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"प्रेम की मांग करने से प्रेम मर जाता है"

१४ अगस्त, २०१०, पेनांग, मलेशिया

प्रश्न : मैं इस साल की शुरुवात से ही आर्ट आफ़ लिविंग के साथ जुड़ी हूं, और मेरे स्वास्थ्य में इससे बहुत सुधार आया है। मैं इन प्रक्रियाओं को करने के बाद बहुत अच्छा महसूस करती हूं। मुझे पांच साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, पर मैंने पूरी तरह से अपना इलाज कर लिया है।

श्री श्री रवि शंकर
: तुम्हें पता है कि शोध ये मालूम हुआ है कि हमारे शरीर में ३०० जीन्ज़ हैं जो कि हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह इत्यादि के लिये ज़िम्मेदार होते हैं। जब हम सुदर्शन क्रिया और प्राणायाम करते हैं तो इन जीन्ज़ को बीमारियों पैदा करने से रोका जाता है। वैज्ञानिक लोग शोध से इस निष्कर्ष पर आये हैं। यहां आने से पहले मैंने एक लेख देखा जिसे किसी ने मुझे भेजा था – न्यू यार्क के एक अस्पताल में ॐ का उच्चारण करने की सलाह दी जाती है। हृदय रोग के इलाज से पहले वे आपसे ॐ का उच्चारण करवाते हैं, ध्यान और विश्राम करवाते हैं।


प्रश्न : ग्लोबल वार्मिंग एक बहुत ही गंभीर समस्या हो गई है। सभी जगह प्राकृतिक आपदायें हो रही हैं। इस ग्रह के निवासी होने के कारण हमें क्या करना चाहिये? लोगों को त्रासदियों से परेशान देखकर मुझे दुख होता है। मैं क्या योगदान कर सकता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
हमें जागरूकता बढ़ानी है। आर्ट आफ़ लिविंग के साथ जुड़ जाओ। हम हर रोज़ कहीं ना कहीं पेड़ लगाते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की रोकथाम के लिये और अधिक लोगों को शाकाहारी बनने की आवश्यकता है। कहते हैं कि अगर विश्व की १०% जनसंख्या भी शाकाहारी हो जाये तो ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पूरी तरह हल हो जायेगी। जानवरों के कत्लख़ानों से उपजी मीथेन गैस ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में एक अहम्‍ भूमिका निभाती है। एक पाउंड मांस के उत्पादन में जितना धन आउर ऊर्जा खर्च होती है, उतने में तो ४०० लोगों को शाकाहारी भोजन खिलाया जा सकता है! तो, अधिक लोगों को शाकाहारी बन जाना चाहिये, इससे पर्यावरण में सुधार आयेगा।

प्रश्न : रिश्तों को स्वस्थ रखने का क्या उपाय है?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे इस क्षेत्र का अनुभव नहीं है! (हंसी) फिर भी मैं कुछ सलाह दे सकता हूं।

पहली सलाह है महिलाओं के लिये – कभी भी अपने आदमी के अहं को ठेस मत पहुंचाना। हमेशा उसका उत्साह बढ़ाओ, अहं को सहारा दो। चाहे पूरी दुनिया उसे नाकारा कहे, तुम ऐसा मत कहना! तुम उससे कहना कि उसके पास विश्व का श्रेष्ठतम दिमाग है – वो उसका प्रयोग नहीं करता है इसका मतलब ये नहीं है कि उसके पास वो दिमाग नहीं है! तुम्हें हमेशा कहना चाहिये कि वो सर्वश्रेष्ठ आदमी है। हमेशा उसके अहं का पोषण करो। अगर तुम उसे नाकारा कहोगी तो वो सचमुच ऐसा ही हो जायेगा।

अब एक सलाह है पुरुषों के लिये – कभी भी स्त्री की भावनाओं को ठेस मत पंहुचाना। हां, वो कभी कभी अपने घरवालोंके बार में शिकायत कर सकती है, अपने भाई के बारे में, अपने पिता या मां के बारे में, पर तुम कभी उसकी बात से सहमति मत जताना। अगर तुमने उसकी बात से सहमति जताई तो वह पलट कर तुम्हें ही बुरा भला कहेगी। कभी भी उसके परिवार की बेइज़्ज़ती मत करना। उसे कभी भी ख़रीददारी करने से या किसी आध्यात्मिक कार्यक्रम में जाने से मत रोकना। अगर वो ख़रीददारी करने जाना चाहे तो उसे अपना क्रेडिट कार्ड दे देना।

