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"क्रोध को औजार की तरह प्रयोग करो, तुम क्रोध के औजार मत बनो"

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प्रश्न : मैंने अभी अभी इस पथ पर शुरुवात की है। आत्मा क्या है मैं कैसे समझूं?

श्री श्री रवि शंकर :
दुनिया में सब कुछ बदल रहा है। हमारा अनुभव बदलता है, हमारी बुद्धि बदलती है। हम अलग अलग समय अलग तरह से सोचते हैं। हमारे विचार बदल रहे हैं, और हमारी भावनायें भी बदल रहीं हैं। ये कैसे जानते हो कि सब कुछ बदल रहा है? क्योंकि ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता। वो जो नहीं बदल रहा है उसके अस्तित्व के बिना तुम ये जान भी नहीं सकते हो कि सब बदल रहा है।

तो तुम अनुमान लगाते हो। अगर धुंआ देखा तो तुम कहोगे कि, ‘कहीं आग होगी।’ तुम केवल धुंये को देख कर ये अनुमान लगा लेते हो कि कहीं आग होगी। उसी तरह जो बदल नहीं रहा है तुम उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर सकते, फिर कैसे जान लेते हो? अनुमान से।

प्राचीन समय के लोग कहते थे कि कुछ जानने के तीन उपाय हैं – प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम। एक है प्रत्यक्ष – तुम सीधे उसे देख रहे हो। दूसरा है अनुमान – तुम अंदाज़ा लगाते हो। जैसे कि, तुमने धुंआ देखा तो ये जान लिया कि कहीं आग है। है ना? तो जब तुम देखते हो कि सब कुछ बदल रहा है, तो तुम ये अनुमान लगाते हो कि, ‘हमारे भीतर ऐसा कुछ है जो नहीं बदल रहा है, और वो आत्मा है। तुम उसे जो भी नाम दो!’

तो, हम शरीर से सूक्ष्मतर में गये – शरीर, सांस, मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार। इन सब से सूक्ष्म है आत्मा। ये आत्मा क्या है, ये जानना ही आध्यात्म है, ध्यान है! और ये आत्मा किस चीज़ से बनी है? ये है!

प्रश्न : कुछ विचारधाराओं में आत्मा के अस्तित्व को, या विश्व की चेतना शक्ति के अस्तित्व को नकारा गया है। आप इस बारे में क्या कहेंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आत्मा नहीं है। जो भी ये घोषणा करता है कि आत्मा नहीं है, वो ये कैसे जानता है? कौन जानता है? कौन कह रहा है? हां?

अगर मैं कहूं कि मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता तो कम से कम मैं अपने इन शब्दों पर तो विश्वास करता हूं! मैं ये तो नहीं कह सकता कि, ‘मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता, अलावा अपने इन शब्दों के जिन्हें मैं अभी कह रहा हूं।’

तुम्हें पता है ये इस पूरे विश्व में सबसे बेवकूफ़ी भरी बात होगी, अगर कोई कहे कि, ‘मैं किसी चीज़ में विश्वास नहीं करता हूं।’ जो व्यक्ति ऐसा कह रहा है कम से कम अपने आप में तो विश्वास करता होगा! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं क्या कह रहा हूं? समझे?

अगर मैं कहूं कि मुझे किसी चीज़ में विश्वास नहीं है, तो मुझे ये भी कहना होगा कि, ‘ये शब्द जो मैं तुम्हें अभी कह रहा हूं, मुझे उन में भी विश्वास नहीं है।’ ये वाक्य कि, ‘मुझे किसी चीज़ में विश्वास नहीं है।’ झूठ है, क्योंकि तुम कम से कम इस वाक्य पर तो विश्वास करते हो, वर्ना तुम ये वाक्य क्यों कहते?

तो कोई भी व्यक्ति ये पूर्ण रूप से नहीं कह सकता है कि वो किसी भी चीज़ में विश्वास नहीं करता है।

अगर वो ऐसा कहता है तो या तो वो मानसिक रूप से असंतुलित है या आत्मज्ञानी है (हंसी)। ये शब्द जो हम कहते हैं कि, ‘सब कुछ बदल रहा है’ किसी संदर्भ में लिये जाते हैं। तुम जो भी देखते हो, छूते हो, महसूस करते हो, ऐसा पंचेन्द्रियों के ज़रिये करते हो। इसीलिये हम कहते हैं कि सब कुछ बदल रहा है, पर ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता है। अगर एक बार हम उसे जान लेते हैं जो नहीं बदलता, तो फिर हमें कुछ भी हिला नहीं सकता है! ये आत्मज्ञान है! आत्मज्ञान क्या है? मुझमें ऐसा कुछ है जो नहीं बदलता है, मैं नहीं बदलता हूं।
अपनी आत्मा की एक झलक भर मिल जाने से जीवन में कोई भय नहीं रहता।

जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास सब कुछ है, मन शांत हो जाता है, स्थित, सृजनात्मक, बुद्धि और अंतरज्ञान से पूर्ण और तुम्हारे भीतर से प्रतिभा खिल उठती है – और जब तुम ध्यान में बैठते हो तब ऐसा होता है, तुम सब कुछ छोड़ देते हो और बस बैठ कर ध्यान करते हो। सब कुछ छोड़ दो। और यदि कुछ क्षणों के लिये भी मन स्थिर हो जाता है और आपके उस ना बदलने वाले अस्तित्व से मिल जाता है, तो काम हो गया! जीवन का उद्देश्य पूरा हो गया!
हर मानव मन-शरीर, सागर की एक लहर की तरह है। तब तुम ये जान जाते हो कि इस पूरे विश्व के कण कण में जीवन व्याप्त है। हमारा शरीर इस सागर में तैरते ख़ाली सीपियों की तरह हैं। जीवन सागर में कई शरीर हैं। तो, केवल शरीर में जीवन हो, ऐसा नहीं है। जीवन में शरीर है।

अगर ये बहुत ज़्यादा हो गया और तुम्हें अभी समझ नहीं आया, तो इसे अपने मन के किसी पिछले हिस्से में सहेज लो, किसी दिन तुम ये बात समझ जाओगे। ठीक है? ये केवल एक सिद्धांत हो सकता है, और तभी तो हम सिद्धांतों के साथ क्या करते हैं? उन्हें मन में किसी पिछले भाग में सहेज लेते हैं। हम केवल अपने अनुभव के अनुसार चलते हैं। देखो, हम अपने अनुभव के साथ और अधिक परिपक्व होते जाते हैं...हां। अच्छा है!

