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"क्रोध को औजार की तरह प्रयोग करो, तुम क्रोध के औजार मत बनो"

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प्रश्न : मैंने अभी अभी इस पथ पर शुरुवात की है। आत्मा क्या है मैं कैसे समझूं?

श्री श्री रवि शंकर :
दुनिया में सब कुछ बदल रहा है। हमारा अनुभव बदलता है, हमारी बुद्धि बदलती है। हम अलग अलग समय अलग तरह से सोचते हैं। हमारे विचार बदल रहे हैं, और हमारी भावनायें भी बदल रहीं हैं। ये कैसे जानते हो कि सब कुछ बदल रहा है? क्योंकि ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता। वो जो नहीं बदल रहा है उसके अस्तित्व के बिना तुम ये जान भी नहीं सकते हो कि सब बदल रहा है।

तो तुम अनुमान लगाते हो। अगर धुंआ देखा तो तुम कहोगे कि, ‘कहीं आग होगी।’ तुम केवल धुंये को देख कर ये अनुमान लगा लेते हो कि कहीं आग होगी। उसी तरह जो बदल नहीं रहा है तुम उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर सकते, फिर कैसे जान लेते हो? अनुमान से।

प्राचीन समय के लोग कहते थे कि कुछ जानने के तीन उपाय हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। एक है प्रत्यक्ष – तुम सीधे उसे देख रहे हो। दूसरा है अनुमान – तुम अंदाज़ा लगाते हो। जैसे कि, तुमने धुंआ देखा तो ये जान लिया कि कहीं आग है। है ना? तो जब तुम देखते हो कि सब कुछ बदल रहा है, तो तुम ये अनुमान लगाते हो कि, ‘हमारे भीतर ऐसा कुछ है जो नहीं बदल रहा है, और वो आत्मा है। तुम उसे जो भी नाम दो!’

तो, हम शरीर से सूक्ष्मतर में गये – शरीर, सांस, मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार। इन सब से सूक्ष्म है आत्मा। ये आत्मा क्या है, ये जानना ही आध्यात्म है, ध्यान है! और ये आत्मा किस चीज़ से बनी है? ये है!

प्रश्न : कुछ विचारधाराओं में आत्मा के अस्तित्व को, या विश्व की चेतना शक्ति के अस्तित्व को नकारा गया है। आप इस बारे में क्या कहेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आत्मा नहीं है। जो भी ये घोषणा करता है कि आत्मा नहीं है, वो ये कैसे जानता है? कौन जानता है? कौन कह रहा है? हां?

अगर मैं कहूं कि मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता तो कम से कम मैं अपने इन शब्दों पर तो विश्वास करता हूं! मैं ये तो नहीं कह सकता कि, ‘मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता, अलावा अपने इन शब्दों के जिन्हें मैं अभी कह रहा हूं।’

तुम्हें पता है ये इस पूरे विश्व में सबसे बेवकूफ़ी भरी बात होगी, अगर कोई कहे कि, ‘मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता हूं।’ जो व्यक्ति ऐसा कह रहा है कम से कम अपने आप में तो विश्वास करता होगा! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं क्या कह रहा हूं? समझे?

अगर मैं कहूं कि मुझे किसी चीज़ में विश्वास नहीं है, तो मुझे ये भी कहना होगा कि, ‘ये शब्द जो मैं तुम्हें अभी कह रहा हूं, मुझे उन में भी विश्वास नहीं है।’ ये वाक्य कि, ‘मुझे किसी चीज़ में विश्वास नहीं है।’ झूठ है, क्योंकि तुम कम से कम इस वाक्य पर तो विश्वास करते हो, वर्ना तुम ये वाक्य क्यों कहते?

तो कोई भी व्यक्ति ये पूर्ण रूप से नहीं कह सकता है कि वो किसी भी चीज़ में विश्वास नहीं करता है।

अगर वो ऐसा कहता है तो या तो वो मानसिक रूप से असंतुलित है या आत्मज्ञानी है (हंसी)। ये शब्द जो हम कहते हैं कि, ‘सब कुछ बदल रहा है’ किसी संदर्भ में लिये जाते हैं। तुम जो भी देखते हो, छूते हो, महसूस करते हो, ऐसा पंचेन्द्रियों के ज़रिये करते हो। इसीलिये हम कहते हैं कि सब कुछ बदल रहा है, पर ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता है। अगर एक बार हम उसे जान लेते हैं जो नहीं बदलता, तो फिर हमें कुछ भी हिला नहीं सकता है! ये आत्मज्ञान है! आत्मज्ञान क्या है? मुझमें ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता है, मैं नहीं बदलता हूं।
अपनी आत्मा की एक झलक भर मिल जाने से जीवन में कोई भय नहीं रहता।

जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास सब कुछ है, मन शांत हो जाता है, स्थित, सृजनात्मक, बुद्धि और अंतरज्ञान से पूर्ण और तुम्हारे भीतर से प्रतिभा खिल उठती है – और जब तुम ध्यान में बैठते हो तब ऐसा होता है, तुम सब कुछ छोड़ देते हो और बस बैठ कर ध्यान करते हो। सब कुछ छोड़ दो। और यदि कुछ क्षणों के लिये भी मन स्थिर हो जाता है और आपके उस ना बदलने वाले अस्तित्व से मिल जाता है, तो काम हो गया! जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया!
हर मानव मन-शरीर, सागर की एक लहर की तरह है। तब तुम ये जान जाते हो कि इस पूरे विश्व के कण कण में जीवन व्याप्त है। हमारा शरीर इस सागर में तैरते ख़ाली सीपियों की तरह हैं। जीवन सागर में कई शरीर हैं। तो, केवल शरीर में जीवन हो, ऐसा नहीं है। जीवन में शरीर है।

अगर ये बहुत ज़्यादा हो गया और तुम्हें अभी समझ नहीं आया, तो इसे अपने मन के किसी पिछले हिस्से में सहेज लो, किसी दिन तुम ये बात समझ जाओगे। ठीक है? ये केवल एक सिद्धांत हो सकता है, और तभी तो हम सिद्धांतों के साथ क्या करते हैं? उन्हें मन में किसी पिछले भाग में सहेज लेते हैं। हम केवल अपने अनुभव के अनुसार चलते हैं। देखो, हम अपने अनुभव के साथ और अधिक परिपक्व होते जाते हैं...हां। अच्छा है!

प्रश्न : आपने हमें आत्मा का अनुभव करने के लिये कहा। आपने अपनी आत्मा को कब सब से पहले अनुभव किया? हमें जानकर बहुत खुशी होगी।
श्री श्री रवि शंकर :
मेरा पहला अनुभव कब हुआ था? मुझे नहीं पता! वो बचपन में था, फिर मैं बड़ा हुआ और ये अनुभव और भी स्पष्ट हो गया। शायद १७-१८ साल की उम्र में।

प्रश्न : हम ये कैसे जाने कि हम अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा कर रहे हैं या किसी और का काम कर रहे हैं?
श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है! हम ये कैसे जाने कि हम जीवन में जिस काम को करने आये हैं वो कर रहे हैं कि नहीं? हम यहां क्या करने आये हैं? देखो क्या तुम खुश हो और तुम्हारे आस पास लोग खुश है। क्या तुम अपने आस पास के लोगों के लिये जो भी कर सकते हो, कर रहे हो? क्या तुम प्रेम बांट रहे हो और ज्ञान प्राप्त कर रहे हो? जो भी ज्ञान तुम्हारे पास है क्या तुम उसे लोगों के साथ बांट सकते हो? तुम्हें अपने आप से बार बार ये प्रश्न पूछने चाहिये, और तुम्हें पता है, कभी कभी हमें खुद पर बहुत शक नहीं करना चाहिये – कभी कभी खुद पर शक होता है, ‘क्या मैं ये ठीक कर रहा हूं?’