अब एक सलाह, दोनों के लिये – कभी भी एक दूसरे से प्रेम का प्रमाण मत मांगना। ये मत पूछना, ‘क्या तुम मुझे सचमुच प्रेम करते हो? तुम मुझे पहले जैसा प्रेम नहीं करते।’ अपने प्रेम को प्रमाणित करना बहुत बोझिल कार्य है। अगर कोई तुम से कहे कि अपने प्रेम को प्रमाणित करो तो तुम कहोगे, ‘हे भगवान! मैं इस व्यक्ति को कैसे बताऊं?’ हर काम कुछ ख़ास अदाज़ में और मुस्कुराते हुये करो।

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"शांति और अहिंसा की आवाज़ ऊँची और स्पष्ट होनी चाहिए"

हांगकांग, ५ जुलाई

आप जो भी देते हैं, वो आपके पास वापिस आता है। कुदरत ऐसी ही है। हम जो दुनिया को देते हैं, वही हमारे पास वापिस आता है।

क्या आप मुझे सुन सकते हैं? (बहुत ही धीमे स्वर में)
हमारी बोली में भी इतना ही प्रभाव होता है, और हमारी आवाज़ अनसुनी रह जाती है। धर्म, शांति और अहिंसा की आवाज़ ऊँची और स्पष्ट होनी चाहिए। तनाव का मुख्य कारण होता है जब हम समझते हैं कि हमे दूसरे ठीक से नहीं समझ रहे हैं। हम सोचते हैं हमें हमारे घर के सदस्य, पति-पत्नि, भाई, बहन, माँ-बाप, यां रिश्तेदार ठीक से नहीं समझ रहे हैं। इस वार्तालाभ की मुश्किल के कारण भावानात्मक तूफान उठता रहता है। बच्चों की शिकायत होती है कि माँ-बाप उन्हे नहीं समझते और माँ-बाप की शिकायत रहती है कि बच्चे उन्हे नहीं समझते। कितने माँ-बाप का यह अनुभव है?

हम सभी को कहीं न कहीं वार्तालाभ में मुश्किल अनुभव होती ही है। कितने लोग इससे सहमत हैं? पति-पत्नि को हाथ उठाने की ज़रुरत नहीं है, मैं नहीं चाहता कि उनके घर पर कोई तूफान आए! यह एक बहुत आम समस्या है कि हम सोचते हैं लोग हमे गलत समझ रहे हैं। पर दूसरों पर इलज़ाम लगाने की बजाए हमें अपने को बेहतर ढंग से अभिव्यक्त करने की आवश्यकता है। यह ऐसा है जैसे अगर मैं आपसे स्वाहिली में बात करूं तो आप समझ नहीं पाएंगे। एक ऐसी भाषा भी है जो सभी समझते हैं, पेड़-पौधे और जानवर भी, और वो भाषा है हृदय की भाषा। उसके लिए आपको शब्दों की ज़रुरत नहीं है, आपका अस्तित्व ही काफी है। अगर आपके पास कोई पिल्ला यां कुत्ता है तो उसको आपके प्रति प्रेम अभिव्यक्त करने के लिए शब्दों की ज़रुरत नहीं पड़ती, केवल उसकी मौजूदगी यां हाव भाव से ही प्रेम झलकता है।
हम इस प्रेम और मासुमियत के साथ ही पैदा हुए थे पर कहीं हमने वो खो दिया है। आप जितने अच्छे हैं, समाज आपको उससे अधिक अच्छा मानता है। अगर आपमें १०० प्रतिशत अच्छाई है तो समाज आपको २०० प्रतिशत अच्छा मानता है। दुनिया आपका सम्मान करती है। आप दुनिया का सम्मान करते हैं तो वही आपके पास वापिस आता है। जीवन में आपकी परिस्तिथि आपके मन में चल रहे भावों का प्रतिबिंब है। मैंने ५४ सालों में कभी किसी के लिए बुरे शब्दों का प्रयोग नहीं किया, कभी किसी को अपमानित भी नहीं किया।

आध्यात्म के सूत्र

१. अपने आप पर इलज़ाम मत दो-अपने आपको यां दूसरों पर इलज़ाम मत दो। ’मैं अच्छा/अच्छी नहीं हूँ, मुझ में यह अवगुण है’ - अगर आप ऐसा करते हैं तो आप कभी आध्यात्मिक नहीं हो सकते। जीवन में अच्छी और बुरी दोनो चीज़ें होती हैं। अगर आप अपने पर ही इलज़ाम देते रहते हैं तो आपकी मुस्कान और आत्म-विश्वास चला जाता है। आप में क्रोध और चिढ़ चिढ़ा पन आ जाता है जो आगे चल कर हिंसा का रूप ले लेता है। हिंसा से मन में आत्म हत्या के विचार आते हैं।

