजी कौनसी इच्छाओ को भगवान के समक्ष समर्पित कर देना चाहिए और कौनसी इच्छाओं को स्वयं के प्रयासों के द्वारा पूरा किया जा सकता है ? इसे कैसे समझें ?
श्री श्री रवि शंकर: प्रयास और समर्पण एक साथ चलते है, इसीलिए आप प्रयास करें और उसे समर्पित कर दीजिए | हम संकल्प  लेकर  उसे छोड़ देते हैं | पूजा में हम क्या करते है ? हम चावल, पानी ओर फूल को अपने हाथ में लेकर संकल्प लेते है और उसे छोड़ देते है | हम फूल को अपने हाथ में  पकड़ कर नहीं रखते | जब आप सिनेमा देखने जाते है तो आप पहले टिकिट खरीदते है और जब आप  सिनेमा घर में प्रवेश कर रहे होते हैं तो वह टिकिट आपको वापस कर देना पड़ता है | ३० -४० वर्ष पूर्व निश्चित ही टिकिट वापस देनी पड़ती थी |अभी भी आप को उसे वापस देना पड़ता है | इसीलिए संकल्प और समर्पण को हमें इस तरह से देखना चाहिए | आप अपना १०० प्रतिशत दीजिये और फिर उसे भगवान की इच्छा मान लीजिए |

प्रश्न : नैतिक मूल्यों के बारे में आध्यात्मिक गुरुओं की क्या भूमिका होती है ?
श्री श्री रवि शंकर: उनकी पूरी भूमिका होना चाहिए | सिर्फ दूसरों को मूल्यों के बारे में बताना पर्याप्त नहीं है | परन्तु यह बताना कि इन मूल्यों को आपको अपने जीवन में कैसे उतरना चाहिए, यह भी सिखाना भी आवश्यक है |  इन मूल्यों के साथ कैसे जीना इसे भी समझदारी के साथ बताना चाहिए | यदि कोई फिसल जाये तो फिर समझदारी  से उन्हें आगे बढ़ने के लिए  प्रोत्साहित करना चाहिए | यही इसका कौशल है |

The Art of living
© The Art of Living Foundation

"स्वतंत्रता चाहना एक प्राकृतिक घटना है"


प्रश्न : गीता में भगवान श्री कृष्ण ने उस व्यक्ति को अपने अधिक निकट बताया है जो उन्हे याद करता है और उनकी सेवा करता है। दूसरी तरफ़ हम कहते हैं कि भगवान सबको एक दृष्टि से देखता है। कृप्या इस बारे में बताएं।

श्री श्री रवि शंकर :
१२वें अध्याय में श्री कृष्ण ने बहुत तरह के लोगों को अपने अधिक निकट बताया है। जिसके मन में किसी के लिए नफ़रत नहीं है, जो सबके लिए करुणा और मैत्री भाव रखता है, जिसमें किसी के लिए अत्याधिक मोह नहीं है, जो हर तरह की परिस्थिति में संतुलित भाव बनाए रखता है - इन सबको अपने निकट बताया है। तुम भी तो अपनी पसन्द व्यक्त करते हो। किसी चीज़ं को पसन्द करने से अन्य चीज़ें नापसन्द नहीं हो जाती।
श्री कृष्ण ऐसा भ्रम पैदा करने के लिए भी कहते हैं। जब अर्जुन का मन पूर्ण रूप से विचलित हो गया तो उसके दिल से एक निश्चित बात सुनने की प्राथना जगी। तब श्री कृष्ण कहते हैं - "सब एक ही है। चाहे मैं अलग अलग बात कहता हूँ पर सब एक ही है।"

प्रश्न : हम समाज को सेवा के लिए एक साथ कैसे ला सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम सेवा करते रहो। अन्य लोग अपने आप जुड़ जाएंगे। तुम उन्हे प्रेरित कर सकते हो। अगर तुम सेवा में आनंद ले रहे हो तो अन्य लोग स्वयं ही प्रेरित हो जाएंगे। लीडर को ऐसा ही होना चाहिए।

प्रश्न : तपस्या क्या है?

