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"अष्टावक्र भी यही कह रहे हैं – कोई तृष्णा, कोई द्वेष, कोई राग आत्मज्ञान को ढक नहीं सकता"

बैंगलोर आश्रम, भारत

पिछली पोस्ट के शेष अंश..

प्रश्न : मैं आप के साथ कुछ समय बिताना चाहता हूँ, बैठ कर आप से बातें करना चाहता हूँ। आपके साथ यात्रा करना चाहता हूँ। इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

श्री श्री रवि शंकर : जो इच्छाएं तुम पूरी कर सकते हो, वो पूरी कर लो, और जो इच्छाएं समर्पित कर सकते हो, उन्हें समर्पित कर दो। किसी भी इच्छा की पूर्ति में समय और प्रयास लगता है। जब तुम अपनी इच्छाओं को समर्पित कर देते हो, वो अपने आप ही पूरी हो जाती हैं। कुछ इच्छाएं बहुत लंबे समय तक इच्छा करने पर पूरी होती हैं। और कुछ इच्छाएं तब भी पूरी नहीं होती हैं। कई बार तुम पाते हो कि किसी इच्छा का पूरा ना होना तुम्हारे हित में था। इस विश्वास के साथ चलो कि ईश्वर जानता है तुम्हारे लिए क्या उत्त्म है। ना तो इच्छाओं की आलोचना करो, और ना ही उनके साथ बह जाओ। ठीक है? ये बीच का रास्ता है। जैसे ही तुम सजग होते जाते हो, बाकी सब अपने आप ही शांतिपूर्ण हो जाता है।

प्रश्न : लोगों को आप पर बहुत विश्वास है। अगर आप कहें कि आप गुरु नहीं हैं तो उनके विश्वास का क्या होगा? मैं यह नहीं कह रहा कि ऐसा है पर मैं एक स्थिति दर्शाने की कोशिश कर रहा हूँ जो कि मेरी जीवन में घट चुकी है। अगर कोई कहे कि मैंने जिसपर विश्वास किया वो गलत है, तो मेरी प्रतिक्रिया क्या होनी चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : तुम ने मन में एक कल्पना बनाई है और एक जो अस्तित्व से तुम्हारा मन कहता है। विश्वास वही है जो संशय से हिलता नहीं है। संशय आसमान में छाये बादलों की तरह आ कर चला जाता है। कितने भी बादल हों पर आसमान को अधिक देर के लिए ढक नहीं सकते। १०० परिक्षा भी हो पर दिल कहीं तो कहता है क्या सत्य है।
अगर तुम्हारे पैर में दर्द हो और मैं भी तुम से कहूं कि तुम्हारे पैर में दर्द नहीं है, तो क्या तुम मान लोगे? जीवन में कुछ ऐसे अनुभव होते हैं चाहे पूरी दुनिया कहदे गलत है पर मन नहीं मानता।
एक प्रकार से, संशय करना अच्छा है। एक तरह से पकने के लिए प्रभु की कृपा हो गया। संशय की अग्नि से तुम्हें मज़बूत बनने का मौका मिलता है।

प्रश्न : गायत्री मंत्र में कहा है, ‘धियो यो ना प्रचोदयात:’ इसका क्या अर्थ है?

श्री श्री रवि शंकर : बुद्धि में दिव्यता का प्रवाह हो। बुद्धि में केवल अच्छे विचार ही आएं।

प्रश्न : योगी होने का क्या अर्थ है?

श्री श्री रवि शंकर : योगी होने का अर्थ है फिर एक बच्चे की तरह हो जाना। अष्टावक्र भी यही कह रहे हैं – कोई तृष्णा, कोई द्वेष, कोई राग आत्मज्ञान को ढक नहीं सकता।

प्रश्न : इच्छा और संकल्प में क्या अंतर है?

श्री श्री रवि शंकर : जीवन में हर कार्य संकल्प से होता है। तुम्हारे मन में ये संकल्प उठा कि तुम यहाँ आओ, तभी तुम यहाँ आ सके। अगर कोई चीज़ तुम्हारे मन में बार बार आती रहे, तो वह इच्छा है। ये मत सोचो कि मन में कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए। बड़े बड़े काम करने के संकल्प करो। अधिक काम की ज़िम्मेदारी लो, पर कभी कभी उन्हें किनारे रख कर विश्राम भी करो।

प्रश्न :मन को एकाग्र कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : तुम्हारा मन प्रेम से स्थिर हो जाता है। लालच और भय भी मन को स्थिर करते हैं। मैं प्रेम को बाकी दोनों उपायों से श्रेष्ठ मानता हूँ।

प्रश्न : आपकी उपस्थिति में इतनी शांति और आनंद मिलता है कि मैं हमेशा उसी आनंद में रहना चाहता हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर : चाहे तुम विश्व में कहीं भी हो जब तुम इन अनुभवों को याद करते हो, तो तुम उस आनंद को अनुभव कर लेते हो। संसार के बाकी सभी छाप इस अनुभव से धुल जाती हैं।


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एक भक्त ही दूसरों में भक्ति को जगा सकता है

चेन्नई, भारत

आज महासत्संग में उन तीनों तत्वों का समन्वय था, जो कि एक आर्ट आफ़ लिविन्ग उत्सव का समग्र हिस्सा हैं - गान, ग्यान और ध्यान। पाश्चात्य और भारतीय संगीत में निपुण गुणीजनों ने संगीत प्रस्तुत किया। तदुपरान्त, श्री श्री ने सबको संबोधित किया और सामूहिक ध्यान कराया।