बस स्वाभाविक रहो। हर काम में कुछ अच्छाई और कुछ बुराई होती है। कोई भी कर्म निर्दोष नहीं है। कर्म के क्षेत्र में कुछ ना कुछ कमी रहती ही है चाहे वो १ या २ प्रतिशत ही क्यों ना हो। तो, हर काम में कुछ ना कुछ कमी हो सकती है।

उसी तरह, बोला गया कोई भी शब्द अपूर्ण हो सकता है। निर्दोष क्या हो सकता है – हमारा उद्देश्य, हमारा भाव। क्या तुम समझ रहे हो कि मैं क्या कह रहा हूं? तुम किसी के प्रति दुर्भाव ना रखो, ऐसा संभव है।

तुम्हें पता है, मैंने इतने सालों में कभी किसी से बेइज़्ज़ती के शब्द नहीं कहे। ज़्यादा से ज़्यादा जो शब्द मेरे मुंह में आता है, वो है, ‘बेवकूफ़’। जब मुझे बहुत गुस्सा आता है, तो मैं आवाज़ ऊंचीं कर के कहता हूं, ‘अरे, बेवकूफ़!’ पर मैंने कभी किसी को श्राप नहीं दिया, मैं ऐसा ही बना हूं। मैं इसके लिये कोई श्रेय नहीं ले सकता हूं, क्योंकि इसमें मेरा कोई प्रयत्न नहीं है। ये सीखने के लिये मैं किसी कोर्स या स्कूल में नहीं गया – कि कैसे मैं किसी को बुरा-भला ना कहूं, इल्ज़ाम ना दूं। चीखना, चिल्लाना, या परेशान होना मेरे स्वभाव में नहीं है। बुरे शब्द मेरे मुंह में आते ही नहीं हैं।

प्रश्न : क्या कभी क्रोध नहीं करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा मत सोचो कि तुम सब को हर समय क्रोध से मुक्त होना चाहिये। ज़रूरत पड़ने पर क्रोध को एक औज़ार की तरह प्रयोग करो। मैं ऐसा करने का प्रयत्न करता था, पर बहुत सफल नहीं रहा। कभी कभी मैं अपना क्रोध दिखाने का प्रयत्न करता हूं, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि मुझे जल्दी ही हंसी आ जाती है और बाकी सब लोग भी साथ में हंसने लगते हैं। लोग विश्वास ही नहीं करते कि मैं गुस्सा हूं।

पर, कभी कभी क्रोध अच्छा होता है। ख़ासतौर पर जब दुनिया में भ्रष्टाचार है, अन्याय है, और हर तरह के लोग हैं जो हर तरह के ग़लत काम करते हैं और तुम्हारा फ़ायदा उठाते हैं। ऐसी स्थिति में ये आवश्यक है कि तुम थोड़ा भंवों को चढ़ाओ, गुस्सा दिखाओ, ये अच्छा रहेगा।

पर ये ख़्याल रखना कि तुम गुस्सा दिखाओ पर उसे अपने हृदय में मत उतारो, परेशान मत हो।

देखो, ऐसा एक ही दिन में नहीं हो जाता है, और यहीं पर साधना से मदद मिलती है। हां, मैं ये नहीं कह रहा हूं कि सब्जी की तरह बन जाओ, या मानसिक रूप से अविक्सित व्यक्ति बन जाओ, हमेशा मुस्कुराओ और कभी परेशान ही मत हो – जब स्थिति की मांग हो, तो गुस्सा दिखाओ। पर कभी भी उस क्रोध को अपने मन में नफ़रत की सड़ान्ध मत बनने दो। क्रोध को क्षणिक ही रखो।

तुम्हें पता है स्वस्थ क्रोध क्या है? पानी की सतह पर लकीर खींचो तो वो कितनी देर टिकती है? बस उतनी ही देर क्रोध टिके तो वो स्वस्थ क्रोध है। अगर क्रोध क्षणिक है और उस पर तुम्हारा नियंत्रण है तो वो स्वस्थ क्रोध है, और तुम ठीक हो। तुम गुस्सा हो सकते हो, पर गुस्सा तुम पर हावी ना हो जाये। अक्सर क्या होता है कि क्रोध तुम पर हावी हो जाता है और तुम मुश्किल में पड़ जाते हो। ज्ञान इसका विरोधात्मक है। समझे? तुम छुरी का प्रयोग करो पर छुरी तुम्हारा प्रयोग ना करे!


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"जीवन का क्या महत्व क्या है"

आज श्री श्री ने क्या कहा..

२६ अगस्त २०१०


प्रश्न : एक प्रश्न मैं अपने आप से बहुत समय से करता आया हूं, पर समझ नहीं पा रहा हूं कि उसे किन शब्दों में कहूं। ये अजीब लग सकता है, पर जब मैं पूरे ब्रह्माण्ड को आपस में जुड़ा हुआ पाता हूं, तो सोचता हूं कि इस में मनुष्य का क्या कोई उपयोगी महत्व है, और क्या हम जब तक यहां हैं, क्या हमारे अस्तित्व से दूसरों को कोई लाभ है भी?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत अच्छा प्रश्न है! जीवन का क्या महत्व क्या है और हम यहां किसलिये हैं? तुम्हें खुद को शाबासी देनी चाहिये। अगर ये प्रश्न तुम्हारे जीवन में आया है, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी बुद्धि प्रौढ़ है। यहां लाखों लोग बिना ये प्रश्न पूछे कि, ‘जीवन का ध्येय क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?’ अपना पूरा जीवन बिता देते हैं। वे बस भोजन करते हैं, पीते हैं, टेलिविज़न देखते हैं, प्रेम या लड़ाई करते है और मर जाते हैं। उन्हें इस बारे में ज़रा भी ख़्याल नहीं आता। वे एक मिनट भी रुक कर ये नहीं सोचते कि, ‘जीवन क्या है? मैं कौन हूं? मुझे क्या चाहिये? मैं क्या कर सकता हूं? मैं कैसे उपयोगी हो सकता हूं?’ इन में से कोई भी प्रश्न उनके मन में नहीं आते। अगर ये प्रश्न तुम्हारे भीतर आया है तो इसका अर्थ है कि तुमने जीवन जीना शुरु कर दिया है। तुम्हारी जीवन यात्रा सही रास्ते पर जा रही है। इस यात्रा को आध्यात्म कहते हैं – ये जानना कि, ‘इस जीवन का ध्येय क्या है। मुझे क्या चाहिये? जीवन क्या है? मैं कौन हूं?’ इससे पहले कि तुम अपने आप से ये प्रश्न करो कि, ‘मुझे क्या चाहिये?’ तुम्हें ये जानना चाहिये कि तुम कौन हो। जीवन क्या है? इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण भाग हैं – एक विज्ञान है और एक आध्यात्म है। विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’

‘मैं’ और ‘ये’। ‘ये’ की समझ तुम्हें विज्ञान से आती है। ‘मैं’ की समझ तुम्हें आध्यात्म से आती है। ये ‘मैं’ क्या है? ‘मैं’ को जानने के लिये पहले ‘ये’ को जानो। ‘ये क्या है?’ ‘ओह! ये संसार है।’ ‘ये शरीर है।’ और, ‘ये शरीर कैसे आया?’ ‘ये शरीर एक ४-५ किलो के बच्चे के रूप में आया। फिर उस बच्चे ने इस धरती से ही सब सामग्री ली और अब ५० किलो का हो गया है।
तो, इस शरीर में क्या है? ये शरीर कैसे बना है?

