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"सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं, और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें"

जुलाई १०, वेनकोवर, कैनेडा :

कोई भी तकनीक काम नहीं करती! वो तुम हो जिसके कारण तकनीक काम करती है, तुम्हारी श्रद्धा। जब तुम्हारा इरादा है और उस पर तुम ध्यान देते हो तो वैसा होने लगता है। अगर तुम्हारा इरादा नहीं है, तो वो काम नहीं करेगी। सुदर्शन क्रिया का प्रभाव होता है क्योंकि उसके पीछे इरादा है। किसी भी काम की पूर्ति के लिए उसके लिए इरादा, फिर उस पर ध्यान देना और वो होने लगता है।

अब हम कुछ प्राणायाम करते हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम से शुरु करते हैं। जब हमारी बाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का दाहिना हिस्सा सक्रिय होता है, और जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का बाहिना हिस्सा सक्रिय होता है। दिमाग का दाहिना हिस्सा संगीत है और दिमाग का बाहिना हिस्सा तर्क। तो जिनकी दाहिनी नासिका सक्रिय है वो मुझे बेहतर समझ सकते हैं। और अगर दोनो सक्रिय हैं तो आप ध्यान में है। केवल दाहिनी नासिका सक्रिय होने से ध्यान नहीं होता। जब भी आप अपनी आँखे बंद करते हैं यां खोलते हैं तो आपकी स्थिति बदल जाती है। भोजन के बाद दाहिनी नासिका सक्रिय होनी चाहिए। जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो पाचन प्रक्रिया ५० प्रतिशत तेज़ होती है।

बाहिनी यां दाहिनी नाड़ी की सक्रियता बदलती रहती है क्योंकि हम प्राणों के सागर में रहते हैं।किस समय कौन सी नासिका सक्रिय होगी यह स्थान और वातावरण पर निर्भर करता है। अगर आप किसी मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च यां किसी भी ऐसी जगह के पास जाते हैं जहाँ आध्यात्मिक उर्जा अधिक है तो दोनो नासिकाएं सक्रिय होती हैं। जब किसी पूजा के स्थान पर लोग पूर्ण भक्ति में होते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक गुरु से मिलते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं तो आपकी आवाज़ आपको स्वयं बता देगी।

प्रश्न : गुरुजी हमे वादा कीजिए कि आप हर साल वेनकौवर आएंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
आपको पता है, मेरे लिए साल में ७०० दिन हैं!

प्रश्न : आप कहते हैं ध्यान में बैठते समय कोई प्रयत्न नहीं करना, पर मन का एक हिस्सा कुछ प्रयत्न करना चाहता है क्योंकि कुछ ना करने का भाव मन में उठता है। उस भाव के साथ क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
भस्त्रिका और आसन करो। उसमे प्रयत्न लगाओ। जब आप ध्यान के लिए बैठते हैं तो कोई प्रयत्न लगाने की आवशयकता नहीं है। जैसे ट्रेन पकड़ने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है पर एक बार जब आप ट्रेन में बैठ गए तो केवल आराम से बैठना ही होता है। ट्रेन में भागने से आप अपने लक्ष्य पर जल्दी नहीं पहुँचते। एक बार चढ़ने के बाद आप केवल विश्राम करते हैं।

प्रश्न : इच्छाओं पर नियंत्रन कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर :
इस क्षण में रहो। इच्छा का अर्थ है किसी आने वाले क्षण में सुख मिलने की चाह। अभी इसी क्षण में खुश और आनंदित रहो, बच्चों की तरह। अगर आप एक बच्चे से पूछते हैं कि उन्हें क्या चाहिए तो वो सहज ही कहता/कहती है - ’कुछ नहीं’, क्योंकि वो वर्तमान क्षण से खुश हैं।

प्रश्न : क्या आप लोगों का औरा देख सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
इसमें कौन सी बड़ी बात है? तुम भी देख सकते हो।

प्रश्न : सिर दर्द और थकान से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
योगा और प्राणायाम से।

प्रश्न : आप कैसे जान सकते हैं कि कोई उत्तर भीतर से आ रहा है यां तर्कसंगत मन से?

श्री श्री रवि शंकर :
इसका कोई मापदंड नहीं है।मन जितना शांत होता है, तुम्हे सही उत्तर मिलता है।

प्रश्न : नकारात्मक विचारों के प्रवाह को कैसे रोक सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
नकारात्मक विचार तीन कारणों से होते हैं - अगर रक्त का प्रवाह सही नहीं है,लसीका प्रणाली (lymphatic system) सही नहीं है यां मल त्याग (bowel moment) अनियमित है। आप फल आहार से अपनी आत्रें साफ कर सकते हैं। प्राणायाम से भी मदद मिलेगी। कुछ दिनों के लिए त्रिफला (आयुर्वेदिक परिशिष्ट) ले सकते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान करो। तुम्हे फर्क अवश्य महसूस होगा। सामुहिक साधना से भी मदद मिलेगी।

प्रश्न: विचार अंदरूनी हैं यां बाहरी?

श्री श्री रवि शंकर :
विचार मन में है। मन तुम्हारे चारों और है - अंदर भी और बाहर भी।

प्रश्न : हम ईश्वर के सामने रोते क्यों हैं? हम स्वयं को ईश्वर के पास कैसे ला सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम आंसु बहाते हो तो तुम्हे राहत महसूस होती है। मन की छाप धुल जाती है।
ईश्वर से निकटता के लिए तुम्हे कोई चेष्टा करने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर तुम्हारे सब से पास है। तुम खुद को कुछ भी मानते हो - अच्छा यां बुरा, ईश्वर तुम्हारे चारों और है। जैसे हवा तुम्हारे चारों और है। ईश्वर से कोई बचाव नहीं है, जैसे हवा तुम्हारे चारों और है चाहे तुम जाग्रित हो यां सुप्त हो। जब तुम्हे गर्मी लगती है तो तुम पंखे के सामने खड़े हो जाते हो। पंखा केवल उसी हवा को प्रवाह में लाता है जो वहाँ पहले से ही है। सत्संग पंखे की तरह हैं। मास्टर यां गुरु पंखे की तरह है। उसी से तुम हवा का प्रवाह महसूस करते हो।

प्रश्न : कृप्या सत चित आनंद का अर्थ बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
सत का अर्थ है ’जो है’, चित वो है जो जानता है और आनंद का अर्थ है भीतरी खुशी।

प्रश्न : कोई अपने बचपन की छाप से कैसे बाहर आता है?