प्रश्न : आपने हमें आत्मा का अनुभव करने के लिये कहा। आपने अपनी आत्मा को कब सब से पहले अनुभव किया? हमें जानकर बहुत खुशी होगी।
श्री श्री रवि शंकर :
मेरा पहला अनुभव कब हुआ था? मुझे नहीं पता! वो बचपन में था, फिर मैं बड़ा हुआ और ये अनुभव और भी स्पष्ट हो गया। शायद १७-१८ साल की उम्र में।

प्रश्न : हम ये कैसे जाने कि हम अपने जीवन के उद्देश्य को पूरा कर रहे हैं या किसी और का काम कर रहे हैं?
श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है! हम ये कैसे जाने कि हम जीवन में जिस काम को करने आये हैं वो कर रहे हैं कि नहीं? हम यहां क्या करने आये हैं? देखो क्या तुम खुश हो और तुम्हारे आस पास लोग खुश है। क्या तुम अपने आस पास के लोगों के लिये जो भी कर सकते हो, कर रहे हो? क्या तुम प्रेम बांट रहे हो और ज्ञान प्राप्त कर रहे हो? जो भी ज्ञान तुम्हारे पास है क्या तुम उसे लोगों के साथ बांट सकते हो? तुम्हें अपने आप से बार बार ये प्रश्न पूछने चाहिये, और तुम्हें पता है, कभी कभी हमें खुद पर बहुत शक नहीं करना चाहिये – कभी कभी खुद पर शक होता है, ‘क्या मैं ये ठीक कर रहा हूं?’

बस स्वाभाविक रहो। हर काम में कुछ अच्छाई और कुछ बुराई होती है। कोई भी कर्म निर्दोष नहीं है। कर्म के क्षेत्र में कुछ ना कुछ कमी रहती ही है चाहे वो १ या २ प्रतिशत ही क्यों ना हो। तो, हर काम में कुछ ना कुछ कमी हो सकती है।

उसी तरह, बोला गया कोई भी शब्द अपूर्ण हो सकता है। निर्दोष क्या हो सकता है – हमारा उद्देश्य, हमारा भाव। क्या तुम समझ रहे हो कि मैं क्या कह रहा हूं? तुम किसी के प्रति दुर्भाव ना रखो, ऐसा संभव है।

तुम्हें पता है, मैंने इतने सालों में कभी किसी से बेइज़्ज़ती के शब्द नहीं कहे। ज़्यादा से ज़्यादा जो शब्द मेरे मुंह में आता है, वो है, ‘बेवकूफ़’। जब मुझे बहुत गुस्सा आता है, तो मैं आवाज़ ऊंचीं कर के कहता हूं, ‘अरे, बेवकूफ़!’ पर मैंने कभी किसी को श्राप नहीं दिया, मैं ऐसा ही बना हूं। मैं इसके लिये कोई श्रेय नहीं ले सकता हूं, क्योंकि इसमें मेरा कोई प्रयत्न नहीं है। ये सीखने के लिये मैं किसी कोर्स या स्कूल में नहीं गया – कि कैसे मैं किसी को बुरा-भला ना कहूं, इल्ज़ाम ना दूं। चीखना, चिल्लाना, या परेशान होना मेरे स्वभाव में नहीं है। बुरे शब्द मेरे मुंह में आते ही नहीं हैं।

प्रश्न : क्या कभी क्रोध नहीं करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा मत सोचो कि तुम सब को हर समय क्रोध से मुक्त होना चाहिये। ज़रूरत पड़ने पर क्रोध को एक औज़ार की तरह प्रयोग करो। मैं ऐसा करने का प्रयत्न करता था, पर बहुत सफल नहीं रहा। कभी कभी मैं अपना क्रोध दिखाने का प्रयत्न करता हूं, पर इससे कोई फ़ायदा नहीं होता क्योंकि मुझे जल्दी ही हंसी आ जाती है और बाकी सब लोग भी साथ में हंसने लगते हैं। लोग विश्वास ही नहीं करते कि मैं गुस्सा हूं।

पर, कभी कभी क्रोध अच्छा होता है। ख़ासतौर पर जब दुनिया में भ्रष्टाचार है, अन्याय है, और हर तरह के लोग हैं जो हर तरह के ग़लत काम करते हैं और तुम्हारा फ़ायदा उठाते हैं। ऐसी स्थिति में ये आवश्यक है कि तुम थोड़ा भंवों को चढ़ाओ, गुस्सा दिखाओ, ये अच्छा रहेगा।

पर ये ख़्याल रखना कि तुम गुस्सा दिखाओ पर उसे अपने हृदय में मत उतारो, परेशान मत हो।

देखो, ऐसा एक ही दिन में नहीं हो जाता है, और यहीं पर साधना से मदद मिलती है। हां, मैं ये नहीं कह रहा हूं कि सब्जी की तरह बन जाओ, या मानसिक रूप से अविक्सित व्यक्ति बन जाओ, हमेशा मुस्कुराओ और कभी परेशान ही मत हो – जब स्थिति की मांग हो, तो गुस्सा दिखाओ। पर कभी भी उस क्रोध को अपने मन में नफ़रत की सड़ान्ध मत बनने दो। क्रोध को क्षणिक ही रखो।

तुम्हें पता है स्वस्थ क्रोध क्या है? पानी की सतह पर लकीर खींचो तो वो कितनी देर टिकती है? बस उतनी ही देर क्रोध टिके तो वो स्वस्थ क्रोध है। अगर क्रोध क्षणिक है और उस पर तुम्हारा नियंत्रण है तो वो स्वस्थ क्रोध है, और तुम ठीक हो। तुम गुस्सा हो सकते हो, पर गुस्सा तुम पर हावी ना हो जाये। अक्सर क्या होता है कि क्रोध तुम पर हावी हो जाता है और तुम मुश्किल में पड़ जाते हो। ज्ञान इसका विरोधात्मक है। समझे? तुम छुरी का प्रयोग करो पर छुरी तुम्हारा प्रयोग ना करे!


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"‘मैं नहीं जानता हूँ,’ की अवस्था में तुम्हें जानने का मौका मिलता है"

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प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैं कभी भी एक आध्यात्मिक या सच्चा धार्मिक व्यक्ति नहीं रहा हूँ। मैं ऐसा कैसे बनूं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हें अपने आप पर एक लेबल लगाने की आवश्यकता नहीं है – मैं धार्मिक व्यक्ति हूँ, इत्यादि। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। बस, स्वाभाविक रहो – एक सुंदर, अच्छे इंसान। बस इतना ही!

अगर कोई अच्छा इंसान नहीं है और वो कहे कि, ‘मैं आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति हूँ,’ तो ये इसका क्या फ़ायदा है? वो किस काम का है? है कि नहीं?

अध्यात्म का ध्येय है तुम्हें अच्छा इंसान बनाना। धर्म का ध्येय है तुम्हें धर्मशील बनाना, तुम्हें विश्व से जोड़ना, विश्व की चैतन्य शक्ति से जोड़ना। यही आध्यात्म है, और एक सीधा साधा, स्वाभाविक, आम इंसान भी यही है! समझ गये? ठीक है। तो ये बेहतर होगा कि तुम अपने आप पर कोई लेबल ना लगाओ।

अगर तुम सोचते हो कि तुम आस्तिक या नास्तिक हो, तब भी अपने आप पर नास्तिक का लेबल लगाना ठीक नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति ये कहता है कि वह नास्तिक है, तो मेरे हिसाब से सच नहीं है। तुम सच में नास्तिक नहीं हो सकते हो। तुम्हारी चेतना के किसी कोने में तुम्हें किसी बात पर आस्था है। तुम कुछ तो ज़रूर जानते हो, क्योंकि तुम्हारी चेतना अति प्राचीन है। तुम अपनी चेतना को नहीं जानते हो, क्योंकि ये इतनी प्राचीन है, इसमें इतनी परतें हैं, तुम्हारे मन पर कितनी ही छापें हैं – ये चेतना बहुत ही अद्भुत है!