प्रश्न: आपने शरीर के बारे में बताया है। मैं शरीर और पंचतत्वों के संबंध को जानना चाहता हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष – ये पंचतत्व हैं। अगर इन में से एक भी तत्व ना हो तो ये श्रीर टिक नहीं पायेगा। है ना? पृथ्वी तत्व से भोजन मिलता है। जल तत्व तो आप जानते ही हैं। फिर, अग्नि तत्व की, गर्मी की आवश्यकता होती है। गर्मी के बिना ये शरीर जी नहीं सकता। फिर वायु तत्व आया। शरीर के लिये वायु और अंतरिक्ष तत्व के बिना रहना भी संभव नहीं है।

इस शरीर का अस्तित्व पंचतत्वों से है। और फिर इस शरीर का क्या होता है? ये शरीर पंचतत्व से आया है और उन्हीं को वापस चला जायेगा। ये विज्ञान है। एक मृत शरीर में भे पंचतत्व विद्यमान होते हैं। तो फिर, एक मृत और जीवित शरीर में क्या अंतर है? जीवित शरीर में जीवन होता है। और, जीवन क्या है?

जब ये प्रश्न आया, तब तुम देखते हो, ‘ओह! प्राण – जीवन शक्ति!’ और फिर तुम प्राण के गहन अध्धयन में जाते हो, और प्राण से अधिक कुछ पाते हो। ‘ये क्या है? ये मन है। ओह! तो ये मन क्या है? मन कितने प्रकार का होता है? मन क्या क्या करता है?’ इस जिज्ञासा से तुम आर्ट आफ़ लिविंग में आ जाते हो।

प्रश्न : अस्तित्व के इतने स्तरों के बारे में आपने बताया है, कृपया इन पर कुछ और विस्तार कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार, मन के चार कार्य हैं। या, मन के ये चार पहलू हैं।

तो, मन क्या है? क्या तुम सुन रहे हो? अगर तुम्हारी आंखें खुली हैं, और कान तो खुले हैं ही...तुम्हारे कान में आवाज़ जाती है पर यदि तुम्हारा मन कहीं और है, तो क्या तुम मेरी बात सुन सकोगे? नहीं। है कि नहीं? तो, इस मन से ही तुम महसूस करते हो। ठीक है ना? जो पांचों इन्द्रियों के ज़रिये बाहर जाता है और अनुभव करता है, वो मन है।

अच्छा, अगर तुम मन से अनुभव कर रहे हो तो बुद्धि क्या है? जब तुम अनुभव करते हो, तो कहते हो, ‘ओह! ये अच्छा है। ये अच्छा नहीं है। मुझे ये चाहिये। मुझे वो नहीं चाहिये।’ तुम्हारी बुद्धि तय करती है। ये विवेक शक्ति है। मैं बोल रहा हूं और तुम्हारा मन कह रहा है, ‘ये बात मुझे पसंद नहीं है।’ या, ‘मैं ये बात मानता हूं।’ या, ‘मैं ये बात नहीं मानता।’ तुम अपने भीतर एक वार्तालाप कर रहे हो। ये बुद्धि है।

और फिर, स्मृति वो है जो जानकारियों को संभाल कर रखती है। तो, कभी कभी कोई अनुभव करते हुये तुम्हें लगता है, ‘ओह! मैंने ऐसा अनुभव पहले किया है।’ अगर तुम एक सेब की मिठाई का मज़ा पहले ले चुके हो तो तुम कह उठते हो, ‘ओह! मैं पहले भी इसका मज़ा ले चुका हूं। मैंने ये सेब की मिठाई पहले भी खाई है।’ तो स्मृति का काम है अनुभव को पहचानना और उसे स्मृति में संजो कर रखना।

फिर आया अहंकार। अहंकार है – ‘मैं कुछ हूं। मैं बुद्धिमान हूं। मैं मूर्ख हूं। मुझे ये पसंद है। मुझे वो पसंद नहीं है। मैं अमीर हूं। मैं बहुत ग़रीब हूं। मैं बदसूरत हूं। या, मैं सुंदर हूं। मैं कुछ हूं। मैं हूं,’ ये अहंकार है।
जब तुम अहंकार को जान गये, तो कहोगे कि क्या बस इतना ही है? नहीं! अहंकार को जानने के बाद भी कुछ जानना बाकी है। वो क्या है? वो आत्मा है।

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"चेतना के विस्तार के साधन हैं संगीत, ज्ञान और मौन"

श्री श्री रवि शंकर ने क्या कहा..

न्यूयार्क के गणेश मंदिर में दिये गये व्याख़्यान के कुछ अंश

चेतना के विस्तार के लिये तीन मुख्य साधन हैं - संगीत, ज्ञान और मौन।

ज्ञान, तर्क-बुद्धि से जुड़ा है। रोज कुछ क्षण मौन रखने के अभ्यास से, हम अपनी सजगता का स्तर बढ़ा सकते हैं। बुद्धि के स्तर को उन्नत करना यानि पात्रता बढ़ाना है, और यह हो सकता है कुछ ही क्षण मौन में रहने से। बस इतना ही प्रयास चाहिये यह हासिल करने के लिये।

संगीत का उद्देश्य है मौन की ओर ले जाना, और ज्ञान का लक्ष्य है आश्चर्य की ओर ले जाना।

सचेतन

अब क्या हो रहा है यहाँ? (हँसी) सचेतन होने का आभास, ठीक है ना? मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ और आप सब लोग कुछ पकड़ने के लिये इन्तज़ार कर रहे हैं। क्या आप को इस बात का आभास हो रहा है? किसी चीज़ को पकड़ने की अपेक्षा, अपने ध्यान को प्रतीक्षा की ओर लगाने को सचेतन होना कहते हैं, और यह है ध्यानस्थ सजगता।

क्या आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूँ? तो जब आप सचेतन होते हैं तब क्या होता है? आप में एक बदलाव आने लगता है -आप दृश्य से हट कर दृष्टा की ओर जाने लगते हैं। अब आप ही दृष्टा और दृश्य हैं। आप मुझे देख रहे हैं और समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ।

अब फिर से अपना ध्यान खुद की ओर ले जाइये। आप बैठे हैं, पढ़ रहे हैं..

अपना ध्यान अब अपनी साँस पर ले जाइये। आप्के मन में कुछ संवाद चल रहा है अपने आप से - ‘हाँ’ या ‘ना’ के रूप में। समझ रहे हैं न मेरी बात?

दृश्य से हट कर दृष्टा की ओर जाना योग द्वारा, उज्जई साँस और ध्यान से संभव होता है। इससे आपके भीतर एक करुणा का सागर उमड़ पडता है। इससे बुद्धि तीक्ष्ण और सचेत होती है। आप अधिक सजग और सूक्ष्म आभासी हो जाते हैं, और आपका मैत्रीभाव और आत्मविश्वास और अधिक बढ़ता है।

विश्वास के तीन स्तर

विश्वास के तीन स्तर होते हैं। पहला जब आप अपने में विश्वास रखते हैं तभी दूसरों में भी विश्वास रख सकते हैं। यह समाज में, लोगों की अच्छाई के प्रति विश्वास है। देखिये, यहाँ कितने अच्छे लोग बैठे हैं! ( हँसी)।

फिर, उसके प्रति जिसे देख नहीं सकते पर महसूस कर सकते हैं। यह बात समझना कठिन है पर इसे नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता।

और अंत में, दैवी शक्ति या ईश्वर में विश्वास। पर ईश्वर में विश्वास होने से पहले दुनिया के लोगों में विश्वास करना होगा। इस दुनिया में हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक अच्छाई है। यहाँ केवल थोड़े से, गिनती के सिरफिरे, राह से भटके, तनाव से भरे लोग हैं, जो तरह तरह के हिंसात्मक कार्यों में लगे हुए हैं। साधारण तौर पर दुनिया में अच्छाई ही है।

आध्यात्म का पहला नियम

हम अधिकतर दुनिया को दोष देते हैं और उसके फलस्वरुप खुद को भी दोषी ठहराने लगते हैं।

