भक्ति(Devotion) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
भक्ति(Devotion) लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

"जिसे आप नहीं जानते उसके प्रति प्रेम श्रद्धा है"

किसी भी कार्यक्षेत्र में संघर्ष हो सकता है। जब ऐसा होता है तो उसके प्रति indifference का भाव रखो। यह आपका प्रेम कितना दृढ़ है, इसका संकेत है। जब आप गलती के पीछे सही अंदेशा देखते हैं तो किसी की यां आपकी गलती आपको परेशान नहीं करती। यह ज्ञान का अलग ही नज़रिया है। आपको याद हो तो मैने आपसे एक बार कहा था कि दूसरों की गलती के पीछे वजह मत देखो। पर अब मैं कह रहा हूँ कि गलती के पीछे वजह देखो। जब कोई सही भाव से अच्छा काम करता है, पर कृत गलत हो जाता है तो यह आपको परेशान नहीं करता। एक डाक्टर मरीज़ का इलाज उसे ठीक करने की भावना से करता है, पर अगर इसके दौरान मरीज़ की मृत्यु हो जाए तो डाक्टर पर आरोप नहीं लगाते। पर एक डाकू यां आतंकवादी को इस तरह से माफ नहीं किया जा सकता। मगर यदि आप इतने बुद्धिमान हैं कि आप यह देख सकें उनका गलत करने की वजह का कारण तनाव और अज्ञानता है, तो आप करुणा का भाव रखते हैं। जब आप दूसरों की गलती के पीछे वजह देखते हैं, और आप वजह को ठीक पर कृत को गलत देख पाते हैं तो किसी की गलती आपके मन को विचलित नहीं करती। जैसे एक परिवार में बच्चा अगर कोई गलती करता है तो आप जानते हैं कि वो ऐसा जानबूझ कर नहीं कर रहा है।

किसी भी क्षेत्र में हमें श्रद्धा अपनाने की आवश्यकता है। अगर श्रद्धा नहीं है तो कोई भी काम अच्छे से नहीं किया जा सकता। आज यह श्रद्धा भाव कार्य क्षेत्र में अत्याधिक अनिवार्य है। अगर अपने काम के प्रति श्रद्धा ही नहीं है तो कोई भी काम सही ढंग से कैसे किया जा सकता है? श्रद्धा ना होने के कारण काम पर बुरा प्रभाव पड़ता है, और ऐसा क्या है जो श्रद्धा को छीन लेता है। संघर्ष, श्रद्धा में संघर्ष के कारण ही श्रद्धा खो जाती है। जब भी आपका सामना संघर्ष से हो, चाहे वो काम में हो, दोस्तों के साथ हो, परिवार में हो, यां किसी भी क्षेत्र में हो, उसके प्रति indifferent रहो, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

किसी धार्मिक यां आध्यात्मिक क्रिया के साथ भी। कभी कभी आपकी ध्यान करने की, साधना करने की यां प्रार्थना करने की इच्छा नहीं होती। आपको यह ऊबाने वाला लग सकता है। और जब ऐसा महसूस हो तो क्या करें? जब आप किसी कृत से प्रेम करते हैं तो आप उसका निरंतर अभ्यास करते रहते हैं। और जब प्रेम समाप्त हो जाता है तो संघर्ष पैदा हो जाता है। कुछ ऐसे से प्रेम करो जिसे आप नहीं जानते। जिसे आप नहीं जानते उसके प्रति प्रेम श्रद्धा है, भक्ति है।


art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

"प्रेम पराकाष्टा भक्ति है"

जीवन का केन्द्र प्रेम है, पर फिर भी हम अपने केन्द्र से इतने दूर प्रतीत होते हैं। ऐसा क्या है जो हमे अपने केन्द्र से जोड़ सकता है, जो हमे अपने में वापिस ला सकता है? यह एक निरंतर खोज है। जुड़े रहने के लिए एक सूत्र चाहिए, ऐसा कुछ जो जीवन में तुम्हारी आशा बढ़ाए रखे, ऐसा कुछ जो तुम्हारी आँखों में चमक ला सके, जो तुम्हारे हृदय को हलका रखे। वो ऐसा क्या है जिसकी जीवन में कमी है, और जिसके होने से जीवन पीड़ा से उत्सव में परिवर्तित हो जाता है, जिससे पीड़ा के आँसु खुशी और शुकराने के आँसुओं में परिवर्तित हो जाते है। वो धागा हमे चाहिए और उसे ही सूत्र कहते हैं - कुछ ऐसा हो जो तुम्हे थामे रखता है। पतंग एक सूत्र से आकाश में ऊँचा उठती है। मन को भी इसी तरह के सूत्र की आवश्यकता है।