२. दूसरों पर इल्ज़ाम मत दो - हर कोई केवल एक डाकिया है जो आपकी चिट्ठी यां पार्सल आप तक पहुँचाता है। अगर आपने मिर्ची का ऑडर दिया और मिठाई की अपेक्षा कर रहे हैं तो यह देने वाले की गलती नहीं है। यदि आप किसी को उनकी गलती बताना चाहते हैं तो क्रोध से नहीं बल्कि करुणा से बताओ। एक दृढ़ता के साथ मुस्कान और करुणा से गलती बताओ।

३. पूरा विश्व आपका परिवार है और आपका कोई दुश्मन नहीं है - यह आध्यात्म का तीसरा सूत्र है। अगर आप सारे विश्व को अपने परिवार के रूप में नहीं स्वीकार कर सकते तो शुरुआत इससे करो - ’मेरा कोई दुश्मन नहीं है’। ऐसा करते ही जीवन में ऐसी शांति का उदय होगा जिसे आपसे कोई नहीं ले सकता।

प्रश्न : पति-पत्नि के रिश्ते की कामयाबी के लिए क्या ज़रुरी है?

श्री श्री रवि शंकर : मैं महिलाओं और पुरुषों को एक सुझाव देना चाहूंगा, और एक सुझाव दोनो के लिए:

महिलाओं के लिए : अपने पति के अहम को कभी ठेस मत पहुँचाओ। आपको उनके अहम को हमेशा बढ़ावा देना चाहिए। चाहे सारा संसार ही आपके पति के बारे में कुछ भी कहे पर आपको कभी अपने पति को नीचा नहीं दिखाना चाहिए। अगर आपका व्यवहार उन्हे यह दर्शाएगा कि वो किसी काम के नहीं हैं तो वो वैसे ही बन जाएंगे। पुरुष अभिव्यक्त करने में इतने अच्छे नहीं होते, इसलिए महिलाओं को उनसे तारीफ सुनने की अपेक्षा करने की बज़ाए उनकी तारीफ करनी चाहिए।

पुरुषों के लिए : अपनी पत्नि की भावनाओं को कभी ठेस मत पहुँचाओ। वो अपने परिवार के बारे में कभी कुछ भला बुरा कह सकती है पर आप कभी इस विषय में उनका पक्ष मत लेना। अगर आप भी इसमें शामिल हो जाते हैं तो आप पर ही मुश्किल आ जाएगी। अगर वो खरीदारी यां आध्यात्मिक सभा में जाना चाहे तो उसे मत रोको। अगर वो कहीं खरीदारी पर जाना चाहे तो आप उसे अपना क्रेडिट कार्ड दे दो।

दोनों के लिए एक सुझाव : एक दूसरे से अपने प्रति प्रेम का प्रमाण मत मांगो। कभी एक दूसरे से ऐसे प्रश्न मत पूछो, "क्या तुम मुझे सच में प्रेम करते/करती हो? तुम अब पहले जैसा प्रेम नहीं करते/करती?" किसी को अपने प्रेम का प्रमाण देना सिर पर पड़े भारी बोझ के समान है।

शेष अंश अगली पोस्ट में..


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"हमे बच्चों से सीखना भी है और उन्हे सीखाना भी है"

