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"सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं, और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें"

जुलाई १०, वेनकोवर, कैनेडा :

कोई भी तकनीक काम नहीं करती! वो तुम हो जिसके कारण तकनीक काम करती है, तुम्हारी श्रद्धा। जब तुम्हारा इरादा है और उस पर तुम ध्यान देते हो तो वैसा होने लगता है। अगर तुम्हारा इरादा नहीं है, तो वो काम नहीं करेगी। सुदर्शन क्रिया का प्रभाव होता है क्योंकि उसके पीछे इरादा है। किसी भी काम की पूर्ति के लिए उसके लिए इरादा, फिर उस पर ध्यान देना और वो होने लगता है।

अब हम कुछ प्राणायाम करते हैं। नाड़ी शोधन प्राणायाम से शुरु करते हैं। जब हमारी बाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का दाहिना हिस्सा सक्रिय होता है, और जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो दिमाग का बाहिना हिस्सा सक्रिय होता है। दिमाग का दाहिना हिस्सा संगीत है और दिमाग का बाहिना हिस्सा तर्क। तो जिनकी दाहिनी नासिका सक्रिय है वो मुझे बेहतर समझ सकते हैं। और अगर दोनो सक्रिय हैं तो आप ध्यान में है। केवल दाहिनी नासिका सक्रिय होने से ध्यान नहीं होता। जब भी आप अपनी आँखे बंद करते हैं यां खोलते हैं तो आपकी स्थिति बदल जाती है। भोजन के बाद दाहिनी नासिका सक्रिय होनी चाहिए। जब दाहिनी नासिका सक्रिय होती है तो पाचन प्रक्रिया ५० प्रतिशत तेज़ होती है।

बाहिनी यां दाहिनी नाड़ी की सक्रियता बदलती रहती है क्योंकि हम प्राणों के सागर में रहते हैं।किस समय कौन सी नासिका सक्रिय होगी यह स्थान और वातावरण पर निर्भर करता है। अगर आप किसी मंदिर, गुरुद्वारे, चर्च यां किसी भी ऐसी जगह के पास जाते हैं जहाँ आध्यात्मिक उर्जा अधिक है तो दोनो नासिकाएं सक्रिय होती हैं। जब किसी पूजा के स्थान पर लोग पूर्ण भक्ति में होते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक गुरु से मिलते हैं तो ऐसा होता है। जब आप किसी आध्यात्मिक व्यक्ति से मिलते हैं तो आपकी आवाज़ आपको स्वयं बता देगी।

प्रश्न : गुरुजी हमे वादा कीजिए कि आप हर साल वेनकौवर आएंगे?

श्री श्री रवि शंकर :
आपको पता है, मेरे लिए साल में ७०० दिन हैं!

प्रश्न : आप कहते हैं ध्यान में बैठते समय कोई प्रयत्न नहीं करना, पर मन का एक हिस्सा कुछ प्रयत्न करना चाहता है क्योंकि कुछ ना करने का भाव मन में उठता है। उस भाव के साथ क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
भस्त्रिका और आसन करो। उसमे प्रयत्न लगाओ। जब आप ध्यान के लिए बैठते हैं तो कोई प्रयत्न लगाने की आवशयकता नहीं है। जैसे ट्रेन पकड़ने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है पर एक बार जब आप ट्रेन में बैठ गए तो केवल आराम से बैठना ही होता है। ट्रेन में भागने से आप अपने लक्ष्य पर जल्दी नहीं पहुँचते। एक बार चढ़ने के बाद आप केवल विश्राम करते हैं।

प्रश्न : इच्छाओं पर नियंत्रन कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर :
इस क्षण में रहो। इच्छा का अर्थ है किसी आने वाले क्षण में सुख मिलने की चाह। अभी इसी क्षण में खुश और आनंदित रहो, बच्चों की तरह। अगर आप एक बच्चे से पूछते हैं कि उन्हें क्या चाहिए तो वो सहज ही कहता/कहती है - ’कुछ नहीं’, क्योंकि वो वर्तमान क्षण से खुश हैं।

प्रश्न : क्या आप लोगों का औरा देख सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
इसमें कौन सी बड़ी बात है? तुम भी देख सकते हो।

प्रश्न : सिर दर्द और थकान से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
योगा और प्राणायाम से।

प्रश्न : आप कैसे जान सकते हैं कि कोई उत्तर भीतर से आ रहा है यां तर्कसंगत मन से?

श्री श्री रवि शंकर :
इसका कोई मापदंड नहीं है।मन जितना शांत होता है, तुम्हे सही उत्तर मिलता है।

प्रश्न : नकारात्मक विचारों के प्रवाह को कैसे रोक सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
नकारात्मक विचार तीन कारणों से होते हैं - अगर रक्त का प्रवाह सही नहीं है,लसीका प्रणाली (lymphatic system) सही नहीं है यां मल त्याग (bowel moment) अनियमित है। आप फल आहार से अपनी आत्रें साफ कर सकते हैं। प्राणायाम से भी मदद मिलेगी। कुछ दिनों के लिए त्रिफला (आयुर्वेदिक परिशिष्ट) ले सकते हैं। योगा, प्राणायाम और ध्यान करो। तुम्हे फर्क अवश्य महसूस होगा। सामुहिक साधना से भी मदद मिलेगी।

प्रश्न: विचार अंदरूनी हैं यां बाहरी?

श्री श्री रवि शंकर :
विचार मन में है। मन तुम्हारे चारों और है - अंदर भी और बाहर भी।

प्रश्न : हम ईश्वर के सामने रोते क्यों हैं? हम स्वयं को ईश्वर के पास कैसे ला सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम आंसु बहाते हो तो तुम्हे राहत महसूस होती है। मन की छाप धुल जाती है।
ईश्वर से निकटता के लिए तुम्हे कोई चेष्टा करने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर तुम्हारे सब से पास है। तुम खुद को कुछ भी मानते हो - अच्छा यां बुरा, ईश्वर तुम्हारे चारों और है। जैसे हवा तुम्हारे चारों और है। ईश्वर से कोई बचाव नहीं है, जैसे हवा तुम्हारे चारों और है चाहे तुम जाग्रित हो यां सुप्त हो। जब तुम्हे गर्मी लगती है तो तुम पंखे के सामने खड़े हो जाते हो। पंखा केवल उसी हवा को प्रवाह में लाता है जो वहाँ पहले से ही है। सत्संग पंखे की तरह हैं। मास्टर यां गुरु पंखे की तरह है। उसी से तुम हवा का प्रवाह महसूस करते हो।

प्रश्न : कृप्या सत चित आनंद का अर्थ बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
सत का अर्थ है ’जो है’, चित वो है जो जानता है और आनंद का अर्थ है भीतरी खुशी।

प्रश्न : कोई अपने बचपन की छाप से कैसे बाहर आता है?

श्री श्री रवि शंकर :
उसकी छाप पहले ही जा चुकी है। अगर तुम सोचत्ते हो कि उसकी छाप अभी भी मन पर है, तो उसे झाड़दो। स्मृति से दर्द को अलग करो। पर अगर तुम ऐसा करने के लिए प्रयत्न करते हो तो तुम स्मृति में उसे वापिस लकर आते हो। पर ध्यान में तुम दर्द को किसी घटना से जुड़ा हुआ नहीं बल्कि एक स्पंदन के रूप में अनुभव करते हो। जीवन का पहला अनुभव दर्द का ही था जब, एक छोटे से रास्ते के ज़रिए, माँ के गर्भ से बाहर आए थे। उससे पहले आप संपूर्ण आनंद में थे, आपको कुछ खाने की भी ज़रुरत नहीं पड़ती थी। फिर अचानक आप रोते हुए बाहर आए। आपने एक नए जन्में शिशु के चेहरे का भाव देखा है? यह ऐसा है जैसे वो १० घंटे के कड़े श्रम के बाद बाहर आया होता है। पहला अनुभव दर्द का होता है। और फिर बच्चा अपनी माँ की आँखों में देखता है और प्रेम का अनुभव करता है। तो दर्द को किसी घटना के साथ मत जोड़ो।

प्रश्न: किसी से बिछड़ने के दर्द से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
उज्जई श्वास।

प्रश्न : जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो रिश्ते का क्या होता है? क्या उसी व्यक्ति से कोई रिश्ता अगले जन्म में फिर बनता है?