नारद भक्ति सूत्र ऐसे ही सूत्र हैं। एक प्राचीन ऋशि थे - नारदा। नारद का अर्थ है जो केन्द्र और परिधि दोनो में है, और जो केन्द्र से जोड़ता है। हम में से बहुत केवल परिधि में ही अटके रहते हैं, केन्द्र में जाने की तलाश तो करते हैं पर कभी केन्द्र तक नहीं पहुंचते, हम बाहर ही चक्कर काटते रहते हैं। और कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल अपने ही केन्द्र में रहते हैं, अपनी ही दुनिया में रहते हैं, और जीवन के व्यवहारिक स्तर से नहीं जुड़ते। केवल अपनी ही विचारधारा में अटके रहना और जगत की व्यवहारिकता को भूल जाना, यां फिर केवल जीवन की व्यवहारिकता में अटके रहना और अपनी विचारधारा को पूर्णत्या त्याग देना - दोनो ही परिस्थितियों में कोई विकास नहीं है। ज्ञान वो है जिससे आप उच्च विचारधारा को जीवन के रोज़मर्रा व्यवहार में ला सकते हैं। नारद ऋशि को देवर्षि भी कहते हैं - जो अपने नटखट तरीको से कोतुहल पैदा करने के लिए विख़्यात हैं। दो अलग जगहों पर वो अलग अलग भूमिका निभाते हैं। भारत में कहावत है जो कहती है नारादा की तरह नहीं होना चाहिए। वो कोई ना कोई मुश्किल खड़ी कर देते हैं। पर किसी ना किसी तरह वो मुश्किल भी हर किसी के लिए लाभदायक ही सिद्ध होती है। बिना शरारत के जीवन में कोई आनंद नहीं है। जीवन संघर्ष नहीं है, जीवन सिर पर पड़ा कोई बोझ नहीं है, पर जीवन एक उत्सव है, खेल है। तुम्हारा जीवन तुम्हारी ही चेतना का खेल और प्रतिबिंब है। नारदा अपनी ही तरह के ऋषि हैं जो कुछ शरारत पैदा करते हैं, और ऐसे लोगों को जोड़ देते हैं जो आमतौर पर नहीं जुड़ते। वो तुम्हे तुम्हारे केन्द्र से जोड़ देते हैं, तुम्हारे अस्तित्व से।

जब जीवन रुका हुआ सा प्रतीत हो तो तुम्हे नारदा के पास जाना है, वे तुम्हे आगे बढ़ाते हैं। और वे ऐसा कैसे करते हैं? कुछ सूत्र से, कुछ ज्ञान के शब्दों से - भक्ति सूत्र। भक्ति दिव्य प्रेम है - प्रेम की पराकाष्टा।


art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

"भक्ति के संस्कार से मन के बाकी संस्कार और विकल्प हटते हैं"

बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : आप आतंकवाद को समाप्त करने के लिए इतना समय बिताते हैं। क्या मुझे आपका समय लेने के लिए आतंकवादी बनना पड़ेगा? आपके माध्यम से रुपांतरण होना मुझे अच्छा लगेगा।


श्री श्री रवि शंकर : आतंकवादी तो बन्दूक लेके मारता है, आप अपने भाव के तीर लगाते हो। आप का भाव कई अधिक बलवान है।

एक दिन ऋषिकेश में एक भक्त बेहोश होकर गिर गए। सब लोगों का ध्यान उधर आकर्षित हो गया। हमे तो पता था यह सब ध्यान खींचने का नाटक है। हम पहले तो चलते रहे पर फिर जब यह ज़्यादा देर तक चला तो गए उधर। पूछने पर वह बोले, "आप तो देखते नहीं, इसलिए यह हरकत करनी पड़ी"। ऐसी हरकत तुम मत करने जाना। आपको कैसे पता हम तुम्हारी तरफ़ नहीं देखते? जब आप इधर उधर देखते हो तो मैं आप की तरफ़ ज़रूर देखता हूँ। लक्ष्य तो एक ही है - आपका मन, चेतना एक जगह टिकाना।जब आपका मन टिक गया, आप शांत हैं, मुस्कुरा रहे हैं तो मुझे उनको देखना पड़ता है जिनका मन अभी टिका नहीं और इधर उधर भाग रहा है।