बैंगलोर आश्रम, भारत

श्री श्री द्वारा माता-पिता के साथ वार्ता के अंश

मेरे लिए बच्चों के पालन पोषण की बात करना कठिन है। मुझे इसका कोई अनुभव नहीं है। पर मैं अपने निरीक्षण के अनुसार सुझाव दे सकता हूँ। आप अपने अनुभव से देखें, अगर आप बहुत व्यवस्थित हैं तो बच्चें आपको अराजक बना देते हैं। आपकी सीमाओं को तोड़ने के लिए बच्चे सबसे श्रेष्ठ हैं। मुझे याद है मेरे एक अंकल मुझे और मेरी बहिन को बहुत अनुशासित करते थे। पर जब उनका पुत्र हुआ तो उनके पुत्र ने उनकी सभी सीमाओं को तोड़ दिया। तो आपके बच्चे आपको बहुत कुछ ऐसा सिखा सकते हैं जो शायद अन्य नहीं सिखा सकते। पहली चीज़ जिसपर हमें ध्यान देने की ज़रुरत है कि हम यह देखे बच्चे की क्या प्रवृतियाँ हैं और वो कौन सी दिशा ले रहा है। यह दोनो तरफ की यात्रा है। आप उनसे क्या सीखना चाहते हैं और आप उन्हे क्या सिखाना चाहते हैं? उन्हें अपनी दृष्टि के हिसाब से ढालने की कोशिश मत करो पर आप अपने दृष्टि उनके साथ सांझी करें। अगर वो किसी गलत दिशा में जा रहें हो तो आप बिना अशांत हुए उन्हे समझाएं।हर बच्चा कुछ मूल प्रवृत्तियाँ लेकर इस धरती पर आया है जिन्हे आप बदल नहीं सकते। और वह कुछ ऐसी चीज़ें ग्रहण करता है जिन्हे नियंत्रित किया जा सकता है।
हमे संवेदनशील होने की आवश्यकता है। अगर हम उन्हे झूठ ना बोलने को कहते हैं और घर पर होते हुए आप उन्हे किसी से कहने को कहते हैं कि आप घर पर नहीं हैं, तो आप का उन्हे समझाना पूर्णता व्यर्थ है। बच्चों के सामने विवाद यां झगड़ा करना उनके मन पर और गलत असर डालता है। अगर आप अपने पति/पत्नि के साथ कोई विवाद यां झगड़ा करना चाहते ही हैं तो बच्चों को किसी से काम से बाहर भेंजदे, और यह देखें कि उनके घर पर आने पर आप दोनो में पुन: समझौता हो जाए।
हम बच्चों में किसी को चीज़े ना देने की प्रवृति को उत्साहित करते हैं। एक सीमा के बाद यह घुटन का कारण बन जाता है। उनमें चीज़ों को अपने पास रखने की प्रवृति बन जाती है। यह उनका व्यक्तित्व खिलने में बाधक है। ऐसी छोटी छोटी बातें ही उनका व्यक्तित्व झलकाती हैं। देने और बाँटने का भाव उनका व्यक्तित्व निखारता है। उनमें ऐसी प्रवृत्तियों को प्रेरित करके उनकी अर्जित प्रवृत्तियों को बदला जा सकता है। पर जिन प्रवृतियों के साथ बच्चा जन्मा है, आप उनके लिए कुछ नहीं कर सकते। वो उसमें रहती ही हैं। इन दोनो में अंतर जानना ही विवेक है। और अगर आप अंतर जान पाते हैं तो आधा काम तो ही गया। शेष आधा हिस्सा आप ईश्वर पर ही छोड़ सकते हैं। आपका उसपर कोई नियंत्रण नहीं है। इस सारी प्रक्रिया में आप संयम और धैर्य सीखते हैं।
बच्चों को एक सपना देना और फिर उन्हे उस सपने की ओर बढ़ाना माता-पिता के लिए एक बड़ी चुनौती है। उन्हें विविध क्षेत्रों की गतिविधियों से अवगत कराएं। यह दस या ग्यारह साल से पहले बच्चे में कराना चाहिए। उन्हे विज्ञान, कला, सेवा सभी क्षेत्रों की जानकारी दें। किसी रविवार को उन्हे चॉकलेट दें और उन्हे गरीब बच्चों मे बाँटने को कहें। साल में एक यां दो बार उन्हे किसी बस्ती में लेजाकर सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करें। इससे उनका व्यक्तित्व खिलेगा।
बच्चे के दाहिने दिमाग और बाहिने दिमाग दोनो का विकास ज़रुरी है। भारत में ज्ञान की धारणा विश्व में सर्वश्रेष्ठ है। अगर आप ज्ञाण की देवी का चित्र देखें तो पाएंगे - उनके एक हाथ में किताब, एक में संगीत वाद्य और एक में जप माला है। किताब मस्तिष्क के बाहिने हिस्से के पोषण का प्रतीक है, संगीत वाद्य दाहिने हिस्से का और जप माला ध्यान को दर्शाता है। ज्ञान, संगीत और ध्यान - तीनों को मिलाकर ही शिक्षा पूर्ण होती है। और तभी आप बच्चे को सभ्य और शिक्षित कह सकते हैं। तो आप इस बात पर ध्यान दें कि बच्चे संगीत और योगा सीखें। और यह भी सुनिश्चित करें कि बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। उन्हे प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करें। एक बच्चा तीन साल की उम्र में सवाल पूछने शुरू करता है। फिर वह सवाल पूछते रहता है। कई बार उनके सवालों का आपके पास कोई जवाब नहीं होता। कितने माता पिता को इसका अनुभव है? वे तुम्हें आश्चर्य में डाल देते हैं। वे तुम्हें वास्तविकता पर विचार करने के लिए प्रेरित कर देते हैं।. इसलिए यह उनके लिए बहुत आवश्यक है कि वे विज्ञान और संगीत दोनो की तरफ ध्यान दें।
फिर अपने बच्चे के व्यक्तित्व पर ध्यान दें। यह देखें कि वो सभी उम्र के लोगों से बात करे। इस पर ध्यान दें कि वो अपने से छोटों, अपने से बड़ों और अपनी उम्र के लोगों से कैसे व्यवहार करता है। इससे आप यह देख सकते हैं कि उनमें कोई श्रेष्ठ या हीन भावना नहीं आ रही है, यां वे ज़रुरत से ज़्यादा अंतर्मुखी या बहिर्मुखी हो रहे हैं। इसमें आपकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। आप उनके साथ कुछ खेल खेलें और उन्हें सभी उम्र के लोगों से बातचीत करने के लिए प्रोत्साहित करें।हम उनमें एक केन्द्रित और प्रतिभावान व्यक्तित्व का विकास कर सकते हैं।जिन बच्चों में हीन भावना आ जाती है वो अपने से छोटों के साथ ही व्यवहार करने में आराम महसूस करते हैं। वे अपने से बड़ों यां अपने बराबर वालों का संग पसंद नहीं करते। और जिन बच्चों में श्रेष्ठता की भावना पनप जाती है वो केवल अपने से बड़ों से बात करना पसन्द करते हैं। दोनो ही सूरतों में बच्चे में बातचीत करने की कुशलता नहीं विकसित होती। माता पिता उन्हे संचार कौशल सिखा सकते हैं। उनके लिए सही ढंग से बात-चीत की कला सीखना बहुत अनिवार्य है।
अब मैं आप सबको एक प्रयोग करवाना चाहूँगा। आप के बगल में बैठे व्यक्ति से कहो, "मैं तुम पर विश्वास नहीं करता"। यह एक अच्छा मौका है अगर वह व्यक्ति आपकी पति यां पत्नि है(मज़ाक करते हुए)! (कुछ समय के बाद) आप ऐसा नहीं कर पाए। आपने देखा यह कितना मुश्किल है किसे से कहना कि आप उन पर विश्वास नहीं करते। किसी से यह कहना कि आप उनपर विश्वास करते हैं मुश्किल है। पर किसी से यह कहना कि आप उनपर विश्वास नहीं करते और भी अधिक मुश्किल है। आपने आज कुछ ऐसा किया जो आपने पहले कभी नहीं किया। आपने किसे से कहा कि आप उन पर विश्वास नहीं करते और आप हँसने लगे। आप दिल से नहीं कह पाए। क्या ऐसा पहले कभी हुआ है। विश्वास करना बच्चों के स्वभाव में है, पर यह कहीं खो जाता है। हमे यह देखने की ज़रुरत है। क्या बच्चे को खुद पर विश्वास है? तीन तरह का विश्वास होना एक पुष्ट बच्चे के लक्षण हैं।

