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दिव्यता को विविधता से प्रेम है


जुलाई ३०, २०११

प्रश्न : उपनिषद के इस श्लोक ‘‘तैल्यधारावत् अनुसन्धानम् नैरंतर्यध्यानं’’ की व्याख्या आपने यह की है कि तेल के प्रवाह के जैसे चेतना में धुंधली सी कल्पना रह जाती है| यह धुंधली कल्पना क्या है ? क्या यह जीवन में ज्ञान के सिद्धांत है या यह हमारे भीतर ऊर्जा का प्रवाह है ?
श्री श्री रवि शंकर: यह उर्जा का धुंधला प्रवाह है | जब आप सहज ध्यान करते है तो मंत्र तो है, परन्तु जो धुंधलीसी कल्पनाये होती है, यह वहीं है |

प्रश्न : जब मेरे बुरे कर्म दूसरों को दुःख देते है, फिर उस स्थिति को कैसे संभाला जाये ?
श्री श्री रवि शंकर: जब आपके  बुरे कर्म से दूसरों को दुःख हुआ है तो फिर यह संकल्प लीजिये कि आप उसे फिर से नहीं दोहराएंगे | अपने आप से कहे, मैने ऐसा कुछ किया है जिससे दूसरों को दुःख हुआ है, अब मैं इसे दोबारा नहीं करूंगा ’| इस संकल्प से आपको सहायता मिलेगी, आप दो तीन बार असफल हो सकते है परन्तु अपने संकल्प पर दृढ रहे |

प्रश्न: इस बात का ज्ञान होना कि मैं खाली और खोखला हूँ और दुःख होने के कारण जानने के उपरान्त भी मेरा मन वस्तुओं और लोगों में फँस जाता है? यह तूफ़ान के जैसे आकार निकल जाता है |विशेष रूप से लड़कियों के उम्र के इस पड़ाव पर ऐसा होता है, मैं क्या करू ?
श्री श्री रवि शंकर: मन वस्तुओं और लोगों में फँस जाता है, परन्तु अभी ध्यान कैसा हुआ?(उत्तर – गुरूजी बहुत अच्छा ) |क्या मन उन चीजों से मुक्त हुआ ?(उत्तर-हाँ)| फिर उसे निरंतर करते रहे | समय समय पर इस तरह की चीजे आती जाती रहती हैं | आप उनका पीछा न करे | यदि वे आती है तो उन्हें रहने दीजिये | हमारा नियम है क्या ? और उसका सिद्धांत है कि उसे रहने दीजिये |

प्रश्न: गुरूजी आप बहुत सारा ज्ञान प्रदान करते है, आपके बहुत सारे ज्ञान के सत्र होते है | कभी वे मुझे समझ में आ जाते है और कभी कभी वे मेरे सिर के ऊपर से निकल जाते है | गुरूजी मैं क्या करूं जिससे मेरी ज्ञान को सुनने और समझने की क्षमता बढ़ जाये ?
श्री श्री रवि शंकर: उसे सुनते रहे और फिर किसी दिन आप कहेंगे कि “अच्छा गुरूजी यह कह रहे थे” | इसके तीन चरण होते है, पहला- श्रवण –सुनना, दूसरा- मनन- उसके बारे में बार बार सोचते रहना, तीसरा- निधिध्यास- जब वह आपका अपना बन जाता है, जब वह ज्ञान आपका हिस्सा बन जाता है |

The Art of living
© The Art of Living Foundation

आप जितने अधिक वैरागी बन जाते हैं, उतनी ही अधिक संकल्प शक्ति आपको प्राप्त होती हैं |