श्री श्री रवि शंकर:
तपस्या वह है जो हो सकता है तुम्हे पसन्द न हो पर तुम्हारे लिए हितकारी हो।

प्रश्न : प्रार्थना का अर्थ क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
प्रार्थना का अर्थ है दिल की गहराई से उठी मांग। जब बच्चे रो कर अपनी माँ को पुकारते है, वही प्रार्थना है। दूसरा, जब हम कोई भी कार्य पूरे दिल से करते हैं तो वो प्रार्थना है।

प्रश्न:सामाजिक जीवन और आध्यात्मिकता में संतुलन कैसे लाएँ?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम चलना जानते हो तो तुम संतुलन बनाना समझते हो। तुम दोनो कदम ज़मीन पर एकसाथ नहीं रखते और ना ही तुम दोनो कदम ज़मीन से एकसाथ उठाते हो।
अगर तुम सब काम छोड़कर केवल ध्यान ही करने लगोगे तो ध्यान होगा ही नहीं। अगर तुम केवल सामाजिक कामों में ही लगे रहोगे तो भीतर से अपने आप ही ध्यान की तड़प उठेगी। अपने दिल की सुनो। इसका झुकाव दोनो तरफ़ ही है। एक संतुलन से दोनो ही करना है।

प्रश्न : क्या मनुष्य जीवन एक ही बार मिलता है? क्या हम सब योनियों से होकर मनुष्य बने हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम इस जन्म में मनुष्य रूप में पैदा हुए हो - इसके प्रति सजगता ज़्यादा महत्वपूर्ण है। तुम भी यहीं हो और मैं भी। अपनी यात्रा इसी जीवन में पूरी करने का प्रयास करते रहना चाहिए।

प्रश्न : नियम और कानून का उल्लंघन करने वालों का किस हद तक विरोध करना चाहिए? अगर विरोध के बावजूद भी फल हमारे हित में ना हो तो क्या करना चाहिए? केवल भय के कारण हम चुप है। कृप्या मार्ग दर्शन करें।

श्री श्री रवि शंकर :
संघे शक्ति कलयुगे - कलयुग में संघ की ही शक्ति है। हमें समुह में कार्य करने की आवश्यक्ता है। जो भी तुम्हे गलत लगता है उसके विरोध में आवाज़ उठाओ। लोगों को उसके बारे में जागरूक करो। आज भी समाज में बहुत अच्छे लोग हैं। सबको इसमे शामिल करो।

प्रश्न : गुरु तत्व क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुमने यह सवाल पूछा क्योंकि तुम कुछ जानना चाहते हैं। कुछ जानने के लिए प्यास शिष्यत्व है। जो तुम्हे उत्तर देता है वो गुरु है। और वो स्रोत जिसमे जीवन का हर उत्तर निहित है, गुरु तत्व है। हमें उत्तर क्यों चाहिए? ताकिं हम पूर्ण महसूस करें। ज्ञान हमें पूर्ण करता है। जिस तत्व की उपस्थिति में जीवन में कोइ कमी नहीं रहती, वो गुरु तत्व है।

प्रश्न : हमारे शरीर में उर्जा के कौन कौन से केन्द्र हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
शरीर का हर कण उर्जा का स्रोत है। पूरी चेतना उर्जा की एक अभिव्यक्ति है।

प्रश्न : क्या अंतर्ज्ञान(intuition) गलत हो सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
तो वो अंतर्ज्ञान नहीं है।

प्रश्न : सदगुरु को कैसे पहचाने? जो कोई भी किसी गुरु से जुड़ता है उसे अपना गुरु ही सच्चा लगता है। मगर कई बार इस विश्वास का गलत फ़ायदा उठाया जाता है। मुझ इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन लगता है।

श्री श्री रवि शंकर :
दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं जो मित्रता में विश्वासघात करते हैं। पर इस भय से तुम मित्र बनाना तो नहीं छोड़ देते।
कई डाक्टर शरीर के अंगों की चोरी करते हैं पर इस भय से तुम उनके पास जाना तो नहीं छोड़ते। किसी रेल दुर्घटना के बाद रेल से सफ़र करना तो नहीं छोड़ते। इसलिए इतना डरने की आवश्यकता नहीं है। अपने हृदय की सुनो। अगर तुम्हारा विश्वास सच्चा है तो गुरु का कुछ गलत करना भी तुम्हे नुकसान नहीं पहुँचाता। अगर कोई गुरु गलत करता है तो उसे इसका दुष्परिणाम भी झेलना होगा। तुम्हारा हृदय तुम्हे सही रास्ता बताएगा।