प्रश्न : जब आप सामने होते हैं तो आँखे बंद करके ध्यान करने के लिए कहते हैं। पर हमारा मन तो पलक झपकने का भी नहीं होता। हँसकर टालिए मत, भक्त परेशान है।

श्री श्री रवि शंकर : आइना ला के दे दूँ। तुम अपने अंदर जाके तो देखो तुम कितने सुन्दर हो।

प्रश्न : आप कहते हैं, "मुझ में और तुम में कोई भेद नहीं है"। तो फिर मैं दुख क्यों अनुभव करता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर : दुख इसलिए है क्योंकि इस बात को निश्चित रूप से नहीं जाना। मन और दिल की गहराई से इसको नहीं स्वीकार किया अभी। स्वीकार करते ही दुख भाग जाता है।

प्रश्न : सबकुछ भगवान है तो तामसिक कार्य कौन करता है? कोई संत है और कोई चोर - ऐसा क्यों?

श्री श्री रवि शंकर : जिस अनुसार तुम कार्य करते हो उसके अनुसार भगवान फल भी देता है। चोरी करोगे तो भगवान पुलिस के रूप में आएंगे। गलत काम करोगे तो दुख देने जैसा आएंगे भगवान। अच्छा काम करोगे तो सुख देने जैसे आएंगे। सुख-दुख विवेक से ही मिलता है। जिस विवेक से काम करते हैं उसके ऊपर निर्भर करता है। एक गलास दूध पिया तो ठीक है पर मानलो तीन किलो दूध पी लिया तो...। बिना विवेक के वही अमृत ज़हर जैसा कार्य करता है।

प्रश्न : मेरे पति सुदर्शन क्रिया करते हुए भी अधर्म का काम करते हैं। मुझे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर : ऐसा कैसे हो सकता है? यां फिर वो क्रिया सिर्फ़ एक अभ्यास की तरह करते होंगे। साधना शिविर पर लेके आओ उन्हे। यां उन्हे समझ में नहीं आया जो वो कर रहे हैं वो अधर्म है। तुन्हे अधर्म लगता होगा पर उन्हे लगता होगा वो ठीक ही कर रहे हैं। बात करके देखो।

प्रश्न : जब बच्चे नासमझी की बात करते हैं तो माता पिता उन्हे समझाते हैं। पर बड़ती उम्र में माता पिता नासमझी की बातें करने लगते हैं और कुछ समझते नहीं तो बच्चों को क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर : फिर भी उनकी सेवा करते रहें। जब तुम परिस्तिथि से पृथक होकर देखते हो तो हो सकता है तुम्हे लगे वो सही हैं। यां फिर वो गलत भी हो सकते है। यह ज़रूरी नहीं कि उनकी हर बात पर चलें क्योंकि उनकी समझ और अनुभव अलग हैं, दुनिया अलग है और बच्चों की समझ और अनुभव अलग हैं।

प्रश्न : क्या भक्ति का चित्त पर संस्कार होता है?

श्री श्री रवि शंकर : हां, ज़रूर होता है। भक्ति के संस्कार से बाकी संस्कार हटते हैं, विकल्प हटते हैं। भक्ति का संस्कार भी अपने आप विलीन हो जाएगा। जैसे आप पानी को शुद्ध करने के लिए फिटकारी डालते हैं तो वो पानी को शुद्ध करता है और खुद भी गल जाता है। उसी तरह से भक्ति का संस्कार भी है।

प्रश्न : आप सबको अपने नटखनपन से नाच नचाते हैं। पूरी दुनिया पागल हुई जा रही है। आप अपने इस नटखनपन के बारे में कुछ बताएं।

श्री श्री रवि शंकर : नटखनपन बोलने का नहीं होता, नटखनपन तो करने का होता है।
हरेक में तो बालपन है। बचकाना नहीं, पर बालपन। योगी होते होते ऐसा हो ही जाता है, सहजता आ जाती है जीवन में, सब अपने लगने लगते हैं। यह सहज ही है। सब तरह का अहंकार मिट जाता है।

प्रश्न : कैसे समझे के पूर्व कर्म खत्म हुए, जल गए हैं?