आध्यात्म का पहला नियम है- स्वयं को दोषी मत मानो और न ही दूसरों को।

क्या आपने यह पहल कदम ले लिया है? क्या आप यह कर सकते हैं? इसके बिना आगे बढ़ना बेकार है। तो, ना खुद को दोष दो और ना ही अन्य किसी को। फिर देखो क्या परिवर्तन होता है खुद में - एक उत्साह और शक्ति उभर आती है! मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि तुम अपने दोषों को छुपाओ। गलती को जान कर उसे दूर करने की चेष्टा करो। अपनी गलती को मान कर आगे बढ़ते जाओ। यह बात अपने आप को दोषी मानते रहने से भिन्न है। खुद में और समाज की अच्छाई में विश्वास रखो। इस पूरी सृष्टि के मूल सार में विश्वास रखो।

क्या आप सेलफोन इस्तेमाल करते हैं? इसको चलाने के लिये सिम कार्ड लगता है। अगर सिम कार्ड नहीं है तो नंबर लगाये जाने पर भी किसी से बात नहीं कर पाओगे। इसी तरह हमारी कई प्रार्थनायें भी नहीं पहुँच पाती हैं और न ही उनका फल मिल पाता है, क्योंकि मेरे भाई तुमने सिम कार्ड नहीं डाला!

अब सिम कार्ड लगाने पर भी अगर कहीं ज़मीन के नीचे के तल हो, तो सिग्नल नहीं मिलता है। फिर बैटरी की भी ज़रूरत होती है। तो सिम कार्ड, सिग्नल और बैटरी हो, तो तुम किसी से बात कर सकते हो। उसी प्रकार से हमारी अपनी चेतना से जुड़ने के लिये, मन शांत, शुद्ध और स्थिर होना चाहिये।

ज्ञान, संगीत और मौन - ये तीन साधन हैं जीवन में पूर्णता लाने के लिये। तब हमारी प्रार्थना सुनी जाती है।

भावपूर्वक गाते रहो। श्रद्धा, विशवास, मौन और ज्ञान से प्रेरित प्रार्थना जरूर फलित होती है।

क्या आप सब यहीं हैं?

यह आत्मा क्या है?

हम इतना सुनते हैं आत्म साक्षात्कार के बारे में पर यह आत्मा है क्या?

क्या आप जानना चाहते हैं? आप में से कितनों ने भौतिक विज्ञान (फ़िज़िक्स) और रासयनिक विज्ञान (केमिस्ट्री) पढ़ा है? सबको भौतिक विज्ञान के विषय में थोड़ी जानकारी अवश्य होनी चाहिये। हमारा शरीर करोड़ों कोशिकाओं से बना है और प्रत्येक कोश में जीवन है। प्रतिदिन नयी कोषिकायें बनती और मिटती रहती हैं। जब रगड़ कर नहाते हो तो चमड़ी पर से मरी कोषिकायें धुल जाती हैं। तुम एक अकेले व्यक्ति नहीं हो। हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि तुम एक ‘पुरुष’ हो, यानि कि चलती फिरती नगरी हो। संस्कृत में ‘पुर' का अर्थ नगरी होता है। हमारी आत्मा इस नगरी यानि हमारे इस चलते फिरते शरीर में वास करती है। और इस चलते फिरते शरीर में भी अनेक जीव जन्तु घूम रहें हैं साथ साथ। जानते हैं, हमारे शरीर की केवल आँतों में ही ५०,००० कीटाणु रहते हैं?!

तो, यह शरीर तो प्रतिदिन बदल रहा है, फिर भी इसमें एक कुछ है जो नहीं बदल रहा। यह समझने के लिये मधुमक्खी के छत्ते को जानना होगा। आपने देखा है कभी छत्ता? उसे थामे रखने वाला आधार कौन है? रानी मधु मक्खी। यदि रानी उड़ जाती है तो सब नष्ट हो जाता है।

वैसे ही हमारा शरीर भी अनेक परमाणुओं से बना है और इसमें एक रानी मधुमक्खी छुपी बैठी है। प्रत्येक शरीर मधु से भरे एक छत्ते के समान है। अपने शरीर रूपी छत्ते में छुपी रानी को ढ़ूँढ निकालो। यही ध्यान है। करोड़ों परमाणु जो हमारे शरीर में मौजूद हैं वैसे ही हाथी या अन्य प्राणी में भी हैं। बाहरी शरीर की बनावट का कोई महत्व नहीं है। अंदर वास करती आत्मा सबमें एक है और नित्य है, कभी बदलती नहीं। यह ज्ञान होने पर तुम्हें कुछ भी नहीं सता सकता है, तुम्हें सब अपने लगने लगेंगे, कोई बात तुम्हें विचलित नहीं कर पायेगी तब, और यही आध्यात्म का सार है।


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"मुस्कान हमारा ट्रेड मार्क है"


२६ जून २०१०,
बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : मैने अभी हाल ही में अपना बेसिक कोर्स खत्म किया है, और एडवांस कोर्स के बारे में बहुत सुना है। क्या आप मुझे एडवांस कोर्स के बारे में बता सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मन की सुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं, आत्म बल बढ़ता है, शरीर पुष्ट होता है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है। लाभ ही लाभ हैं।

प्रश्न : मैं पहली बार यहाँ आया हूँ पर मुझे ऐसा तीव्र भास हो रहा है जैसे मैं यहाँ पहले भी आया हूँ। क्या आप मुझे इसके बारे में कुछ बता सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
चेतना के स्तर पर कई ऐसे अनुभव होते हैं जिनके लिए लगता है ऐसी अनुभूति पहले भी हो चुकी है। आज वैज्ञानिक कहते हैं सब कुछ पहले ही घटित हो चुका है और सबकुछ केवल परदे पर परिबिंबित हो रहा है। स्ट्रिंग थियुरी के अनुसार सबकुछ केवल उर्जा ही है। यह बात किसी दार्शनिक के मुख से नहीं बल्कि वैज्ञानिक के मुख से आ रही है।

प्रश्न : आपने कभी झूठ बोला है, यदि हाँ तो क्यों?

श्री श्री रवि शंकर :
बचपन में मैं अपने दोस्तों से कहा करता था कि मेरा परिवार सारे विश्व में है। मेरे दोस्त मेरे माँ-बाप से कह देते कि मै ऐसा झूठ बोल रहा हूँ और फिर मुझे डांट पड़ती। पर, अब तो यह सच हो ही गया!

प्रश्न : मैं अपने मोबाइल फोन से अत्याधिक जुड़ा हुआ हूँ? वो नहीं भी बजता तो भी मैं उस पर आश्रित हूँ। कृपया मुझे इससे बाहर आने में सहायता कीजिए।

श्री श्री रवि शंकर :
तुम सही जगह पर हो। अपना फोन बंद कर के आराम करो। हमारे शरीर को सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाली चीज़ों में से मोबाइल फोन एक मुख्य चीज़ है। आपने सुना ही होगा कि कैलीफोर्निया में एक नियम बन गया है जिसके अनुसार हर मोबाइल फोन पर यह अंकित होना चाहिए कि ’यह सेहत के लिए हानिकारक है’, जिस तरह से सिगरेट पर लिखा होता है।

प्रश्न : मैनें हाल ही में येस प्लस किया है, और मैं आपका बहुत आभारी हूँ। मैं अपने सभी प्रिय जनो को यह करवाना चाहता हूँ।

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, बहुत से देशों में युवकों को इससे बहुत फ़ायदा हुआ है। अमरीका के ४३ विश्व विद्दालयों में येस प्लस क्लब हैं और कई विश्व विद्दालयों में येस प्लस करने से पढ़ाई में क्रेडिट भी मिलता है। मैं चाहता हूँ कि आप में से बहुत से सहभागी आएं जो विश्व के कोने कोने में इस ज्ञान को फैलाएं।