किसी भी समय में गान, ध्यान और ध्यान का बड़ा महत्व है।

सत्य को आप ना नज़रअंदाज़ कर सकते हैं , ना नकार सकते हैं।

प्रेम वही है जिसे आप पूरी तरह छुपा भी नहीं सकते, जता भी नहीं सकते।

सौंदर्य को आप बांध कर नहीं रख सकते, उसका त्याग भी नहीं कर सकते।

प्रश्न: शरीर में मन किस स्थान पर रहता है?
श्री श्री: यह प्रश्न पूछने वाला कौन या क्या है? और वो क्या है जो इस प्रश्न का उत्तर सुनेगा? बुद्धि उत्तर को दर्ज करेगी, पर वस्तुतः वो मन है जो इस उत्तर की तलाश में है।


प्रश्न: पांचों इन्द्रियों को कैसे जीतें? क्या आप एक वाक्य में बतायेंगे?
श्री श्री: सूर्य के प्रकाश के आगे मोमबत्ती का महत्व नहीं रहता। वैसी ही अन्य चीज़ें निरर्थक हो जाती हैं।

प्रश्न: ये हम कब जान पाते हैं कि हम प्रेम से ही बने हैं?
श्री श्री: प्रेम को जाना या समझा नहीं जा सकता। इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। एक बच्चा अपनी मां से नहीं पूछता कि, "तुम्हारी योग्यता क्या है? तुम क्या करते हो? तुम्हारे मित्र कौन हैं? मुझे बताओ। तब मैं तुम्हें प्रेम करूंगा।" जैसे हमारा शरीर कार्बोहाईड्रेट्स और अमीनो ऐसिडस से बना है, हम एक ऐसे तत्व से बने हैं जो कि प्रेम है। क्रोध, लालच, ईर्ष्या ये सब प्रेम के ही विकृत रूप हैं।


प्रश्न: आतंकवाद का नियंत्रण कैसे करें?
श्री श्री: समस्त संसार में सभी धर्मों में यही चर्चा चल रही है कि आतंकवाद को कैसे रोकें। भारत के आध्यात्म और ज्ञान में इतनी ताकत है जिससे कि आतंकवाद और धर्मांधता को नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्न: क्या ज्योतिष एक विज्ञान है?
श्री श्री: हां, यकीनन ज्योतिष एक विज्ञान है। पर इसका अर्थ ये नहीं कि सभी ज्योतिषी वैज्ञानिक हैं!

प्रश्न: ऐलोपैथी में कैंसर या क्षयरोग का इलाज नहीं है। क्या आयुर्वेद या सिद्ध चिकित्सा पद्दति में इनका इलाज है?
श्री श्री: अवश्य है। तुम्हें पता है, सिद्ध चिकित्सा पद्दति केवल तमिल नाडू में ही उपलब्ध है। आयुर्वेद पूरे देश में उपलब्ध है।

प्रश्न: क्या २०१२ में दुनिया का अंत हो जायेगा? क्या ये सच है?
श्री श्री: १९९९ में लोग कहते थे कि नई सह्स्त्राब्दि के पूर्व दुनिया का विनाश हो जायेगा। कनाडा में तो कुछ लोगों ने छः छः महीने का राशन भी संग्रहित कर के रख लिया था! (हंसी)
२०१२ में एक सकरात्मक बदलाव आयेगा, और ये आध्यात्मिक होगा। तुम्हें पता है, दक्षिण ध्रुव के पास टेर डेल फ़िआगो में और उत्तरी ध्रुव के पास नौर्वे में लोग ध्यान कर रहे हैं, शाकाहारी हो रहे हैं, भारतीय परंपराओं को अपना रहे हैं और ॐ नमः शिवाय का जप कर रहे हैं।

प्रश्न: गुरुजी, हमारी दो बिनती हैं। आप चेन्नई में क्यों नहीं आते और यहां पर एक आश्रम क्यों नहीं शुरु करते?
श्री श्री: कल से यहाँ एक ध्यान केन्द्र खुलने जा रहा है। तुम सब यहाँ आकर ध्यान किया करना।

प्रश्न: हम ’आर्ट आफ़ लिविन्ग’ का एक टी वी चैनेल क्यों नहीं शुरु करते, ताकि ज्ञान सब तक पंहुचे?
श्री श्री: इसे सिर्फ़ एक चैनेल तक सीमित क्यों रखें? ये सभी चैनेलों पर होना चाहिये। (हंसी)
यदि तुम एक चैनेल शुरु करना चाहते हो तो मैं तुम्हारा प्रोत्साहन करता हूं। उस चैनेल में सिर्फ़ ध्यान और संगीत ना होकर आध्यात्मिक ज्ञान भी हो, और दुनिया में क्या हो रहा है उसकी भी खबर हो।
एक आखिरी बात, जब भी तुम्हें कोई चिंतायें सतायें, तुम पत्र या कोरियर के द्वारा मुझे दे दो। कुछ ऐसा करो जो तुम्हारे आसपास के लोगों के लिये उपयोगी हो। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हारे बाकी सब विषयों की देखभाल हो जायेगी।


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