(वार्ता के शेष अंग और माता-पिता के प्रश्न अगली पोस्ट में सम्मिलित किए जाएंगे)

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"अपनी क्षमता के अनुसार और बिना किसी अपेक्षा के किए जाने वाला कर्म सेवा है"

GODDESS LAXMI(LEFT) AND GODDESS SARASWATI(RIGHT)

संगीत हमे जोड़ता है और ध्यान हमे अपनी भीतर गहराई में ले कर जाता है| इससे हम में संपूर्णता आती है| यदि आप भारत में ज्ञान की देवी सरस्वती को देखें तो पाएँगे कि वे एक चट्टान पर बैठतीं हैं| चट्टान स्थिर और अचल है| यह इस बात का प्रतीक है कि सीखा हुआ ज्ञान आप का हिस्सा बन जाता है| जब कि धन की देवी लक्ष्मी कमल के फूल पर विराजमान हैं| बरसात आती है और पानी के बहाव के साथ कमल का फूल भी हिलता है| देवी सरस्वती के हाथों में वीणा, पुस्तक और माला है| पुस्तक ज्ञान का, वीणा संगीत का और माला ध्यान के प्रतीक हैं| ध्यान, ज्ञान और संगीत - ये तीन पहलू हमें जीवन में उतारने चाहिए|

प्र : 'आर्ट ऑफ लिविंग' व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं और पद्धतियों से कैसे संबधित है?