श्री श्री रवि शंकर :
दोनों संभावनाएं हैं। कुछ रिश्ते खत्म हो जाते हैं और कुछ अगले जन्म तक चलते हैं।

प्रश्न : हम मन में चल रहे हाँ और ना के द्वंद से कैसे बाहर आ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
केवल मुस्कुराओ। जैसे परिस्तिथि आती है उसे स्वीकार करो।

प्रश्न : क्या यह हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम बच्चे को जन्म दें? यां यह हम ईश्वर की इच्छा पर छोड़ सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर आप संतान चाहते हैं तो यह आप पर है। यह बहुत सीधा है। संतान चाहने का विचार भी सृष्टि के किसी नियम के आधार पर आ सकता है।

प्रश्न : कोई हमेशा प्रतिबद्ध कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
क्या आपको उत्तर चाहिए? क्या उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध हैं? चलो देखते हैं आप कितनी देर उत्तर लेने के लिए प्रतिबद्ध रह सकते हैं? आपको पता है, केवल एक प्रतिबद्धता जैसा कुछ नहीं है। समय समय पर आपको प्रतिबद्धताएं लेनी होती हैं जीवन में। यह आपके स्वभाव का हिस्सा है। अगर आप कमज़ोर हैं तो आप हर रोज़ अपनी प्रतिबद्धता तोड़ते हैं। अगर आप मज़बूत हैं तो आप उस पर डटे रहते हैं। कोई मज़बूत कैसे होता है? प्राणायाम और ध्यान से।

प्रश्न : ध्यान में नींद आ जाना गलत है क्या?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तक आप खर्राटे नहीं लेते और औरों को परेशानी नहीं होती, तब तक ठीक है! ध्यान गहरा विश्राम है। समाधि क्या है? एक मिलियन वर्षों के विश्राम जितना है यह। अगर एक क्षण के लिए भी ध्यान होता है, और आप उससे पहले यां बाद में सोए भी रहें तो कोई बात नहीं।

प्रश्न : कृप्या अपने और दूसरों के प्रति क्षमा भाव के बारे में बताएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम्हे लगता है कि क्षमा करना मुश्किल है तो मत करो। जो आसान लगे उसे करो। अगर माफ करना मुश्किल है तो कभी माफ मत करो। अगर किसी के प्रति कोई शिकायत है तो सारा जीवन उसे अपने अंदर रखो। फिर तो तुम्हे उस भाव के साथ खुश रहना चाहिए। क्या किसी के लिए घृणा के भाव से तुम खुश रह सकते हो? अगर किसी ने कोई गल्ती की तो यह उनकी मुश्किल है, तुम्हारी नहीं। तुम्हे जो आसान लगे वो करो।
संघर्ष तब है जब हम क्षमा करना चाहते हैं पर कर नहीं पाते। हमे हर अपराधी को एक विपत्ति - ग्रस्त यां हालात के शिकार के रूप में देखना चाहिए। अगर किसी ने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया तो निश्चय ही वो खुश नहीं था। नहीं तो उसने वैसा नहीं किया होता। वो तुम्हारी तरह सभ्य और परिष्कृत नहीं था। यह किसकी गल्ती है? अगर उसमें ज्ञान होता तो वो वैसा नहीं करता। इसलिए करुणा का भाव रखो।

प्रश्न : घरेलु हिंसा के बारे में बताएं औए कोई इसके साथ कैसे रह सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
घरेलु और सामाजिक हिंसा, दोनो ही तनाव के कारण होती हैं। लोगों को कभी यह नहीं सिखाया गया कि तनाव से किस तरह मुक्त हों। किसी को आध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया गया। क्या आपको नहीं लगता ध्यान और सुदर्शन क्रिया का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए? अहिंसा का यह ज्ञान सब तक पहुँचना चाहिए?
लोगों तक यह ज्ञान पहुँचाना है। आप घरेलु हिंसा को ऐसे ही स्वीकार नहीं सकते। लोगों में ज्ञान लेकर आओ, उन्हे शिक्षित करो। इसके लिए अपना शत प्रतिशत लगादो। फिर आप देखेंगे उनका पूर्ण व्यवहार बदल गया है।

भारत में ७०० परिवारों का एक गाँव है नान्देड़। उसमें गाँवों में होने वाली आम चुनौतियाँ थी - शराब, कर्ज़ा आदि। एक ’आर्ट ऑफ लिविंग’ के अध्यापक ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और छोटे समुहों में कोर्स लेने शुरु किए। कुछ ही महिनों में गाँव में एक विशाल बदलाव आया। अब सब लोग इकट्ठा होकर वहाँ सत्संग करते हैं। कोई भी शराब, सिगरेट यां किसी तरह का नशा नहीं करता। वहाँ किसी तरह का कोई जुर्म नहीं है। गाँव में एक दुकान है जो विश्वास पर चलती है, उसमें कोई दुकानदार नहीं है और लोग ज़रुरत का सामान लेकर पैसे डिब्बों में छोड़ जाते हैं। यह पिछले तीन साल से बिना किसी चोरी के ऐसे चल रहा है। सारा गाँव ऑरगैनिक है, और वहाँ कोई भी बिना रोज़गार के नहीं है। सारे गाँव में किसी दरवाज़े पर लौक नहीं है। एकता दर्शाने के लिए सभी घरों में गुलाबी रंग का पेंट है। गाँव में सभी स्वावलंबी हैं और वातावरण के प्रति सम्मान रखते हैं। उन्हें सबसे आदर्श गाँव का इनाम भी मिला। कर्नाटक में १८० गाँव और कुल ५०० गाँव इसी राह पर चल रहें हैं।

प्रश्न : मृत्यु के भय से कैसे बाहर आएं?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम एकांत होकर केवल अपने बारे में ही सोचते रहोगे तो तुम्हे मृत्यु का भय लगेगा। जब तुम एक बार सेवा में लग जाते हो तो मृत्यु का कोई भय नहीं रहता। एक आतंकवादी किसी ध्येय के लिए प्रतिबद्ध होता है, इसलिए वो मत्यु से नहीं डरते। अगर तुम दूसरों का भला करना चाहते हो, तो इसके लिए तुम्हारी प्रतिबद्धता इस भय से तुम्हे दूर रखेगी।

प्रश्न : पृथ्वि पर रहने वालों के लिए आपकी क्या सलाह है? हम किस तरह रह सकते हैं कि ५० - १०० साल बाद भी ताज़ा हवा उपल्ब्ध हो?

श्री श्री रवि शंकर :
कुदरत की देखभाल करो। कुदरत के लिए सम्मान रखो जैसे हर देश के मूल समुदाय कुदरत का सम्मान करते हैं। वातावरण का सम्मान करो। एक जगह ऐसी है जहाँ एक पेड़ काटो तो उसके बदले अगले ४० दिनो में ५ पेड़ लगाने की ज़िम्मेदारी ली जाती है। हमे कुदरत का सरंक्षण करना ही है।

प्रश्न : ऐसे में क्या करना चाहिए जब आप किसी से प्रेम करें पर वो आपसे प्रेम ना करे?

श्री श्री रवि शंकर :
उन्हे यह पूछने की बजाए कि वो आपसे प्रेम क्यों नहीं करते, आप यह पूँछे कि वो आपसे इतना प्रेम क्यों करते हैं। आप उनसे कहें कि जितना प्रेम वो आपसे करते हैं आप उसके लायक नहीं हैं। जीवन में किसी भी मुश्किल का सामना एक अंदाज़ से करें।

पूरा जीवन एक खेल की तरह हैं। जीवन संघर्ष नहीं है। कुछ भी आपको खत्म नहीं कर सकता। आप अमर हैं। आपकी आत्मा अमर है। अगर अभी यह समझ नहीं आ रहा तो कोई बात नहीं। मैं वही कहुँगा जो मुझे पता है और किसी दिन आप भी इससे सहमत हो सकें। किसी भी चीज़ से डरने की ज़रुरत नहीं है। हमारे पास कोई विकल्प ही नहीं है।

प्रश्न : आप पाकिस्तान में तीन सेंटर स्थापित करने में कैसे सफल हो सके?

श्री श्री रवि शंकर :
पाकिस्तान में लोग बहुत अच्छे हैं। वो बस सुदर्शन क्रिया करते हैं। हमारे अध्यापक हैं वहाँ। जब आप किन्ही धारणाओं में फंस जाते हैं तो यह एक पिजरें में कैद हो जाने जैसा है। जब आपका अनुभव होता है तभी आप पिंजरे से बाहर आ पाते हैं।

प्रश्न : कृप्या हमें बताएं कि २०१२ में क्या होगा?