श्री श्री रवि शंकर : मान ही लो। जैसे ’मैं मुक्त हूँ’ - यह अभिमान करके मुक्त हो जाते हैं। कर्म मिट गया मानने से मिट ही गया समझो।

art of living TV
© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

"बुद्धि शुद्ध होते ही श्रद्धा मज़बूत हो जाती है"

बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : आदरणीय प्रणाम। गुरुदेव आप कौन हैं?

श्री श्री रवि शंकर : पहले तुम अपने आप को जानो। मुझे जानने की चेष्टा क्यों कर रहे हो? तुम खुद को जानो, तुम्हे अपना ही परिचय नहीं है। तुम कितनी बार दुनिया में आए हो पहले यह तो जानो। फिर मुझे जानना आसान हो जाएगा।

प्रश्न : कभी कभी लगता है आप मेरे साथ हो और हमेशा मुझे देख रहे हो। पर कभी कभी लगता है कि संपर्क टूट गया है। उस समय मन विचलित हो जाता है। विचलित मन से साधना भी नहीं होती। ऐसे में क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर : तुमने प्रश्न में उत्तर भी दे दिया। प्रेम का स्वरूप ही ऐसा है कि इसके ना होने पर विरह की पीड़ा होती है। जिन्हे दिल में भक्ति की एक झलक भी मिल जाए तो ना होने पर जी घबराता है। ऐसा नहीं है कि भक्ति नहीं होती पर ऐसा भास होता है, और उससे मन विचलित हो जाता है। अगर ज्ञान पूर्वक देखें तो श्री नारद ने भक्ति सूत्र में कहा है भक्ति का लक्षण ही यही है कि उसके होने में परमांनद और ना होने से परम व्याकुलता का अनुभव होता है। यही भक्ति की ख़बर देता है। इसलिए तुम अपने को भाग्यवान मानो जब इस तरह से जी मचलता है। थोड़े समय के लिए ही ऐसा लगता है। भक्ति तो रहेगी ही। वो मिटती नहीं। भक्ति तो है ही अमृत स्वरूप। भक्ति कभी मिटती नहीं पर घट जाती है। जब घट जाती है तो इस तरह की बेचैनी होती है। यह सहज ही है। ऐसा बहुत भाग्य से होता है। नहीं तो जड़ता में जो व्यक्ति आ जाता है उसमे ना भक्ति होती है, और भोग और चिंता खा जाते हैं।

प्रश्न : श्रद्धा को कैसे दृढ़ करें?

श्री श्री रवि शंकर : श्रद्धा को दृढ़ करना है, इस भाव से ही दृढ़ हो गया। ’मुझ में अटूट श्रद्धा है’ - यह मान कर चलो। बुद्धि शुद्ध होते ही श्रद्धा मज़बूत हो जाती है। बुद्धि शुद्ध करने के लिए हमारा आहार शुद्ध हो। भोजन पर ध्यान दीजिए। यदि भोजन करते वक्त दुनिया भर की गलत बातें सोचते रहें तो इसका भी बुद्धि पर प्रभाव पड़ता है। कई बार तो लोगों को बात करने का समय भी केवल भोजन के वक्त मिलता है, और भोजन परोसते और करते समय बीमारी इत्यादि की बात करते हैं। यह बहुत गलत है। इस आदत से हमको छुटकारा पाना चाहिए। जैसा अन्न वैसा तन।और जैसा मन वैसा तन भी होने लगता है। अन्न से ही मन पर प्रभाव पड़ने लगता है। इसलिए बुद्धि शुद्ध होने के लिए प्रसन्न चित्त से खाना खाओ। अक्सर जब हम बहुत खुश होते हैं तो, जल्दी में भोजन गले से ठीक से नीचे भी नहीं उतरता। और व्याकुलता में हम ज़रुरत से अधिक भोजन कर लेते हैं। इसलिए होश के साथ भोजन करना उचित है।

प्रश्न : जब भी आपको देखता हूँ तो आँखों से आँसु बहने लगते हैं। ऐसा लगता है मैं आपको बहुत लंबे समय से जानता हूँ। क्या यह सत्य है?