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैंने सत्य के बारे में सुना और समझा है, पर यह मेरे अनुभव में नहीं आया है। सत्य का नुभव करने में कृपया मेरी मदद कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
बढ़िया! ‘मैं नहीं जानता हूँ,’ की अवस्था में तुम्हें जानने का मौका मिलता है। अगर तुम सोचते हो कि तुम जानते हो, तो तुम एक सिद्धांत में अटके हुये हो। उपनिषद में बहुत सुंदर बात कही गयी है, ‘जो कहता है कि, “मैं नहीं जानता हूँ।” वो जानता है, और जो कहता है, “मैं जानता हूँ।” सच में नहीं जानता है!’

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, हाल ही में वैज्ञानिकों ने घोषित किया है कि वे लैब में जीन्ज़ में फेरबदल कर के जीवन बना सकते हैं। क्या ये आध्यात्म और धर्म के विरुद्ध नहीं है कि मनुष्य जड़ वस्तु को जीवंत बनाये?

श्री श्री रवि शंकर :
बिल्कुल नहीं। तुमने ये सुना है कि ‘ईश्वर ने मनुष्य को अपने जैसा ही बनाया है,’? ठीक है ना? तो जो ईश्वर कर सकते हैं, मनुष्य भी वो कर सकता है। ईश्वर ने मनुष्य को बनाया, अपने ही जैसा बनाया – ऐसा बाइबल में लिखा है। है ना?

५००० वर्ष पहले लिखे गये महाभारत महापुराण में भी ऐसी कथा आती है। तो, टेस्ट ट्यूब बच्चे कोई नयी बात नहीं है। महारानी गांधारी ने एक ही भ्रूण को १०० भागों में बांट कर अलग अलग मटकों में रख कर १०० तरह के बच्चे बनाये।

पर वो बच्चे किस तरह के थे, तुम सभी जानते हो! तो इस में जोखिम भी है! पर ये एक तथ्य है कि ५००० वर्ष पहले गांधारी ने १०० मटकों में १०० बच्चे बनाये थे। तो लैब में जीवन बनाना या टेस्ट ट्यूब बेबी कोई नई बात नहीं है। ऐसा ५००० वर्ष पहले किया जा चुका है!

प्रश्न : गुरुजी, क्या पिछले जन्म में की कई ग़लतियों का भी प्रभाव रहता है? अगर ऐसा है, तो इससे बचने का उपाय क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हें कोई ज़्यादा प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। बस, अपनी साधना करते रहो। सुदर्शन क्रिया, ध्यान और गान से तुम्हारे सभी बुरे कर्म और चित्तवृत्ति अपने आप ही साफ़ हो जायेंगे। और कुछ अडवांस कोर्स, कुछ hollow and empty meditations...सभी छाप साफ़ हो जायेगी।

प्रश्न: प्रिय गुरुजी, क्या ये सच है कि गुरु ही शिष्य को चुनता है? अगर ऐसा है तो आपने मुझे चुनने में इतनी देर क्यों लगाई??
श्री श्री रवि शंकर: (हंसी) हम भूतकाल में ना जाकर, आगे मज़े करें। आगे के सुंदर दिन, ठीक है?

प्रश्न : गुरुजी, जब आप आतंकवादियों और नक्सलियों से मिलते हैं तो उनके रवैये और ज्ञान की कमी को देख कर निराश नहीं हो जाते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये तो ऐसा ही हुआ अगर तुम किसी डौक्टर से पूछो, ‘क्या तुम बीमार लोगों को देख कर बीमार नहीं हो जाते हो?’!

प्रश्न : क्या आप मुझे एक सुझाव देंगे – अगर आपका जीवनसाथी आप से हमेशा क्रोधित रहे तो आप शांत कैसे रहें?

श्री श्री रवि शंकर :
मेरा जवाब प्रामाणिक नहीं होगा! यहाँ बहुत से अनुभवी व्यक्ति हैं, तुम उनसे अनुभव बांट सकते हो!

अगर कोई अक्सर ही तुम से क्रोधित रहे तो तुम्हें इसकी आदत हो जाती है, और तुम उसकी ज़्यादा फ़िक्र नहीं करते हो। है ना? पर अगर वे आमतौर पर तुमसे प्यारा बर्ताव करें और कभी कभी क्रोधित हो जायें तो तुम्हें विशेष परेशानी होती है, है ना?

भारत में एक लोकप्रिय कहानी है। एक विनम्र व्यक्ति की शादी एक बहुत ही कुटिल महिला से हुई। वो हर काम उसकी इच्छा के विरुद्ध करती थी। वो व्यक्ति जो भी कहे, वह उसका उल्टा ही करती थी। वो व्यक्ति इस बात से बहुत परेशान और दुखी था। उन दिनों भारत में तलाक इतनी आम बात नहीं थी। तो, वह व्यक्ति उस स्थिति में फंस गया था। जब आप किसी मुश्किल में फंस जाते हैं तो आप किसी ज्ञानी व्यक्ति के पास जाते है। तो, वह व्यक्ति एक योगी से मिलने गया।

उस योगी ने उसके कान में कुछ कहा, और तीन महीने बाद जब वह योगी उस व्यक्ति को फिर मिला तो वह व्यक्ति खुशी से मुस्कुरा रहा था! उसने जाकर योगी से कहा कि, ‘आपका मार्गदर्शन बहुत उपयोगी रहा, और अब घर में शांति है!’ मार्गदर्शन ये था कि वो जो भी चाहता था, अपनी पत्नि से उसका उल्टा ही कहता था। जो बात वो कहे, उसकी पत्नि तो मानने वाली थी नहीं! तो तुम्हें उस व्यक्ति की नब्ज़ जानने की ज़रूरत है।

अगर तुम्हारा जीवनसाथी हर वक्त तुमसे क्रोधित रहता है तो मैं जानते हूँ कि अपने अनुभव से तुमने इस बात को संभालना सीख ही लिया होगा, और उसके क्रोध को कम या ज़्यादा कैसे करना। है ना? ये रुचिकर है! शायद ऐसे लोगों के साथ तुम्हें एक-दो महीने ऐसा करना चाहिये, फिर अचानक एक दिन उन्हें अचंभित कर दो। अग्र वे क्रोध में हो तो उनकी तारीफ़ करो और बहुत प्रेम करो। क्रोध के साथ एक तय रवैया ना अपनाओ।


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"आत्मज्ञान के लिये कोई शर्त नहीं है"