श्री श्री रवि शंकर :
आप अपनी मान्यताएँ और पद्धतियाँ बनाए रख सकते हैं क्योकिं 'आर्ट ऑफ लिविंग' में हम विविधता में विश्वास रखते हैं| अपना धर्म निभाते हुए अध्यात्म में आगे बढ़ा जा सकता है|

प्र : मुश्किल के समय में देखा गया है कि शासन, व्यापार और धर्म के क्षेत्र में लोग हमारी आशाओं पर पानी फेर देते हैं| आपके हिसाब से ऐसे में परिस्थिती कैसे संभाल सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
महात्मा गाँधी ने ऐसे नेताओं की एक नस्ल बनाई जो दुनिया के चारों ओर सम्मानित हुए|
राजनीति में अध्यात्म , ज्ञान का विश्विकर्ण और धर्म में धर्मनिरपेक्षता आव्श्यक है| हर किसी को हरेक धर्म के बारे में थोड़ा बहुत मालूम होना चाहिए| यदि सभी बौध धर्म, हिंदू धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म और ईसाई धर्म के बारे में थोड़ा-थोड़ा सीख लें तो हमारे पास धर्म का एक पूरा सम्मिश्रण तैयार मिलेगा| यही एक तरीका है जिससे हम एक दूसरे को समझ सकते हैं और आध्यात्म की तरफ आगे बढ़ सकते हैं| अगर हर बच्चा हरेक धर्म के बारे में थोड़ा-बहुत जानता हो, तो वे सभी धर्मों को स्वीकार करते हुए आगे बड़ेगा |

प्र : सेवा का ऐसा कौनसा कार्य है जो हर कोई कर सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई भी कार्य सेवा का कार्य हो सकता है| दुनिया आप से ऐसे काम की आशा नहीं करेगी जो आप से न हो सके| आप जो भी कर सकते हैं और बदले में बिना किसी अपेक्षा के जो आप करते हैं वही सेवा है| कोई भी कार्य दो तरह से हो सकता है| पहला, हम इसलिए करें कि हमें काम पूर्ण होने के बाद खुशी की अपेक्षा है| दूसरा, हम आनंद के साथ कार्य पूर्ण करते है| नौकरी और सेवा में यही फ़र्क है|

प्र : मेरे दिल और दिमाग़ हमेशा संघर्ष करते रहते हैं| मुझे किसका कहना मानना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
दोनो का अलग-अलग समय पर इस्तेमाल करो| व्यापार दिल से नहीं बल्कि दिमाग़ से करो| सेवा दिमाग़ से नहीं बल्कि दिल से करो|

प्र : कैसे मालूम हो कि किसी को कब माफ़ करना है?

श्री श्री रवि शंकर :
जब कोई चीज़ तुम्हें बहुत परेशान करने लगे|

प्र : आप में जो इतनी शक्ति है, इतना बड़ा दिल है और इतनी करुणा है- इसका राज़ क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
सादगी| जब आप अपने स्वभाव से हटकर कुछ और बनने का प्रयत्न करते हैं तब ये आपको थका देता है| जब आप किसी को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं या किसी से कुछ उम्मीद रखते हैं तो भी आप बोझ महसूस करने लगेंगे|

प्र : मुझे हवाई जहाज़ की उड़ान से बहुत डर लगता है| मुझे डर ने पकड़ रखा है| इस डर को अंकुश में रखने के लिए मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
जब ऐसा हो, शरीर में उठ रही संवेदनाओं को महसूस करें| डर प्रेम का विपरीत है, फिर भी डर को प्रेम में बदला जा सकता है| आप 'अड्वान्स मेडिटेशन कोर्स' के ज़रिए भी इन सब चक्रों से गुज़र कर उनसे परे जा सकते हैं|

प्र : इतने लोगों पर हो रहे अन्याय को देख कर मुझे जो गुस्सा आता है, उसके लिए मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
सिर्फ़ गुस्सा महसूस करके बैठे मत रहो| उसके लिए कुछ करो| अपना मानसिक संतुलन खोने की कोई ज़रूरत नहीं है| तुम्हें उसे स्वीकार करते हुए धैर्य से जवाब देना चाहिए| ये एक कौशल है| मन से शांत रहो और योग से जुड़े रहो| यही गीता का संदेश है|

प्र : एक व्यक्ति के लिए एक जीवन काल में मोक्ष प्राप्त करना कितना वास्तविक है?