श्री श्री रवि शंकर : तेरा अनुभव है और तुझे इसपर ही संशय हो रहा है। तब तो बिल्कुल सच है। सच पर ही संशय करते हैं, झूठ पर कभी संशय नही करते। किसी की ईमानदारी पर ही संशय करते हैं। किसी की बेईमानी पर आजतक किसी ने संशय नहीं किया। इसी तरह से कोई तुमसे पूछे कि तुम सुखी हो तो कहते हैं पता नहीं।दुख को निश्च्य रूप से जानते हैं। सुख को निश्च्य रूप से नहीं जानते। सुख पर संशय करते हैं। ईश्वर है कि नहीं इस पर संशय होता है। इस अस्थायी और नश्वर जगत के होने पर संदेह नहीं होता। पर एक विकसित वैज्ञानिक यह समझता है कि यह सब दिखाई देने वाले संसार के अस्तित्व पर एक प्रश्न चिन्ह है।

प्रश्न : आपने कहा की निष्क्रिय होने पर दिव्यता अनुभव होती है। निष्क्रिय होने का क्या भाव है?

श्री श्री रवि शंकर : निष्क्रिय होना मतलब यह नहीं कि सब काम करना छोड़ दें। यह गहराई की बात है। अपना जो काम है वो करते जाएं और करते हुए भी भीतर यह जानो कि तुम कुछ नहीं कर रहे हो। शुरु शुरु में थोड़ी देर बैठकर यह अनुभव करो कि तुम कुछ नहीं कर रहे हो। फिर लगेगा करते हुए भी मेरे अंदर एक सत्ता है जो कुछ नहीं कर रही है।
इसको समझाने के लिए ॠषियों ने बड़ा सुन्दर बताया है। एक ही वृक्ष पर दो पक्षी बैठे हुएं हैं। एक खा रही है और दूसरा सिर्फ़ साक्षी होकर देख रही है। यहाँ मुक्त पक्षी की बात कह रहें हैं जो साक्षी है, निष्क्रिय है। उसकी तरफ़ भी ध्यान दो। जो दो पक्षी हैं वो सखा हैं। साथ साथ रहते हैं। एक निरंतर साक्षी बनी हुई है और दूसरा निरंतर कार्य में लगा हुआ है। इस बात को जानो। बिना काम किए हुए वैसे ही बैठ जाना निष्क्रियता नहीं है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं एक क्षण के लिए भी बिना क्रिया करते कोई टिक नहीं सकता। कर्म करते जाओ। कर्म के भी साक्षी बनते जाओ। यह बहुत गहरा ज्ञान है।

श्री श्री ने ’Understandind Shiva’ नाम की पुस्तक का शुभारंभ किया। इस पुस्तक में सर्वव्यापी शिव तत्व का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण सम्मिलित किया गया है।


art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

"जब तुम समाज की भलाई का कार्य करते हो तो भगवान भी तुम्हारा कार्य करते हैं"

२२ मई २०१०,
बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : आपके लिए खुशी की क्या परिभाषा है?

श्री श्री रवि शंकर :
जिस दिशा में जीवन के बहने की प्रवृत्ति है।

प्रश्न : आपकी खुशी की सबसे अच्छी स्मृति क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
खुशी तब है जब तुम अपने लिए कुछ नहीं चाहते, और केवल देना चाहते हो। जहाँ इच्छाएं खत्म होती हैं और साझा करना(बांटना) शुरु होता है, वहीं खुशी है। स्मृति खुशी नहीं है। जब तुम खुश होते हो, तुम सब भूल जाते हो। जब खुशी नहीं रहती, तब तुम अपनी स्मृति में खुशी तलाशते हो। संसार में लोग खुशी की कल्पना यां खुशी की संमृति में रहते हैं। यह यां तो भूतकाल में रहना है यां भविष्य में। पर खुशी वर्तवान में है। यह तुम्हारा स्वभाव है।

प्रश्न : जब मैं एकांत में होता हूं तो भीतर आनंद अनुभव करता हूं। पर लोगो के साथ मन बाहरी परिस्थितियों में फ़ंस जाता है। क्या कोई ऐसा तरीका है कि सबके साथ रहते हुए भी मै वही भीतर का आनंद महसूस करूँ।