२९ जुलाई २०११
प्रश्न : प्रिय गुरूजी, जब आप कहते हैं कि मैं शरीर से भिन्न हूँ तो यह बात मेरे समझ में आती है परन्तु जब आप कहते हैं कि मैं मन से भी भिन्न हूँ तो मैं यह समझ नहीं पता | मैं मन से कैसे भिन्न हूँ ?
श्री श्री रवि शंकर : अभी आप आपके विचार हैं या विचार आपके हैं ? मन का अर्थ है विचार | विचार आते जाते रहते हैं | कई विचार आते हैं और कई विचार चले जाते हैं | आप उनमे से कई से सहमत होते हैं और कई से असहमत होते है और जिन विचारों से आप सहमत होते हैं कुछ समय उपरांत आप उन्ही से असहमत हों जाते हैं | आप बैठ कर अपने सभी विचारों को लिखें | कुछ समय बाद आप पाएंगे, क्या मैं वही व्यक्ति हूँ जो यह सब सोच रहा था ? आप आश्चर्य करेंगे, ठीक है ? इस तरह से आप अपने विचारों से भिन्न हैं | विचार आपमें आते जाते रहते हैं | यह आकाश मैं बादल के सामान हैं | आकाश बादल नहीं हों सकता परन्तु जब आकाश पर बहुत सरे गहरे बादल छाये हों तो आपको लगता है बादल ही आकाश है | जब आपने खुले हुए आसमान का स्वाद ले लिया हो तो आपको लगता है कि आकाश बदल से परे है और यही साधना कि सुंदरता होती है | जब आप पहली बार सुदर्शन क्रिया करते हैं तो क्या होता है ? कुछ क्षण आपको ऐसा लगता है जैसे कुछ भी नहीं है | कुछ क्षणों में बादलों के माध्यम से आपमें सजगता आ जाती है | आप सोचते हैं कि बादल ही आकाश है परन्तु उन गहरे बादलों के मध्य में खाली स्थान बन जाये तो आपको उन गहरे बादलों के बीच में नीला आकाश स्पष्ट दिखने लगता है | क्या आपने यह अनुभव किया है ? अब आप कुछ पीछे मुड़कर देखें कि पहला कोर्स, पहला ध्यान या सुदर्शन क्रिया करने के पहले कैसे थे ? और अब आप क्या हैं ? आप में से ऐसे कितने व्यक्ति हैं जो अपने १० वर्ष पूर्व के व्यक्तित्व के साथ समानता नहीं पाते हैं ? (कई लोगों ने अपने हाथ उठाये) इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि आप सिर्फ विचार नहीं हैं | १० वर्ष पूर्व वाला व्यक्ति मन या विचारों का पुन्लिंदा ही तो था | परन्तु अब आपको मन के बाहर कि झलक मिल चुकी है जो कि मन नहीं है और आकाश तत्व है जो कि आप हैं | मन का विलीन होना ही ध्यान है | कभी कभी बादल और विचार आते हैं और चले जाते हैं और आप कुशलता पूर्वक उनके मध्य में केंद्रित रहें |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी, जब लोग ज्ञान के सूत्र और आपका नाम लेकर अपने झूठ को झिपाते हैं या अपना काम करवाते है, तो क्या किया जाये?
श्री श्री रवि शंकर: इसके लिये आप क्या कर सकते हैं | मैं या आप उन्हें सिखा तो नहीं सकते | आप उन पर सिर्फ दया कर सकते हैं | उनको उनकी करनी और कर्म का फल अवश्य मिलेगा | करुणा के साथ उन्हें समझायें ‘ आप ऐसा क्यों कर रहे हैं, ऐसा न करें | यदि आप की बात वे नहीं सुनते हैं तो आप क्या करेंगें ? आप क्रोधित नहीं हो सकते या भूख हड़ताल पर नहीं जा सकते ! आप क्या करेंगे ?उनके लिये प्रार्थना करे, उन्हें आशीर्वाद दीजिये, उन पर दया करे और उनसे दूरी बना लीजिये  और यदि आप में शक्ति हो तो उनका सामना करे | उनका सामना कैसे करे? इस के बारे में आप सोचें !!!