फ़्रान्स
३० जुलाई २०१०


प्रश्न : मुझे ऑफ़िस कार्य के दौरान कई ऐसी जगह पर जाना पड़ता है जहाँ शाकाहारी भोजन आसानी से उपलब्ध नहीं होता है और दूसरे साथियों के साथ गलत भोजन करने से बहुत आलस महसूस होता है। ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
जिन लोगों को किसी भोजन से कोई एलर्जी होती है तो उस भोजन को चाहे उनके साथी खा रहे हों, वे नहीं खाते हैं। यदि तुम्हें दूध से एलर्जी हो और तुम्हारे साथी, दूध- चाय आदि पी रहे हों, तो तुम नहीं कहोगे, ‘हाँ मैं भी पी लूँगा’, क्योंकि तुम्हें पता है इससे तुम्हें हानि होगी।

वैसे ही, किसी भी संगत में रहते हुए भी तुम अपने भोजन का चुनाव खुद कर सकते हो। अगर मांसाहारी भोजन ही उपलब्ध है तो तुम कह सकते हो, ‘मैं केवल चिप्स, सब्जी, ब्रेड आदि ही खाऊँगा। माँसाहारी भोजन या अन्य भोजन जो तुम्हें अस्वस्थ करे, उसे खाने के लिये तुम्हें कोई मजबूर नही कर सकता अगर तुम ना खाना चाहो तो, ठीक है ना? अगर जानते हो कि कोक, पेप्सी आदि तुन्हारे लिए हानिकारक हैं तो तुम्हें पीने की आवश्यकता नहीं। सही है ना? देखो जो लोग बहुत पेप्सी, कोला आदि पीते हैं, उनके पेट व आँतों की अंतरीय परतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और आगे चल कर कितने प्रकार की मुश्किलें पैदा करती हैं। ये सब गैस वाले पेय हानिकारक होते हैं, इनसे दूर ही रहना चाहिये।

किसी ने यह बात प्रमाणित करने के लिये किसी के गिरे हुए एक दाँत को जब पेप्सी से भरे एक कप में ड़ाला, तो वह उसमें गल गया! अब दाँत जो प्राकृतिक रुप से इतना मजबूत होता है, वह भी गल जाता है पेप्सी में, तो आप सोच सकते हैं कितना विनाशक होता होगा पेप्सी। और वही विनाशक पेय हमारी आँतो को, मस्तिष्क को, नाड़ी-तन्तुओं को भी कितनी हानि पहुँचा सकता है। इसलिये हमें लाभदायक भोजन करने की आदतों पर जो़र देना चाहिये और उनके बारे में प्रचार कर के दूसरों को भी सावधान करना चाहिये।

आज का समय ३० साल पहले के समय से कहीं अधिक अच्छा है। ३० साल पहले जब हमने यह पहल की थी तब लोग शाकाहारी भोजन व आध्यात्म के प्रति बहुत उदासीन थे, परंतु आज वही चीज फ़ैशन बन गयी है, क्योंकि अब हमने इसे लोगों के बीच एक प्रवृति बना दिया है और हम इसको धारा स्वरुप चलायमान रखते हैं।

प्रश्न : मैं आपकी सेवा में लगना चाहता हूँ, किस जगह जाऊँ?

श्री श्री रवि शंकर :
यहाँ बहुत से अवसर हैं। बैड अंतोगस्ट में ही बहुत लोगों की जरूरत है जो यहाँ के आश्रम में रह कर मदद करना चाहें, कर सकते हैं। अन्य जगह भी हैं।

प्रश्न : मैं दो व्यक्तियों के बीच चुनाव की दुविधा में हूँ। इनमें से एक मेरे बच्चे का पिता है किंतु मैं उसके साथ एक स्त्री के रूप में सुखी नहीं हूँ, और दूसरा जो व्यक्ति है वह मुझे अच्छा लगता है। इनमें से किसका चयन करूँ? क्या मुझे बच्चे के संरक्षण हेतु उसके पिता के साथ रहना चाहिये या मुझे अपने दिल के रास्ते पर चलना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
यह तो बड़ा मुश्किल सवाल है! यह तुम्हारे बच्चे की उमर क्या है, इस पर निर्भर करता है। और यदि बच्चे को दोनों माता-पिता का प्यार और संरक्षण चाहिये, तो तुम्हें पहले उस ओर ध्यान देना चाहिये। बाल अवस्था जीवन का बहुत कीमती व महत्वपूर्ण समय होता है। इसके लिये हमें, जब बालक का विकास हो रहा है, तब अपनी निजी इच्छाओं का भी त्याग करना पड़े तो करना चाहिये। इसलिये तुम्हारा अपने परिवार को बचाना हितकर है और यही तुम्हारा सर्व प्रथम उद्देश्य होना चाहिये। इसके लिये तुम्हें कई प्रलोभनों को, कई निजी इच्छाओं को त्यागना पड़ सकता है, हाँ?

प्रश्न : अपनापन और सात्विक शक्ति को कैसे बढ़ायें जिससे अधिकतम लोगों को इस पथ पर ला सकें?

श्री श्री रवि शंकर :
यह सवाल को मैं आप लोगों के लिये ही छोड़ता हूँ। अपने आप से पूछते रहो यह सवाल, समय समय पर इसका जवाब आपको मिलेगा तब लोगों को शांत और सुखी करने के लिये उनका इस्तमाल करते जाना। जिसे हम सात्विक शक्ति कह रहे हैं यहाँ, वह क्या है? वह है सांमजस्य - तुम्हारे भीतर और अपने आसपास में लय महसूस करना।

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मुझे शादी नहीं करनी है, पर अकेले रहना भी बहुत कठिन लग रहा है। साथ में बातचीत या काम करने के लिये कोई भी ना होने पर अधिक समय फ़िर टी.वी. देखने में चला जाता है। मैं इस स्थिति को कैसे संभालूं और क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, जो अकले रहते हैं, उन्हें ये मुश्किलें आयेंगी ही। इसी कारण आश्रम बनाये गये हैं जहाँ कई लोग मिलकर रहते हैं, हर दिन सत्संग में सामुहिक रूप से भाग लेते हैं और व्यस्त रहते हैं। तुम भी कोई प्रोजेक्ट लेकर कार्य शुरु कर सकते हो। फ़्रांस में भी बहुत मदद की जरूरत है, तुम भी फ़्राँस की टीम के साथ जुड़ सकते हो।

प्रश्न : क्या क्रोध अहंकार के साथ जुड़ा होता है? हिन्दू कथाओं में कई ऋषियों को बहुत क्रोधी बताया गया है। इससे उन की मन की शांति पर क्या असर पड़ा?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत नहीं, एक ही ऋषि अपने क्रोध के कारण प्रसिद्ध थे पर उनका गुस्सा भी लोगों के लिये लाभदायक सिद्ध होता था। इसलिये मैं कहता हूँ कि एक ज्ञानी का गुस्सा भी लाभदायक होता है और एक मूढ़ का प्रेम भी हानिकारक होता है।

अब देखो, कोई अज्ञानी, अनपढ़ माता अपने बच्चों को स्कूल जाने से रोकती है क्योंकि बच्चे स्कूल जाते वक्त रोते हैं। बच्चे कहते हैं हमें स्कूल नहीं जाना, नहीं पढ़ना है, तो वह मान जाती है। तो यह उसका बच्चों के प्रति अंधा प्रेम, उसकी मूर्खता है जो उसके बच्चों के हित में नहीं है, है कि नहीं ? इसलिये मूर्ख का प्रेम हानिकारक होता है पर संत, मुनियों का गुस्सा भी लाभदायक होता है।