श्री श्री रवि शंकर :
इसके लिए तुम्हें विशिष्ट होने की ज़रूरत नहीं है| तुम उसे इसी पल इस जगह भी पा सकते हो|

प्र : मैं विश्व शांति के लिए कैसे सहयोग दे सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
यह प्रश्न मैं आप पर ही छोड़ना चाहूँगा क्योंकि आप ऐसा बहुत से तरीकों से कर सकते हो| सेवा के लिए तैयार रहो| ऐसे प्रश्नों का एक जवाब नहीं हो सकता|

प्र : क्या आप कामुकता के स्वाभाव के बारे में कुछ बता सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जिसके बारे में जानते न हों और जिस बात में विश्वास न करते हों उसके बारे में उपदेश देना सही नहीं है| जिन लोगों ने गहरी समझ पा ली है वे किसी बात की एक राय नहीं बनाते| आध्यात्मिकता के साथ आप अनुभव के एक अन्य स्तर पर जा सकते हैं| सेक्स का आदर करो पर उससे उँचे स्तर पर पहुंचो|

प्र : रिश्ते को सफल बनाने का क्या तरीका है?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं रिश्तों के मामले में विशेषज्ञ नहीं हूँ ! पर मैं पुरुषों और स्त्रियों के लिए एक-एक सलाह दे सकता हूं | स्त्रियों को पुरुष के अहंकार पर कभी चोट नहीं पहुंचानी चाहिए | सारी दुनिया चाहे उसे बेवकूफ कहे पर तुम्हें उससे कहना है कि वह सबसे अधिक बुद्धिमान है| तुम्हें उसकी काबिलियत पर शक नहीं करना है| उससे कहो, "तुम सबसे ज़्यादा बुद्धिशाली हो| अगर तुम उसका उपयोग नहीं करते तो इसका मतलब ये नहीं कि तुममें समझ नहीं है|" अगर तुम उसे बेवकूफ कहती रहोगी तो वह सचमुच बेवकूफ ही बन जाएगा| अपने पति से प्रेम का प्रमाण माँगते रहना ठीक नहीं है| बस समझ लो कि वह तुमसे प्यार करते हैं| अगर किसी को रोज़ ये साबित करना पड़े कि वो तुम से प्रेम करते हैं तो वो उन्हें थका देगा| प्रेम को बहुत ज़्यादा व्यक्त नहीं करना चाहिए| बहुत बार समस्या ये हो जाती है कि हम अपना प्रेम कुछ ज़्यादा ही व्यक्त करते रहते हैं| अगर तुम बीज को सतह पर ही लटकाए रखो तो तुम उसकी जड़ें कभी नहीं देख पाओगे| लेकिन अगर उसे गहरे में गाड़ दोगे तब भी उससे अंकुर नहीं फूटेगा ! बीज को सही ढंग से बोओ| इस तरह से तुम्हें अपना प्यार जताना चाहिए| अपने प्रेम का गौरव बनाए रखो|

अब पुरुषों के लिए एक सुझाव है कि स्त्री की भावनाओं पर कभी पैर मत रखना | अगर वो अपनी माँ, बहन, अपने परिवार वग़ैरह की शिकायत करे तो उसमें शामिल मत हो जाना| थोड़ी देर के बाद वो पक्ष बदलेगी और हो सकता है तुम्ही निशाना बन जाओ! अगर वो कुछ ध्यान करना चाहे, किसी मंदिर में जाना चाहे या कोई आध्यात्मिक साधना करना चाहे तो उसे रोकना मत| अगर वो खरीदारी के लिए जाना चाहे तो उसे अपना क्रेडिट कार्ड दे दो| इससे घर में शांति रहेगी|

प्र : क्या ज्ञान की तलाश में गुरु या आध्यात्मिक नेता की ज़रूरत है?

श्री श्री रवि शंकर :
आप प्रश्न पूछ रहे हो और आप को जवाब चाहिए| आप को दवा चाहिए और जो भी आप को वो दे दे वो आप के लिए डॉक्टर बन जाता है| साधक को उत्तर चाहिए, उसे चाहिए कि कोई उसे सही मार्ग दिखाए| अगर कोई कहे मैं मरीज नहीं हूँ पर मुझे दवा चाहिए और कोई कहे मैं डॉक्टर नहीं हूँ पर मैं तुम्हें दवा दूँगा तो इन दोनों को आप क्या कहेंगे?
आप जो सुनना चाहते हो वो तो कोई भी आप से कह सकता है पर आपको सही मार्ग दर्शन की ज़रूरत है| कोई होना चाहिए जो आप का होंसला बँधा सके| जब आप तैरना सीखते हैं, ट्रेनर कहता है, " कूदो, आगे बढ़ो" और आप में आत्म-विश्वास जगता है| जिसमें ऐसा आत्म-विश्वास हो, वही आप का मार्ग दर्शक बन सकता है|