प्रश्न : पूजा का क्या महत्त्व हैं ? मूर्ती,प्रकृति और स्वयं की पूजा करना, क्या सब एक ही हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: हाँ ! मन को फूल के जैसा खिलने के लिये वातावरण का सृजन करना ही पूजा है |आपका दिल,मन और पूरी चेतना खिल जाती हैं | पूजा सिर्फ एक कृत्य हैं | इससे यह फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या कर रहे हैं |यह सब बाहरी रूप में हैं परन्तु सबसे मुख्य हैं आपके भीतर की भावनायें | इसलिये पूजा श्रेष्ठ होती हैं परन्तु मानस पूजा सर्वश्रेष्ठ होती है | मानस पूजा का तात्पर्य हैं पूजा को मन में करना |  मेरा दिल आपका सिंहासन हैं ; “रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैर्स्नानं च दिव्यांबरं,नानारत्नविभूषणं मृगमदामॊदाङ्कितं चन्दनम्” । इस पूरी मानस पूजा में सबकुछ आपका हैं, पूरा संसार भी आपका ही है | मेरा दिल और मन एक फूल हैं | और जब आप विश्राम करते हुये गहन विश्राम में चले जाते हैं; तो आपका मणिपुर चक्र बड़ा होकर खिल जाता हैं |मणिपुर चक्र को मध्य का मस्तिष्क भी कहते हैं और विज्ञानिकों ने पाया कि सामान्यताः मणिपुर चक्र करोंदे के जितना होता हैं और योगियों में यह मशरूम या बेर के जितना बड़ा हो जाता है |जो लोग नियमित रूप से योग और ध्यान करते हैं, उन्होंने पाया कि उनका मणिपुर चक्र बड़ा हो गया था | वह मूंगफली या करोंदे के छोटे आकार से बेर के जितना बड़ा हो जाता हैं | जब मध्य का मस्तिष्क या मणिपुर चक्र बड़ा हो जाता हैं तो  स्वायत्त तंत्रिका तंत्र (आटोनोमस नर्वस सिस्टम) पर अधिक नियंत्रण आ जाता है | योग करने  से ऐसा होता है | इसलिये वे इसे पद्मनाभ कहते हैं | पद्मनाभ का अर्थ क्या हैं? वह योग निद्रा में विश्राम कर रहे हैं | उनकी नाभि फूल के जैसे बन गयी हैं | पद्म का अर्थ हैं कमल या फूल | जब आपकी नाभि फूल के जैसे खिल जाती हैं तो फिर क्या होता हैं ? यदि आप योगी हैं और आप पद्मनाभ हैं तो आप अत्यंत सृजनात्मक बन जाते हैं |आपके भीतर से सृजनकर्ता बहार आ जाते हैं | यह इसका भी प्रतीक हैं कि आपके नाभि से एक कमल आया और सृष्टिकर्ता उस पर आकर बैठ गये |इसका एक गहन अर्थ भी हैं | जब आप योग निद्रा या ध्यान कर रहे होते हैं और जब आप चेतना के चौथी अवस्था के गहन में चले जाते हैं, तो आपकी नाभि कमल या फूल के जैसे बन जाती हैं | पेट में सारी नकारक भावनायें  संग्रहित होती हैं | इसलिये जब आप भय में होते तब आपके पेट में कुछ होता हैं |जब आप चिंता में होते तब आपके पेट में कुछ होता हैं | आपमें से कितनों यह अनुभव किया हैं? चाहे वह भय, चिंता, नकारात्मक भावनायें, लालच या ईर्ष्या हो तब पेट में कुछ होता हैं | हानि होने का भय और दुःख होने से पेट में कुछ होता हैं | वह सिकुड़ कर छोटा हो जाता हैं वह पद्मनाभ नहीं हैं | जब नाभि खिल जाती हैं तो उदारता, प्रेम और सृजनात्मकता जैसे गुण आने लगते हैं | पद्मनाभ वह हैं जो अत्यंत  सृजनात्मक हैं | इसलिये भीतर की पूजा समर्पण हैं | सबकुछ आपका हैं, मेरा मन,शरीर,विचार,भावनायें,पूरा वातावरण आपका हैं और सब कुछ एक ही हैं |आप कह रहे हैं ‘मैं नहीं हूँ,आप भी नहीं हैं, और सिर्फ एक ही चीज़ हैं और वह पूजा हैं | आरती का अर्थ हैं, मेरे जीवन का प्रकाश दिव्यता के पास जाये  और मैं सम्पूर्ण ज्ञान को स्वीकार करता हूँ | मैं इस ज्ञान और विवेक को अपने भीतर समां लेता हूँ |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी संकल्प शक्ति को कैसे बढ़ायें ? वासनाओं से कैसे मुक्ति पायें ?
श्री श्री रवि शंकर: मौन के माध्यम से | आप जितने अधिक वैरागी बन जाते हैं, उतनी ही अधिक संकल्प शक्ति आपको प्राप्त होती हैं |