श्री श्री रवि शंकर :
वर्ष 2012 एक आकर्षण का केन्द्र बन गया है। यह एक सनसनी बन गई है। कोई भी ख़बर बिना सनसनी के अच्छी नहीं मानी जाती। हमारे पास और काम होगा करने को। लोग और आध्यात्मिक होंगे। यह एक फैशन ही नहीं पर एक ज़रुरत होगी। सुनहरा समय आ ही गया है।

मुझे लगता है मैने अब सब कह दिया है। बहुत बातें बिना शब्दों के कही जाती हैं। कुछ बातें शब्दों से भी नहीं कही जाती, कही भी जाएं तो समझ में नहीं आएगा।

जब आप घर जाएं तो यह सोचकर जाएं कि आप बहुत भाग्यशाली हैं। आप बहुत सुंदर हैं। इस ज्ञान को याद रखें और मुस्कुराहट फैलाएं। चिंता कम करके सबके जीवन में खुशहाली बिखराएं। आप यह काम करें और ईश्वर को आपके जीवन की देखरेख करने दें|


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"जीवन में बुद्धि और भावना का सन्तुलन रखना चाहिये।"

प्रश्न : सेवा से थक जाते हैं, उत्साह नहीं रहता तो खुशी से उत्सव कैसे मनायें?

श्री श्री रविशंकर :
तब तो तुम्हारी सेवा में कोई कमी रह गयी होगी। जब सेवा उत्सव मनाने के भाव से करते हैं तो न थकावट और न ही मुर्झाहट लगती है। देखो भई, तुम सब लोग पिछ्ले दो तीन दिन कितने उत्साहित रहे पूरे दिनभर, और कल रात आप लोग देर रात तक जगे थे, पर मुझे तो कोई भी थका हुआ नज़र नहीं आ रहा !  आप को जो भी इतना लाभ मौन और ध्यान से मिल रहा है उसको सुरक्षित रखिये। हर एक काम में संयम का पालन करना चाहिये, कार्य में, बातचीत में, व्यवहार में - सब में। किसी बात में अतिश्योक्ति न हो, इसका ध्यान रखना चाहिये।

प्रश्न : जीवन में बहुत कुछ मिलता है पर अधूरी इच्छाओं के रहते एक असंतुष्टता की भावना रह जाती है मन में। इससे दुख पहुँचता है, क्या करें, इनसे कैसे निपटें?

श्री श्री रविशंकर :
आपने बेसिक कोर्स किया है न? उसमें क्या सीखा? जीवन में कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती है और दोनों को साथ लेकर चलना है। असफलता से आप को कभी खुशी नहीं मिल सकती, उस से दुख ही मिलेगा। तो फ़िर उस समय क्या करें? उसके लिये अपने पास दो उपाय हैं - ’सो वट?’(तो क्या?) और ’सोहम’! अब तुम्हारे पास ये दो कुंजियाँ हैं परिस्तिथि को सम्भालने के लिये!

प्रश्न : गुरुजी,आज मैं सेवा कर रहा था पर ये भूल स्वीकार करना चाहता हूँ कि वह मैं आप का ध्यान आकर्षित करने के लिये कर रहा था।

श्री श्री रविशंकर :
कोई बात नहीं, इतनी ग्लानि महसूस मत करो कि तुमने मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिये सेवा की थी। माना गलती हुई पर तुमने सेवा भी तो करी ना! और जैसे जैसे तुम आगे बढ़ोगे सुधार होता जायेगा। बहुत बार लोग प्रश्न भी ध्यान आकर्षित करने के लिये पूछते हैं। मैं जानता हूँ! इसीलिये केवल ध्यान आकर्षित करने में ही रुचि मत रखो - दोनों काम करो।

प्रश्न : हम ने सुना है कि यहाँ कृपा भरपूर मिल रही है पर हम कितना ले सकते हैं ये हमारे पात्र पर निर्भर है, तो हम ज्यादा मिलने के लिये अपने पात्र का आकार कैसे बढ़ायें?

श्री श्री रविशंकर :
योग से योग्यता और पात्रता बढ़ती है। योग, प्राणायाम आदि जो भी तुम सब यहाँ कर रहे हो, वे सभी तरह के गुण कुशलता और पात्रता बढ़ाते हैं। सेवा से भी ये सब बढ़ता है।

प्रश्न : साँस कैसी हो, लंबी, गहरी या धीमी, शांत?

श्री श्री रविशंकर :
आपको कभी लंबी और कभी धीमी दोनों सांस लेनी चाहिए। जब लंबी गहरी साँस लेते हो तो प्राण की ऊर्जा बढ़ती है, और धीमी और शांत साँस से विश्राम मिलता है।

प्रश्न : आज के युग में बहुत लोग शर्करा(Diabetes) की बीमारी से पीड़ित हैं जो सामान्य दवाइयों से दूर नहीं हो सकती है। क्या योग से ठीक हो सकती है?

श्री श्री रविशंकर :
हाँ, कुछ तरह की शर्करा की बीमरी योग और आयुर्वेद के साथ दूर हो सकती हैं, सब प्रकार की नहीं। यहाँ के अनुसंधान केन्द्र में डाक्टर वेदमूर्ताचार्य ने कुछ शोध किया है और ४३ शोध पत्र भी लिखे हैं। आप लोग उनसे बात कर लीजिये। इन्होंने १००० शर्करा के मरीजों पर शोध किया है जो सुदर्शन क्रिया व संतुलित भोजन से इस बीमारी से मुक्त हो गये हैं।

प्रश्न : मुझे हर काम के लिये बहुत प्रयत्न करना पड़ता है और सन्तोष जनक फल भी नहीं मिलता है।

श्री श्री रविशंकर :
तुमने अपने मन में ऐसा संकल्प क्यों धारण कर लिया कि तुम्हे सब काम के लिये बहुत प्रयत्न करना पड़ता है, यां तुम ठीक से कार्य नहीं कर पाते इत्यादि? ऐसी मान्यता तुमने स्वयं अपने ऊपर लाद रखी है। किसी समय ऐसा हुआ होगा पर आगे भविष्य में भी ऐसा ही हो यह ज़रुरी नहीं है।

प्रश्न : चित्त की एकाग्रता बढ़ाने के लिये क्या करना चाहिये?

श्री श्री रविशंकर :
और अधिक एडवान्स कोर्स करो।

प्रश्न : मैं बोध कैसे हासिल करूँ? मुझे भगवान से साक्षात्कार करना है, मुझे बोध प्राप्त करना है।

श्री श्री रविशंकर :
बोध प्राप्त करना है? भगवान से साक्षात्कार करना है? तो सेवा करो और विश्राम करो।

प्रश्न : मैं हर रोज़ अपनी साधना करता हूँ पर हर समय आपके साथ रहूँ यह एक प्रबल इच्छा बनी रहती है और जब दूसरों को आपके साथ बात करते देखता हूँ तो मतिभ्रम में पड़ कर सोचने लगता हूँ कि आप केवल मेरे से ही बात कर रहे हैं- एक बीमरी सी लगने लगी है। अगर मैं आपको देख लेता हूँ या आपका कुछ इशारा देखता हूँ तो कुछ ठीक पाता हूँ खुद को। पर आज सबको मिलते समय आपने मुझे देखा भी नहीं तो मुझे बुरा लगा। अब ये बुरा लगना और ये आपके पास रहने की बीमारी को कैसे दूर करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
देखो जिस वक्त तुम्हें यह अहसास हुआ कि ये मोह बीमरी स्वरूप बन रहा है तो तुम उसी वक्त इस से बाहर आ गये। ठीक है कुछ वक्त के लिये किसी का ध्यान आकर्षित करना, पर हर समय ऐसा नहीं करना। तुम अपनी साधना, सेवा, सत्संग करते जाओ, खुश रहो और केन्द्रित रहो। ठीक है, बैठ कर उसका विश्लेषण मत करो- ये भक्ति थी यां मोह? ज्यादा विश्लेषण से परिणाम और भी खराब होंगे। बस सहज रहो, आगे चलते रहो, जो भी हो रहा है उसे स्वीकार करते जाओ, समझे? हमें हमेशा उस चीज़ की प्राप्ति होती है जिसकी हमें सही में जरूरत होती है, है ना? यह एक निर्धारित नियम है, यह जान कर आगे बढ़ते रहो।

प्रश्न : कुछ काम करते समय मैं ये सुनता हूँ कि यह कार्य गुरुजी ने मुझसे करने को कहा, इस से मेरे सामन्य जीवन पर असर पड़ने लगा है, मैं क्या करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
संतुलन होना चाहिये तुम्हारे अंतरात्मा की आवाज़ और अपनी आन्तरिक शक्ति पर। जो तुम्हें परेशान कर रही है उसे योग माया कहते हैं। कभी कभी योग माया से भ्रमित मन में विचार आते हैं जो गलत भी होते हैं। इसलिये हमें अपने विवेक और बुद्धि को तीक्ष्ण और स्पष्ट रखना चाहिये। आन्तरिक चेतना के स्तर पर दिखने वाले दृश्य यां झलक और सुनाई पड़ने वाली आवाज़ को सही समझने के लिये विवेक और बुद्धि मे तीक्ष्णता चाहिए। राम कृष्ण परमहंस को भी ऐसी कई झलकियाँ, दृश्य दिखते थे। दुनिया में और भी कई सत्पुरुषों को ऐसे कई झलक दिखने या आन्तरिक आवाज़ सुनने का आभास हुआ है। इसलिये सन्तुलन रखो और धीमी गति से बुद्धि और भावों में समता से आगे बड़ों। जीवन में दोनों- बुद्धि और भावना का, दिमाग और दिल का सन्तुलन होना चाहिये।

प्रश्न : गीता में श्री कृष्ण ने ये संसार गुणों का खेल कहा है - इसका क्या अर्थ है?