प्रश्न : क्या गुरु पर अंधविश्वास होना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
विश्वास कभी अंधा नही होता। जब विश्वास टूटता है तो लगता है कि वो अंधविश्वास था। जब ऐसा हो तो अपने में विश्वास लाने का यत्न मत करो। विश्वास अपने आप ही होता है। मैं तो कहूँगा तुम जितना चाहो संशय करो। फिर भी जो ठहर जाए वही सच्चा विश्वास है। मेरा काम तुम्हे विश्वास दिलाना नहीं है, पर तुम्हे संशय मे डालना है। तुम्हारा काम है कि तुम उसमे से बाहर आओ।

प्रश्न : मुझसे गुस्सा नियंत्रण नहीं होता। पर आपको देखने के बाद गुस्सा एकदम चला जाता है। मुझे गुस्सा नियंत्रित करने के लिए क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हारे कहने का मतलब है कि मुझे देखकर तुम्हारा गुस्सा खत्म हो जाता है। तो ठीक है तुम मुझे देख सकती हो।

प्रश्न : पथ पर आने वाली बाधाओं से कैसे निपटा जा सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
उन्हें बाधा की तरह मत लो।

प्रश्न : गुरुजी,मुझे मेरी पत्नी का यहाँ आने से रोकना पसन्द नहीं। मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
उसका ऐसा करने का कारण उसका भय हो सकता है कि तुम कहीं सब छोड़ कर साधु ना बन जाओ। ऐसे में उसे विश्वास दिलाओ कि गुरुजी तुम्हें ऐसा करने ही नहीं देंगे।

प्रश्न : मेरा परिवार आध्यात्मिक मार्ग में कब आएगा?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम चिन्ता मत करो। धीरे धीरे सब इस मार्ग पर आएंगे।

प्रश्न : हम कैसे जान सकते हैं कि जो ज्ञान हमे आप से मिलता है, उसे हम उसी रूप में आगे बाँटते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
इसीलिए teacher प्रशिक्षण (training) है। इससे गुज़रने की बाद तुम यह ज्ञान उसी शुद्द रूप में बाँट सकते हो।

प्रश्न : भगवान का कया मतलब है?

श्री श्री रवि शंकर :
जिसमे भूमि की तरह सहनशीलता, पानी की तरह तरलता, अग्नि की तरह तीक्षणता, हवा की तरह सूक्ष्मता हो, और जो आकाश की तरह सर्वव्यापी है।

प्रश्न : भगवान तक पहुँचने का सर्वश्रेषठ मार्ग कौन सा है - भक्ति का मार्ग, यां ज्ञान का मार्ग?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम किसी को जाने बिना उसे पसन्द नहीं कर सकते। अहर तुम्हे गुलाब जामुन पसन्द है,तो उसके बारे में जानना ज्ञान योग है। उसे खरीद कर खाना कर्म योग है, और उसे पसन्द करना भक्ति योग है। भक्ति मतलब पसन्द करना। जब तुम किसी चीज़ को पसन्द करते हो तो उसके बारे में जानने की इच्छा स्वाभाविक ही उठती है। तीनो एकसाथ चलते हैं।

प्रश्न : हम मुक्ति क्यों चाहते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मुक्ति चाहना स्वाभाविक ही है। परीक्षा खत्म होने के बाद तुम जो अनुभव करते हो, वो मोक्ष का एक छोटा सा अनुभव है। जीवन में भी तुम आशा और इच्छाओं से जलते रहते हो। यह अब इच्छाएं तुम्हे कष्ट ही देती हैं। जब तुम इससे बाहर निकल कर विश्राम
करते हो, तुम मुक्त महसूस करते हो। ’मुझे कुछ नहीं चाहिए’, मैं कुछ नहीं हूँ, और ’ मुझे अभी के लिए कुछ नहीं करना’ - जब तुम इस भाव से ध्यान में बैठते हो, तुम मुक्ति अनुभव करते हो।


art of living TV

© The Art of Living Foundation
For Global Spirituality

"आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है"

बैंगलोर आश्रम, २ सितंबर २००९

श्री श्री ने आज कहा -

प्रश्न : मैं अपने प्रदेश में एक सम्मानित, प्रतिष्ठित और जाना माना, उच्च पदाधिकारी हूं। जब मैं किसी अन्य जगह जाता हूं तो कभी कभी मुझे लगता है कि वहां मेरा महत्व कुछ कम है। मैं अपनी identity पर प्रश्न चिह्न लगा लेता हूं। इससे छुटकारा कैसे पाऊं?