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तर्क भावनाओं को सांत्वना नहीं दे सकता परन्तु वहां आपकी शांत उपस्थिति अंतर ला सकती है!!!


१९ मई २०११, बैंगलुरू आश्रम 

प्रश्न: गुरूजी जो कुछ भी याद रखने योग्य है, मैं उसे भूल जाता हूं और जो याद रखने योग्य नहीं है, उसे मेरी स्मृति याद करती रहती है, मन की यह कैसी विडम्बना है ?
श्री श्री रवि शंकर: कम से कम आपको यह समझ तो आ गया है | कई लोगों को यह समझ में नहीं आता | आप अपनी पीठ को थपथपाएं | आपने सही दिशी में पहला कदम रख लिया है | थोड़े प्रयासों से यह बदल जाएगा | जब आप अतीत की समीक्षा करते हैं तो आपको इसका यही निष्कर्ष निकालना चाहिए कि सब कुछ अच्छे के लिए ही हो रहा है, क्योंकि आप गलत बातों से कुछ सीखते हैं | परन्तु इसे आपको भविष्य के लिये लागू नहीं करना है | अतीत को देखते हुए यह जान कर कि जो कुछ होता है उसके लिये पीछे एक अच्छा कारण होता है, यह सोच रख कर आप भविष्य में आगे बढ़ें | परन्तु वर्तमान में यह कहना कि ‘जो कुछ होता है, वह अच्छे के लिये होता है’ यह ठीक नहीं है |

प्रश्न: जब किसी प्रियजन की मृत्यु हो जाती है तो उन्हें आप कैसे समझाते हैं ? उन्हें कैसे सांत्वना दें ?
श्री श्री रवि शंकर: आपको समझाने की आवश्यकता ही क्यों है ? जब आपको किसी को सांत्वना देनी हो तो आप सिर्फ शान्ति से वहां अपनी उपस्थिति दीजिये, वहां आपकी मौजूदगी ही पर्याप्त है | हर किसी को आप शब्दों से सांत्वना प्रदान नहीं कर सकते | हर कोई यहां कुछ समय के लिए आया है, फिर उसे एक दिन ऐसे ही जाना है | कोई भी तर्क भावनाओं को सांत्वना नहीं दे सकता | इसमें तर्क की कोई भूमिका नहीं हो सकती | भावनाओं को तर्कपूर्ण निष्कर्षो या समझ से शांत करना कोई ठीक बात नहीं है |
यह बात सही है कि मन में ऐसे विचार आते है कि ‘ऐसा क्यों हुआ ?’ ऐसे प्रश्नों का उत्तर कभी नहीं देना चाहिये | आप वहां पर शान्ति, प्रेम और करुणा के साथ रहे, फिर वातावरण अपने आप ही बदल जायेगा |

प्रश्न: जब किसी पौधे या पशु की प्रजाति लुप्त हो जाती है तो क्या उसका हम पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है ? क्या यह प्रजातियां किसी और अन्य गृह या समरूप गृह पर मौजूद होती हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: कुछ भी पूरी  तरह से लुप्त नहीं होता, वह सिर्फ ऐसा प्रतीत होता है और उसकी संख्या ऊपर या नीचे होती रहती है | किसी भी प्रजाति को पूर्ण रूप से लुप्त होने के लिए बहुत समय लगता है | इसलिए आप चिंता न करे, कई अन्य गृह है परन्तु हमें इस गृह का ध्यान रखते हुए यही आनंद लेना और रहना है और वही पर्याप्त है |