भारत में कई कहानियां प्रचलित हैं एक क्रोधी ऋषि की जिनका नाम था दुर्वासा। कोई बहुत गुस्से वाला होता है तो लोग कहते हैं, ‘ओह! वह दुर्वासा है।’ तो दुर्वासा का मतलब हो गया जो थोड़ी सी बात पर भी क्रोधित होता हो, थोड़ी सी बात का बतंगड़ बना देता हो, पर जल्द ही सामान्य स्थिति में भी लौट सकता हो! इसको दूसरी तरह से कह सकते हैं कि गुस्सा आया तो इतनी ग्लानि मत करो, ऋषियों को भी गुस्सा आता था, तो आत्मग्लानि कर के अपने आप को परेशान मत करो। सत्य तो यह है कि आत्मज्ञान होने के लिये किसी शर्त की आवश्यकता नहीं है। क्या है? आत्मज्ञान के लिये कोई शर्त नहीं है। और एक बात, कि इसके लिये कोई खास अवस्था होना जरूरी नहीं, सो क्रोध भी किसी अवस्था में हो सकता है। और कभी कभी क्रोध भी लाभदायक साबित हो सकता है।

शेष अंश अगली पोस्ट में!!


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"एक पत्थर, महसूस नहीं कर सकता है पर एक मनुष्य महसूस कर सकता है"


२२ जुलाई २०१०, हार्टफ़ोर्ड, कनेक्टिनट


प्रश्न : मेरे आस पास हो रहे अन्याय पर मुझे अक्सर क्रोध आता है, पर मैं यह समझता हूँ कि प्रेम और समझ की भी आवश्यकता है। मैं इन भावनाओं को संतुलित कैसे करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब कई तिनके मिलाकर एक झाड़ू बनाया जाता है तब वह एक बड़े कमरे की सफ़ाई उन अलग अलग तिनकों से बेहतर कर सकता है। उसी तरह, एक संघ में रह कर आप अधिक प्रभावी कार्य कर सकते हैं, बजाये कि कोई काम अकेले करने के। चाहे सेवा कार्य हो या अन्याय के विरोध में कार्य करना हो, आपको मिलकर काम करना चाहिये। ये बहुत आवश्यक है।

अन्याय तो है। इस स्थिति को बदलना आपका काम है। चीनी भाषा में ‘मुसीबत’ और ‘नये अवसर’, दोनों ही शब्दों के लिये एक ही शब्द है। अगर आप केवल समस्या देखेंगे तो निराश हो जायेंगे। ये अच्छा नहीं है। मिलकर इस पर काम कीजिये और देखिये कि आप क्या कर सकते हैं। दुनिया के कई भागों में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ है। हर काम के लिये धन खर्च होता है। हमारे संघ ने भ्रष्टाचार का विरोध कर के काफ़ी उपलब्धि प्राप्त की है।

हमारे युवाओं ने रिश्वत देने से इंकार कर दिया। जब अफ़सरों ने इस तरह का रवैया देखा, तो उनके लिये भी यह एक नई बात थी। आखिर वे भी इंसान हैं। आयुर्वेद की परियोजनाओं के लिये हमें १० लाइसेंसों की आवश्यकता थी। लोगों ने कहा कि उन्हें पाने में २ साल लग जायेंगे! हमने इन लाइसेंसों के लिये मांग पत्र भरा और रिश्वत ना देने का संकल्प किया। हम ने निश्चय किया कि आवश्यकता पड़ने पर हम ५० चक्कर लगाने को तैयार थे, पर रिश्वत देने के लिये तैयार नहीं थे। एक महीने के भीतर हमें सभी १० लाइसेंस मिल गये! तो, अन्याय के विरोध में ज़रूर लड़ो, पर बिना क्रोध के। शांत मन से लड़ो। भगवदगीता में भी ऐसा ही कहा गया है।

प्रश्न : मेरे पिता का देहान्त हुये अभी कुछ ही समय हुआ है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि वे कैसे हैं, कहाँ हैं, और मेरे बारे में क्या सोचते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जो लोग दूसरी तरफ़ जा चुके हैं, वे आप पर आशीर्वाद बरसाते हैं। वे आपको नाप तौल की दृष्टि से नहीं देखते हैं, और ना ही आपके बारे में चिंता करते हैं। वे जानते हैं कि आप सुरक्षित रहेंगे।

प्रश्न : इच्छाओं को त्यागना चाहिये, पर क्या मुक्ति की इच्छा रखना ठीक है? ये इच्छा कब छूटेगी?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। मुक्ति की इच्छा होना ठीक है।

प्रश्न : अगर ईश्वर हमारे भीतर है, तो वे हमें सदा ही अच्छे कार्यों की तरफ़ प्रेरित क्यों नहीं करता है? विश्व में इतनी हिंसा और गुनाह क्यों है?

श्री श्री रवि शंकर :
एक फ़िल्म की कल्पना करो जिस में कोई विलेन ना हो। कल्पना करो कि केवल एक हीरो है, जो खाता है, सोता है, और बस यूं ही रहता है, कोई काम नहीं करता है! क्या तुम ऐसी फ़िल्म देखोगे? विरोधाभासी मूल्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। कांटे और पंखुड़ियां, दोनो ही हैं। आप दोनों में से किसी को भी चुन सकते हैं।

ईश्वर आपके भीतर हैं। कभी वे सोते हैं, कभी छुप जाते हैं, कभी जागृत होते हैं और कभी नाचते हैं। थोड़ी साधना के बाद ईश्वर जागृत हो जाते हैं। तब वे चैतन्य होते हैं। अपने भीतर के देवी देवता को जगाओ!

एक पत्थर, महसूस नहीं कर सकता है पर एक मनुष्य महसूस कर सकता है। अपने भीतर के देवत्व को जगाना अति आवश्यक है। इीलिये भारत में सुबह कुछ स्तोत्र गाये जाते हैं, ‘हे ईश्वर, आप जागे और हमें आशीर्वाद दें!’ एक स्तर से ये अजीब लगता है क्योंकि बच्चे को जगाना माता पिता का कार्य है, परंतु यहाँ मनुष्य, ईश्वर के लिये गाते हैं कि जागो और सृष्टि को आशीर्वाद दो। इस विरोधाभास में अस्तित्व का गहरा रहस्य छुपा है।

प्रश्न : प्रेम हमेशा आसक्ति के साथ क्यों आता है? क्या ये संभव है कि आप अपने जीवन साथी को प्रेम भी करें पर साथ ही वैराग्य भी रहे?