प्रश्न : योगा भारत की देन है, पर अमरीका जैसे देशों में इसका इतना खूबसूरत स्वागत किया जाता है। आप इस पर क्या कहेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
योगा भारत से फैला है, और भारत का ट्रेड मार्क तो रहना ही चाहिए। नहीं तो आने वाले १०० वर्षों में भारत में इसका परिचय पश्चिम से फैलने का होगा।

प्रश्न : ’आर्ट ओफ़ लिविंग’ का ट्रेड मार्क क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
मुस्कान! यदि कोई कहे उसने ’आर्ट ओफ़ लिविंग’ का कोर्स किया है और वो मुस्कुरा नहीं रहे तो उसका यकीन मत करना। उसने सही माइनो में कोर्स किया ही नहीं है।


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"काम पूरा करने की इच्छा तुम्हारे भीतर से आनी चाहिये"

बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : मैं कई काम शुरु कर लेता हूँ, पर उन्हें पूरा नहीं कर पाता हूँ। आप मुझे इस स्थिति को सुधारने का कोई उपाय बता सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम चाहो, तो तुम कुछ भी कर सकते हो। काम पूरा करने की इच्छा तुम्हारे भीतर से आनी चाहिये। इस संकल्प के साथ कि मैं ये काम करूंगा ही। भीतर से किया गया ये संकल्प तुम्हारी सहायता करेगा। समझ गये? ये काम तुम्हारे सिवा कोई नहीं कर सकता है।

तो, छोटे छोटे काम हाथ में लो, और उन्हें पूरा करो । इस तरह तुम में आत्मविश्वास आ जायेगा। इस से तुम बड़े काम करने के लिये तैयार होते हो। तुम्हें पता है कि तुम काम पूरा क्यों नहीं करते हो? क्योंकि तुम उसे महत्वपूर्ण नहीं समझते। पर, जीवन में कुछ भी महत्वहीन नहीं है। हर चीज़ का अपना महत्व है। अगर तुम्हें कोई काम महत्वपूर्ण नहीं लगे, तब भी तुम कहो, ‘मुझे ये काम पूरा करना है, और मैं इसे पूरा करूंगा।’ इस से तुम्हारी पर्तिबद्धता बढ़ेगी।

प्रश्न : कहते हैं कि सिर्फ़ अपने बारे में सोचने से अवसाद हो जाता है, पर महाभारत के युद्ध की शुरुवात में अर्जुन तो दूसरों के बारे में सोच रहा था, तब भी अवसाद-ग्रस्त हो गया था। कृपया इस पर प्रकाश डालिये।

श्री श्री रवि शंकर :
अवसाद-ग्रस्त होने का मंत्र है - ‘मेरा क्या होगा? मेरा क्या होगा?’। अर्जुन सोच रहा था कि जो काम उसे करना है वो उसे कैसे करे, और लोग उसके बारे में क्या सोचेंगे। वो अपने बारे में ही सोच रहा था। सिर्फ़ अपने बारे में सोचने से ही नहीं, पर मोह और सही तरह से ना समझ पाने की वजह से भी अवसाद हो जाता है। अवसाद ग्रस्त होने का एक अचूक तरीका है – बिना किसी काम के, खाली बैठना और सोचना, ‘मेरा क्या होगा?’ इस तरह तुम ज़रूर अवसाद-ग्रस्त हो जाओगे।

प्रश्न : गुरुजी, आज एक कार्यशाला में बताया कि अगर तुम्हारे किसी मित्र के मित्र का मित्र खुश है तो तुम भी खुश हो सकते हो। क्या वैदिक शास्त्रों में ऐसा कोई सूत्र है?

श्री श्री रवि शंकर : हाँ! इसका अर्थ है, उदाहरण के तौर पर - जैसे कि अहिंसा को पसंद करना, अहिंसा को अपनाना। जो व्यवहार प्रकृति और परमात्मा तुम्हारे साथ करते हैं, तुम भी करो। कुछ ऐसा करो जिसके बदले में कुछ पाने की इच्छा ना हो।
एक वैदिक प्रार्थना है, ‘मैं सबको मित्रता की दृष्टि से देखूं, और सभी मुझे मित्रता के भाव से देखें।’

प्रश्न : अंधविशवासी होने का क्या अर्थ है? मैं भ्रमित हूँ। कभी कभी मैं इन बातों को मानता हूँ, पर मैं अंधविश्वासी नहीं हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
तुम कह रहे हो कि तुम अंधविश्वासी नहीं हो, पर उन बातों को मानते हो। अच्छा, पहले ये बताओ कि अंधविश्वास क्या है?
देखो, कई तरह की मान्यतायें होती हैं। किसी को कोई बात अंधविश्वास लग सकती है, पर किसी दूसरे को ऐसा नहीं लगता। पर एक व्यापक दृष्टि से देखें तो जो तर्क-संगत ना हो, मानव की क्रमगत उन्नति में सहायक ना हो, और बौधिक, मानसिक, आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से नुक्सान पहुँचाये, वह अंधविश्वास है और उसे मिटाने की आवश्यकता है। दुनिया के कई भागों में अंधविश्वास प्रचलित है।
आध्यात्म और अंधविश्वास, एक दूसरे के विलोम हैं। वे संग में नहीं चल सकते। हमें समाज में आध्यात्मिक गुणों को बढ़ाना है, और अंधविश्वास को घटाना है।

प्रश्न : जीज़स की इस बात का क्या अर्थ है, ‘जो रोटी तुम खाते हो, वो मैं ही हूँ।’?

श्री श्री रवि शंकर :
मैंने इस बारे में, ‘Jesus - the embodiment of love’ किताब में बताया है।

प्रश्न : आध्यात्मिक पथ पर सांसारिक सुखों का परित्याग करना पड़ता है, जिससे ऐसा लगता है कि जीवन से खुशी छिन गई है। क्या ऐसा है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं। बल्कि, ये तुम्हें और खुशी देता है।

प्रश्न : अद्वैत शब्द के प्रयोग के बारे में जानना चाहिती हूँ । ‘जो दो नहीं है’ क्यों कहते हैं? इसे ‘एक ही है’ क्यों नहीं कहते?

श्री श्री रवि शंकर :
क्योंकि एक को गिन सकने के लिए दो चाहिए।

प्रश्न : पंचतत्वों में पृथ्वी और जल को स्त्रीलिंग बताया है, अग्नि और वायु को पुल्लिंग बताया है। आकाश का क्या लिंग है? ये भेद क्यों?

श्री श्री रवि शंकर : इस के बारे में कई सोच विचार हैं। लोग हर चीज़ में पुल्लिंग और स्त्रीलिंग आरोपित कर देते हैं। पर मानव मन इसी तरह कुछ समझ पाता है। वो इसके आगे नहीं समझता।

प्रश्न : मोक्ष क्या है, और उसे कैसे प्राप्त करें?