प्रश्न: क्या समलैंगिकता पाप है? क्या मानवो में ऐसे प्रवृतियों को साधना और आध्यात्मिक अभ्यासों से बदला जा सकता है ?
श्री श्री रवि शंकर: ऐसी प्रवृतियां आप में इसलिए आती है क्योंकि आप अपने माता और पिता दोनों से बने है, आप उन दोनों का संयोग है | हर किसी व्यक्ति  में पुरुष और स्त्री के जीन होते है | जब पुरुष के गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हावी होते है या जब स्त्री के गुणसूत्र (क्रोमोसोम) हावी होते है, तब इस तरह की प्रवृतियां आती जाती है | आपको अपने आप को इस तरह से कोई लेबल नहीं देना है, यह सब बदल जाएगा | इन प्रवृतियों के बदलने की पूरी संभावना है | आपको यह जान लेना है कि आप सिर्फ शरीर नहीं है | आप चमकती हुई उर्जावर्धक चेतना हैं | आप एक चमकता हुआ प्रकाश हैं और इसलिए अपने आप को उस उर्जा से और अधिक पहचानिये |

प्रश्न: मेरा आईना मुझे यह दिखाता हैं कि मैं बाहर से बड़ा हो रहा हूं, मेरी भीतर की आध्यात्मिक प्रगति को जानने के लिए मैं किस आईने का उपयोग करूं?
श्री श्री रवि शंकर: क्या आप शांत, तृप्त और संतुष्ट होना महसूस करते हैं ? क्या अपने आप में फैलाव का अनुभव करते हैं ? अतीत में जाकर देखें कि आप कैसे थे और अब आप कैसे हैं | अपने स्वयं के प्रतिबिंब को इस तरह से देखने पर आपको इसकी अनुभूति होती है |

प्रश्न: गुरूजी मैं बहुत जल्दी से कुछ बनकर अपनी पहचान बनाना चाहता हूं | इस बात से कुछ फर्क नहीं पड़ता कि मैं अपने मन को कितने बार यह कहूं कि मेरे हाथ में कुछ नहीं है और मुझे सब कुछ स्वीकार कर लेना चाहिये, इससे मुझे और निराशा ही होती है | कृपया मेरा मार्गदर्शन करें |
श्री श्री रवि शंकर: अपने आप को व्यस्त रखें | सिर्फ बैठ कर अपने बारे में न सोचें | अपनी स्वयं की छवि को बनाने की सोच आपकी प्रगति में बाधा बनाती है | आप खाली और खोखले हो जाएँ | और अधिक ध्यान करे |

प्रश्न: गुरूजी अपने आसपास के संकीर्ण मन या सोच रखने वाले लोगों से कैसे निपटा जाये ?
श्री श्री रवि शंकर: उनके प्रति उदार रहें | उनके लिए सिर्फ मुस्कुराएँ | उनके लिए जैसे को तैसा वाला रुख न अपनाएं | इससे कोई लाभ नहीं होता है | उन्हें सहजता के साथ शिक्षा प्रदान करें और यह सुनिश्चित कर लें कि  आप अपनी खुशी को उनके संकीर्ण मन या सोच के कारण नहीं खोयेंगे |

प्रश्न: पैसा, मन और ध्यान मेरे नियंत्रण में नहीं है ? पैसा आता नहीं है और मन ठहरता नहीं है इसलिए ध्यान भी नहीं लगता | मेरा क्या होगा गुरूजी ?
श्री श्री रवि शंकर: आप ध्यान नहीं कर सके, ठीक है | पहले यह समझें कि आपका ध्यान क्यों नहीं लगता | आपके स्वयं का जो भाग पैसे और मन में उलझा हुआ है, उसे सुलझा कर मुझ में उलझा दीजिए | फिर ध्यान भी लगेगा और मन खुश रहेगा और पैसा भी अपने आप आने लगेगा |