श्री श्री रवि शंकर :
आसक्ति से पीड़ा आती है, पर पीड़ा के बिना तो कुछ भी नहीं है। हम इस दुनिया में पीड़ा के साथ ही आते हैं। जन्म की प्रक्रिया ही बहुत पीड़ादायक होती है। नौ महीनों तक हम आराम से थे। अचानक हमारे आस पास का सागर गा़यब हो गया और हमें बाहर आना पड़ा! आसक्ति तब होती है जब आप अपने अस्तित्व पर केन्द्रित ना होकर बाहर की दुनिया को देखते हैं। नियंत्रण करने की इच्छा, प्राप्त करने की इच्छा, संचय करने की इच्छा, पीड़ा लाती है। जब हम विश्राम में होते हैं, संतुष्ट होते हैं, तब प्रेम ही आनंद में परिवर्तित हो जाता है। मांग और नियंत्रण केवल पीड़ा लाते हैं। प्रेम के साथ ज्ञान ही इसकी काट है।

प्रश्न : मैं क्रोध को कैसे काबू में करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
उत्तमता के प्रति तुम्हारे प्रेम से ही क्रोध का जन्म होता है। अपने जीवन में तृटियों के लिये स्थान रखो। उन सब बातों की एक सूची बनाओ जो तुम्हें खराब लगती हैं। फिर अपने आस पास के लोगों से कहो कि वे उस सूची में लिखी सभी बातें करें! जब तुम क्रोधित हो जाओ तो उस संवेदना को महसूस करो। देखो तुम्हारे दांत कैसे भिंच जाते हैं। मन कैसा हो जाता है। कुछ लंबी गहरी सांसे लो और देखो अगर पहले की संवेदना से कुछ फ़र्क है। हालांकि क्रोध के मामले में मेरा अनुभव नहीं है, क्योंकि मुझे ये समस्या कभी नहीं हुई है। तो मेरी सलाह, अच्छी नहीं भी हो सकती है! तुम और लोगों से पूछो। यहाँ कई ऐसे लोग हैं जो तुम्हें बता सकते हैं। सुदर्शन क्रिया के नियमित अभ्यास से क्रोध शांत पड़ जाता है।

प्रश्न : जीवन का उद्देश्य क्या है? हम जन्म लेते हैं, पढा़ई करते हैं, काम करते हैं, और एक दिन मर जाते हैं। मैं जीवन के प्रति आसक्ति को खोता जा रहा हूँ।

श्री श्री रवि शंकर :
अच्छा है। तुम ठीक रास्ते पर हो। जो तुम कह रहे हो वो हमारी intro talk की तरह है। कल्पना करो कि हम ८० साल तक जीते हैं, तो उस में से २०-२५ साल तो सोने में चले जाते हैं। १० साल बाथरूम में गुज़र जाते हैं। १० साल ट्राफ़िक में गुज़र जाते हैं। फिर कितने साल हम दुखी रह कर बिताते हैं। अंत में केवल २-३ साल ही हम प्रार्थना, सेवा इत्यादि में बिताते हैं।

ये अच्छा है कि तुम इस बारे में सोच रहे हो। तुम सही रास्ते पर हो।

प्रश्न : अगर कोई ऩज़दीकी व्यक्ति किसी बीमारीवश मृत्यु की ओर अग्रसर हो, तो क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर:
उन्हें आशीर्वाद दो। जीवन चलने दो, गाओ, नाचो, ध्यान करो। अगर तुम बीमारी के बारे में अधिक सोचोगे तो तुम्हारी ऊर्जा कम हो जाती है। बदलाव कभी भी आ सकता है। चिकित्सा की आवश्यकता है, पर विश्वास भी रखो। दैवी कृपा हर वक्त तुम्हारे साथ है। कभी भी कुछ भी हो सकता है।

प्रश्न : क्या ये संभव है कि हम सभी को आत्मज्ञान हो जाये?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। कभी भी! बीज तो है, वो कभी भी अंकुरित हो सकता है। वो कभी भी एक बड़ा पेड़ बन सकता है।

प्रश्न : १५ साल से मैं एक ही नौकरी कर रहा हूँ, और मेरा अधिकारी मेरी इज़्ज़त नहीं करता है। क्या मैं नौकरी छोड़ कर, अपना व्यवसाय शुरु करूं? कृपया मेरी मार्गदर्शन कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
ये चुनाव तुम्हें करना है, आशीर्वाद मुझे देना है।

प्रश्न : वैदिक ज्ञान में सृष्टि के नियमों का सत्य दिया गया है। क्या आधुनिक विज्ञन भी इसका एक अंश है?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। ज्ञान अनंत है। कई ऋषि, आज के वैज्ञानिक बन कर आये हैं। वे ब्रह्माण्ड की खोज में लगे रहते हैं। हर चीज़ को आदर देना चाहिये, चाहे नई हो या पुरानी। आजकल Quantum Physics की कई खोजें सामने आ रही हैं। इनमें वैदिक ज्ञान से बहुत समानता है। उदाहरण के रूप में, Dark matter तथा String Theory, दोनों के ही बारे में प्राचीन ज्ञान में बताया गया था। एक वैज्ञानिक Dr.Hans-Peter Dürr, नें मुझे बताया कि वे जब भी व्याख्यान देते हैं, उन्हें लगता है कि वे वेदान्त की बात कर रहे हैं। ये पूरा विश्व एक ही वस्तु से बना है। कोई दूसरा नहीं है। यह वेदान्त है। प्राचीन ऋषि तथा आधुनिक वैज्ञानिक, दोनों ही एक ही बात कहते हैं।


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"कोई घटना तुम्हारे केन्द्र को छू नहीं सकती"

वैन्कूवर,
१० जुलाई


कुछ क्षण अपने साथ बैठे व्यक्ति के साथ पहचान करते हैं। हम शब्दों से ज़्यादा अपनी मौजूदगी से अभिव्यक्त करते हैं। शब्दों से ज़्यादा हम अपनी उर्जा से अभिव्यक्त करते हैं। कई बार हम कहते हैं - मुझे अच्छा स्फुरण महसूस नहीं हो रहा। यह बात सत्य है, सही में हम उर्जा का लेन देन ही करते हैं। मैं यहाँ दो घंटे खड़ा होकर प्रेम के विषय में व्याख्या दे सकता हूँ पर हो सकता है वह किसी के दिल में उतरे ही नहीं। पर शिशु की एक नज़र सब कुछ कह जाती है। इसी प्रकार जब हम क्रोधित होते हैं, तनाव में होते हैं तो वही तरंगें दूसरों को प्रतिपादित करते हैं। न घर में और न बाहर किसी ने हमें इन तरंगों को शुद्ध रखने की शिक्षा दी। अपनी उर्जा को शुद्ध रखने के लिए जीवन को विशाल रूप से देखने की आव्श्यकता है। हमारे शरीर में प्रतिदिन लाखों नए कोष पैदा होते हैं और मरते हैं। जब आप मुँह रगड़ कर धोते हो तो मरे हुए कोष दूर करते हो। इतने कोष प्रतिदिन मरते और पैदा हैं पर आप वही रहते हैं।