श्री श्री रवि शंकर :
तुम सही जगह पर हो।

प्रश्न : पाप और पुण्य क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
पाप वही है जो तुम्हे भी दुख दे और औरों को भी दुख दे। पुण्य वही है जो तुम्हे भी खुशी दे और औरों को भी खुशी दे।

प्रश्न : ऐसा कहा गया है कि भगवान श्री कृष्ण १६ गुण सम्पन्न थे, श्री राम १२ गुण सम्पन्न थे, और हनुमान १४ गुण सम्पन्न थे। तो फ़िर श्री राम को अवतार कैसे कह सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा भक्तों की महिमा गाने के लिए कहा गया है। असल में गुरु और शिष्य दोनो भगवान हैं। भक्तो की महिमा गाने के लिए और उनका स्तर ऊँचा करने के लिए भगवान स्वयं झुक जाते हैं। यह ऐसा है जैसे एक पिता अपने पुत्र को अपने से ऊँचा अपने कंधे पर उठा लेता है। अगर हनुमान श्री राम से बलिष्ठ नहीं होते तो उनकी सहायता कैसे करते? यह ऐसा है जो मुझसे बलवान है वही मेरा सामान उठा सकता है।

श्री राम को भी हनुमान की सहायता की आवश्यकता थी। इसी तरह ईश्वर भी तुमसे सहायता चाहते हैं। इसलिए हमें धर्म का कार्य,समाज की भलाई का कार्य, करना चाहिए। जो समाज की भलाई का कार्य करता है, ईश्वर भी उनका ध्यान रखते हैं। ईश्वर का काम करना, समाज के लिए काम करना, हमारे में दैवी गुण खिलने का संकेत है।
इसीलिए हनुमान जी श्री राम का काम करते रहे, पर उनमें कभी यह अहंकार नहीं आया कि वह श्री राम की सहायता कर रहे हैं। वह जानते थे कि यह तो केवल माया है और उन्हे ऐसा भाग्य मिला है कि वह श्री राम का काम कर सकें। वह श्री राम के दास बनकर उनका सारा काम करते रहे।

art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

"खुशी केवल तुम्हारे मन पर आधारित है"


प्रश्न : गुरुजी आप इतनी कम नींद लेते हैं तो क्या आप को इससे कोई परेशानी नहीं होती?

श्री श्री रवि शंकर :
एक योगी ऐसी बातों की चिन्ता नहीं करता। योगा से कुछ भी मुमकिन है।

प्रश्न : भक्ति के अनुभव के लिए मुझे कहाँ जाना होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
भक्ति के लिए कहीं जाने की ज़रुरत नहीं। भक्ति केवल स्मरण से ही उजागर हो जाती है। तुम कहीं भी हो याँ किसी भी काम में लगे हो, तुम भक्त हो सकते हो।

प्रश्न : ’आर्ट ऑफ लिविंग’ से मुझे बहुत कुछ मिला है। मैं कैसे योगदान कर सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम आश्रम में किसी भी समय आकर सेवा कर सकते हो।

प्रश्न : मेरा अतीत मुझे बहुत परेशान करता है। मुझे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
जो हुआ सो हुआ। किसी को माफ करना भी भूल जाओ। माफ करने के लिए भी तुम्हें याद करना पड़ता है। उसे एक सपने की तरह देखो। किसी भी बाधा को तुम्हे आगे बड़ने से मत रोकने दो।

प्रश्न : मैं जहाँ भी जाता हूँ दुख ही अनुभव करता हूँ। मुझे कहाँ जाना चाहिए और कया करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
अपने भीतर - अन्तरमुख।

प्रश्न : मैं सी.डी से ध्यान करते समय आपके निर्देशों का अनुसरण नहीं कर पाता।

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान में मुझे सुनने की कोशिश मत करो। जो होता है, उसे होने दो। उसे एक सलाह की तरह लो। तुम ध्यान में बैठे हो, यही बहुत है।

प्रश्न : जीवन की परिभाषा क्या है? हुम एक खुशहाल जीवन के लिए क्या कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर:
’आर्ट ऑफ लिविंग’ इसी के बारे में है। जीवन परिभाषा से परे है। जीवन इतना विशाल है कि कुछ शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। खुशी हमारा स्वभाव है पर उसकी खोज में कहीं हम वो खो देते है। आध्यात्मिकता का अर्थ है ऐसी मुसकान लाना जो तुमसे कोई ले नहीं सकता। एक बार यह पा लेने के बाद तुम्हे सारा अतीत एक सपने जैसा लगता है। वर्तमान क्षण मे खुशी ही है और अपनी खुशी के लिए तुम दूसरों पर निर्भर नहीं हो। खुशी केवल अपने मन पर निर्भर करती है। जब मन अतीत की छापों और भविष्य की चिन्ता से मुक्त होता है, तो खुशी इसी पल मौजूद है।

प्रश्न : मैं जन्म से मांसाहारी हूँ और मुझे यह समझ में नहीं आता कि माँस क्यों नहीं खाना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
थोड़ी देर के लिए आध्यात्म के बारे में भूल जाओ। एक खोज के अनुसार एक किलो माँस पैदा करने में जितनी खपत होती है उससे ४०० व्यक्ति भोजन कर सकते हैं। एक और खोज के अनुसर अगर केवल १० प्रतिशत लोग मांसाहार छोड़ दें तो ग्लोबल वार्मिंग की समस्या खत्म हो जाएगी। इस आधार पर इस ग्रह के लिए और तांकि सब लोगों को भोजन मिल सके, इस के लिए मांसाहारी भोजन की खपत कम करना ज़रुरी है। भगवान ने हमें धरती की और धरती पर रहने वालों की देखभाल करने की होश तो दी है।
हम जितना भोजन उगाते हैं उससे ४० - ५० प्रतिशत अधिक इस्तेमाल करते हैं। ध्यान के साथ साथ पेड़ उगाना, जानवरों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी और शाकाहारी होना भी आध्यात्म का हिस्सा है।

प्रश्न : क्या कभी ऐसा होगा कि दुनिया में हिंसा ना हो और सिर्फ शांति ही हो?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, इसी के लिए हमे कार्य करते रहना चाहिए। सारी दुनिया एक ही परिवार है - वासुदेव कुटुम्बकम।

art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality

प्रयत्न और प्रार्थना, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं

बैंगलोर आश्रम, २२ नवंबर २००९

अगर हम रोज़ प्रेम व्यक्त करते रहते हैं तो वो सिर्फ़ शब्द रहे जाते हैं जिनमें भाव नहीं रहता। अगर रोज़ कहते रहो, "मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ।" तो अंतत: ये हो जाता है, "मैं तुम्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता।" ज़रुरत से अधिक अभिव्यक्ति बात को बिगाड़ देती है। अगर बिलकुल अभिव्यक्त ना करो, तब भी ठीक नहीं है। संतुलन होना चाहिये। जैसे कि एक बीज को अगर सतह पर ही रख दोगे तो वो उगेगा नहीं, और ना ही तब उगेगा जब वो धरती के भीतर बहुत गहरा दब गया हो। इसे सही गहराई पर बोने की आवश्यकता है, संतुलन की आवश्यकता है।

प्रश्न: औरा को साफ़ करने में नींबू का क्या महत्व है?
श्री श्री: तुमने कभी माइक्रोस्कोप से नींबू के रस को देखा है? वो सूर्य की किरणों की तरह दिखता है। विटामिन सी को माइक्रोस्कोप से देखो तो वो सूर्यमुखी के फूल की तरह दिखता है। कुछ पदार्थ जैसे कि नमक, नींबू और सही मात्रा में मिर्च ऐसी शक्ति रखते हैं कि वो नकरात्मक ऊर्जा को मिटा देते हैं। यहाँ श्रद्धा भी काम करती है। अगर तुम कोई दवा भी लेते हो और तुम्हें उस दवा या उसे देने वाले डाक्टर पर भरोसा नहीं है तो शायद वो दवा तुम पर असर ना करे।

प्रश्न: शक्ति और भक्ति कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
श्री श्री: विश्राम से तुम भक्ति को प्राप्त करते हो। जब तुम विश्राम के साथ में प्रयत्न लगाते हो तब तुम्हें शक्ति मिलती है। प्रयत्न और प्रार्थना, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। किसी कार्य की पूर्णता के लिये दोनों की आवश्यकता है। आमतौर पर महिलायें केवल प्रार्थना करती हैं और पुरुष केवल प्रयत्न करते हैं। प्रार्थना और प्रयत्न दोनों को ही करना होगा।

प्रश्न: मैं परिवार और आजीविका में किस को चुनू, ये तय नहीं कर पा रहा हूँ।
श्री श्री: आजिविका पर ध्यान दोगे तो माता पिता भी तुम पर प्रसन्न होंगे। अगर आजिविका के अभाव में तुम घर पर बैठ जाओ तो क्या उन्हें अच्छा लगेगा? नहीं! इस तरह से परिवार और आजिविका दोनों एक साथ आ गये।

प्रश्न: मैं जीवन में कभी सफल नहीं हुआ। मैं अपने आप को अपने माता पिता पर बोझ समझता हूँ।
श्री श्री: आलस छोड़ो और अधिक नुक्ताचीनी ना करो। जो भी काम मिले उसे करो। ये ना सोचो कि कोई काम तुम्हारे लिये तुच्छ है। ये ना सोचो कि तुम सफल नहीं हो। हर काम आदर और प्रतिष्ठापूर्ण है।

प्रश्न: गुरुजी, मेरे परिवार में कुछ अलगाव है। एक सदस्य ’आर्ट आफ़ लिविन्ग’ को मानता है। दूसरा सदस्य किसी और आध्यात्मिक मार्ग, प्राणिक चिकित्सा की पद्दति पर चलता है।
श्री श्री: दोनों अपने अपने आध्यात्मिक मार्ग पर दृढ़ रहो।

प्रश्न: ध्यान करते समय, मन कई जगह जाता है। एक बार आपने कहा था कि, "मन जहां भी जाये उसे जाने दो।" क्या इसका अर्थ हुआ कि मेरा और मेरे मन का अस्तित्व अलग अलग है? अगर ये सच है तो मेरा मन क्या है और मैं कौन हूं?
श्री श्री: जब तुम अपने मन को रोक कर रखने की कोशिश करते हो तो ये इधर उधर भागता है। जब तुम इस भागते मन को देखते हो तो तुम्हें ये एहसास होता है कि तुम अपने मन से बड़े हो। जब तुम ये जान लेते हो कि तुम मन नहीं हो, शरीर नहीं हो, कुछ और नहीं हो, जो बचता है वही तुम हो। अपने आप को जान कर तुम श्रेष्ठतम को जान लेते हो। तुम पाते हो कि तुम ही सर्व हो। तुम ही मन हो। तुम ही विचार हो। तुम ही पूरा संसार हो। पर ये होता है दूसरे स्तर पर। जब तुम स्वयं को जान लेते हो, तुम दैवी शक्ति को जान लेते हो। सर्व खल्विदम ब्रह्म - सब वही एक शक्ति है। ये जानकर ज्ञान में स्थापित हो जाओ।

प्रश्न: गुरुजी, एक बार आपने कहा था कि इच्छायें आती हैं, जाती हैं। जिन इच्छाओं को पूर्ण होना होता हैं वे रहती हैं, बाकी गायब हो जाती हैं। पर उन इच्छाओं का क्या जो रहती हैं, पर पूरी नहीं होती?
श्री श्री: प्रतीक्षा करो और दृढ़ रहो।

प्रश्न: मैं यहां आने के लिये इतना पागल क्यों रहता हूं?
श्री श्री: क्योंकि मैं भी ऐसा ही हूँ। कोई अमीर ही दूसरे को अमीर बना सकता है। कोई मुक्त ही दूसरों को मुक्त करा सकता है। एक भक्त ही दूसरों में भक्ति को जगा सकता है। ईशवर से प्रेम करने वाला व्यक्ति दूसरों को भी वैसा बना देता है। जो तुम्हारे भीतर है, वही दूसरे तुम से ले पाते हैं। जो तुम्हारे भीतर है, वही तुम दूसरों में देखते हो।

प्रश्न: जीवन साथी(Soul mate) क्या है?
श्री श्री: पहले अपनी आत्मा (Soul) से मिलो, फिर जीवन साथी (Soul mate) के बारे में जान सकते हो।



art of living TV

© The Art of Living Foundation For Global Spirituality