प्रश्न: क्या प्रत्यक्ष पाप न करना नेक कार्य करने के समान है और क्या आवश्यक नेक काम को न करना पाप के समान है ? क्या मैं अपने कृत्य और अकृत्य के लिए जिम्मेदार हूं ? यदि मैं कुछ नहीं करता तो मेरी भूमिका क्या होगी ?
श्री श्री रवि शंकर: कोई भी बिना कुछ करे रह ही नहीं सकता | और जब आप कुछ करते हैं तो उससे किसी को लाभ होगा और किसी को नुकसान होगा | कोई भी बिना कुछ करे १ पल भी नहीं रह सकता | आप किसी के बारे अच्छा या बुरा सोचने लगते हैं | इसलिए कुछ अच्छा  करते रहें परन्तु उसके कारण आप में अहंकार नहीं आना चाहिये | “मैने इतने अच्छे कार्य किये है” | ‘नेकी कर और कुंए में ड़ाल’ इसलिए ऐसा नहीं हो सकता कि आप कुछ नहीं कर रहे हैं, और जब आप कुछ करते हैं तो यह देखें कि वह कृत्य सबको उठा या विकसित कर रहा है |

प्रश्न: क्या किसी के कर्म किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित होते हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: निश्चित ही हां | जब आप अच्छा व्यापार करते हैं और जब आप उसे अपने बच्चों को दे देते हैं तो आपके कर्म उनके पास हस्तांतरित हो जाते हैं | उसी तरह जब आप कोई बड़ी गडबडी करते हैं तो आपके बच्चों या पालकों को भी उसे सहन करना पड़ता है | कर्म निश्चित ही कोई एकल कृत्य नहीं है और उसका प्रभाव आपके परिवार और आस पास के लोगों और राष्ट्र पर भी होता है | कर्म के भी विभिन्न स्तर होते हैं |The Art of living

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जब आप ध्यान करते है और आपका मन शांत हो जाता है, फिर वह शांत मन भगवान का निवास स्थान हो जाता है !!!


२२ मई, २०११, बैंगलुरू आश्रम 

प्रश्न:जय गुरुदेव, गुरूजी मैं इस संसार को मन, बुद्धि, स्मृति, अहंकार इत्यादि से जानता हूं , परन्तु इन ६ स्तरों को छोड़ने पर ही, मैं अपने वास्तविक स्वयं को जान सकता हूं | मेरा प्रश्न है,  कि इन ६ स्तरों  को छोड़ने के उपरांत हम अपने स्वयं के सांतवे स्तर में कैसे स्थापित हो सकते है ?
श्री श्री रवि शंकर:आपको इन ६ स्तरों को छोड़ना नहीं है; आपको शरीर, मन, बुद्धि को छोड़ना नहीं हैं | आपको इनके साथ रहकर स्वयं को समझना है |शरीर, मन, स्मृति, बुद्धि और अहंकार हैं और उन्हें वहां रहने दीजिये |प्रतिदिन काम से पहले  और काम के बाद कुछ समय  के लिये ध्यान करें और उसमें विश्राम का अनुभव करें | जब आप ध्यान करते है और आपका मन शांत हो जाता है, फिर वह शांत मन भगवान का निवास स्थान हो जाता है | ऐसे आप भगवान को नहीं जान सकते पर भगवान के साथ एक हो सकते है | जब आप शांति और खुशी का अनुभव करते है और गहन ध्यान में चले जाते है तो फिर आपको अनुभव होने लगता है कि ‘ मैं ही  सबकुछ हूं, और सिर्फ मैं ही हूं’ |