ऐसे ही, संसार को भी एक बदलते हुए दृश्य स्वरूप देखो। जीवन घटनाओं का क्रम है जिसमें घटनाएँ आती हैं, विलीन होती हैं, तुम अछूते उनमें से गुजर जाओ। तुम एक अनमोल हीरा हो। तुम्हें कोई घटना हिला नहीं सकती, तुम्हारा प्रेम नष्ट नहीं कर सकती। हम घटनाओं से ऊपर हैं, उनसे बढ़कर हैं। चाहे प्रशंसा हो यां निंदा - तुम्हें कुछ छू नहीं सकता, तुम अछूते हो।
तुम एक प्रज्जवलित दीपक हो, एक ऐसा फूल जो सदा सुगंधित है। क्या आप सब यहीं पर हैं? सुन रहे हैं, यां ये बातें काल्पनिक लग रही हैं? ये बातें स्वपन स्वरूप, मिथ्या जैसी लग सकती हैं पर सत्य हैं।
हम सब एक दूसरे के साथ इस सृष्टि में जुड़े हुए हैं, चाहे लोग माने यां न माने, तुम विश्व की आत्मा हो, तुम सृष्टि के केन्द्र हो। और आध्यातमिकता यही है - अपने आप को समस्त सृष्टि से जुड़ा पाना। तुम छोटा अहम नहीं हो, तुम विशाल चेतना हो जिसकी कोई सीमा नहीं, वह असीम चेतना तुम हो।

यह विशाल चेतना हम सब में शिशु रूप में जन्म के साथ होती है, किंतु हम समय के साथ अपने आप को छोटी बड़ी उपाधियों के आवरण से ढकते जाते हैं। हमे आवरण के परे अपना सच्चा स्वरूप देखना होगा, और इसको हासिल करने के लिये उत्तम साधन है, ध्यान।

क्या आप लोगों का ध्यान इधर ही है? अब क्या चल रहा है मन में? और कुछ सुनना है, आगे क्या होगा आदि।

सच्चा ज्ञान वह नहीं जो हम शब्दों से व्यक्त करते हैं। क्या आप लोग सुन रहे हैं? शब्दों से प्रतिपादन केवल घटना मात्र है, अंतराल भरने का माध्यम।

ध्यान के लिये तीन स्वर्णिम नियम हैं :


१) पहले सुखपूर्वक शरीर को ढीला छोड़ कर बैठ जायें। अगले कुछ मिनट में सिर्फ इस एक विचार से बैठें, ’मुझे कुछ नहीं चाहिये’, अगर आपके मन में उठा- मुझे प्यास लगी है, पानी पीना है इत्यादि, तो आप ध्यान नहीं कर रहे।

२) दूसरा नियम यह कि अगले १०-१५ मिनट के लिए ’मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ’।

३) और तीसरा - ’मैं कुछ नहीं हूँ’। अगले १०-१५ मिनट के लिए मैं कुछ नहीं हूँ। यदि तुम समझते हो तुम बहुत बुद्धिमान हो तो ध्यान के बारे में भूल जाओ, और अगर समझते हो कि बेवकूफ़ हो तो भी आप उसी किश्ती में स्वार हैं। अगले कुछ क्षंणों के लिए सब धारणाएं जैसे मैं अमीर हूँ, गरीब हूँ, बहुत धार्मिक हूँ यां पापी हूँ इत्यादि सब भूल जाओ, तो आप कुछ नहीं हो!

तुम्हें कुछ नही चाहिये-(अचाह), तुम कुछ नहीं कर रहे हो (अप्रयत्न), और तुम कुछ नहीं हो (अकर्ता)- ये तीन उपाय हैं ध्यान करने के लिये।

प्रश्न : इस ईर्ष्या और घृणा से भरे जगत में विनम्रता और शांति के पथ पर कैसे चला जाये?

श्री श्री रवि शंकर : जगत को ऐसी मान्यता और उपाधि से मत बाँधो। कुछ लोग वैसे हो सकते हैं, उन पर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ जाओ। वे अपनी ईर्ष्या में जलते हैं तो जलने दो, तुम उस पर ध्यान न दो। तुम जिस पर ध्यान देते हो, महत्व देते हो - वही बात बढ़ने लगती है। किसी भी संकल्प पर ध्यान देने से वो फलीभूत होने लगता है।

मैंने अपने ५५ साल के जीवन में किसी के लिये अपशब्द नहीं कहे हैं। यह मेरा स्वभाव है। अधिकतम किसी को बेवकूफ कहा होगा पर किसी को बुरा न कहा है, न बुरा चाहा है। यदि तुम्हारा उद्देश्य ठीक है तो मै कहता हूँ, तुम्हें आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता है।

यदि कोई ईर्ष्या करे तो क्या करें? आगे बढ़ते जाओ। तुम्हारा ध्यान विशालता की ओर हो, अपने विकास कि ओर हो।

प्रश्न : मैंने आपके सानिध्य में रहने वालों को उनकी क्षमता से भी अधिक विकसित होते देखा है। आप कैसे इन सब लोगों को प्रभावित करते है, प्रेरणा देते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : वर्ल्ड बैंक के प्रैज़ीडेंट ने भी यह सवाल मुझसे पूछा था, ’आपकी इतनी सारी योजनाएँ सफलता कैसे पाती हैं? हम भी बहुत से प्रयोजन करते हैं पर हर किसी को सफलता नहीं मिलती।’
सफलता केवल धन पर ही नहीं, अपितु आपके सही उद्देश्य, उस पर ध्यान देने से और स्पष्टता पर निर्भर करती है। हम अपनी दृष्टि को बदल कर देखें तो पायेंगे सब कुछ भीतर से उत्पन्न हो रहा है। अगर मन के भीतर का वातावरण सुखद है, तो बाहर भी अच्छा लगेगा। तो तुम ही इस बदलाव के प्रतिनिधि (कार्यकर्ता) बनो।

प्रश्न : शरीर को आवश्यक्ता से अधिक चलायमन मन के विचारों से कैसे मुक्त किया जाये?

श्री श्री रवि शंकर : सुदर्शन क्रिया, ध्यान, योग और सही भोजन आदि करने से यह ठीक हो सकता है।

प्रश्न : आपने मुझ पर जो इतनी कृपा की है, मैं उसका आभारी हूँ। पर मैं जब भी आपसे मिलता हूँ तो बहुत आँसूं निकलते हैं। ऐसा क्यों होता है?

श्री श्री रवि शंकर : हे भगवान! तुम तो मेरी ये प्रतिष्ठा खत्म कर रहे हो कि जो भी मुझे देखता है वह मुस्कराता है! जब दिल खिलता है तो आँसू निकल पड़ते हैं।प्रेम और आभार के आँसू बहुत कीमती हैं।

प्रश्न : जीवन का उद्देश्य क्या है, इसे कैसे जाना जा सकता है?

श्री श्री रवि शंकर : शांतचित्त होकर अपनी अंतरात्मा को सुनो। आप सबके पास मोबाइल फोन है न? उसको काम में लाने के लिये क्या क्या होना चाहिये? अगर सिम कार्ड नहीं है तो कार्य करेगा क्या? सिम कार्ड है पर तुम बहुत दूर हो तब सिग्नल नहीं पकड़ता है तो क्या वो काम करेगा? और तुम्हें सिम कार्ड, सिग्नल ठीक पकड़ने के साथ यह भी देखना होगा कि बैट्री पूरी है। तो तीनों चीज़ें चाहिये- बैट्री, सिम कार्ड व टावर की नज़दीकी। पर यह तीनों के होने के बाद भी यदि तुम नंबर नहीं लगाओगे तो भी काम नहीं चलेगा। तो ये सब करना पड़ेगा तुम्हें - आध्यात्मिक संबंध टावर समान है, आपका अपना प्रयत्न नंबर घुमाने समान है और ध्यान करना बैट्री चार्ज करने समान है। ये सब हो तो प्रार्थना की सुनवाई होती है। तुम्हारे में भी दूसरों को आशीर्वाद देने और दूसरों की मनोकामना पूरी करने की क्षमता हो सकती है यदि मन शांत और स्थिर हो।

प्रश्न : मुझे कई लोगों के साथ अटपटा सा लगता है, व्यग्रता महसूस होती है, चाहे वो अजनबी ही हों। ऎसा क्यों होता है?

श्री श्री रवि शंकर : इसे एक परीक्षण के रूप में लो और ध्यान करो। ध्यान की गहराई में जाकर देखोगे कि ये व्यग्रता मिट जायेगी। तुम इस संवेदना को अधिक महत्व देते हो। यह जान लो कि तुम इन सब से अधिक विशाल हो। जब तुम अपना दृष्टिकोण बदल लोगे तो ये संवेदनाएँ भी मिट जायेंगी।

प्रश्न : आत्मसम्मान खोने पर जीने का उद्देश्य कैसे ढूँढा जा सकता है?

श्री श्री रवि शंकर : आत्मा नहीं खोई है तो अत्मसम्मान भी कैसे खो सकता है! उठो जागो! तुम को कई अनेक स्वीकार करते हैं और प्रेम करते हैं। तुम इस धरती के एक कीमती फूल हो। कुछ उपयोगी कार्य करो। हर समय केवल अपने बारे में ही विचार मत करो।

प्रश्न : क्रोध क्यों आता है?

श्री श्री रवि शंकर : सब कार्य में निपुणता की इच्छा रखना ही क्रोध का कारण होता है। कुछ हद तक दोष भी स्वीकार करो। किसी भी कार्य में परिपूर्णता असंभव है। किसी भी कार्य में केवल ९५ प्रतिशत पूर्णता हासिल हो सकती है। हाँ, वचन और विचार में १०० प्रतिशत पूर्णता हासिल हो सकती है।

प्रश्न : अफगानिस्तान में शांति के लिये क्या मार्ग है?

श्री श्री रवि शंकर :ये याद रहे कि वहाँ पहले बौद्ध और हिन्दू धर्म के लोग रहते थे, व अफगानियों के पूर्वज योग और ध्यान के साधक थे। यह बात समझने पर लोग कट्टरपंथि भाव छोड़कर विशाल दृष्टिकोण रख सकते हैं। उनका यह सोचना कि ’वे ही स्वर्ग में जायेंगे और अन्य लोग नरक में’, दूसरों के लिये नरक उत्पन्न कर देता है। सबको विशाल दृष्टिकोण रखना होगा। प्रत्येक विध्यार्थी को थोड़ा बहुत उपनिषद, कुरान, गुरु ग्रंथ साहिब आदि का ज्ञान होना चाहिये। जैसे सिख धर्म के गुरु ग्रन्थ सहिब में उपनिषदों का सार है। यह महत्वपूर्ण है कि सब बच्चे इसके बारे में जाने, तब वे विशाल भाव रख सकेंगे। जो बलिदान सिख गुरुओं ने दिया वह अवर्नणीय है। उसके बिना योग और ध्यान इस भूमी से कब के मिटा दिये जाते। सिख गुरुओं ने बलिदान का जीवन बिताया। उन्होंने इस ब्रह्मज्ञान की सुरक्षा की जो सम्पूर्ण विश्व के लिये है। सब को हर धर्म के बारे में थोड़ी जानकारी अवश्य होनी चहिये।

प्रश्न : ध्यान लगाने में सहायक क्या बातें हो सकती हैं?

श्री श्री रवि शंकर : किसी भी अच्छी बात की शुरुआत के लिए ये तीन बातें सहायक हो सकती हैं: लोभ, भय और प्रेम।

कोई आपको लोभ दे कर कहे कि आपको साधना नियमित करने पर लाख डालर मिलेंगे, तो आप करोगे क्या? यह सुन आप पाँच दिन ज्यादा भी करने को तैयार हो जाओगे!

जिससे प्रेम करते हो वह यदि सिगरेट पीने को मना करे, तो आप तैयार हो जाओगे, उनकी बात रख लोगे। भय से भी आप सिगरेट पीना छोड़ दोगे। यदि डाक्टर ने कहा सिगरेट पीना छोड़ दो वर्ना मर जाओगे, तो आप क्या करेंगे? इन तीनों उपायों में से मैं प्रेम का उपाय बेहतर समझता हूँ।

गुरु प्रेम और प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

प्रश्न : स्त्री-पुरुष का सम्बंध कैसे मजबूत हो सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :मैं कुछ सुझाव दे सकता हूँ।
पहले महिलाओं के लिये: आप सब तैयार हैं? तो पहिली बात, अपने पति के अहम पर कभी चोट न पहुँचायें। कभी यह न दरशायें कि वे किसी काम के नहीं है। यदि आप ऐसा कहती हैं तो वे वैसे ही बन जायेंगे। सब समय प्रशंसा करो और कहो वे सबसे उत्तम हैं, उनकी सराहना करो।

अब पुरुषों के लिये: कभी भी स्त्री की भावना पर चोट न पहुँचायें, न ही उसके परिवार के ऊपर टिप्पणी करें। वो चाहे अपने परिवार के बारे में शिकायत करे, आप चुप ही रहना बेहतर समझें। जिस क्षण आपने अवहेलना में साथ दिया वो पलट कर आप पर ही क्रोध कर सकती है। उसकी भावनाओं का सम्मान करें। उसे खरीददारी पर यां किसी आध्यात्मिक सम्मेलन में जाने से मना ना करें। खरीदारी पर जाना चाहें तो अपना क्रेडिट कार्ड देदें! उसकी भावनओं का ध्यान रखें।
अब पुरुष और महिलाओं के लिए: प्रेम का प्रमाण न माँगें, जैसे-क्या तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो? सोचो कितना बोझिल है यह सिद्ध करना कि तुम किसी से प्रेम करते हो, सच्चा प्यार करते हो। अगर आपको लगे भी कि आप के पति यां पत्नि का प्रेम कम हो गया है तो भी आप यही कहें कि ’तुम मुझे इतना प्रेम क्यों करते हो?’ तब रिश्तों मे मुर्झाहट आ भी गयी हो तो फिर से खिलाहट आजायेगी। प्रश्न वही पूछो जो उपयोगी हो। कभी भी किसी से प्रेम का प्रमाण नहीं मांगो, इसे मान कर चलो कि प्रेम है!

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