श्री श्री रवि शंकर :
जिस दिन तुम्हारी छुट्टी होती है तुम्हें कैसा लगता है? वो मोक्ष की एक हल्की सी झलक है। तब भी तुम्हें ऐसा ही लगता है जब तुम्हारे इम्तिहान खत्म होते हैं, और तुम एक राहत के साथ अपनी किताबों को किनारे रखते हो। जब बस में एक लंबा सफ़र करने के बाद तुम अपनी मंज़िल पर उतरते हो, और एक चैन की सांस के साथ अपने आप को हिलाते डुलाते हो तो भी मुक्ति का अनुभव होता है। ऐसे ही जब जीवन में तुम पूर्ण विश्राम पाते हो, जब मन आनंदित और संतुष्ट होता है, उसे मोक्ष कहते हैं।

प्रश्न : ऐसा क्यों है कि मैं Art of living के सेवा कार्यों में अपना १००% दे पाता हूँ, पर पढ़ाई में ऐसा नहीं कर पाता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे पता है कि ये कठिन है, पर तुम्हें करना होगा। जो काम अच्छा लगता है, मन उस में आसानी से लग जाता है। अगर उस में तुम्हें रस आ रहा है, तो मन लगाना कठिन काम नहीं है। ये स्वाभाविक रूप से हो जाता है। पर कोई काम अगर रुचिकर ना हो, रूखा और उबाऊ लगे, पर आगे चल कर तुम्हारे लिये फ़ायदेमंद सिद्ध हो तो तुम्हें उसे करने में पूरा प्रयास करो। कोई विकल्प नहीं है।

प्रश्न : Yes+ कोर्स करने से मुझे बहुत फ़ायदा हुआ है, पर जीवन में एक नई समस्या हो गई है। कोर्स करने के पहले मैं हर छोटी छोटी बात के लिये भी अपने माता पिता पर निर्भर थी, पर अब मैं अपने कुछ निर्णय खुद ही लेने लगी हूँ। । इससे मेरी मां हमारे रिश्ते के नये प्रारूप को लेकर कुछ असुरक्षित महसूस करती हैं। उन्हें लगता है कि उनकी बेटी उनसे दूर जा रही है। पर ये सच नहीं है। मेरे हृदय में उनके लिए पहले से अधिक सम्मान है।मैं चाहती हूँ कि वे असुरक्षित ना महसूस करें और मैं अपने कुछ निर्णय खुद भी के सकूं। इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
अपनी भावनाओं को ठीक तरह अभिव्यक्त करना, और दूसरों की भावनाओं को ठीक तरह समझना सबसे कठिन कार्य है। इस कौशल की कमी ही आज समाज की सब से बड़ी समस्या है। इस कौशल का विकास करना है। ये कभी परिपूर्ण नहीं होता है। इस मामले में उतार चढ़ाव होते ही रहते हैं। हम जो महसूस करते हैं, उसे ठीक तरक व्यक्त नहीं कर सकते हैं, और दूसरों को ठीक तरह समझ नहीं सकते हैं। ऐसा जीवन में होता ही रहता है। पर, जब हम शांत और प्रसन्नचित्त हो जाते हैं, तब हम दूसरों के मन को अधिक समझ पाते हैं। इसीलिये, प्राणायाम और ध्यान करना आवश्यक है। इनसे हमें अंतःस्फूर्णा और भीतरी स्पष्टता मिलती है। और हम पाते हैं कि दूसरें हमें आसानी से समझ पाते हैं और हम अपने विचारों को बेहतर अभिव्यक्त कर पाते हैं।

प्रश्न : अगर हम कोई वस्तु यां घटना चाहते हों तो हमारे पास दो रास्ते हैं - एक तो ये कि इच्छा को छोड़ दो, और उसे पूरा होने दो। दूसरा रास्ता है कि, उसे इतना चाहो कि वह पूरी हो जाये। इन दोनों में से हमें कौन सा रास्ता अपनाना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : स्वाभाविक रूप से जो हो रहा है, होने दो। कभी कभी तुम किसी चीज़ के लिये दिल से प्रार्थना करते हो और वो तब पूरी होती है। कभी कभी बस मन में एक हल्का सा विचार आता है और वो इच्छा पूरी हो जाती है। है ना? तो, इसके लिये कोई तय मापदंड नहीं है। सब कुछ संभव है।

प्रश्न : हम कथाओं में पढ़ते हैं कि योगी कभी कभी श्राप भी देते हैं। योगी श्राप क्यों देते हैं? एक तरफ़ तो वो कहते हैं, ‘सुखी रहो। ध्यान करो, इत्यादि।’ तो फिर श्राप क्यों देते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
योगी अगर श्राप भी दें तब भी उस से लाभ होता है। एक अज्ञानी का प्रेम भी नुक्सान करता है। जैसे कि, गाँव में कोई बच्चा रो कर कहे कि वो स्कूल नहीं जाना चाहता, तो कभी कभी उसकी माँ उसका रोना बंद करने के लिए अज्ञानवश बच्चे की बात मान जाती है, और बच्चा घर पर खेलता रहता है, यां जानवरों को जंगल में चराने ले जाता है। स्कूल ना जाने से बच्चे को आगे चल कर नुक्सान होगा। उसी तरह, एक योगी के क्रोध से भी प्रेरणा मिल सकती है और इससे कल्याण हो सकता है।

प्रश्न : क्या आपने कभी किसी को श्राप दिया है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं। कभी ऐसा मौका ही नहीं आया। जब आप पूर्ण महसूस करते हैं, तब श्राप देने की इच्छा ही नहीं जागती। जो लोग जीवन में कुछ कमी महसूस करते हैं, वे ही श्राप दे सकते हैं।

प्रश्न : क्या मृत्यु के समय तुरंत ही आत्मा शरीर को छोड़ देती है? अस्वाभाविक और दुर्घटना से हुई मौत के बाद क्या होता है?

श्री श्री रवि शंकर :
शरीर और आत्मा का रिश्ता अद्भुत है। ये बहुत गहरा विषय है, इसके बारे में फिर कभी बात करेंगे।

प्रश्न : मैं वस्तुओं और व्यक्तियों से बहुत मालिकीपन और आसक्ति रखता हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। इसकी सजगता से ही तुम इससे बाहर आने लगते हो।

प्रश्न : हम चिंता और अपेक्षा से कैसे मुक्त हो सकते हैं? साथ ही बार बार आती अपेक्षाओं की वजह से परेशान ना हो?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। उसे रहने दो। तुम अपनी सभी अपेक्षाओं से क्यों मुक्त होना चाहते हो? जब तुम्हें उनसे परेशानी होती है, तब तुम उनसे मुक्ति चाहते हो, है ना? तुम्हें पता है, जब तुम्हारे पास कुछ करने को नहीं होता तब तुम बैठ कर चिंता करते हो, अपेक्षा रखते हो यां दिवास्वप्न देखते हो। जब तुम व्यस्त होते हो, तब ऐसा नहीं होता है।

प्रश्न : मैं कभी कभी तय नहीं कर पाता कि क्या करूं, क्या ना करूं। जैसे कि पढ़ाई के समय मैं कहीं खो जाता हूं, और पढ़ाई करना भूल जाता हूं। ऐसी स्थितियों में मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
साधना, सत्संग और सेवा करो, इससे मन केन्द्रित होता है।
शेष अंश अगली पोस्ट में..


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"जो कह रहा है, जो सुन रहा है, जो समझ रहा है, वही आत्मा है"

प्रश्न : इस वर्ष को विरोधी क्यों कहा गया है?

श्री श्री रवि शंकर :
शायद इसलिए कि विरोध के लिये समाज में कुछ स्थान रहे। यह मार्च में ख़त्म हो रहा है। आगे बढ़ो।

प्रश्न : आत्मा कौन है?

श्री श्री रवि शंकर :
जो पूछ रहा है, जो सुन रहा है, जो जान रहा है, वही आत्मा है।

प्रश्न : गुरुजी, मैंने अतीत में पाप किया है...

श्री श्री रवि शंकर :
देखो, अब तुम यहां आ गये हो, सब पाप और पुण्य भूल जाओ। अपने पुण्य के कारण तुम यहां आये हो और तुम्हारे सब पाप धुल गये हैं।

प्रश्न : घर में जब लोगों के विचार नहीं मिलते तो उस स्थिति में क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर :
उसे स्वीकार कर लो। मतभेद हो सकते हैं। स्वीकार करने से तुम शांत हो जाओगे। क्या तुम कह सकते हो कि सागर में लहरें नहीं होनी चाहिये? यह प्रकृति है। उसी प्रकार इस संसार में अलग अलग लोग अलग अलग बात कहेंगे। तुम बस मुस्कुराओ और आगे बढ़ जाओ। बार बार इसको मन में दोहराने से कभी न कभी यह बात समझ में आ ही जाएगी।

प्रश्न : लोग २०१२ में दुनिया ख़त्म होने की बात कर रहे हैं। जब मैं दुनिया के अंत की बात सोचने लगा तो विचार आया - सृष्टि क्यों है?