श्री श्री रविशंकर :
गीता पर बहस करने में बहुत वक्त लगेगा, तो अभी नहीं करेंगे। फिर से पढ़ो, क्योंकि कभी कभी पढ़ते ही तुरंत समझ आ जाता है, और कभी अनेक बार पढ़ने पर समझ आता है।

प्रश्न : कभी मुझे अच्छा लगता है और कभी बुरा- दोनों में संतुलन कैसे लाऊँ?

श्री श्री रविशंकर :
कुछ दिन मौन रखो और देखो जो उचित है वही भावना प्रेक्षित होंगी।

प्रश्न : मैं पिछले छह साल से सुदर्शन क्रिया कर रहा हूँ और एक नयी जिंदगी जी रहा हूँ। खुशीपूर्वक नकारात्मक विचार रहित जीवन जी रहा हूं पर एक समस्या है - मेरी स्मरण शक्ति पहले जैसी नहीं है अब तो कुछ उपाय करूँ यां ऐसे ही छोड़ दूँ?

श्री श्री रविशंकर :
उम्र के हिसाब से तुम्हें आयुर्वेदिक दवाई लेनी चाहिये जैसे ब्राह्मी, शंख पुष्पी आदि जिससे लाभ मिलेगा। हमारे देश में आजकल जो हमने भोजन प्रणाली बना रखी है वह स्मरणशक्ति के लिये उपयुक्त नहीं है, उसमें स्टार्च, कार्बोहाईड्रेट्स ज्यादा हैं व सब्जी, प्रोटीन्स, फल इत्यादि कम। अपने भोजन में बदलाव करो और देखो कि इनकी मात्रा ज्यादा हो। इसके साथ आयुर्वेदिक दवाइयाँ (ब्राह्मी आदि), प्राणायाम, योग से लाभ होगा।

प्रश्न : आप कहते हैं चुनाव या निर्णय हमारा है और आशीर्वाद आपका पर मैं क्या नौकरी करूं, यह समझ नहीं पा रही। एक नौकरी लेती हूँ और कुछ समय बाद छोड़ देती हूँ - क्या आप मेरे लिये निर्णय ले सकते हैं?

श्री श्री रविशंकर :
जब हम कभी भी कोई काम लेते हैं तो कुछ समय बाद लगता है ये नहीं कुछ और ठीक रहता। जो लोग डाक्टर बने हैं वे सोचते हैं एन्जिनीयर बनते तो अच्छा था, और जो एन्जिनीयर हैं वे सोचते हैं अरे वकील बनते तो अच्छी कमाई रहती! तो हर नियुक्त कार्य में कोई दोष तो मिलेगा ही। इसीलिये मैं कहता हूँ अपनी पसंद का काम हाथ में लो और उसके साथ निभाओ। और मैं आपके लिए कार्यक्षेत्र नहीं चुनूंगा। आप सब अपना कार्य क्षेत्र खुद तय करें, मेरा आशीर्वाद साथ में है ही।

प्रश्न : गुरुजी, समय क्या है? क्या इसको और इसकी गति को बदला जा सकता है?

श्री श्री रविशंकर :
दो घटनाओं के बीच जो दूरी है वह समय है। दुख में समय लंबा और सुख में छोटा प्रतीत होता है, इसकी गति में बदलाव मौन द्वारा किया जा सकता है।

प्रश्न : आपने नारद भक्ति सूत्र में कहा कि सब माया है, तो क्या इसका मतलब है कि हम कोई कार्य नहीं करें?

श्री श्री रविशंकर :
पहले तुम पूरे भक्ति सूत्र की व्याख्या सुनो, आधा यां एक टेप सुन कर कोई धारणा बनाना उचित नहीं है।

प्रश्न : आप से मिल कर भी मैं संतुष्ट नहीं होता - मुझे लगता है आप दूसरों को ज़्यादा वक्त देते हैं। आज भी दर्शन कतार में आप मुझे बिना देखे आगे निकल गये। और मुझे जब आप से बात करने का मौका भी मिलता है तब मैं बोल ही नहीं पाता, क्या बोलूं समझ ही नहीं पाता! फिर लगता है ’अरे मैं ये कहना भूल गया’, ’ये पूछना भूल गया’-और इस तरह अपने दिमाग में विश्लेषण करने लगता हूँ- अब क्या करूँ?

श्री श्री रविशंकर :
कैसे सोचा कि तुम्हें नहीं देखा? मैं हर एक जो दर्शन के लिये आता है उसे देखता हूँ, किसी को भी नहीं छोड़ता! और तुम मिलने पर कुछ भी पूछना भूल जाते हो तो वो भी ठीक है- अब बोल दिये ना!

प्रश्न : सुना है कि अभिमन्यु ने युद्ध की एक कठिन कला "चक्रव्यूह" तोड़ने की कला, गर्भ में ही सीख ली थी। क्या ये सम्भव है कि कोई गर्भ में भी सीख सकता है?

श्री श्री रविशंकर :
हाँ, यह सत्य है।


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"हमारे लिए जो ज़रूरी है वो हमको मिलता है"

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बैंगलोर आश्रम, भारत

प्रश्न : गुरुजी, महात्मा गांधी के अहिंसावादी सिद्धांत को जीवन में कितना उतारना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
अहिंसा का सिद्धांत अत्यंत प्राचीन समय से चल रहा है। जीवन में अहिंसा तो रहनी ही चाहिए। कभी किसी के भले के लिये अगर उसे थप्पड़ भी मारना पड़ता है, तो मुस्कुराते मुस्कराते मारना चाहिए। देखो, भैंस को आगे बढ़ाने के लिये उसे छ्ड़ी से धक्का भी देना पड़ता है। गाय तो केवल आवाज़ से चल पड़ती है।पर भैंस और गधे के लिये लाठी ज़रुरी हो जाती है। इसे हिंसा नहीं मानते। हिंसा किसे कहते हैं? जब भीतर आक्रोश है, द्वेश है, क्रोध है, उससे जो काम करते हैं वो हिंसा होता है।

प्रश्न : क्या कोई हमें थप्पड़ मारे तो क्या हमें दूसरा गाल भी आगे कर देना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर वह व्यक्ति संवेदनशील है, तो दूसरा गाल भी आगे कर दो, वह तुम्हें दोबारा थप्पड़ नहीं मार पायेगा। पर अगर कोई असंवेदनशील हो तो तुम भी उसे दो-तीन लगा सकते हो!

प्रश्न : कभी कभी लोग पूछते हैं कि तुम सिर्फ़ भगवान को क्यों नहीं मानते, गुरु को क्यों मानते हो? मेरा जवाब होता है कि मेरे गुरु ही मेरे भगवान हैं। पर क्या भगवान और गुरु में कोई अंतर है?

श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है, तुम्हें लोगों को सफ़ाई देने की ज़रूरत नहीं है। बस मुस्कुराओ। तुम कह सकते हो, ‘क्या तुम नहीं जानते कि आत्मा, भगवान और गुरु, एक ही हैं।’ ये पूरा ब्रह्माण्ड एक ही तत्व से बना है। जैसे, बिजली तो एक ही है, पर वह अलग अलग उपकरणों में अलग दिखती है - बल्ब, पंखा, वातानुकूल, इत्यादि। वैसे ही अलग अलग शरीर और तौर तरीके हो सकते हैं, पर हम सब एक ही तत्व से बने हैं।

प्रश्न : अगर भगवान हमारी कोई प्रार्थना पूरी नहीं कर रहे हैं, तो क्या क्रिया और साधना में मज़बूत करने से वो पूरी हो जायेगी?

श्री श्री रवि शंकर :
धीरज रखो। आशा रखो कि वह पूरी हो सकती है। हमारे लिए जो ज़रूरी है वो हमको मिलता है।

प्रश्न : कभी कभी अपने आप पर मेरा नियंत्रण ढीला पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
ऐसा कभी कभी होता है तो कोई बात नहीं है। ऐसा हर समय तो नहीं होता है ना? तुम पीछे मुड़कर देखो। (प्रश्नकर्ता अपने पीछे मुड़ कर देखता है, और सभी लोग हँसने लगे।) अभी नहीं! अपने जीवन में पीछे मुड़कर देखो - एक साल, दो साल, तीन साल पहले जाकर देखो कि तुम तब क्या थे और आज क्या हो। तुमने कोई फ़र्क देखा? कितना फ़र्क देखा? तुम कह रहे हो एक महीने में जब से तुम सुदर्शन क्रिया कर रहे हो तुमने बहुत फ़र्क देखा है। तुम आगे भी बहुत फ़र्क देखोगे।

प्रश्न : Art of Living में हम कौन से योग का अभ्यास करते हैं - हठ योग, राज योग, कर्म योग यां ध्यान योग?
श्री श्री रवि शंकर : Art of Living में सब है। सब योग मिलकर Art of Living में हैं। भक्ति योग, कर्म योग, ध्यान योग सब हैं।

प्रश्न : क्या मैं हठ योग का अभ्यास कर सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम जिस भी योग का अभ्यास करो, सहजता और असानी से करो। अपने शरीर को बहुत कष्ट देने की आवश्यकता नहीं है। साधारण और सहज रहो। हठ योग के अभ्यास के लिये कई सावधानियां बरतनी पड़ती हैं।

प्रश्न : गुरुजी, मैं बहुत सारा काम करना चाहता हूँ, पर वह मेरे अधिकार क्षेत्र के बाहर आता है। क्या फिर भी मैं इस बारे में सोचूं और स्वप्न लूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, तुम्हें ऐसा स्वप्न रखना चाहिये।

प्रश्न: हम राष्ट्र के प्रति अपनी कृतज्ञता जताने के लिये क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर :
अपने राष्ट्र के प्रति अपना प्रेम और कृतज्ञता दर्शाने के लिये तुम्हें समाज में बहुत काम करना चाहिये ताकि हमारे गाँव विकास करे और स्वावलंबी बने। समाज को भ्रष्टाचार और हिंसा से मुक्त करने के लिये हमें पूरे दिल से काम करना है। ठीक है?

प्रश्न : मैंने अपने अंतिम साल की परीक्षा दी है और मैं आगे और पढ़ना चाहता हूँ। मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ, पर एकाग्रता से पढ़ाई नहीं कर पाता हूँ। मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
अगर तुम एकाग्रता से पढ़ाई नहीं कर पा रहे हो तो इन तीन बातों पर ध्यान दो -

१. तुम्हारा भोजन. अपने भोजन पर ध्यान दो। इस पर ध्यान दो कि तुम क्या खाते हो।

२. क्या तुम कोई शारीरिक व्यायाम करते हो? अगर तुम केवल बैठ कर टी वी देखते रहते हो या कम्प्यूटर पर इन्टरनेट पर काम करते रहते हो, तो शरीर में ऊर्जा का संचार कम होता है। तब तुम आलसी हो जाते हो, और पढ़ने में मन नहीं लगता। तो, कुछ शारीरिक व्यायाम करना आवश्यक है।

३. योग, प्राणायाम, ध्यान और सत्संग में भाग लेना, इत्यादि। इतना करने से तुम्हारे शरीर की सभी आवश्यकतायें पूरी हो जायेंगी। और फिर तुम बैठ कर पढ़ने के लिये अच्छा समय दे सकते हो। इससे तुम्हारी समझने की शक्ति और याद्दाश्त भी बढ़ जायेगी, और तुम कम समय में अधिक ग्रहण कर सकोगे। आगे पढ़ने की तुम्हारे इच्छा है तो पढ़ो, निर्णय तुम्हारा है, और मेरा आशीर्वाद है।

प्रश्न : भगवान शंकर और कृष्ण में क्या फ़र्क है? कुछ लोग शिव की पूजा करते हैं और कुछ लोग कृष्ण की।

श्री श्री रवि शंकर : नाम और रूप अनेक हैं, पर सब एक ही है।

प्रश्न : इनमें से क्या ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं - हमारे संस्कार या जाति? जो लोग जातिवाद और धर्मवाद का समर्थन करते हैं, अन्तर्जातीय विवाह का विरोध करते हैं। दोनों में क्या अधिक महत्वपूर्ण है - मानवीय गुणं या व्यक्ति का धर्म और जाति?

श्री श्री रवि शंकर :
मानवीयता को अधिक महत्व देना चाहिये।

प्रश्न: क्या विवाह संबंधों से पहले जन्म-पत्री मिलानी चाहिये? क्या इस में विश्वास करना चाहिये? क्या मांगलिक होने से कोई फ़र्क पड़ता है?

श्री श्री रवि शंकर :
> ये विज्ञान है, पर ये इस पर निर्भर करता है कि बताने वाला कैसा है। कई बार ज्योतिष के नाम पर लोग ठग लेते हैं। जन्म-पत्री मिलाने में कुछ तो है, अगर तुम्हे लगे तो कर सकते हो । ॐ नमः शिवाय का जप करना सब कमियों का उपाय है।

प्रश्न : आप हमारे Art of living के गुरु हैं, पर परिवार में भी गुरु हैं, पारंपरिक धार्मिक क्रियायें हैं, उपासना की अलग पद्दति है, क्या हमें उन्हें भी निभाना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
देखो, अगर परिवार में एक परंपरा चली आ रही है बहुत समय से तो उसे करने में क्या हर्ज है? पारिवारिक परंपराओं को निभाना चाहिये।

प्रश्न : असफलता को कैसे स्वीकार करें?

श्री श्री रवि शंकर :
ये जान कर कि ये भविष्य में सफलता की तरफ़ एक कदम है।

प्रश्न : कोर्स करने के बाद आप तीन बार मेरे सपने में आये। दूसरी बार जब आप सपने में आये तो मैंने देखा कि अब आप इस दुनिया में नहीं रहे।

श्री श्री रवि शंकर :
ठीक है। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। अभी उस बात को होने में बहुत समय बाकी है!

प्रश्न : Art of Living में बहुत सारे अध्यापक हैं जो कि प्रेरणास्रोत हैं। अच्छा अध्यापक होने के लिये क्या योग्यता चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर : हाँ, टीचर्ज़ ट्रेनिंग ले लो, और अच्छी तरह से अपने आप को तैयार कर लो।

प्रश्न : मेरे गुरु होने के लिये धन्यवाद। मैं एक सिख हूँ, और हमारे धर्म में हमारे अंतिम गुरु ने कहा था कि अब कोई गुरु नहीं होगा, गुरु ग्रंथ साहिब ही गुरु का स्वरूप है। तो, मेरे परिवार के लोग नहीं चाहते कि मैं किसी को गुरु मानूँ। मैं उन्हें कैसे समझाऊं?

श्री श्री रवि शंकर :
सब ठीक है। वाहे गुरु वाहे गुरु कहो। जो भी धर्म है उन्हें वो निभाने दो, पर वो कोर्स कर सकते हैं और सब से मित्रता कर सकते हैं।

प्रश्न : Art of living के कुछ स्वयंसेवी आपके आशीर्वाद से राजनीति में जाना चाहते हैं।

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, ठीक है। उन्हें राजनीति में जाना चाहिये। राजनीति की सफ़ाई करनी चाहिए जैसे कि Art of Living के स्वयंसेवियों ने यमुना की सफ़ाई की!


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ध्यान करने से समस्त वातावरण में उस ऊर्जा का स्पंदन होता है

पिछली पोस्ट के शेष अंश :

हमारे युवाचार्य एक फ़ैक्टरी के लिये लाइसेंस लेने गये, और उन्होंने रिश्वत देने से मना कर दिया। बिना किसी क्रोध के, आत्मविश्वास से उन्होंने कहा, ‘हम Art of Living के सिद्धांतों पर चलते हैं, और हम रिश्वत नहीं देंगे। आप चाहते हैं तो हम आप के पास ५० चक्कर लगायेंगे, पर रिश्वत नहीं देंगे।’ उस व्यक्ति ने बड़ी आसानी से उन्हें लाइसेंस दे दिया। मैं चाहूंगा कि तुम सब ऐसे ही समुह में आगे बड़ो।
यहाँ तुम सब के पास समय और मौका है अपने व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिये। अपनी प्रतिभा को बढ़ाओ। हमें योग, प्राणायाम और ध्यान के साथ साथ अपनी प्रतिभा को बढ़ाना है। हम ये करेंगे।
...वाद-विवाद का अभ्यास, पत्रकारिता...कुछ टोलियों को Talk show का अयोजन करना चाहिये। जो लोग सार्वजनिक भाषण देना नहीं जानते, उन्हें यहाँ जन समूह के सामने बोलना चाहिए। जो अच्छे गायक नहीं हैं, उन्हें यहाँ माइक पर आकर गाना चाहिये। जो हम करना जानते हैं, वो तो करते ही रहते हैं। उसमें कोई मज़ा नहीं है। जो काम करना तुम नहीं जानते हो, उसकी शुरुवात करो। जिन्हें खाना बनाना नहीं आता, उन्हें खाना पकाने दो। पर तब उन्हें कुछ समस्या हो सकती है जो खाना खाना जानते हैं! इस तरह हमें जो कार्य करना नहीं आता है, उसके अभ्यास को चुनौती की तरह स्वीकार करना चाहिये।

तुम में से कितनों ने आश्रम में दाखिल होते ही एक ऊर्जा का अनुभव किया? तुम में से बहुत से लोग बहुत लंबी यात्रा कर के आये हैं। कई लोग ३-४ दिन की यात्रा कर के यहाँ पहुंचे हैं। तुम में से कितनों को ये अनूठा लगा कि किसी जगह अंदर आते ही उर्जा से भर गए तुम? तुम्हें पता है ऐसा क्यों हुआ?(गुरुजी, आप की वजह से!)

ऐसा इसलिये है क्योंकि यहाँ लोग ध्यान करते रहे हैं। ध्यान करने से समस्त वातावरण में उस ऊर्जा का स्पंदन होता है। ये ध्यान, ज्ञान और भक्ति का प्रभाव है। तो, हमें यहाँ की ऊर्जा को अच्छा बनाये रखना है, और ऐसा करने के लिये सुबह के कार्यक्रमों में भाग लेना मत भूलना। यहाँ कई तरह के योग होंगे - खेल कूद वाला योग, गांव की महिलाओं वाला योग, नृत्य वाला योग, जानवरों वाला योग, बाल योगा और ज्ञान योग। अपनी और वातावरण की उर्जा बनाए रखने के लिए बहस, चुगली और निंदा से दूर रहना। अगर मन में कोई परेशानी हो, तो उसे लिख कर botheration basket में डाल दो। अगर तुम्हारे कमरे में किसी के खर्राटों से तुम्हें परेशानी हो! ३-४ दिन तक खर्राटों वाले कमरे में रात बिताना मुश्किल हो सकता है! यां तो तुम ear plugs का इस्तेमाल करो, यां फिर हम सभी खर्राटे लेने वाले व्यक्तियों को एक ही कमरे में रखेंगे - और खर्राटों के सुरों की महफ़िल होगी! खर्राटे लेना बुरी बात नहीं है। खर्राटें लेने वाले व्यक्ति आत्मग्लानि ना करें। अगर कई लोग खर्राटे लेते हैं तो उन सब को इक्कठा कमरों में रखेंगे। हां, एक बात का ध्यान रखना होगा कि सभी एक समय पर सो जायें - तभी तो सुरों का संगम संभव है! (सब लोग हंसते हैं।)

यहाँ कोई मेहमान नहीं है। तुम सब मेज़बान हो, और तुम्हें वैसा ही बर्ताव करना चाहिये, मेहमान जैसा बर्ताव नहीं। ये जगह तुम्हारी है। तुम्हें घर जैसा माहौल बनाना है। ऐसा माहौल यहाँ है ही, पर तुम्हें उसमें रमना है, उसे महसूस करना है। तो, यहाँ सब मेज़बान हैं, केवल मैं ही मेहमान हूँ!
इसे अपना घर समझो और पूर्ण विश्राम का अनुभव करो। वैसे भी तुम सब ये जानते ही हो, किसी को कहने की आवश्यकता नहीं है।
जो लोग कवितायें और लेख लिखना चाहते हैं, उन्हें यहाँ रहते हुये ये सब ज़रूर करना चाहिये। बाकी सब तुम्हारे लिए surprise है।


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"पूर्ण रूप से वर्तमान क्षण में रहकर भविष्य के लिए बेहतर दृष्टिकोण मिलता है"


प्रश्न : मैं अपने आप को भय से कैसे मुक्त कर सकता हूँ जो कि बहुत वर्ष पहले मेरे भीतर बैठ गए थे? मैं समझता हूँ कि वो बेबुनियादी हैं और केवल मेरे मन में ही हैं, पर फ़िर भी भय बार बार सामने आता है। वो मुझे बाँध के रखे हैं।

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान करो यां किसी मंत्रों का संगीत सुनो। यह सब सहायक होगा। ध्यान, प्राणायाम, क्रिया, कुछ व्यायाम, उज्जई श्वास भय से मुक्त होने में बहुत सहायक है। यह मत सोचो भय तुम्हारी गहराई में है। यह psychology की गलत धारणा है जिसके अनुसार भय और गलानि तुम्हारी गहराई में है। तुम्हारे भीतर गहराई में केवल खु:शी और आनंद है। और उस केन्द्र में कोई भय, लालच, वासना, क्रोध, यां गलानि तुम्हे छू नहीं सकता। तुम भीतर में अद्‍भुत हो। इसलिए यह मत सोचो कि तुम में यह सब गलत भावनाएं हैं। जो कहते हैं तुम्हारे भीतर गहराई में कुछ गलत है वो अंधे हैं। कोई भी बुरा गुण केवल बाहरी सतह पर है। अगर कोई उसे गहरा कहता है तो मैं कहूँगा और गहराई में जाओ। अपने केन्द्र की गहराई में तुम केवल आनंद स्वरूप हो। अपने भीतर गहराई में कुछ गलत है, ऐसा सोचना अज्ञानता की निशानी है। इस को सच जानते हो तो इससे मुक्त होना मुश्किल हो जाता है। यह भाव और स्थिर हो जाते हैं।

प्रश्न : मन को शांत कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मन को शांत करने की इच्छा ही बहुत तरह से कार्य करती है। सुदर्शन क्रिया और ध्यान इसमें बहुत सहायक हैं।

प्रश्न : ध्यान करने की कोई सीमा है?

श्री श्री रवि शंकर :
जितना चाहिए उतना ही करो। ज़रुरत से ज़्यादा करने की कोई आव्श्यकता नहीं है। ध्यान स्नान लेने जैसा है। तुम शरीर को स्वच्छ रखने के लिए सुबह स्नान करते हो। पर तुम सारा दिन स्नान नहीं करते रहते। मन को साफ़ और निर्मल करने के लिए ध्यान है। एक बार मन स्वछ हो जाने पर तुम प्रसन्न महसूस करते हो।

प्रश्न : ध्यान करते दौरान एकाग्रता कैसे बनाएं?

श्री श्री रवि शंकर :
एकाग्रता ध्यान नहीं है। ध्यान एकाग्रता का उलटा है। मन को ढीला छोड़ना ध्यान है। ध्यान से मन शांत हो जाता है, और तुम्हे सुखद अनुभूति होती है। पर रोज़ाना की जीवन शैली में हमें कई काम करने होते हैं, जैसे बिल का भुगतान...। इस दौरान भी हम मन को कैसे शांत रखें? तुम ध्यान करते हो और मन शांत होता है। फिर तुम अपने कार्य में लग जाते हो। उस दौरान भी मन को शांत रखना इतना आसान नहीं होता, पर निरंतर ध्यान के अभ्यास से तुम ऐसा कर सकते हो।

प्रश्न : गुरुजी, मन में चल रहे संघर्ष का क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
जब तुम यह एहसास करते हो कि मन में इतना संघर्ष है तो तुम्हारी आँखे खुलती हैं। प्राणायाम और ध्यान से इससे मुक्ति मिल सकती है।

प्रश्न : मन को केन्द्रित रखकर और वर्तमान क्षण में रहते हुए हम भविष्य के लिए दृष्टि कैसे रख सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
भविष्य के लिए एक दृष्टि होना और वर्तमान क्षण में रहना एक दूसरे के विरोध में नहीं हैं। तुम दृष्टि रखते हुए भी वर्तमान क्षण में रह सकते हो। पूर्ण रूप से वर्तमान क्षण में रहकर भविष्य के लिए बेहतर दृष्टिकोण मिलता है।

प्रश्न : मृत्यु के भय से कैसे मुक्त हो सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ध्यान से।

प्रश्न : मैं अपने अहंकार के कारण गिरा हूँ। मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
कोई बात नहीं। अगर तुमने पहचाना कि तुम गिरे हो तो तुम उससे अधिक ऊपर उठोगे। तुमने जाना कि तुम में अहंकार है, यह बहुत है। इससे लड़ने का प्रयत्न मत करो। इसे जहाँ है वहीं रहने दो, और इससे छेड़ छाड़ मत करो।
अगर तुम्हे अहंकार नहीं पसन्द तो इसे मुझे दे दो। मगर मैं चाहूँगा तुम इसे अपने पास रखो। हमारा अहंकार को मिटाने की चेष्टा करना, एक और बड़ी समस्या बन जाती है। तुम्हारे पास पहले ही और समस्याएं हैं सुलझाने के लिए।


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"कोई काम आनंद की अभिव्यक्ति में करना या उस काम को आनंद की उम्मीद में करना - दोनों में अंतर है"


डार कोंसीटीच्युशन हॉल
वाशिंगटन डी सी,
अप्रैल २५,२०१०

'आर्ट ऑफ़ लिविंग' में हम एक योजना को लागु करने के लिए इन्तजार नहीं करते| हम काम करना शुरू कर देतें हैं और जो भी आवश्यक होता है अपने आप आने लगता है| इसे सिद्धि या पूर्णता कहतें हैं - जब जो कुछ भी आवश्यक होगा, मिल जाएगा| प्राणायाम और ध्यान की फिर यहाँ भूमिका है| इस से आप ऐसे बन जाते हो कि कोई कमी ही महसूस नहीं होती| हमें वापिस इस अवस्था में आने की आवश्यकता है| वातानुकूलित कमरे और सब तरह के ठाट का क्या फायदा यदि इससे साथ अनिद्रा और मुधुमेह जैसे रोग हों? इसलिए हमें अपने आसपास सकरात्मक उर्जा पैदा करने की जरूरत है| ये चिंतित रहने यां सोचते रहने से नहीं हो सकता| मैं आपको कार्य करने के दो तरीके बताना चाहूँगा| एक तो यह कि आप कुछ करते हो क्योंकि आप को कुछ चाहिए होता है, आप उस कार्य की पूर्णता से खुशी की उम्मीद करते हो| दूसरा, आनंद की अभिव्यक्ति के साथ कुछ करना ,आप एक कार्य करते हो क्योंकि आपके पास कुछ है| आनंद की अभिव्यक्ति के साथ कुछ करना और आनंद पाने के लिए कुछ करना , दोनों में बहुत अंतर है| आज दुनिया में बहुत से लोग अवसाद से पीड़ित हैं| आंकड़े बतातें हैं कि आने वाले दशक में यह संख्या बढ़ कर ५० प्रतिशत हो जायेगी| दुनिया की आधी जनसंख्या - यह बहुत दुःख की बात है| हमें इसे बदलना होगा| psychiatric दवाएं लेना समाधान नहीं है| ध्यान और प्राणायाम से ही यह बदला जा सकता है|

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"जब हम परेशान होते हैं तो हमारे लिए एक अवसर होता है यह जान लेने का कि हम ज्ञान के साथ कितना आगे बढ़े हैं"

कई वर्षों के बाद मैं यहाँ डरेसडेन में आया हूँ। इस स्थान में बहुत परिवर्तन आ गया है| इसी तरह से हम लोग भी बदलते रहते हैं| आज आप कल जैसे नहीं हो| जो आप दस महीने पहले थे आज आप वैसे नहीं हो| हम सब विकास के साथ प्रगति करते हैं| आपका शरीर, मन, भावनाएं, विचार बदलते रहते हैं। परन्तु एक चीज़ है जो नहीं बदलती, इसे जान लेना,पहचान लेना,इस में स्थिर होना ही आध्यत्मिकता है| परिवर्तन का पता लगाने के लिए आपको कुछ ऐसी चीज़ का पता चलाना पड़ता है जो नहीं बदलती| केवल वही सनातन और स्थिर है| जीवन में स्थिर होने के लिए आपको कुछ ऐसा पकड़ना पड़ता है जो नहीं बदलता| क्योंकि जो सनातन है, जो स्थिर है वही विश्राम और शांति ला सकता है| ठीक है? अब आप मुझे बताओ क्या आप केवल १० दिन की शांति के इच्छुक हो? नहीं| हम स्थाई और हमेशा रहने वाली शांति चाहते हैं,ऐसा प्रेम जो आपकी आत्मा को उन्नत करे,मैं इसे आध्यात्मिकता कहता हूँ|

कुछ क्षणों के लिए बादल आ सकते हैं| आपकी भावनाएं बदल सकती है परन्तु उससे आप में कुछ स्थिरता मिलती है| क्या ऐसा नहीं है? उस स्थिरता के लिए जीवन को विशाल दृष्टिकोण से देखो| विश्राम में रहना सीखो,कुछ देर के लिए रोज़ ध्यान अवश्य करो|

क्या आप सब यहाँ हो?

१०० प्रतिशत?

अब आप यहाँ हो| अब जब मैं यह प्रश्न पूछता हूँ,अचानक मन यहाँ आ जाता है|क्या ऐसा नहीं है? पता है हम अपने श्वास के बारे में नहीं सीखते| श्वास में स्वस्थ होने के लिए बहुत से गुण हैं और ध्यान में तो इससे भी ज्यादा|

प्रश्न : समय के बारे में आपके क्या विचार हैं? आधुनिक भौतिक विज्ञान के विद्वान् कहते हैं समय विकास शील है|आपका अनुभव समय के बारे क्या है?

श्री श्री रवि शंकर : वेदों में यह बहुत समय पहले ही कहा गया है| समय और मन जुड़े हुए हैं| समय और मन में सम्बन्ध आश्चर्यचकित कर देने वाला है| हमारे पास मन और समय के विषय पर एक पुस्तक है| यदि आपकी रूचि है तो आप पढ़ सकते हो|

प्रश्न : डर से कैसे निभाएं?

श्री श्री रविशंकर : प्राणायाम से मदद मिलेगी| सुदर्शन क्रिया से मदद मिलेगी| ध्यान से मदद मिलेगी| यदि आपके पास कोई डर है तो मुझे दे दो| आप मुस्काते हुए घर वापिस जाओ|

प्रश्न : आपको इतने विशाल परियोजनाओं के लिए शक्ति और विचार कहाँ से आते हैं? आप जब अस्वस्थ होते हो क्या करते हो?

श्री श्री रवि शंकर : पता है, सारी शक्ति एक ही स्रोत से आती है| जब आप उस स्रोत से जुड़ जाते हो तो सब कुछ अपने आप आने लगता है|

प्रश्न : मनुष्य होने के नाते क्या सबसे आवश्यक है?

श्री श्री रविशंकर : मनुष्य के लिए सबसे जरुरी है प्रेम, यह आपका स्वभाव है| आपको केवल शांत होने की आवश्यकता है| जब आप विश्राम में होते हो तो आपको पता चलता है कि मनुष्य जीवन का प्रयोजन क्या है|

प्रश्न : आप किसानो की आत्महत्या और बीजों में अनुवांशिक परिवर्तन के विषय में क्या कहेंगे?

श्री श्री रवि शंकर : किसानो द्वारा आत्महत्या प्रगतिशील राष्ट्रों की बहुत बड़ी समस्या है| अनुवांशिक बीज का उत्पादन कर रही कुछ कम्पनियाँ गरीब किसानो से असली बीज खरीद के जला रहे हैं| कुछ लोग लालच में आकर उनके साथ मिल गए हैं| आज किसानो को इसके बारे में शिक्षित करना बहुत ज़रुरी है| आर्ट ऑफ़ लिविंग ने ५२० गाँवो में काम किया है जहाँ किसानो को उपयुक्त शिक्षा दी गई| अब इन सब गाँवो में आत्महत्या पूरी तरह से बंद हो गई है| परन्तु अभी भी बहुत कुछ करने के लिए है| हमे और अधिक काम करने कि जरूरत है|

प्रश्न : क्या हिंसात्मक व्यक्ति को वो जैसा है वैसे स्वीकार कर सकते हैं? क्या हमे सहनशील रहना चाहिए?

श्री श्री रविशंकर :सहनशक्ति का मतलब यह नहीं है किसी को कोई हिंसात्मक कार्य करने की आज्ञा दो, परन्तु हिंसा को हिंसा से वश में नहीं किया जा सकता| बुद्धिमत्ता से, बिना परेशान हुए,जैसे एक डाक्टर मरीज को देखता है वैसे ही हिंसा को रोकना है| हिंसा के प्रति जल्दबाज़ी में प्रतिक्रिया दिखाने का कोई लाभ नहीं होता। हिंसा के प्रति प्रतिक्रिया दिखाना ठीक नहीं परन्तु इसके खिलाफ कार्य करने की जरूरत है|

प्रश्न : गुरूजी,मुझे नहीं पता कि मैंने ठीक निर्णय लिया है यां नहीं| मेरा किसी के साथ सम्बन्ध था, मैंने वो संबंध खत्म कर दिया और फिर दोबारा किसी और से रिश्ता शुरू किया| क्या यह नई शुरुआत है? क्या मैंने ठीक निर्णय लिया है?

श्री श्री रविशंकर : समय आप को बता देगा! पता है जब हम परेशान होते हैं तो यह अवसर इस बात को जानने का होता है कि हम ज्ञान में कितना आगे बढ़े हैं| जब हम इस बात की जिम्मेदारी लेते है, ’मैंने किसी के साथ कुछ गलत किया है’ तो ५०% दुःख ख़त्म हो जाता है| बाकि का ५०% भी चला जाता है जब आपको पता होता है कि भविष्य में सबकुछ बदल जायेगा| एक बार एक सज्जन अपने पत्नी के साथ बहुत नाराज़ था|

जब उससे पूछा गया कि वह अपनी पत्नी के साथ नाराज़ क्यों है तो उसने कहा,"क्योंकि मैं उससे प्यार करता हूँ। यदि मुझे उसकी कोई परवाह नहीं होती तो मैं उससे क्यों लड़ता?" आप लड़ाई करते हो क्योंकि आप में स्वामित्व और अपनेपन की एक भावना होती है| इसी अपने पन की भावना की वजह से आप लड़ते हो और इसी अपनेपन की वजह से फिर मिल जाते हो| क्या ऐसा नहीं है? आप कुछ और लोगों से भी संपर्क कर सकते हो,मुझे तो इसका अनुभव नहीं है|

प्रश्न : आपके और अन्य लोगों के साथ में अंतर क्यों है?

श्री श्री रविशंकर : मुझे कोई अंतर नहीं लगता| यदि आपको कोई अंतर लगता है तो आप मुझे बताओ| जहाँ कहीं भी मैं जाता हूँ शायद सब के साथ सहज रहता हूँ| मुझे अपने लिए कोई चिंता नहीं है। मैं यह नहीं सोचता, ’मेरा क्या होगा?’ मैं हर किसी के बारे में महसूस करता हूँ चाहे वे मुझे जानते हो यां नहीं| मुझे किसी प्रकार का भय नहीं है। आपको भी शायद ऐसा ही लगता हो| यह जानना आपके लिए है| क्या आपको ऐसा नहीं लगता?

प्रश्न : मैं आपकी तरह पथ पर और सशक्त और प्रतिबद्ध कैसे हो सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर : आप पहले से ही प्रतिबद्ध हो| अपने पर संदेह मत करो| आपके पास सभी गुण हैं| एक बीज के रूप में आपके पास सब है| एक कली में वह सब होता है जिससे वे फूल बन सके| केवल इसके लिए कुछ समय लगता है| सभी पंखुडियां खुल जाएँगी और यह पूर्ण रूप से खिला फूल बन जायेगा| यद्यपि यह एक कली है परन्तु इसके पास सब कुछ है| इसी तरह एक व्यक्ति के पास सब कुछ है| आपको केवल कुछ पोषण की जरूरत है| इसलिए आप जानलो कि आपके अंदर सब गुण हैं| इसके लिए कुछ समय लगता है| कुछ प्राणायाम,ध्यान करो और अच्छे साथ में आप इसे और भी जल्दी होते देखोगे|

प्रश्न : मैं बहुत से लोगों को शराब और सिगरेट पीते देखता हूँ| मैं क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर : मेरे पास भी यही प्रश्न है! शिक्षा,शिक्षा! इन लोगों को किसी बड़े आनंद का अनुभव होना चाहिए| देखो सुदर्शन क्रिया के साथ वे अपनी इस आदत को कितनी जल्दी छोड़ देते हैं और इससे बाहर निकल आतें हैं|
हम इनके लिए एक कार्यक्रम करेंगे| हम ने कुछ देशों में ऐसा किया है और यह बहुत कामयाब रहा है|६५ प्रतिशत लोग बिना सिगरेट के रहे| ३०-३५ प्रतिशत वापिस सिगरेट पीने लगे परन्तु मात्रा में फर्क आया है| उनके सिगरेट यां शराब के सेवन में ८० प्रतिशत घटौती हुई है।

प्रश्न : क्या मुझे चर्च की सदस्यता छोड़ देनी चाहिए? (मैं कथोलिक चर्च से हूँ)

श्री श्री रविशंकर : यह आपकी अपनी मर्जी है| आप सदस्य बने भी रह सकते हो और यदि आप को नहीं बनना तो छोड़ भी सकते हो| आप सदस्य हो यां नहीं हो यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं है| क्या महत्वपूर्ण है? क्या आप एक अच्छे इन्सान हो? क्या आप प्रेम और करुणा से परिपूर्ण हो? क्या आप दूसरों की मदद करने में रूचि लेते हो? क्या आप दूसरों के साथ जुड़ना चाहते हो?

प्रश्न : बिना शर्त के प्यार के डर से कैसे उभरें?

श्री श्री रवि शंकर : ओह! ध्यान से| जब आप अपने अंदर गहरे जाते हो तो सभी तरह के डर ख़त्म हो जाते हैं|

प्रश्न : आपको शक्ति के एक क्षेत्र और बुद्धिमत्ता को पा कर कैसा लगता है?

श्री श्री रविशंकर : अच्छा! यह बहुत कठिन प्रश्न है| पता है, मैं जहाँ भी जाता हूँ मुझे लगता है मैं अपना शक्ति क्षेत्र साथ ले जाता हूँ|

प्रश्न : हम जो मन्त्र गाते हैं क्या आप हमें उनका अर्थ समझा सकते हो?

श्री श्री रविशंकर : मन्त्र केवल एक ध्वनि है, एक तरंग है| "ॐ नम: शिवाय" पांच तत्वों को संबोधित करता है :पृथ्वी,अग्नि,वायु, जल और व्योम ..जिनसे हम सब बने हैं|

प्रश्न : क्या आप हमें २०१२ में दुनिया में होने वाले बदलाव के बारे बता सकते हो?

श्री श्री रवि शंकर : अच्छा समय होगा| लोग और अधिक अध्यात्मिक हो जायेंगे,और अधिक दयालु,कम लालची, घृणा कम हो जायेगी,और अधिक समझदार हो जायेंगे| सब बहुत अच्छा होगा, सब वास्तव में बहुत अच्छा होगा|

प्रश्न : बर्लिन और अन्य जगहों पर आर्ट ऑफ़ लिविंग के सेंटर के बारे आप का क्या ख्याल है?

श्री श्री रवि शंकर : अच्छा है। आप सब साथ रहो और कहीं पर भी केन्द्र बनाओ| ज्यादा से जयादा लोग सेंटर में आयेंगे और उनका फायदा होगा| यही मैं चाहता हूँ कि सब खुश रहे| हमें ऐसे खुशीहाल सेंटर बनाने होंगे जहाँ लोग आएं और ख़ुशी से कूदते हुए बाहर जाएं| जहाँ पर जाकर वे अपना मानसिक तनाव,परेशानी और मन की संकीर्णता भूल सकें|

प्रश्न : लोगों के लिए एक दूसरे को समझना इतना मुश्किल क्यों होता है?

श्री श्री रवि शंकर : क्योंकि वे पहले अपने आपको ही नहीं समझते| आप अपने मन को तो समझते नहीं और दूसरों के मन को समझने की कोशिश करते हो| यह बहुत मुश्किल हो जाता है|

प्रश्न : क्या समलैंगिकता एक बीमारी है? क्या आप इसके बारे में कुछ बतायेंगे?

श्री श्री रविशंकर : सबसे पहले यदि आप सोचते हो यह एक बीमारी है तो आप पहले ही इसके विषय में मन बना चुके हो| यह सब मानसिक तौर पर शारीरिक झुकाव है| ये प्रवृतियाँ बदल सकती हैं। मैं कुछ लोगों से मिला हूँ जो ४०-५० वर्ष के बाद समलैंगिक बन गए और कुछ जो पहले समलैंगिक थे बाद में उनके परिवार और बच्चे हुए| दुनिया में सब तरह की प्रवृतियाँ हैं| हमे किसी के साथ इस प्रवृति की वजह से मतभेद नहीं रखना चाहिए| हमे सभी को उनके ध्येय की ओर बढ़ने में प्रेम से मदद करनी चाहिए, जो कोई भी ध्येय उन्होंने अपने लिए बनाया हो| शरीर की सभी जरूरतें बहुत कम हैं,छोटी हैं|
यदि आप शरीर की जरूरतों में ही अटक के रह जाओगे तो हम कुछ भूल रहे है। हमारे पास इससे भी कुछ विशाल है, कुछ जिसके लिए हमने जन्म लिया है| सभी की अध्यात्मिक जरूरत पूरी होनी चाहिए| दुर्भाग्य की बात है लोग छोटी छोटी जरूरतों में ही फसे रहते हैं| भोजन,मनोरंजन,भाईचारा ही उनकी मुख्य चिंता होती है और वे जीवन का उद्देश्य - सार्वर्भौमिक आत्मा के साथ जुड़ना भूल जातें हैं| हमारे जीवन का असली अर्थ है ब्रह्मांड के साथ जुड़ना है|


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