श्री श्री रवि शंकर :
उसकी छाप पहले ही जा चुकी है। अगर तुम सोचत्ते हो कि उसकी छाप अभी भी मन पर है, तो उसे झाड़दो। स्मृति से दर्द को अलग करो। पर अगर तुम ऐसा करने के लिए प्रयत्न करते हो तो तुम स्मृति में उसे वापिस लकर आते हो। पर ध्यान में तुम दर्द को किसी घटना से जुड़ा हुआ नहीं बल्कि एक स्पंदन के रूप में अनुभव करते हो। जीवन का पहला अनुभव दर्द का ही था जब, एक छोटे से रास्ते के ज़रिए, माँ के गर्भ से बाहर आए थे। उससे पहले आप संपूर्ण आनंद में थे, आपको कुछ खाने की भी ज़रुरत नहीं पड़ती थी। फिर अचानक आप रोते हुए बाहर आए। आपने एक नए जन्में शिशु के चेहरे का भाव देखा है? यह ऐसा है जैसे वो १० घंटे के कड़े श्रम के बाद बाहर आया होता है। पहला अनुभव दर्द का होता है। और फिर बच्चा अपनी माँ की आँखों में देखता है और प्रेम का अनुभव करता है। तो दर्द को किसी घटना के साथ मत जोड़ो।

प्रश्न: किसी से बिछड़ने के दर्द से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
उज्जई श्वास।

प्रश्न : जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो रिश्ते का क्या होता है? क्या उसी व्यक्ति से कोई रिश्ता अगले जन्म में फिर बनता है?

श्री श्री रवि शंकर :
दोनों संभावनाएं हैं। कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं और कुछ अगले जन्म तक चलते हैं।

प्रश्न : हम मन में चल रहे हाँ और ना के द्वंद से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
केवल मुस्कुराओ। जैसे परिस्तिथि आती है उसे स्वीकार करो।

प्रश्न : क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम बच्चे को जन्म दें? यां यह हम ईश्वर की इच्छा पर छोड़ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर आप संतान चाहते हैं तो यह आप पर है। यह बहुत सीधा है। संतान चाहने का विचार भी सृष्टि के किसी नियम के आधार पर आ सकता है।

प्रश्न : कोई हमेशा प्रतिबद्ध कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
क्या आपको उत्तर चाहिए? क्या उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं? चलो देखते हैं आप कितनी देर उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध रह सकते हैं? आपको पता है, केवल एक प्रतिबद्धता जैसा कुछ नहीं है। समय समय पर आपको प्रतिबद्धताएं लेनी होती हैं जीवन में। यह आपके स्वभाव का हिस्सा है। अगर आप कमज़ोर हैं तो आप हर रोज़ अपनी प्रतिबद्धता तोड़ते हैं। अगर आप मज़बूत हैं तो आप उस पर डटे रहते हैं। कोई मज़बूत कैसे होता है? प्राणायाम और ध्यान से।

प्रश्न : ध्यान में नींद आ जाना गलत है क्या?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तक आप खर्राटे नहीं लेते और औरों को परेशानी नहीं होती, तब तक ठीक है! ध्यान गहरा विश्राम है। समाधि क्या है? एक मिलियन वर्षों के विश्राम जितना है यह। अगर एक क्षण के लिए भी ध्यान होता है, और आप उससे पहले यां बाद में सोए भी रहें तो कोई बात नहीं।

प्रश्न : कृप्या अपने और दूसरों के प्रति क्षमा भाव के बारे में बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम्हे लगता है कि क्षमा करना मुश्किल है तो मत करो। जो आसान लगे उसे करो। अगर माफ करना मुश्किल है तो कभी माफ मत करो। अगर किसी के प्रति कोई शिकायत है तो सारा जीवन उसे अपने अंदर रखो। फिर तो तुम्हे उस भाव के साथ खुश रहना चाहिए। क्या किसी के लिए घृणा के भाव से तुम खुश रह सकते हो? अगर किसी ने कोई गल्ती की तो यह उनकी मुश्किल है, तुम्हारी नहीं। तुम्हे जो आसान लगे वो करो।
संघर्ष तब है जब हम क्षमा करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते। हमे हर अपराधी को एक विपत्ति - ग्रस्त यां हालात के शिकार के रूप में देखना चाहिए। अगर किसी ने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया तो निश्चय ही वो खुश नहीं था। नहीं तो उसने वैसा नहीं किया होता। वो तुम्हारी तरह सभ्य और परिष्कृत नहीं था। यह किसकी गल्ती है? अगर उसमें ज्ञान होता तो वो वैसा नहीं करता। इसलिए करुणा का भाव रखो।

प्रश्न : घरेलु हिंसा के बारे में बताएं औए कोई इसके साथ कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
घरेलु और सामाजिक हिंसा, दोनो ही तनाव के कारण होती हैं। लोगों को कभी यह नहीं सिखाया गया कि तनाव से किस तरह मुक्त हों। किसी को आध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया गया। क्या आपको नहीं लगता ध्यान और सुदर्शन क्रिया का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए? अहिंसा का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए?
लोगों तक यह ज्ञान पहुँचाना है। आप घरेलु हिंसा को ऐसे ही स्वीकार नहीं सकते। लोगों में ज्ञान लेकर आओ, उन्हे शिक्षित करो। इसके लिए अपना शत प्रतिशत लगादो। फिर आप देखेंगे उनका पूर्ण व्यवहार बदल गया है।

भारत में ७०० परिवारों का एक गाँव है नान्देड़। उसमें गाँवों में होने वाली आम चुनौतियाँ थी - शराब, कर्ज़ा आदि। एक ’आर्ट ऑफ लिविंग’ के अध्यापक ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और छोटे समुहों में कोर्स लेने शुरु किए। कुछ ही महिनों में गाँव में एक विशाल बदलाव आया। अब सब लोग इकट्ठा होकर वहाँ सत्संग करते हैं। कोई भी शराब, सिगरेट यां किसी तरह का नशा नहीं करता। वहाँ किसी तरह का कोई जुर्म नहीं है। गाँव में एक दुकान है जो विश्वास पर चलती है, उसमें कोई दुकानदार नहीं है और लोग ज़रुरत का सामान लेकर पैसे डिब्बों में छोड़ जाते हैं। यह पिछले तीन साल से बिना किसी चोरी के ऐसे चल रहा है। सारा गाँव ऑरगैनिक है, और वहाँ कोई भी बिना रोज़गार के नहीं है। सारे गाँव में किसी दरवाज़े पर लौक नहीं है। एकता दर्शाने के लिए सभी घरों में गुलाबी रंग का पेंट है। गाँव में सभी स्वावलंबी हैं और वातावरण के प्रति सम्मान रखते हैं। उन्हें सबसे आदर्श गाँव का इनाम भी मिला। कर्नाटक में १८० गाँव और कुल ५०० गाँव इसी राह पर चल रहें हैं।

प्रश्न : मृत्यु के भय से कैसे बाहर आएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम एकांत होकर केवल अपने बारे में ही सोचते रहोगे तो तुम्हे मृत्यु का भय लगेगा। जब तुम एक बार सेवा में लग जाते हो तो मृत्यु का कोई भय नहीं रहता। एक आतंकवादी किसी ध्येय के लिए प्रतिबद्ध होता है, इसलिए वो मत्यु से नहीं डरते। अगर तुम दूसरों का भला करना चाहते हो, तो इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता इस भय से तुम्हे दूर रखेगी।

प्रश्न : पृथ्वि पर रहने वालों के लिए आपकी क्या सलाह है? हम किस तरह रह सकते हैं कि ५० - १०० साल बाद भी ताज़ा हवा उपल्ब्ध हो?

श्री श्री रवि शंकर :
कुदरत की देखभाल करो। कुदरत के लिए सम्मान रखो जैसे हर देश के मूल समुदाय कुदरत का सम्मान करते हैं। वातावरण का सम्मान करो। एक जगह ऐसी है जहाँ एक पेड़ काटो तो उसके बदले अगले ४० दिनो में ५ पेड़ लगाने की ज़िम्मेदारी ली जाती है। हमे कुदरत का सरंक्षण करना ही है।

प्रश्न : ऐसे में क्या करना चाहिए जब आप किसी से प्रेम करें पर वो आपसे प्रेम ना करे?

श्री श्री रवि शंकर :
उन्हे यह पूछने की बजाए कि वो आपसे प्रेम क्यों नहीं करते, आप यह पूँछे कि वो आपसे इतना प्रेम क्यों करते हैं। आप उनसे कहें कि जितना प्रेम वो आपसे करते हैं आप उसके लायक नहीं हैं। जीवन में किसी भी मुश्किल का सामना एक अंदाज़ से करें।

पूरा जीवन एक खेल की तरह हैं। जीवन संघर्ष नहीं है। कुछ भी आपको खत्म नहीं कर सकता। आप अमर हैं। आपकी आत्मा अमर है। अगर अभी यह समझ नहीं आ रहा तो कोई बात नहीं। मैं वही कहुँगा जो मुझे पता है और किसी दिन आप भी इससे सहमत हो सकें। किसी भी चीज़ से डरने की ज़रुरत नहीं है। हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है।

प्रश्न : आप पाकिस्तान में तीन सेंटर स्थापित करने में कैसे सफल हो सके?

श्री श्री रवि शंकर :
पाकिस्तान में लोग बहुत अच्छे हैं। वो बस सुदर्शन क्रिया करते हैं। हमारे अध्यापक हैं वहाँ। जब आप किन्ही धारणाओं में फंस जाते हैं तो यह एक पिजरें में कैद हो जाने जैसा है। जब आपका अनुभव होता है तभी आप पिंजरे से बाहर आ पाते हैं।

प्रश्न : कृप्या हमें बताएं कि २०१२ में क्या होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
वर्ष 2012 एक आकर्षण का केन्द्र बन गया है। यह एक सनसनी बन गई है। कोई भी ख़बर बिना सनसनी के अच्छी नहीं मानी जाती। हमारे पास और काम होगा करने को। लोग और आध्यात्मिक होंगे। यह एक फैशन ही नहीं पर एक ज़रुरत होगी। सुनहरा समय आ ही गया है।

मुझे लगता है मैने अब सब कह दिया है। बहुत बातें बिना शब्दों के कही जाती हैं। कुछ बातें शब्दों से भी नहीं कही जाती, कही भी जाएं तो समझ में नहीं आएगा।

जब आप घर जाएं तो यह सोचकर जाएं कि आप बहुत भाग्यशाली हैं। आप बहुत सुंदर हैं। इस ज्ञान को याद रखें और मुस्कुराहट फैलाएं। चिंता कम करके सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं। आप यह काम करें और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें|


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"प्रकृति के साथ हमारा संबंध"

सत्य की खोज में आमतौर पर विज्ञान और आध्यात्म को एक दूसरे से भिन्न माना जाता है। दोनो का ही आधार स्तंभ है जिज्ञासा। आधुनिक विज्ञान वस्तुनिष्ठ विश्लेषण का तरीका अपनाता है, और आध्यात्म आत्मपरक विश्लेषण करता है। 'ये क्या है? जगत में ये क्या है?' इन प्रश्नों के साथ विज्ञान बाहरी जगत को जानने में रत रहता है। जबकि आध्यात्म की शुरुवात होती 'मैं कौन हूं?' प्रश्न से।

प्राचीन समय के जगत में इन दोनों प्रकार के ज्ञान में कोई संघर्ष नहीं था। मनुष्य का स्वयं के बारे में ज्ञान और ब्रह्माण्ड के बारे में ज्ञान, एक दूसरे के पूरक थे, और ये ज्ञान मनुष्य का सृष्टि के साथ एक सुदृढ़ और स्वस्थ संबंध बनाने का आधार था। इन दो प्रकार के ज्ञान को अलग मानने की वजह से आज विश्व के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

प्राचीन ज्ञान के मुताबिक मनुष्य के अनुभव में ५ परतें आती हैं, जो कि हैं – पर्यावरण, शरीर, मन, अंतर्ज्ञान और आत्मा।

पर्यावरण के साथ हमारा संबंध हमारे अनुभव की सर्वप्रथम और सब से महत्वपूर्ण परत है। अगर हमारा पर्यावरण स्वच्छ और सकरात्मक है तो हमारे अनुभव की बाकी सभी परतों पर इसका सकरात्मक प्रभाव पड़ता है, और वे संतुलित हो जाती हैं और हम अपने और अपने जीवन में आये व्यक्तियों के साथ अधिक शांति और जुड़ाव महसूस करते हैं।

मनुष्य की मानसिकता के साथ पर्यावरण का एक नज़दीकी रिश्ता है। प्राचीन समय की सभ्यताओं में प्रकृति को सम्मान के भाव से देखा गया है - पहाड़, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चँद्र...। जब हम प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ अपने संबंध से दूर जाने लगते हैं, तब हम पर्यावरण को प्रदूषित करने लगते हैं और पर्यावरण का नाश करने लगते हैं। हमे उस प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा जिससे की प्रकृति के साथ हमारा संबध सुदृढ़ बनता है।

आज के जगत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जो कि लालचवश, जल्द मुनाफ़ा और जल्द नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं। उनके कृत्य जगत के पर्यावरण को नुक्सान पँहुचाते हैं। केवल बाहरी पर्यावरण ही नहीं, वे सूक्ष्म रूप से अपने भीतर और अपने आस पास के लोगों में नकरात्मक भावनाओं का प्रदूषण भी फैलाते हैं। ये नकरात्मक भावनायें फैलते फैलते जगत में हिंसा और दुख का कारण बनती हैं।

अधिकतर युद्ध और संघर्ष इन्हीं भावनाओं से ही शुरु होते हैं। जिसके परिणाम में पर्यावरण को नुक्सान होता है, और उसे स्वस्थ करने में बहुत समय लगता है। हमें मनुष्य के मानसिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानसिकता ही प्रदूषण की जड़ है - स्थूल तथा भावनात्मक। अगर हमारे भीतर करुणा और परवाह जग जाते हैं, तो वे आधार बनते हैं एक गहरे संबंध का जिस में कि हम पर्यावरण की और व्यक्तियों की देखभाल करते हैं।