प्र : आप सारे विश्व के लोगों का भार उठाने का काम कैसे संभालते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब आप अपने को ये कहते हैं कि आप सिर्फ़ एक साधन यां मध्यम हैं| आप इस ब्रह्मांड के एक अंश हो| जब आप किसी भी परिस्थिति से प्रभावित नहीं होते तो यह सहजता से ही हो जाता है | ये बिल्कुल मुमकिन है, तुममे भी वह क्षमता है|

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"बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है"

बैंगलोर आश्रम

तुम्हें प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये। तुम प्रतिदिन दांत मांजते हो। शरीर को स्वच्छ रखने के लिये नहाते हो। वैसे ही, प्रतिदिन थोड़ा ज्ञान सुनो और ध्यान करो। बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है। वो ज्ञान जो तुम्हें बोध कराता है कि यहां सब कुछ नाशवान है। संगीत और समरसता भावनाओं को शुद्ध बना कर हृदय को संपन्न बनाते हैं। कुछ देने से हृदय शुद्ध होता है। ज्ञान और ध्यान से सब शुद्ध हो जाता है।

प्रश्न : गुरुजी, किसी का देहांत होने पर ‘राम नाम सत्य है’ क्यों कहते हैं?

श्री श्री : किसी के देहांत पर तुम ये समझ जाते हो कि यही सत्य है। एक दिन हर किसी की मृत्यु होगी। जीवित रहते हुए तुम इस सत्य से अन्भिग्य रहते हो। तुम बेकार बातों में फंसे रहते हो।
सत्य को तुम टाल नहीं सकते। सौंदर्य का त्याग नहीं हो सकता। प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
ये तीन बातें ही याद रखने के लिये बहुत हैं। इन्हें पचाओ।

प्रश्न : यज्ञ के क्या क्या अंग होते हैं?

श्री श्री : किसी भी यज्ञ में ध्यान, दान, ज्ञान और गान होता है। गान दिमाग के दायें भाग को पुष्ट करता है। ज्ञान दिमाग के बायें भाग को पुष्ट करता है। ध्यान से दिमाग के दोनों भाग पुष्ट होते हैं। यज्ञ से हमारा विकास होता है।

प्रश्न : गुरुजी, अपना जीवनसाथी चुनते समय हमें उस में किन किन गुणों को परखना चाहिये?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुये) मुझे इस का अनुभव नहीं है! उन से पूछो जिन्हें अनुभव है। तुम यहाँ वैवाहिक विभाग से भी मदद ले सकते हो।
तुम्हें पता है ये क्यों कहते हैं कि ‘विवाह स्वर्ग में पूर्वनिश्चित किये जाते हैं’? क्योंकि, तुम्हारे लिये चुनाव हो चुका है। तुम्हें सिर्फ़ उसे लेना है और आगे बढ़ना है। तुम चुनाव की प्रक्रिया से मुक्त हो। जो तुम्हारी थाली में आये, उसे लो और आगे बढ़ो।
तुम्हें पता है, सबसे अच्छी बात होगी कि तुम अपने जीवनसाथी की कमियों पर ध्यान ना दो। किसी भी रिश्ते में अगर दोनों व्यक्तियों का ध्यान आध्यात्म पर होगा तो वे समांनांतर रेखाओं की तरह बिना किसी टकराव के अनंत तक साथ साथ आगे बढ़ पायेगें। जिस क्षण आध्यात्म से ध्यान हटा और एक दूसरे पर गया तो टकराव होंगे। आध्यात्म के पथ पर रहना बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न : गुरुजी, विशालाक्षी मण्डप का निर्माण कैसे हुआ?

श्री श्री : मनुजी (एक शिष्य) ने कहा, "गुरुजी, एक सभा कक्ष होना चाहिये जहां लोग ध्यान कर सकें।" तो मैनें एक चित्र बनाया और उसे बनाया गया। पहले कोई सभा कक्ष नहीं था। अष्टावक्र गीता की व्याख्या ऐसी जगह की गई थी, जहां बारिश का पानी भीतर आ जाता था।
जब हमने विशालाक्षी मण्डप का उद्घाटन किया, तो इतने लोग आये कि वो उसी वक्त छोटा पड़ गया! तुम्हें पता है, जब लोग एक साथ ध्यान करते हैं तो वो ऊर्जा विशव में प्रसारित होती है।

प्रश्न : गुरुजी, इस स्थान का रहस्य क्या है?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुए) रहस्य यहाँ है (अपने हृदय को इंगित करते हुए)।


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