श्री श्री रवि शंकर :
२०१२! ऐसा कुछ नहीं होगा। हम तब भी यूं ही सत्संग करेंगे। बस तब लोग ज़्यादा होंगे|

प्रश्न : जब ध्यान करते समय द्वैत का आभास हो और कई विचार आयें तो मुझे क्या करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान में कुछ देखने का प्रयत्न ना करो। विश्राम करो। यदि कई विचार आएं तो उन्हें स्वीकार कर लो। द्वैत क्या है? अच्छा और बुरा, सही और ग़लत - ये सब संघर्ष है। ध्यान करते समय तीन बातों का ख़याल रखो - अकिंचन, अचाह, अप्रयत्न।
मैं कुछ नहीं हूं।
मुझे इस क्षण कुछ नहीं चाहिये।
मुझे इस क्षण कुछ नहीं करना|
इन तीन सिद्धांतों से तुम ध्यान कर पाओगे।

प्रश्न : पूर्ण शांति कब होगी?

श्री श्री रवि शंकर :
पहली बात, क्या तुम में पूर्ण शांति है? जब तुम पूर्ण रूप से शांत होगे तब समस्त संसार में भी पूर्ण शांति होगी। लहरें आती हैं, लहरें जाती हैं। संसार में हर समय सभी सुखी हों, ऐसा संभव नहीं है।

प्रश्न : मैं अपनी प्रतिबद्धताओं(कमिटमेन्ट्स) को पूरा नहीं कर पाता। मुझे क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
जो तुम कर सकते हो, उस पर ध्यान दो। यह देखो कि तुमने दो काम पूरे किए। अगली बार तीन पूरे करना, फिर चार...। इस पर ध्यान दो।

प्रश्न : कैसे जाने कि हमने अपना १०० प्रतिशत दिया है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हे ये खुद ही महसूस होगा!

प्रश्न : मैं पर्यावरण के लिये कुछ करना चाह्ता हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
क्या तुम्हारे फ़्लैट में एक बाल्कनी है? गमलों मे कुछ पौधे उगाओ। यहाँ से शुरु करो।

प्रश्न : शिव क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
शिव महाकाल है, समय।

प्रश्न : मैं अपने साक्षातकार(इंटरव्यु) के परिणाम के बारे में चिंतित हूं। क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
उज्जई श्वास, प्राणायाम, भस्त्रिका, ध्यान करो, और गाओ और नाचो। प्रस्न्न रहो।

प्रश्न : परिपक्व(mature) होना किसे कहते हैं? मैं इस बारे में असमंजस(कनफ्युज़) हूं।
श्री श्री रवि शंकर :
जब असमंजसता खत्म हो जाती है तब तुम परिपक्व होते हो।

प्रश्न : कभी कभी मैं सब से एक अलगाव मह्सूस करता हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
यह अच्छा है। उस समय अपनी आंखें बन्द करो और मुस्कुराओ। उस समय मैं तुम्हारे पास हूं।

प्रश्न : सब लोग कब ’आर्ट ऑफ़ लिविन्ग’ को अपनायेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा कुछ नहीं है जो ’आर्ट ऑफ़ लिविन्ग के भीतर या बाहर हो।

प्रश्न : आप पूरी दुनिया को एकदम से क्यूं नहीं बदलते? इतती धीरे क्यों?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम सब को भी तो काम चाहिए!

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"वासुदेव कुटुम्बकम विषय पर वार्तालाप"


श्री श्री रविशंकर :
टोक्यो में १५ अक्तूबर को ’वासुदेव कुटुम्बकम’ विषय पर वार्तालाप
ॐ शांति शांति शांति।

जैसे की आदरनीय उचिंदा और अन्य मानणीय महोदयों ने कहा, आज हमें दुनिया को एक अलग दृष्टि कोण से देखना होगा। हम अपने अतीत से बहुत कुछ सीखते हैं और भविष्य के लिए योजना बना सकते हैं| यदि हम भूतकाल की सांसारिक सभ्यता देखें तो दुनिया में दस बड़े धर्म थे| चार मध्वर्ती पूर्व से,छह पूर्व और दूरवर्ती पूर्व से| दूरवर्ती पूर्व के छह धर्मों में कभी कोई संघर्ष नहीं हुआ।

मैंने राष्ट्रपति निक्सन के साथ होने वाली एक घटना की कहानी सुनी है| वह जापान में थे, और एक बौद्ध संत और शिंटो पादरी के साथ बैठे थे| उन्होंने शिंटो पादरी से पूछा,"जापान में शिंटोवादियों की क्या संख्या है|" शिंटो पादरी ने जबाब दिया,"८०%" | तब वे बौद्ध साधू की ओर मुड़े और उनसे पूछा जापान में बौद्ध लोगो की कितनी संख्या है? दोबारा उन्हें बताया गया ८०%| राष्ट्रपति निक्सन असमन्जस में पड़ गए। उन्होंने कहा ऐसे कैसे हो सकता है कि दोनों का जबाब एक ही हो| बौध और हिन्दू धर्म में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है, और न ही बौद्ध और शिंटो में| हम मिल जुल जाते हैं और सब के साथ अपनेपन की भावना है| भारत में हिन्दू, जैन, बौद्ध और सिख धर्म में कोई बहुत ज्यादा अंतर नहीं है क्योंकि सब एक साथ सद्भावना से रहतें हैं| दुनिया को यह सीखने की ज़रूरत है| क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

यदि दुनिया थोड़ा सा भी यह सीख ले जो जापान और भारत में हो रहा है तो आतंकवाद की समस्या खत्म हो जाएगी| आतंकवाद तब बढ़ता है जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि सिर्फ उनका रास्ता ही सही रास्ता है| मेरा रास्ता ही केवल ईश्वर की ओर ले जाने वाला है| क्या ऐसा नहीं है?

हमें शिंटोवाद के बारे में और जानने की जरूरत है| यद्यपि यह जापान में ही जाना नाता है परन्तु भारत और दुनिया के अन्य भागों में नहीं जाना जाता| मैंने भारत में एक संस्था खोलने का न्योता दिया है जिसमें शिंटो और हिन्दू धर्म का अध्ययन हो सके, तुलनात्मक अध्ययन।

वर्तमान की भाषा विज्ञान की भाषा है| आज विज्ञान और आध्यात्मिकता साथ साथ आ गए हैं| अपने समय के महान वैज्ञानिक आइनसटाईन ने भगवद् गीता पढ़कर कहा. था कि भगवद् गीता का ज्ञान सबसे ज्यादा परिवर्तनकारी ज्ञान है जो उसे मिला है|" आज विज्ञान जो कुछ भी हो,यदि आप किसी वैज्ञानिक वक्ता को सुने तो आपको लगेगा कि आप बौद्ध धर्म को सुन रहे हो, आपको लगेगा आप वेदांत सुन रहे हो|

जर्मनी में मैंने कहा था कि हमारा शरीर जैसा हम समझते हैं वैसा नहीं है। शरीर केवल एक उर्जा है| यदि हम अपने शरीर का निरिक्षण करें तो हमारे शरीर का हर अणु एक शक्ति है और यह हर समय बदल रहा है| ठीक ऐसा ही वेदांत कहतें हैं कि हम समुद्र में बुलबुलों की तरह हैं, एक शक्ति| हम सब एक शक्ति का हिस्सा हैं|

आध्यात्मिकता के लिए यह संदर्भ अवश्यक है| इस संदर्भ की कमी से तनाव और परेशानी हमारे जीवन में भर चुकी है| जब हम तनाव में हों तो दो बातें हो सकती हैं, यां तो हम बहुत उदास हो जायेंगे और आत्महत्या के विचार आ सकते हैं, यां फिर आक्रामक और हिंसात्मक बन जाते हैं। इसीलिए समाज में अपराध हो रहा है,लोग आत्महत्या कर रहे हैं और उदास हो रहे हैं| ये दो बातें होतीं हैं| यह सुन कर दुख होता है जापान में भी बहुत से लोग आत्म हत्या कर रहे हैं। जब भी मैं यह सुनता हूँ मुझे लगता है मैं कुछ कर सकता था क्योंकि यह श्वास, मन और ध्यान का ज्ञान आत्महत्या करने की प्रवृति से बाहर आने में, उदासी और हिंसात्मक प्रवृतियों से निकलने में मदद करता है| सारा रहस्य श्वास,कुछ समय के ध्यान में है, और ध्यान से शक्ति का स्तर भी बढ़ जाता है| जब मन की शक्ति बढ़ती है तो उदासी और आत्महत्या की प्रवृति ख़त्म हो जाती है|
(आप हमे इनके लाभ के बारे में कुछ विस्तार से बता सकते हैं?)

सबसे पहले तो एक हिंसा रहित समाज बनेगा| हमने लगभग दुनिया भर के जेलों में २,००,००० लोगों को सिखाया| उन सब को परिवर्तनकारी अनुभव हुए हैं| मुझे नहीं लगता हमने अभी जापान में यह कार्यक्रम शुरू किये हैं? हम जापान में भी कैदियों के लिए यह कार्यक्रम शुरु करना चाहेंगे| उनका गुस्सा और नफरत पूरी तरह से खत्म हो जायेगी| इसलिए हिंसा रहित समाज, चाहे हिंसा घरेलू हो,महिलायों पर हो, यां माता-पिता और बच्चों के बीच हो इन सब को रोका जा सकता है यदि हम उनको श्वास के द्वारा अपनी नकारात्मक भावनायों पर काम करना सिखाएं|
हाँ, क्या आप सब यही हों?

इस तरह हिंसा-रहित समाज, दूसरा रोग मुक्त शरीर| आज वैज्ञानिको ने अनुसन्धान किया है यदि आप श्वांस के तकनीक, सुदर्शन क्रिया करते रहे तो रोगों से बचाव की क्षमता तीन गुणा बढ़ जाती है| इससे हृदय को अघात, उच्च रक्तचाप,मधुमेह और बहुत से शरीरिक और मानसिक रोगों से बचा जा सकता है|
इस तरह से रोग मुक्त शरीर, दूसरा बिना कम्पन के श्वास,दुविधा के बिना मन,अवरोध के बिना बुद्धि होती है| लोगों का अतीत में पक्षपात हुआ करता था| वह पक्षपात आज समाप्त हो रहा है,बहुत कम हो गया है परन्तु इसे और भी कम करना है| जातिय पक्षपात,लैंगिक,आयु सम्बन्धी,धार्मिक,भाषा सम्बन्धी,राष्ट्रीय ये सभी तरह के पक्षपात।जब आप ध्यान करने लगते हो तो स्वभाविक रूप से आप दुनिया में सबके साथ सम्बंध महसूस करने लगते हो|
पता है जहाँ कहीं भी मैं गया हूँ सबके साथ अपनापन लगता है चाहे यह दक्षिणी ध्रुव हो या उत्तरी ध्रुव|
इस तरह पक्षपात से मुक्त और सभी को अपना लेने का रवैया और उदासी से मुक्त आत्मा!

* अहिंसा रहित समाज
* रोग मुक्त शरीर
* कम्पन रहित श्वास
* भ्रम से मुक्त मन
* अवरोध से मुक्त बुद्धि
* सबको अपनाने वाला अहम
* उदासी से मुक्त आत्मा


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"हम में से हर कोई एक प्रकाश है"

आज प्रकाश का त्यौहार है| दीवाली का मतलब है प्रकाश का त्यौहार| आप में से हर कोई अपने आप में एक प्रकाश है| यह त्यौहार सारे भारत,नेपाल,सिंगापोर,मलेसिया,श्री लंका,इंडोनेसिया,मारीशस,सूरीनाम,त्रिनिदाद और दक्षिण अफ्रीका में मनाया जाता है| लोग एक दूसरे को दिवाली की शुभ कामनाएं देते हैं और मिठाइयाँ बाँटते हैं| दिवाली के समय हम अतीत के सारे दुःख भूल जाते हैं| जो कुछ भी दिमाग में भरा पड़ा हो ,आप पटाखे चलाते हो और सब भूल जाते हो| पटाखों की तरह अतीत भी चला जाता है,सब जल जाता है और मन नया बन जाता है| यही दिवाली है|
एक मोमबत्ती पर्याप्त नहीं है| हर किसी को खुश और प्रकाशित होना होगा| हर किसी को खुश और बुद्धिमान होना होगा| बुद्धिमता का प्रकाश प्रज्वलित हो चुका है| रोशनी को ज्ञान का द्योतक मानते हुए हम ज्ञान रूपी प्रकाश करते है, और आज उत्सव मनाते हैं| आप क्या कहते हो?

दिवाली का सन्देश है: अतीत को जाने दो ,भूल जाओ| जीवन का उत्सव बुद्धिमता से मनाओ| बुद्धिमता के बिना वास्तव में उत्सव नहीं मनाया जा सकता| बुद्धिमता यह जान लेना है कि ईश्वर मेरे साथ है| आज के दिन हम सब के पास जो भी सम्पति है उसे देखो| याद रखो आप के पास बहुत सारी सम्पति है और पूर्णता महसूस करो| नहीं तो मन हमेशा कमी में ही रहेगा,"ओह यह नहीं है,..वो नहीं है,इसके लिए दुखी,उसके लिए दुखी| कमी की ओर से प्रचुरता की ओर बढ़ो| प्राचीन पद्वति है कि अपने सामने सभी सोने चांदी के सिक्के रखे जाते हैं, आप अपनी सारी सम्पति सामने रखते हो और कहते हो, ' देखो भगवान ने मुझे इतना सब दिया है| मैं बहुत आभारी हूँ’| बाईबल में कहा गया है जिनके पास है उन्हें और मिलेगा, और जिनके पास नहीं है ,जो भी थोड़ा बहुत है वो भी ले लिया जायेगा| उसकी प्रचुरता महसूस करो| तब आपको पता चलेगा आपको बहुत दिया गया है|

तब हम लक्ष्मी पूजा करते हैं| धन और एश्वर्य की देवी लक्ष्मी की पूजा की जाती है, और गणेश - चेतना का आवेग जो हमारे रास्ते के सारे विघ्न हर लेते है - यह जप आज के दिन किया जाता है|

यूरोप में २७ राष्ट्र हैं|हम हर राष्ट्र के लिए एक दिया जलाएंगे| तब हम कुछ देर के लिए ध्यान करेंगे| जब हम ध्यान करते हैं हम सार्वभौमिक आत्मा को अपनी प्रचुरता के लिए धन्यवाद देते हैं| हम और ज्यादा के लिए भी प्रार्थना करतें हैं ताकि हम और ज्यादा सेवा कर सकें| सोना चांदी केवल एक बाहिरी प्रतीक है। दौलत हमारे भीतर है। भीतर में बहुत सारा प्रेम,शांति और आनंद है| इससे ज़्यादा दौलत आपको और क्या चाहिए? बुद्धिमत्ता ही वास्तविक धन है| आप का चरित्र,आपकी शांति और आत्म विश्वास आपकी वास्तविक दौलत है| जब आप ईश्वर के साथ जुड़ कर आगे बढ़ते हो तो इससे बड़कर कोई और दौलत नहीं है| यह शाही विचार तभी आता है जब आप ईश्वर और अनंतता के साथ जुड़ जाते हो| जब लहर यह याद रखती है कि वह समुद्र के साथ जुड़ी हुई है और समुद्र का हिस्सा है तो विशाल शक्ति मिलती है|


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