प्राचीन समय में अगर एक व्यक्ति एक वृक्ष काटता था तो साथ ही ५ नये वृक्ष लगाता था। प्राचीन समय में लोग पवित्र नदियों में कपड़े नहीं धोते थे। केवल शरीर के अग्नि-संस्कार के बाद बची हुई राख को नदी में बहाते थे ताकि सब कुछ प्रकृति में वापिस लय हो जाये। हमें प्रकृति और पर्यावरण को सम्मान और सुरक्षा के भाव से देखने वाली प्राचीन प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा।

प्रकृति के पास संतुलन बनाये रखने के अपने तरीके हैं। प्रकृति को ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो पंचतत्व इसका आधार हैं, उनका मूल स्वभाव एक दूसरे के विरोधात्मक है। जल अग्नि का नाश करता है। अग्नि वायु का नाश करती है...। और प्रकृति में कई प्रजातियां हैं - पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी...। भिन्न प्रजातियां एक दूसरे से वैर रखती हैं, फिर भी प्रकृति एक संतुलन बना कर रखती है। प्रकृति से हमे ये सीखने की आवश्यकता है कि अपने भीतर, अपने परिवेश में और जगत में विरोधी शक्तियों का संतुलन कैसे बनाये रखें।

सबसे अधिक आवश्यक है कि हमारा मन तनाव मुक्त हो और हम इस खुले मन से जगत का अनुभव कर सकें। ऐसी मनस्थिति से हम इस सुंदर पृथ्वी का संरक्षण करने के उपाय बना सकेंगे। आध्यात्म से हमे अपने असल स्वभाव का अनुभव होता है और खुद से और अपने परिवेश से एक जुड़ाव का एहसास होता है। अपने असल स्वभाव के साथ परिचय होने पर नकारात्मक भावनायें मिट जाती हैं, चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और पूरी पृथ्वी की देखभाल के लिये एक दृढ़ संकल्प उपजता है।

हमारी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने में और अपने आप से और अपने परिवेश से अपने संबंध को सुदृढ़ करने के लिये क्या करना चाहिये? ये कुछ सक्षम सूत्र हैं -
  1. उप्युक्त भोजन : भोजन से हमारे मन पर असर पड़ता है। जैन परंपरा में मन पर भोजन के प्रभाव के विषय में बहुत शोध किया है । आयुर्वेद, चीनी चिकित्सा पद्दति एवं विश्व की अन्य कई प्राचीन परंपराओं में भोजन से होने वाले मन पर प्रभाव को पहचाना था। आधुनिक विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि भोजन से हमारी भावनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भावनात्म्क रूप से परेशान बच्चे अधिक भोजन लेते हैं और मोटापे के शिकार हो जाते हैं। एक संतुलित आहार का हमारी भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव होता है और इसका असर हमारी चेतना पर होता है।
  2. हल्का या मध्यम व्यायाम|
  3. पंचकर्म : आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा परंपरा में भीतरी सफ़ाई की एक प्रक्रिया है जिसे पंचकर्म कहते हैं। पंचकर्म में शामिल होती हैं - मालिश प्रक्रिया, निर्धारित भोजन, और शरीर की भीतरी सफ़ाई। इससे हज़ारों लोगों को तनाव से मुक्त होने में और अपने व्यवहार में आये विकारों से मुक्त होने में सहायता मिली है। साथ ही, ये कई बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  4. योग, ध्यान और प्राणायाम : योग, ध्यान और प्राणायाम। अपने शरीर और पर्यावरण को सम्मान की दृष्टि से देखने में ये बहुत सहायक हैं। ये अपने शरीर और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने में सहायक होता है और भावनात्मक असंतुलन से भी मुक्त करता है।
  5. संगीत और नृत्य : इनसे शरीर और मन में तारतम्यता और समतुलना आती है। खासतौर पर उस संगीत से जो कि बहुत तेज़ और कोलाहलपूर्ण ना हो। शांतिदायक संगीत हमारे मन और शरीर में एक स्पंदन पैदा करता है जो कि समतुलना लाता है, जैसे कि शास्त्रीय और लोक संगीत।
  6. प्रकृति : प्रकृति के साथ समय बिताना, मौन रहना, प्रार्थना करना..ये बहुत सहायक हैं अपने मन के साथ रहने में।
  7. और फिर सेवा। यह जीवन में संतुष्टि के लिए अनिवार्य है।

संदर्भ..


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"हर दिन एक नया अध्याय है"

प्रश्न : एक दिन आपने पंचतत्व के बारे में बताया था। क्या आप पंचतत्वों के बारे में और प्रकाश डालेंगे?

श्री श्री रवि शंकर : पूर्ण सृष्टि पाँच तत्वों से बनी है।
नदियों का सम्मान करने की एक महान परंपरा रही है। नदी नहीं चाहती कि तुम उसे फूल यां फल दो। ये पूजा का तरीका नहीं है। और नदी में कूड़ा और गंदगी के नाले डाल कर, तुम ये कैसे कह सकते हो कि तुम नदी की पूजा कर रहे हो? पूजा का अर्थ है सम्मान देना। और हम तभी सम्मान दे पाएंगे जब हम नदियों में गंदे नाले, कूड़ा, प्लास्टिक डालना बंद करेंगे। कुछ साल पहले तक, नदी से जल लेकर सीधे ही पी सकते थे। पर आज, किसी भी नदी का जल अपने उद्गम स्थान से १०० किलोमीटर दूर भी पीने लायक साफ़ नहीं है!पहले समय में अपने उद्गम स्थान से हज़ारों किलोमीटर दूर भी नदी का पानी पीने लायक साफ़ हुआ करता था। इस देश में लोग बर्तन साफ़ करने के लिये लकड़ी की राख का प्रयोग करते थे, ना कि साबुन का। हल्दी और दूसरी प्राकृतिक वनस्पतियों का प्रयोग होता था जो कि bio-degradable होती हैं। हम नदियों में बहुत ज़्यादा औद्योगिक कूड़ा डाल रहे हैं। ये जल तत्व के प्रति असम्मान दर्शाता है।

पृथ्वी तत्व का सम्मान करने का अर्थ है कि हम धरती में प्लास्टिक, विषैली खाद और रसायन डाल कर प्रदूषण ना करे। पर्यावरण के लिये सजग होना, पृथ्वी का सम्मान करना है।
फिर वायु तत्व आता है। हमें स्वच्छ ऊर्जा चाहिये। हमने महाराष्ट्र के गाँवों में धूम्ररहित चूल्हों का इंतज़ाम किया है, जो एक बहुत ही सफल प्रयोग रहा। हमे वायु का सम्मान करना है और इसके स्वच्छ वायु के लिये हमें जो भी करने की आवश्यकता हो, करें।

आकाश तत्व है जो कि अमूर्त है। आप आकाश को पकड़ नहीं सकते हैं। जब आप अपने मन को नकारात्मक भावों से बचाते हैं तो आप इर्द गिर्द आकाश को आनंद से भर रहे हैं। तब आसपास की वायु भी आनंदित हो जाती है। तुम एक स्थान को अविश्वास, क्रोध, लालच, और खुदगर्ज़ी से भर सकते हो, यां एक एक ऐसा स्थान बना सकते हो जहाँ मस्ती हो, आत्मविश्वास हो, आपसी समझ हो, अपनापन हो। अगर तुम हर समय गल्तियों के बारे में नकारात्मक भाव व्यक्त करते रहोगे तो तुम इस पृथ्वी पर कहीं भी नहीं जी पाओगे। हर किसी में कोई ना कोई दोष है।
जब हम दूसरों में देखने का प्रयास करते हैं तो हम अपनी कमियों को देखना भूल जाते हैं।

पंचतत्व, सृष्टि का हिस्सा हैं। और इस सुंदर सृष्टि को बनाये रखने के लिये हमे इनका सम्मान करना होगा।

प्रश्न : मैं ऐसी बहुत सी चीज़े पाता हूँ जो मुझे ठीक नहीं लगती। मुझे नहीं पता कि जो मुझे ठीक नहीं लगता, उसे मैं कैसे ठीक करूँ। कृपया मेरा मार्गदर्शन कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर : जब तुम कहते हो, ‘ये ठीक नहीं है,’ तो तुम्हारे मन में इस ‘ये ठीक नहीं है’ का बीज घर कर जाता है जो मन को विश्राम नहीं करने देता है। जब तुम बेचैनी को पकड़ कर बैठे हो, तो मन को चैन कैसे आयेगा? जो जैसा है तुम्हें उसे वैसा ही स्वीकार करना होगा। ‘ये ठीक नहीं है, ये ठीक नहीं है,’ तुम्हें बाहर रखता है। जो दोष तुम्हें दिख रहा है वो किसी कारण से है। वो ठीक हो जायेगा, कुछ समय लगेगा।

इस वक्त जो जैसा है, ठीक है। भविष्य में भी वो ठीक होगा। जो भूतकाल में हुआ है, वो भी ठीक था।
जब तुम ये समझ जाओगे, तुम विश्राम कर सकोगे, और उस विश्राम में तुम ध्यान कर सकोगे। जब तुम विराम लेते हो तो ये निवृत्ति है, और जब तुम उस विराम से बाहर आते हो तो वह प्रवृत्ति है। तब तुम कर्म कर सकते हो। जब तुम थके हुये हो और तुम इस बात पर केंद्रित हो कि, ‘ये ठीक नहीं है,’ तब तुम विश्राम नहीं कर सकते हो। जब तुम मस्ती में होते हो, तो क्या कहते हो? ‘सब बढ़िया है!’ नहीं तो तुम मस्त नहीं हो सकते हो, कर्म नहीं कर सकते हो - ये ना प्रवृत्ति है और ना ही निवृत्ति।

ध्यान योग निवृत्ति है। कर्म योग प्रवृत्ति है। बहुत से लोग, ‘ये ठीक नहीं है,’ विचार को पकड़े हुये हैं जिस वजह से वे विश्राम नहीं कर पाते है, जीवन में आनंदित नहीं हो पाते हैं, मस्त नहीं हो पाते हैं। वो व्यक्ति, सरकार, शासन, सब कुछ ठीक नहीं है।’ तब ये तुम्हारे अंदर भी आ जाता है - ‘मैं ठीक नहीं हूँ।’ सूक्ष्म रूप से ये भाव तुम में समा जाता है कि, ‘मैं ठीक नहीं हूँ।’ तब तुम्हें ऐसा महसूस करना अच्छा नहीं लगता है, और तुम उसे छिपाने की कोशिश करते हो, मन में कई सफ़ाइयां गढ़ लेते हो, और मन भ्रमित हो जाता है।

अगर तमोगुण अधिक हो तो तुम प्रवृत्ति यां निवृत्ति नहीं जानते हो। जब सत्व गुण अधिक होता है तो तुम जानते हो कि तुम्हें क्या करना है, कब करना है, कार्य करना है यां नहीं करना है। जब रजोगुण बढ़ जाता है तो ये बीच का बिंदु है - तुम कर्म करते हो और फिर पछताते हो। हम में से कई लोग कर्म करते हैं और फिर पछताते हैं। मां अपने बच्चे को डांटती है और बाद में पछताती है, और फिर बच्चे से अच्छा व्यवहार करती है।
सत्वगुण में तुम पछताते नहीं हो, विराम और विश्राम करते हो, और तुम्हारी सोच एकदम साफ़ और पारदर्शी होती है।

रजोगुण में भ्रम और अस्तव्यस्तता होती है।

तमोगुण में एकदम आलस और कर्म करने की अनिच्छा होती है।

इन तीनों गुणों के बीच कोई गहरी रेखा नहीं है, ये आपस में घुल मिल जाते हैं, और हम एक गुण से दूसरे गुण में सहज ही आ जाते हैं।

प्रश्न : अपने मन की रक्षा कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर : ये बहुत बड़ा काम है। गीता में कहा गया है कि बहुत बुद्धिमान लोग भी भ्रमित हो जाते हैं कि क्या करें और क्या ना करें, और मन को कैसे संभाले। मन की रक्षा करना एक बहुत बड़ा काम है, और इसके लिये हमें ज्ञान की आवश्यकता है। ये देखो कि आज के इस क्षण तक जो भी कुछ हुआ है, वो सब चला गया है!
जागो!

जब तुम प्राण से भरे हुये होते हो तो तुम अचानक ये देखते हो कि सब चला गया है. अभी! जो भी कुछ हो गया, ठीक था। ये सोचो कि अब क्या करना है। कभी कभी जो भी तुम करते हो १००% सफल होता है, कभी ऐसा नहीं भी होता है। एक किसान जानता है कि वो जो बीज उगाता है, उन में से हर बीज अंकुरित नहीं होता है। वो बीज लेकर खेत में बो देता है और ये नहीं सोचता कि ये बीज उगेगा यां नहीं उगेगा।

इसी समय से एक नया अध्याय शुरु हुआ है। हर दिन एक नया अध्याय है। ये जागरूकता बार बार अपने भीतर लाओ। ये पूरा विश्व मेरी ही आत्मा से भरा है। ये सब मैं ही हूँ। एक ही चेतना है। ये एक चेतना एक व्यक्ति के भीतर एक तरह से अभिव्यक्त होती है, किसी दूसरे व्यक्ति से दूसरी तरह अभिव्यक्त होती है। ये एक सागर की लहरों के समान है। अगर ये बात तुम्हें ५ सेकंड के लिये भी समझ आ गयी तो तुम्हारे शरीर और मन में समूल परिवर्तन आ जायेगा। तब तुम अनुभूत करोगे, ‘अहो!’ सब चिंतायें धुल जायेंगी। बस एक सेकंड के लिये ये पहचान लो कि मेरे दुश्मन में भी मैं ही हूँ। मैंने ही ये खेल शुरु किया है। ये समझ लो लेकिन ऐसा करने के लिए मूड बनाने की आवश्यकता नेहीं है।ये समझ केवल निवृत्ति में रखनी है, प्रवृत्ति में नहीं। अगर हम व्यवहार में अद्वैत को ले आयेंगे तो इससे भ्रम और बढ़ेगा। प्रवृत्ति में हम द्वैत को देखते हैं। द्वैत के बिना मानव शरीर धारण करना असंभव है। कितनी प्रवृत्ति और कितनी निवृत्ति होनी चाहिये ये एक नाज़ुक विषय है। जब प्रवृत्ति अधिक हो जाती है तो नकारात्मक भाव बढ़ जाता है और व्यक्ति को निवृत्ति में जाने को कहा जाता है।

प्रश : मैं एक नया काम हाथ में ले रहा हूँ। कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये।

श्री श्री रवि शंकर : मैं बिना किसी रोक के बहुत आशीर्वाद देता हूँ। ये तुम पर है कि तुम कितना लेना चाहते हो। यहाँ बहुत पानी है। तुम्हारे पात्र की जो क्षमता है, तुम उतना ही ले पाओगे।

प्रश्न : गुरुजी, यहाँ पर इतनी संदर गौशाला है, वहाँ जाकर ऐसा लगता है मानो प्राचीन भारत में आ गए हों। पर अन्य जगह हम देख रहे हैं कि गायें विलुप्त होती जा रही हैं। हमे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर : प्रति १००० व्यक्ति पर हमारे पास १२० गायें रह गयी हैं। १२० गायें १००० व्यक्तियों के लिये पर्याप्त दूध नहीं दे सकती। जब भारत आज़ाद हुआ था तब १००० व्यक्तियों के लिये ४५० गायें थी। अब ये संख्या गिर कर १२० हो गयी है। दो-तीन सालों में से संख्या २० हो जायेगी। ये आज की आवश्यकता है कि गायों की रक्षा की जाये। लोगों को इस बारे में जागरूक होना चाहिये, नहीं तो भारत के लोग दूध, दही, घी की कमी झेलेंगे। हमें गायों का संरक्षण करना होगा।


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"आध्यात्मिकता से अंतर्ज्ञान विकसित होता है"

पिछली पोस्ट के शेष अंश..

प्रश्न : आज के समय में पैसा और शक्ति बहुत जरुरी है| इन सब को पाने के लिए आध्यात्मिकता कैसे मदद करेगी?

श्री श्री रवि शंकर : आपको अमीर बनने के लिए कुछ गलत करने की जरूरत नहीं है| वास्तव में गलत तरीके से पाया हुआ धन बहुत थोड़े समय के लिए रहता है| आध्यात्मिकता से आप में अंतर्ज्ञान विकसित होता है और सकारात्मक विचार आतें हैं। इन सबसे आपमें सही निर्णय लेने की क्षमता आती है|

आपने कभी महसूस किया है कि कुछ लोगों से आप बचने की कोशिश करते हो और कुछ लोगों से आप बात करना चाहते हो? हम में से हर किसी से कुछ खास तरंगे आती हैं| हमारे शब्दों की बजाय इन तरंगों के द्वारा हम अधिक व्यक्त करतें हैं| यदि यह तरंगे सकारात्मक हो जाएँ तो सब कुछ बदल जाता है| इस तरह हमारी पारस्परिक निपुणता बढ़ती है|

प्रश्न : मैं जानता हूँ कोई शादी करके खुश नहीं रह सकता| परन्तु क्या कोई शादी करके प्रबुद्ध हो सकता है?

श्री श्री रवि शंकर : आप ऐसा क्यों सोचते हो कि कोई शादी करके खुश नहीं रह सकता? आप शादी शुदा हो कर खुश भी हो सकते हो| बहुत से कुंवारे लोग हैं जो खुश नहीं है| खुश रहना तो एक स्वभाव है जो आप चुन लेते हो| ये केवल आप पर निर्भर करता है| बहुत से लोग ऐसे हैं जिनके पास नौकरी नहीं है पर खुश हैं| समझदार बनो ओर खुश रहो| चाहे जो भी करो - शादी,बिना शादी के,नौकरी,बिना नौकरी के..परन्तु जो भी कर रहे हो, आपको खुश रहने की जरूरत है|

प्रश्न : दुनिया में बहुत सारी संस्कृतियाँ हैं| क्या कुछ ऐसा है जो सब में समान है?

श्री श्री रविशंकर : कुछ विशेष बातें हैं जो सब जगह मिलती हैं| सुदर्शन क्रिया सब जगह है| आज आप यदि अर्जेंटीना जाते हो,आपको वहां ’आर्ट ऑफ़ लिविंग’ मिलेगा| आप उत्तरी ध्रुव में जाइये वहां आपको ’आर्ट ऑफ़ लिविंग’ मिलेगा| आप मंगोलिया जाओ,वहां ’आर्ट ऑफ़ लिविंग’ मिलेगा| आप फिजी जाओ,न्यूज़ीलैंड जाओ आपको कोई न कोई व्यक्ति सुदर्शन क्रिया करते मिल जाएगा| इसी लिए ’आर्ट ऑफ़ लिविंग’ में सारी बातें सार्वभौमिक रखी हैं|

किसी एक समय में दुनिया जुड़ी हुई थी| अर्जेंटीना में पेरू के लोग अरुणाचल प्रदेश के मूल निवासियों की तरह बहुत सी चीजें करते हैं| अरुणाचल प्रदेश के जन जाति और ब्रिटिश के वेनकोवर के लोगों की बहुत सी बातें एक जैसी हैं| दोनों जगह के लोग दिशायों की पूजा करते थे| दुनिया के विभिन क्षेत्रों के मूल निवासियों में बहुत सी सामानताएं हैं| लिथुयानिया के लोग आपका अभिवादन ब्रेड और नमक से करेंगे। नमक वहां बहुत कीमती चीज है क्योंकि वहां समुद्र नहीं है | इसी तरह से केरल के लोग एक गमले में धान दरवाजे के बाहर लगा रखते हैं जो यह दर्शाता है कि घर में भंडार है और आपका स्वागत है|

कुछ विशेष समानताएं हैं,और कुछ चीजें दूसरे देशों और संस्कृति से बिल्कुल अनोखी और अलग हैं| ये भिन्नताएं रहनी चाहिए| प्रत्येक देश और संस्कृति को यह अद्वितीयता बना कर रखनी चाहिए|रुसी लोगों के लोक नृत्य बहुत सुंदर हैं| डेनमार्क के लोगों के अपने सुंदर तरीके हैं|
प्रेम,करुणा,ध्यान,योग - ये सब सार्वभौमिक हैं|

प्रश्न: मेरे मित्र मुझसे पूछते हैं कि उनके लिए कौन सा ध्यान अच्छा है। मुझे क्या कहना चाहिए उन्हे?

श्री श्री रवि शंकर: यहाँ पर बहुत सी सी डी हैं। कोई भी ध्यान उनके लिए अच्छा होगा।

प्रश्न : क्या मृत्यु के बाद जीवन है?

श्री श्री रवि शंकर : हाँ।

प्रश्न : २१ दिसंबर २०१० को विश्व खत्म हो जाएगा। इस पर आप क्या कहेंगे?

श्री श्री रवि शंकर : मिथ्या कल्पना है।

प्रश्न : मन में विचार कैसे उठते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : मैं यह आश्चय करने के लिए तुम पर छोड़ता हूँ। यह एक रहस्य है। रहस्य को मैं माइक पर नहीं बता सकता।

प्रश्न : ब्रह्मचर्या क्या है?

श्री श्री रवि शंकर : मैने इस विष्य पर योगासूत्र में बोला है। तुम्हे उसे सुनना चाहिए। ब्रह्मा का अर्थ है असीम चेतना। ब्रह्मचर्या का अर्थ है उस असीम चेतना में स्थिर हो जाना।

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैं बहुत बुद्धिमान हूँ। मुझे किसी ने कहा था कि बुद्धिमान व्यक्ति ध्यान नहीं कर सकता। मैं मूर्ख कैसे बनु?

श्री श्री रवि शंकर : फिर तो मूर्ख वुक्ति भी ध्यान नहीं कर सकता! तुम्हे किसने कह दिया तुम बुद्धिमान हो। तुमने स्वयं को ही लेबल कर लिया कि तुम बुद्धिमान हो। जो व्यक्ति अपने पर किसी तरह का लेबल लगाता है वो मूर्ख ही होता है। यह प्रश्न पूछने से ही तुमने जो चाहा वो तुम्हे मिल गया। यह प्रश्न पूछने की ज़रुरत पड़ी तो तुम बुद्धू हो ही गए।

प्रश्न : क्या हमे भीखारी को कुछ देना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर : अगर कोई हट्टा कट्टा हो, बलवान हो तो नहीं देना चाहिए। देख लेना कहीं वो तुमसे ही ज़ोर ज़बरदस्ती से पैसे नहीं निकलवाए। बच्चों को भी इसमें प्रोत्साहित नहीं करना चाहिए। अगर तुम्हे कोई वृद्ध महिला मिले और वो कुछ ना कर सकती हो तो उस समय अपने मन की बात सुन लेना। अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनो। पर अच्छा है पैसे की बजाए अगर खाने के लिए कुछ दे दिया जाए।

प्रश्न : हमारे माँ-बाप हमसे इतनी अपेक्षा क्यों करते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : कुछ सालों में तुम्हे भी मालूम हो जाएगा। मगर तब यह भूलना नहीं कि कभी तुमने भी यह प्रश्न पूछा था।

प्रश्न : आपने मेरे लिए बहुत कुछ किया है। हम आपके लिए क्या कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : तुमसे देश का बहुत कुछ होना है। जैसी खुशी तुम्हे मिली है, अगर तुम ऐसे ही १०, २०..५० लोगों के जीवन में खुशी लाओ। जब तुम खुश होगे और औरों को खुश करोगे तो मुझे इससे खुशी ही मिलेगी।

प्रश्न : पैसे कमाने इतना मुश्किल है। पैसे कमाने का कोई आसान तरीका है क्या?

श्री श्री रवि शंकर : तुम इतने बूढ़े हो गए हो तो मैं तुम्हे कोई आसान रास्ता बताता। तुम में उत्साह है, तुम बुद्धिमान हो..

प्रश्न : ’आर्ट ओफ़ लिविंग’ से इतने लोग जुड़े हैं। हम राजनीति में क्यों नहीं जा रहे?

श्री श्री रवि शंकर : अगर तुम्हारा मन उस दिशा में इतनी रूचि ले रहा है तो तुम्हे ज़रूर जाना चाहिए। मेरा सहयोग तुम्हारे साथ है।

प्रश्न : Basic course और Advance course करने के बाद मेरा गुस्सा ८० प्रतिशत कम हो गया है। मेरा बाकी का गुस्सा कब खत्म होगा?

श्री श्री रवि शंकर : वो भी कम हो जाएगा। थोड़ा गुस्सा रख भी सकते हो। दूसरों के मनोरंजन का साधन तो बन जाता है!

प्रश्न : हमारे शरीर में उर्जा चक्र कौन से होते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : अभी तुम्हारा Advance course बाकी है ना? थोड़ा इंतज़ार करो। उत्तर अभी ब्रेक के बाद!

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"प्रकृति तुमसे प्रेम करती है"

बैंगलोर आश्रम, भारत
१६.०१.२०१०

प्रश्न : जितना लगाव मैं आपके लिए महसूस करता हूँ, क्या आप वैसा अनुभव करते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
उससे भी ज़्यादा। कनेक्शन का मतलब है कि वहाँ एक अंतर है। मैं तो तुम से अलग ही नहीं महसूस करता।

प्रश्न : यदि सत्य विरोधाभासी है, तो सत्य को कैसे खोजें?

श्री श्री रवि शंकर :
सत्य से ना तुम बच सकते हो और ना ही उसका सामना कर सकते हो। सत्य सामने आ ही जाता है। झूठ बोलने के लिए तुम्हें उसका निर्माण करना पड़ता है पर सत्य के लिए कोइ श्रम नहीं करना पड़ता।

प्रश्न : समर्पण के बाद भी समस्याएं मुझे तंग करती हैं। मुझे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
यह ऐसा है जैसे कुछ देने के बाद भी वो तुम्हारे पास है। जितनी बार तुम्हे समस्या परेशान करती है, तुम उसका समर्पण करते जाओ।

प्रश्न : एक आदर्श भक्त के क्या लक्षण हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम हो। इसमे तुम संशय मत करो। तुम जो भी विशेषता अपने में देखना चाहते हो, वो तुम अपने में विकसित कर सकते हो।
१. जिसका मन शांत हो।
२. जो ज्ञान में रहना चाहता है। जिसे कुछ ज्ञान है और वो अधिक ज्ञान पाना चाहता हो।
३. किसे के प्रति नफ़रत की भावना ना रखता हो।
४. दया भाव रखता हो।

प्रश्न : आप हमसे क्या उम्मीद रखते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम हमेशा खुश रहो, ज्ञान में रहो, सेवा करते रहो और पथ पर दृड़ रहो। यह मेरी उम्मीद नहीं क्योंकि मैं जानता हूँ तुम ऐसा ही करोगे। पर मैं चाहता हूँ कि तुम बहुत जल्दी ऐसा करो।

प्रश्न : सच बोल के बाहर समस्या हो जाती है और झूठ बोलने से अपने भीतर। ऐसे में क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर :
समस्या का समाधान। समस्याओं को चुनौतियों के रूप में लो। जो बहादुर है उसे चुनौती पसन्द होती है और तुम बहदुर हो।

प्रश्न : गुरुजी, जब हम ’जय गुरुदेव हैं’ कहते हैं , हम सामने वाले व्यक्ति में गुरु तत्व को ध्यान में रखते हैं याँ हम अपने में गुरु को याद करते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं इसे तुम पर छोड़ता हूँ, जो भी तुम चाहते हो। इसके बहुत अर्थ हैं - नमस्ते, हैलो, तुम कैसे हो, धन्यवाद। इसमे सब कुछ आ जाता है। यह एक आदत की तरह हो गया है। मैं यह तुम पर छोड़ता हूँ, अगर तुम्हारी इच्छा है तो ही कहो।

प्रश्न : क्या शरीर और आत्मा के परे भी मेरा अस्तित्व है? अगर है तो किस रूप में?