श्री श्री :
तुम्हें पता है, तुम्हें एक सूट पहनना आना चाहिये – और उसे उतारना भी! अपने घर में सब राजा होते हैं। अकिंचन रहना सीखो – मैं कुछ नहीं हूँ। जीवन की पूरी यात्रा है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर ‘मैं ही सब हूँ।’ आमतौर पर जीवनयात्रा होती है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर, ‘मैं कुछ हूँ’!

सत्संग में बैठो। अपने वजूद को घुल जाने दो। अपने वजूद को घुलकर जाने देना, समाधि है, आनंद है। तुम जान जाओगे कि तुम अमर हो।

प्रश्न : Art of Living संस्था के लिये आपका क्या vision है?

श्री श्री :
आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है। तुम अपना vision खुद बनाओ। मैं कहूंगा कि तुम दृष्टा बन जाओ, अपने दृश्य खुद बनाओ। परमात्मा तुम्हें नींद देंगे, स्वप्न तुम खुद बनाओ।

प्रश्न : अगर १ से १०० तक की rating करें और एक पत्थर का स्तर शून्य है और मनुष्य का १००, तो बीच के बाकी जीवों का क्या स्तर तय करेंगे?

श्री श्री :
Rating की क्या आवश्यकता है? सब कुछ उस एक का है। उसका ही अंग है। उस एक ने ही ये सभी अनंत रूप लिये हैं। शून्य और १००, सभी में वही है। एक पत्थर में भी जड़ता और चैतन्य होगी। ब्रह्म में जड़ और चैतन्य दोनों का ही समन्वय है। वे ब्रह्म का अंग हैं।

भगवान श्री कृष्ण, भगवद्गीता में कहते हैं, ‘माया भी मुझ से ही है। समस्त विश्व मुझ में ही है। फिर भी मैं किसी में नहीं हूं।’ भगवद्गीता की philosophy भ्रामक लग सकती है। बिना सत्य के अनुभव के philosophy केवल कुछ सिद्धांत मात्र हैं। अपने आप का सत्य अनुभव करने के लिये तुम अपने भीतर, गहरे उतर जाओ।

प्रश्न : मैं अपनी नकरात्मक भावनाओं से ज्ञान के द्वारा कैसे छुटकारा पा सकता हूं? अगर मैं उन्हें हटाने के लिये प्रतिबद्ध हो जाऊं तो वे मेरा विरोध करेंगे। अगर मैं उनका विरोध ना करूं, तो वे यथावत रहेंगे।

श्री श्री :
नकरात्मक भावनाओं के साथ लड़ो मत, और उनसे मित्रता भी मत करो। युक्ति से, सांस से, सही दृष्टिकोण से, सभी नकरात्मकता से छुटकारा हो सकता है। अष्टावक्र गीता में कहा गया है, ‘सही तरीके से मन के ऊपर जाओ।’

प्रश्न : शिव जी के परिवार में हरेक का वाहन, जीव जगत में आपस में दुश्मन है। एक बैल है, चूहा है, मोर इत्यादि है – फिर भी वे आपस में शांते से रहते है! ऐसा कैसे?

श्री श्री :
शिव का शांत, अद्वैत तत्व, हरेक को संग लाता है, और सद्भावना लाता है।

प्रश्न : जिज्ञासा का सार तत्व क्या है?

श्री श्री :
तुम्हारा प्रश्न ही जिज्ञासा के सार तत्व का उदाहरण है। जो तुम पूछ रहे हो, वही इसका उत्तर है। ये तो ऐसा ही है जैसे कोई पूछे कि ध्वनि क्या है?


art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality