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आध्यात्म की शुरूआत आनंद से होती हैं !!!


२३ मई २०११, बैंगलुरू आश्रम 

प्रश्न : गुरुजी क्या अध्यात्म को विज्ञान के द्वारा समझाया जा सकता है ? कभी कभी मुझे इस सृष्टि पर आश्चर्य होता है जिसे अभी भी विज्ञान के द्वारा समझना शेष है | क्या वेद में इसका समाधान है ?
श्री श्री रवि शंकर: योग की शुरुआत आनंद से होती है, जब आप आनंदमय होते हैं  तो आप सत्य की खोज शुरू कर देते हैं और आपकी यात्रा की शुरुआत हो जाती है | यह भी ठीक है ‘विस्मयो योग भूमिका | आध्यात्म की शुरुआत आनंद से होती है और फिर वह हर समय मनोरंजन उद्यान मे रहने के सामान है | आप आश्चर्य चकित हो जाते हैं, ओह, यह ऐसा है ? यह संसार क्या है ? इसमें विभिन्न किस्म के वृक्ष पौधे, फूल, पत्तियां ,सब्जियां, फूल  और लोग है फिर यह सब क्या है ? जब इस प्रकार का विचार आप मे आते है, तो ज्ञान का उदय होता है |

प्रश्न : गुरुजी यदि हम परिस्तिथि जैसी है उसे वैसे ही स्वीकार करते , तो हम सृजनात्मक कैसे हो सकते हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: यह आप ने आर्ट ऑफ लिविंग बेसिक कोर्स पार्ट १ मे समझा होगा, ठीक है ? स्वीकार करने का अर्थ कृत्य न करना नहीं होता है | वास्तव मे स्वीकार करने का अर्थ वर्तमान परिस्तिथि को समझना होता है
हर बच्चे को यह मालूम होना चाहिए की वह विश्व की हर परम्परा का अंश है | पाकिस्तान के कई पूर्वज हिंदू, बौद्ध, और जैन धर्म से थे और उनके कई पूर्वज इन प्राचीन संस्कृति से ही थे | कुछ तो पारसी भी थे | पाकिस्तान मे बच्चों को उपनिषद, थोडा योग और ध्यान सिखाया जाना चाहिए | योग का जन्म पाकिस्तान मे हुआ था | जन्म का तात्पर्य है की उसे वहां पर सिखाया और उसका प्रचार किया जाता था जिसे आज हम पाकिस्तान कहते हैं |
हजारों लोग सब किस्म के उपदेशों का पालन करते है क्योंकि उन्हें अध्यामिक ज्ञान के बारे मे पता नहीं है | इसीलिए हमारा यह महत्पूर्ण कर्त्तव्य है कि हम लोगों को अध्यात्मिक शिक्षा प्रदान करें | क्या आप को ऐसा नहीं लगता ?
इसीलिए हम को और भी सक्रिय होना पड़ेगा कि समाज मे अच्छे काम करने के लिए कैसे कट्टरपन करुणा और प्रतिबद्धता मैं परिवर्तित हो सके |  इसके लिये हम सब को मिल जुल कर काम करना होगा |

प्रश्न : गुरु जी क्या सुदर्शन क्रिया से डी.एन.ए. में बदलाव आ सकता है ?
श्री श्री रवि शंकर: हां |

प्रश्न : गुरुजी आलोचना को स्वीकार करने के लिए मैं अपने आप को कैसे मजबूत कर सकता हूँ ?
श्री श्री रवि शंकर: आप स्वीकार करें या ना करें आलोचना तो हो चुकी है, ठीक है ? आप के पास कोई विकल्प ही नहीं रह जाता | किसी के बोलने के बाद ही आप को यह समझ मे आता है कि उन्होंने आपकी आलोचना की है | उनके बोलने के पहले आप को इसके बारे मे कैसे मालूम पड़ेगा ? किसी की आलोचना करने से पहले इसके बारे मे मालुम नहीं होता है | उनके आलोचना करने के बाद वह घटना घट चुकी होती है | फिर आपके पास क्या विकल्प रह जाता है ? यदि आप उसे स्वीकार नहीं करते तो आप के साथ क्या होगा ? आप और दुखी हो जायेंगे | यदि आप बुद्धिमान है तो आप उसे स्वीकार करेंगे और यदि आप बुद्धिमान नहीं है तो आप उस पीड़ा से पीड़ित रहेंगे | इसका यही उपाय है और आप इसे कर सकते हैं |

प्रश्न: गुरूजी, मैने देखा है कि आपकी मुझ पर अपार कृपा है | मुझे जो कुछ भी चाहिए या मेरी कोई भी इच्छा हो तो आप उसे पूरा कर देते हैं | ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैने कुछ इच्छा की हो और वह पूरी नहीं हुई है | परन्तु मेरी मांगे ऐसी हैं कि उनका अंत ही नहीं हो रहा है, और मुझे अब अपने इस व्यहवार पर शर्म आने लगी है, इसके लिए मैं क्या करूँ ?
श्री श्री रवि शंकर: अब आप इसके बारे में सजग हो गए हैं तो अब आप सही पथ पर आ गए हैं | अब आपकी गाड़ी सही मार्ग पर आ गयी है और उसने यू टर्न ले लिया है | कुछ बड़ा मांगो | आप कुछ छोटी चीज़ क्यों मांगते हैं ? और सिर्फ अपने लिए ही नहीं मांगे, सब के लिए मांगे | आप जो भी मांगेगे, वह आपको मिल जाएगा |

प्रश्न: जिस स्कूल में मेरा बालक पढ़ रहा हैं, उससे मैं खुश नहीं हूं | क्या मैं उसे उस स्कूल से निकाल कर अपने घर में ही शिक्षा प्रदान करूं ?
श्री श्री रवि शंकर: नहीं, क्योंकि स्कूल का वातावरण ठीक नहीं हैं, इसलिए घर में रहना भी ठीक नहीं हैं | फिर बच्चे मंद बन जायेंगे | हमको स्कूल की व्यवस्था में सुधार लाना होगा और यह कार्य हो रहा है | हम कई स्कूल शुरू कर रहे हैं | हमने भारत में अब तक करीब १०० स्कूल खोले हैं |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, मेरी सास दुसरे धर्मों के लोगो को प्रसाद वितरित नहीं करती | उनका तर्क हैं कि जिसे प्रसाद का महत्त्व नहीं समझता, उन्हें लाभ नहीं होगा | मैं कैसे उन्हें अन्यथा सोचने के लिए कहूं ?
श्री श्री रवि शंकर: कोई बात नहीं, यदि वो नहीं करती तो आप उसे हर किसी में वितरित करें | प्रसाद सामान्यतः स्वादिष्ट व्यंजन होता है | हर किसी की अपनी व्यक्तिगत राय होती है, उसे रहने दीजिए | आप अपनी राय रखे, इसमें कोई द्वंद नहीं है | आप वह करे जो आपको करना है |

प्रश्न: क्या महत्वपूण हैं: वेदांत, ज्ञान या प्रेम ?
श्री श्री रवि शंकर: वेदांत, ज्ञान और प्रेम हर समय साथ में चलते हैं | कभी किसी को महत्त्व दिया जाता है तो कभी किसी अन्य को महत्त्व दिया जाता है | इसलिए आपको तीनों को साथ में लेकर चलना होगा |
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"प्रेम की मांग करने से प्रेम मर जाता है"

१४ अगस्त, २०१०, पेनांग, मलेशिया

प्रश्न : मैं इस साल की शुरुवात से ही आर्ट आफ़ लिविंग के साथ जुड़ी हूं, और मेरे स्वास्थ्य में इससे बहुत सुधार आया है। मैं इन प्रक्रियाओं को करने के बाद बहुत अच्छा महसूस करती हूं। मुझे पांच साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हुआ था, पर मैंने पूरी तरह से अपना इलाज कर लिया है।

श्री श्री रवि शंकर
: तुम्हें पता है कि शोध ये मालूम हुआ है कि हमारे शरीर में ३०० जीन्ज़ हैं जो कि हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह इत्यादि के लिये ज़िम्मेदार होते हैं। जब हम सुदर्शन क्रिया और प्राणायाम करते हैं तो इन जीन्ज़ को बीमारियों पैदा करने से रोका जाता है। वैज्ञानिक लोग शोध से इस निष्कर्ष पर आये हैं। यहां आने से पहले मैंने एक लेख देखा जिसे किसी ने मुझे भेजा था – न्यू यार्क के एक अस्पताल में ॐ का उच्चारण करने की सलाह दी जाती है। हृदय रोग के इलाज से पहले वे आपसे ॐ का उच्चारण करवाते हैं, ध्यान और विश्राम करवाते हैं।


प्रश्न : ग्लोबल वार्मिंग एक बहुत ही गंभीर समस्या हो गई है। सभी जगह प्राकृतिक आपदायें हो रही हैं। इस ग्रह के निवासी होने के कारण हमें क्या करना चाहिये? लोगों को त्रासदियों से परेशान देखकर मुझे दुख होता है। मैं क्या योगदान कर सकता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
हमें जागरूकता बढ़ानी है। आर्ट आफ़ लिविंग के साथ जुड़ जाओ। हम हर रोज़ कहीं ना कहीं पेड़ लगाते हैं। ग्लोबल वार्मिंग की रोकथाम के लिये और अधिक लोगों को शाकाहारी बनने की आवश्यकता है। कहते हैं कि अगर विश्व की १०% जनसंख्या भी शाकाहारी हो जाये तो ग्लोबल वार्मिंग की समस्या पूरी तरह हल हो जायेगी। जानवरों के कत्लख़ानों से उपजी मीथेन गैस ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ाने में एक अहम्‍ भूमिका निभाती है। एक पाउंड मांस के उत्पादन में जितना धन आउर ऊर्जा खर्च होती है, उतने में तो ४०० लोगों को शाकाहारी भोजन खिलाया जा सकता है! तो, अधिक लोगों को शाकाहारी बन जाना चाहिये, इससे पर्यावरण में सुधार आयेगा।

प्रश्न : रिश्तों को स्वस्थ रखने का क्या उपाय है?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे इस क्षेत्र का अनुभव नहीं है! (हंसी) फिर भी मैं कुछ सलाह दे सकता हूं।

पहली सलाह है महिलाओं के लिये – कभी भी अपने आदमी के अहं को ठेस मत पहुंचाना। हमेशा उसका उत्साह बढ़ाओ, अहं को सहारा दो। चाहे पूरी दुनिया उसे नाकारा कहे, तुम ऐसा मत कहना! तुम उससे कहना कि उसके पास विश्व का श्रेष्ठतम दिमाग है – वो उसका प्रयोग नहीं करता है इसका मतलब ये नहीं है कि उसके पास वो दिमाग नहीं है! तुम्हें हमेशा कहना चाहिये कि वो सर्वश्रेष्ठ आदमी है। हमेशा उसके अहं का पोषण करो। अगर तुम उसे नाकारा कहोगी तो वो सचमुच ऐसा ही हो जायेगा।

अब एक सलाह है पुरुषों के लिये – कभी भी स्त्री की भावनाओं को ठेस मत पंहुचाना। हां, वो कभी कभी अपने घरवालोंके बार में शिकायत कर सकती है, अपने भाई के बारे में, अपने पिता या मां के बारे में, पर तुम कभी उसकी बात से सहमति मत जताना। अगर तुमने उसकी बात से सहमति जताई तो वह पलट कर तुम्हें ही बुरा भला कहेगी। कभी भी उसके परिवार की बेइज़्ज़ती मत करना। उसे कभी भी ख़रीददारी करने से या किसी आध्यात्मिक कार्यक्रम में जाने से मत रोकना। अगर वो ख़रीददारी करने जाना चाहे तो उसे अपना क्रेडिट कार्ड दे देना।

अब एक सलाह, दोनों के लिये – कभी भी एक दूसरे से प्रेम का प्रमाण मत मांगना। ये मत पूछना, ‘क्या तुम मुझे सचमुच प्रेम करते हो? तुम मुझे पहले जैसा प्रेम नहीं करते।’ अपने प्रेम को प्रमाणित करना बहुत बोझिल कार्य है। अगर कोई तुम से कहे कि अपने प्रेम को प्रमाणित करो तो तुम कहोगे, ‘हे भगवान! मैं इस व्यक्ति को कैसे बताऊं?’ हर काम कुछ ख़ास अदाज़ में और मुस्कुराते हुये करो।

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"सदभाव कहीं बाहर से नहीं लाया जा सकता है, इसे भीतर से ही लाना है"

प्रेस मीटिंग, दोपहर १२.०० बजे, १३ अगस्त २०१०, मलेशिया

प्रश्न : आप ११ साल बाद मलेशिया आये हैं। इस बार मलेशिया आने की कोई ख़ास वजह है?

श्री श्री रवि शंकर :
यहां के उन लोगों का प्रेम जो कि इतने सालों से भारत आते रहे हैं...मैंने उनसे वादा किया था कि मैं इस साल अवश्य ही मलेशिया आऊंगा, और मुझे अपना वादा पूरा करना था।

प्रश्न : क्या आपको इतने सालों के बाद मलेशिया में कुछ फ़र्क दिख रहा है?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत फ़र्क है...बुनियादी सुविधाओं में विकास हुआ है...बाकी का अभी मुझे देखना बाक़ी है, मैं कल रात ही तो आया हूं। अभी तो आया हूं, एक ही रात में कोई विचार नहीं बना सकता! आज मैं लोगों से मिलूंगा, और कल से पेनांग में विश्व के दक्षिण पूर्वी भाग से आये सभी शिक्षकों के साथ एक चार दिवसीय कार्यशाला होगी, तथा मौन, ध्यान और साधना होगी। हां, मलेशिया से कई लोग नियमित रूप से हमारे बैंगलोर स्थित आश्रम में आते रहे हैं। मैं उनसे योरोप और अमरीका में भी मिलता रहता हूं, और वे हमेशा पूछते रहते हैं, ‘आप कुआला लंपुर कब आयेंगे? मलेशिया कब आयेंगे?’ तो, इस बार मैंने समय निकाल ही लिया!

प्रश्न : आप तो हमेशा विश्व भ्रमण करते रहते हैं। विश्व में हो रहे बदलाव को आप किस नज़र से देखते हैं?

श्री श्री रवि शंकर
: आप जानते हैं, विश्व का मतलब ही बदलाव है। कुछ बदलाव लाभदायक सिद्ध हुये हैं और कुछ विघटनशाली हैं। आप देखें तो पायेंगे कि मानवीय गुणों में विघटन आया है, तनाव बढ़ रहा है, प्रदूषण और पर्यावरण की समस्यायें हैं, परिवार छोटे-छोटे परिवारों में विभाजित होते जा रहे हैं, आर्थिक रूप से असुरक्षा बढ़ी है, विश्व के बाज़ार के विघटन से लोगों को बहुत फ़र्क पड़ा है। पर साथ ही बहुत से सकरात्मक विकास कार्य भी हुये हैं। लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो गये हैं, करुणा बढ़ी है, लोग विनाश से त्रस्त लोगों की मदद करने के लिये आगे आ रहे हैं। तो, आप देख सकते हैं कि दोनों ही तरह के बदलाव हो रहे हैं। आवश्यकता है समाज में सकरात्मकता को बढ़ावा देने की और तनाव को कम करने की। और ऐसा संभव करने के लिये ये श्वांस प्रक्रियायें आवश्यक हैं। इससे लोगों में अपनापन बढ़ता है, विभिन्न संप्रदायों में, तथा विभिन्न उम्र के लोगों में एक जुड़ाव आता है।

प्रश्न : गुरुजी, हम पत्रकार बहुत तनाव का सामना करते हैं। हमें खबरे एकत्र कर के रिपोर्ट कर के लेख लिखने पड़ते हैं। ध्यान करने का समय नहीं है। ध्यान के अलावा कोई विधि है जिस से हम उस तनाव से निबट सकें जो कि अपने कंप्यूटर के सामने होने पर या अपने बौस की वजह से हमें होता है?

श्री श्री रवि शंकर :
कुछ लंबी गहरी सांसें! आप ये नहीं कह सकते कि आपके पास सांस लेने का समय नहीं है! कुछ सांसें लो और ये जान लो कि उस परेशानी से निबटने की क्षमता तुम में है। ये भरोसा रखो कि, ‘मुझ में किसी भी समस्या से निबटने की क्षमता है। मैं तनाव से निबट सकता हूं। मुझ में ये क्षमता है।’ इस से स्वयं में विश्वास जागृत होगा।

प्रश्न : आप खुद को तनाव से मुक्त कैसे करते हैं? आप तो हर समय ही व्यस्त रहते हैं...

श्री श्री रवि शंकर
: मैं तनाव को अपने भीतर ही नहीं आने देता हूं! तनाव से मुक्त होने के लिये पहले तनाव को भीतर लेना होना, है कि नहीं? मैं उसे वही से फ़िल्टर कर देता हूं।

प्रश्न : ये आप कैसे करते हैं?

श्री श्री रवि शंकर
: ये अभ्यास से होता है, साथ ही एक बृहद दृष्टिकोण से कि सब काम ठीक तरह से हो जायेगा। देखो, हमारे पास कुछ ही समय होता है और बहुत से काम रहते हैं। इतना कुछ हम ऊर्जा के निम्न स्तर से कैसे कर सकते हैं? तो, हमें अपनी ऊर्जा को बढ़ाना होगा, कार्य को कुशलता से करना होगा, समय का ठीक उपयोग करना होगा। इस सब के लिये हम आर्ट आफ़ लिविंग के कोर्स सिखाते हैं। ये कोर्स इन तीनों ही आयामों में मदद करता है। ये आपके जीवन काल में उत्कृष्ठ गुणवत्ता जगाता है और आपकी ऊर्जा के स्तर को बढ़ाता है, अंतर्ज्ञान को बढ़ाता है।

प्रश्न : आप विश्व भ्रमण में इतने व्यस्त रहते हुये भी अपने स्वास्थ्य को कैसे बनाये रखते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं चिंता नहीं करता हूं! मैं बिल्कुल चिंता नहीं करता। और जब आप उच्च ऊर्जा के क्षेत्र में होते हैं, और सब खुश रहते हैं, और आप अपनी ऊर्जा के स्तोत्र से जुड़े होते हैं तो आप एक कठिन दिनचर्या भी संभाल सकते हैं।

प्रश्न : क्या आपका भोजन कुछ विशेष होता है, और क्या आप व्यायाम करते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं २० मिनट व्यायाम करता हूं और शाकाहारी भोजन लेता हूं।

प्रश्न : आपके इतने सारे अनुनायी क्यों हैं? क्या वे इसलिये आपके अनुनायी है क्योंकि आप एक गुरु हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये तो आप को उनसे ही पूछना होगा! उन सब के पास अलग अलग कारण हो सकते हैं – मैं उनकी तरफ़ से नहीं बोल सकता हूं। एक चीज़ मैं देखता हूं कि लोग इतने प्रसन्न और कृतज्ञ हो जाते हैं कि वे अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिये आते हैं। दुनिया में बहुतों की कायापलट हो रही है। लाखों लोग अपने निजी जीवन में, कामकाजी जीवन में, सामाजिक जीवन में सकरात्मक रूप से बदल रहे हैं। दुनिया में कई जगह ये कोर्स हो रहे हैं – विद्यालयों में, कारागृहों में, और व्यवसायिक क्षेत्र में भी...। और समाज के ग़रीब तबके में, हम उन्हें शिक्षित करते हैं, स्वालंबी बनाते हैं, उनका आत्मविश्वास बढ़ाते हैं।

प्रश्न : आपने लोगों में आ रहे बदलाव के बारे में बताया। क्या ये बदलाव आपका अनुनायी बनने से आता है या वे खुद ही बदल जाते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं श्रेय लेने में आगे रहता हूं!
मुझे लगता है कि सभी में क्षमतायें होती हैं, उन्हें बस ज़रा से मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिये मैंने विभिन्न कोर्स बनाये हैं। बच्चों के लिये कोर्स बनाये हैं कि वे तनाव मुक्त हो सकें। हाल ही में शिकागो में एक कौन्फ़रेंस में शिक्षा के क्षेत्र के विशेषज्ञ आये थे और वे अपने अनुभव बांट रहे थे कि कैसे एक ज़िले के विद्यालयों में ये कोर्स करने के छः महीने बाद बहुत बदलाव आया है। उनमें से एक बड़ा ही विकट शहरी विद्यालय था जिसमें ड्रौपाउट दर और अपराध की दर घट गयी थी। कोर्स से पहले अपराध दर २६८ थी जो कि कोर्स के छः महीने बाद घट कर ६० हो गयी! इस से ये स्पष्ट है कि बच्चों को अहिंसक तौर तरीके सिखाये जा सकते हैं।

प्रश्न : मनुष्य ऐसी स्थिति में रहते हैं जहां सब कुछ उनके नियंत्रण में नहीं होता है। विश्राम करना, ध्यान करना, या लंबी गहरी सांसें लेना भी उनके लिये संभव नहीं हो पाता है। क्या जीवन को सुचारू रूप से चलाने का और कोई तरीका है?

श्री श्री रवि शंकर :
एक कहावत है कि तुम युद्धक्षेत्र में जाकर तीरंदाज़ी सीखना शुरु नहीं कर सकते हो। तुम्हें युद्ध की स्थिति आने से पहले ही तीरंदाज़ी सीखनी होगी। तो उस क्षण में जब तुम तनाव महसूस करते हो तो तुम कुछ नहीं कर पाते हो, पर उस स्थिति में आने से पहले कुछ ऐसा करो कि तनाव की वो स्थिति आने ही ना पाये। ‘तुम मंच पर जाकर कोई नई ताल नहीं सीख सकते हो,’ हांलाकि मैं इस कहावत को नहीं मानता असल में कुछ भी असंभव नहीं है।

मैं कहूंगा कि अपने बर्ताव को बदलो, अपने खान पान को बदलो, और जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलो, अपनी बातचीत की शैली को बदलो, आलोचना से निबटने की क्षमता जगाओ... मोटे तौर पर, जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने से बहुत फ़र्क पड़ता है। परमात्मा से निकटता महसूस करने से तुम्हारी कार्यक्षमता बढ़ जाती है।

तो, मैं तुम्हें कई प्रक्रियायें दूंगा, जिन्हें तुम कर सकते हो – सिर की मालिश, आंखों का व्यायाम, सही भोजन, पैदल घूमने जाना, सूर्यास्त को देखना...शायद कुआला लंपुर में इन ऊंची इमारतों की वजह से सूर्यास्त देखना संभव नहीं हो! प्रकृति के साथ रहें। अफ़सोस है कि आमतौर पर हम बस सोफ़े पर बैठ कर टेलिविज़न देखते हैं, और तुरंता भोजन खाते हैं। इस का असर समाज में नज़र आ रहा है। हमें एक स्वस्थ समाज बनाने के लिये अपनी आदतों को बदलना होगा।

प्रश्न : आपको किन चीज़ों से प्रसन्नता होती है?

श्री श्री रवि शंकर :
जब हर आंसू एक मुस्कुराहट में परिवर्तित हो जाता है तो मुझे प्रसन्नता होती है। और ऐसा हर समय होता रहता है।

प्रश्न : हम जानते हैं कि प्रेम से हम एक बुरे व्यक्ति को अच्छा व्यक्ति बना सकते हैं, बुरी आदतों को सुधार सकते हैं। पर हम प्रेम से अपराधियों और माफ़िया के लोगों को कैसे सुधार सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ओह! हमारे पास इसके कई उदाहरण हैं! आप जानते हैं कि हम कारागृहों में कोर्स कराते हैं। हर अपराधी के भीतर एक प्रताणित व्यक्ति मदद के लिये पुकार रहा होता है। तो गर आप उस प्रताणित व्यक्ति को चंगा कर दें तो अपराधी ग़ायब हो जाता है। ये हम एक बहुत बृहद स्तर पर कर रहे हैं। विभिन्न सामाजिक मान्यताओं वाले इस देश मलेशिया में एक अपनेपन के भाव का जागृत होना बहुत आवश्यक है। सभी को सदभाव के साथ रहना है। सदभाव कहीं बाहर से नहीं लाया जा सकता है, इसे भीतर से ही लाना है। ये भीतरी सदभाव और सौहार्द तभी आता है हब हम तनाव से मुक्त हो और जीवन के प्रति एक बृहद दृष्टिकोण रखते हों।

प्रश्न : सुदर्शन क्रिया से बीमारियों से लड़ने में क्या मदद मिलती है?

श्री श्री रवि शंकर
: सुदर्शन क्रिया से कई बीमारियों की रोकथाम हो जाती है। ओस्लो यूनिवर्सिटी के एक प्रोफ़ेसर जो कि जीन्ज़ पर काम कर रहे हैं, कहते हैं कि हाइपर्टेंशन और कैंसर इत्यादि को बढ़ावा देने वाले ३०० क्रोमोज़ोम, प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया की वजह से उन बीमारियों को बढ़ावा नहीं दे पाते हैं। तो, अगर कोई व्यक्ति नियमित रूप से इनका अभ्यास करता रहे तो इन बीमारियों के होने की संभावना घटती जाती है।

प्रश्न : हम प्रेम की शक्ति का प्रयोग कर के प्राकृतिक प्रकोपों को कैसे रोक सकते हैं या शांत कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये धीरे धीरे होगा। अगर तुम पेड़ पौधों से और अधिक प्रेम करने लगो तो इसका प्रभाव ज़रूर होगा। तुम जानते हो कि खनन कार्यों से हमने सबसे बड़ी विनाशकारी समस्या बना रखी है। हम पृथ्वी के अंदरूनी भाग पर बमबारी करते हैं। पृथ्वी जीवंत है, जड़ नहीं। तो जब हम हम उसके पेट में बम फोड़ते हैं तो उस में कंपन होता है, और अधिक भूकंप आते हैं। प्राकृतिक आपदाओं का एक बहुत बड़ा कारण ये खनन कार्य हैं। दूसरा कारण है पेड़ों को काटना। पेड़ लगाने के प्रति तो जागरूकता हुई है, पर खनन कार्यों में बमबारी से हो रही हानि के प्रति लोग चुप हैं। हमें इसे संभालना हैं।

प्रश्न : विकास कार्यों में और धरती को बचाने में समतुलना कैसे लाई जाये?

श्री श्री रवि शंकर:
साइकिल पर अपना संतुलन कैसे बनाते हो? उसी तरह! प्राचीन भारत में एक प्रथा थी कि यदि आप को एक पेड़ काटना पड़े तो उसे काटने से पहले एक प्रणाली अपनाई जाती थी, जिसमें उस पेड़ से वादा किया जाता था कि ५ नयें पेड़ लगाये जायेंगे, तदुपरान्त ही उस पेड़ से उसे काटने की अनुमति मांगी जाती थी। ये पेड़ से बात करने जैसा था।

आदिवासी इलाकों में लोग पर्यावरण की बहुत देखभाल करते थे। वे पहाड़ों, नदियों, पेड़ों को पूजनीय मानते थे। पूजा के भाव से प्रकृति का सम्मान करने लगते हैं, और उसकी देखभाल करते हैं। नेटिव अमरीकन प्रकृति को पूजनीय मानते थे और वे कभी बमबारी से धरती को नहीं फोड़ सकते थे।

प्रश्न : योग और सुदर्शन क्रिया में क्या अंतर है?

श्री श्री रवि शंकर :
अफ़सोस है कि योग को केवल शारीरिक व्यायाम तक ही सीमित समझा गया है। उसके आगे आती है सांस, और फिर आता है मन। ऊर्जा के भीतरी स्तोत्र तक पंहुचना बहुत आवश्यक है। ध्यान के बिना योगासन पूर्ण नहीं हैं। सुदर्शन क्रिया तुम्हें गहरे ध्यान में ले जाती है जहां शरीर, सांस और मन एक ही ताल में आकर अपने भीतरी स्तोत्र से जुड़ जाते हैं।

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