श्री श्री रवि शंकर :
आत्मा के परे कुछ नहीं है। शरीर के परे? हाँ। अभी के लिए इस को यहीं पर छोड़ते हैं। नहीं तो यह सिर्फ़ एक और धारणा बन जाएगी। जब तुम धीरे धीरे खुद अनुभव करते हो कि तुम सिर्फ़ शरीर नहीं पर तुम्हारा अस्तित्व इससे ज़्यादा है तो तुम खुद को भी पहचान लेते हो।

प्रश्न : गुरुजी, ऐसे कई पल होते हैं जब मैं बहुत उत्साहित और खुश होता हूँ। पर दो समस्याएं है - ऐसी स्थिति में मैं चीजों को भूल जाता हूँ जैसे मेरा समान याँ कोई ज़रुरी मुलाकात। दूसरा मैं डरता हूँ कि अगर ऐसा चलता रहा तो कया होगा। यह डर विशेषकर मेरी पत्नी को है।

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे याद है एक कोर्स में एक सज्जन ने अपनी पत्नी के साथ भाग लिया। हर ज्ञान वाणी(knowledge point) में वे एक दूसरे को कहते "देखा मैने भी ऐसा ही कहा था। मैं कब से यही बता रहा हूँ तुम्हे।" हमे उन्हे बताना पड़ा कि यह ज्ञान तुम्हारे लिए है और इसलिए नहीं के तुम इसको अपने साथी पर लाद दो। तुम अपने भीतर देखो और जहाँ किसी सुधार की ज़रुरत है वहाँ ज्ञान को इस्तेमाल करो। प्रेम, शांति और दान अपने घर से शुरू होता है। तो पहले अपने से शुरू करो।

प्रश्न :मैं शारीरिक रूप से कई लोगों से आकर्षित हो जाता हूँ। यह प्राकृतिक है याँ इसके लिए मुझे कुछ करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम अपने मन को देखो तो इसमे कितने ही विचार आते हैं। हर विचार का अनुसरन करने की कोशिश में व्यक्ति पागल हो सकता है। तुम कितने लोगो से आकर्षित होते हो और कई लोगों से प्रतिकर्षित। तुम मन में आने वाले हर विचार का अनुसरन कर ही नहीं सकते। तुम्हे अपनी समझ से काम करना है। पहले देखो कि क्या सही है और क्या गलत, क्या तुम्हे विकास की ओर ले के जा रहा है और क्या तुम्हारे विकास में बाधक है, और क्या स्थायी है और क्या बदल रहा है। यह समझना ही विवेक है। हमे अपने काम इसी विवेक से करने है। नहीं तो तुम बिना सोच समझ के काम करते हो और ऐसा कार्य तुम्हे दुख ही देता है।

प्रश्न : हम आपको इतनी चिन्ताएं समर्पण करते है। आप वो सब किसे देते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
इसकी चिन्ता तुम मत करो। मेरे पास प्रोसेसिन्ग यूनिट है जो सब कचरे को खाद बना देती है।

प्रश्न : अगर आत्मा न खत्म होती है और ना ही पैदा होती है तो संसार में इतनी नई आत्माएं कहाँ से आती हैं? जनसंख्या कैसे बड़ती है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम यह भूल रहे हो कि कितने जानवर भी खत्म हो रहे हैं। बाकि का उत्तर तुम सोच ही सकते हो।

प्रश्न : गुरुजी, जब मैं समस्या मे होता हूँ तो साधना करता हूँ। पर जब समस्या दूर हो जाती है तो मैं पथ से दूर हो जाता हूँ। इसके लिए मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम देखो इसका क्या करना है। एक कहावत है
"दु:ख मे सिमरन सब करे, सुख मे करे ना कोई।
सुख मे सिमरन जो करे, सो दु:ख काहे को होए॥
यह हम पर भी लाघु होती है। हम खुशी मे भी प्राणायाम, सुदर्शन क्रिया, साधना करते हैं तो वो सुख बना रहता है।
आज ही अख़बार में था कि डिपरैशन का पूरा इलाज केवल ध्यान से ही हो सकता है। एन्टी डिपरैशन दवाइयों से पूरा ईलाज नहीं होता और कुछ समय में डिपरैशन वापिस आ जाता है। कुछ समय के लिए लगता है कि डिपरैशन ठीक हो गया है पर बाद में डिपरैशन ज़्यादा प्रबलता से वापिस आता है। आज कई लोग डिपरैशन से पीड़ित है और नहीं जानते ऐसा कुछ भी है जिससे वो डिपरैशन से बाहर आ सकते हैं। इसलिए ज़रुरी है कि हम ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक यह पहुँचाएं।

प्रश्न : यहाँ आकर हमें जितनी खुशी और शांति मिली है उसका अनुभव इससे पहले कभी नहीं किय था। हम यही खुशी और शांति कश्मीर में कैसे ले के आएं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम भी इस पर सोचो और हम भी सोचते हैं। अच्छा होगा अगर तुम जैसे युवक यहाँ आएं और इस अनुभव के बाद वपिस जा कर वहाँ भी यह खुशी और शांति फैलाएं। अगर तुम सब ऐसा निश्चिय कर लेते हो तो हम कश्मीर में ’आर्ट ऑफ़ लिविन्ग’ ज़रुर शुरु करेंगे।

प्रश्न : ऐसा कहते हैं कि अगर कोई दु:ख अनुभव करता है तो व्यक्ति के पिछ्ले जन्म के कर्म जिम्मेदार हैं। आप इसके बारे में बताएं।

श्री श्री :
'पाप क्या पुण्य क्या तू भूलादे, कर्म कर फल की चिन्ता तू मिटादे। इसके बारे में ज़्यादा मत सोचो। अगर कुछ गलत हो गया तो हो गया। अब क्या कर सकते हो वो देखो। क्या ठीक कर सकते हैं, उसके बारे में सोचो। कर्म के बारे मे ’मौन की गूँज’ पुस्तक में कहा है मैने।

प्रश्न : गीता ज्ञान को जीवन में कैसे उतारें? मुझे ऐसा करना मुश्किल लगता है।

श्री श्री :
यह बिल्कुल मुश्किल नहीं है। सहज रहो। जीवन जैसे आता है वैसे उसको स्वीकार करो और आगे बड़ते चलो। ’आर्ट ऑफ़ लिविन्ग’ के ज्ञान के सूत्र जीवन में से ही लिए गए हैं। यह ज्ञान सहज ही जीवन में उतरता है। थोड़ा योगा, प्राणायाम और ध्यान करो, तुम देखोगे सहजता से ही जीवन परिवर्तित हो गया है।

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