प्रश्न: जय गुरुदेव , गुरुदेव मैने कई आपकी, सत्य साईं बाबा और ओशो की पुस्तके पढ़ी है मुझे उनमे कोई भिन्नता नहीं लगी, वे सभी प्रेम की बात करते है और मुझे लगता है कि वे सिर्फ भिन्न भौतिक अभिव्यक्तियां है |मैं ओशो और उनके जोरबा बुद्ध के सिद्धांत से काफी प्रभावित हुई हूं | मैं इस पर आपकी राय जानना चाहती हूं |सांसारिक तत्व  और आध्यात्म को साथ में रखकर उनके द्वारा की गई चर्चा मुझे बहुत पसंद है, आप इस पर क्या सोचते है, मैं उसे सुनना चाहती हूं |
श्री श्री रवि शंकर: हां, वे एक महान वक्ता थे और काफी अच्छा बोलते थे | उनका  गहन बुद्धिजीवी दृष्टिकोण था और वह बहुत अच्छा हैं, लेकिन वहां मंत्रो का ज्ञान और मंत्रो की संस्कृति मौजूद नहीं थी | गौतम बुद्ध ने कहा कुछ नहीं है और  सबकुछ कुछ नहीं है और उन्होंने कहा  मैने परम सत्य की खोज की,मैंने आत्मा की खोज की परन्तु मैने पाया कि कोई स्वयं या आत्मा नहीं है | मैने फिर और खोज की और अंत में पाया कि कोई आत्मा नहीं है |
सनातन धर्म में आदि शंकराचार्य ने कहा , किसने खोज करी? किसे कुछ नहीं मिला ? वही आत्मा है |यह सिक्के के दो पहलु के जैसे है | वे खालीपन के बारे में बात करते है और दूसरी ओर वेदांत सम्पूर्णता के बारे में बात करता है | कोई से कोई नहीं पहला कदम है और गौतम बुद्ध वहां रुक जाते है और वेदांत आपको कोई नहीं से सबकुछ की ओर ले जाता है |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी ऐसा कहा जाता है कि आत्मा का पुनर्जन्म के द्वारा पुनर्नवीनीकरण होता है,और इस गृह की जनसंख्या में निरंतर बढोत्तरी हो रही है, क्या दुसरे गृह के लोग पृथ्वी में जन्म लेकर हमारे साथ जुड रहे है या अन्य जीव मानव रूप में जन्म ले रहे है ?
श्री श्री रवि शंकर: अन्य जीव! दोनों संभव है, दोनों बाते हो रही है |

प्रश्न: गुरूजी, डॉ स्टीफेन हाकिंग  का हमारे वर्तमान मानव जीवन पर दृढ़ विश्वास है , वे कहते है कि इस जीवन और आस्तित्व के परे कुछ भी नहीं है | मुझे नहीं पता कि उन्होंने धर्म के बारे में कितना अध्ययन किया है परन्तु मुझे पता है कि आपने भौतिक शास्त्र पढ़ा है, इस पर आप उनको क्या उत्तर देंगे ?
श्री श्री रवि शंकर: कोई भी विज्ञानिक ऐसा नहीं कहेगा कि ‘ उसे सब पता है और जो कुछ यहां पर है वहीं सबकुछ है और उससे परे कुछ भी नहीं है’| डॉ स्टीफेन हाकिंग  ने यह नहीं कहा कि जो भी यहां है वही अंतिम है |उन्होंने कहां कई स्तर और पहलु हैं | हमारा मस्तिष्क आवृत्ति विश्लेषक होता है और वह कुछ ही आवृतियों का विश्लेषण कर सकता है| अभी यहां पर कितनी अलग अलग आवृतियां है | कोई भी विज्ञानिक आस्तित्व के विभिन्न स्तर और कई और दुनियां की बात को नहीं नकारेगा, क्योंकि बहुत सारी लहरें या तरंगे यहां पर हैं ! आप जिसे देखते है वह तरंगों का कृत्य है जिसमें असीमित तरंगे होती है, एक के भीतर  एक और उनके भीतर अनेक | सूक्ष्म जीव से ब्रह्माण्ड तक कई दुनियां है और समय के कई स्तर है |

प्रश्न:जय गुरुदेव, रामकृष्ण परमहंस  एक महान साधक थे, उन्होंने जीवन भर साधना की, फिर भी अंत में उन्हें क्यों अत्यंत पीड़ा सहन करनी पड़ी ?
श्री श्री रवि शंकर: कई बार गुरु शिष्यों के कर्म अपने पर ले लेते हैं | शिष्यों के कर्मो के कारण उन्हें शारीरिक पीड़ा सहन करनी पड़ी | यह कोई जरूरी नहीं है कि हर किसी को उस पीड़ा से गुजरना पड़ता है, लेकिन कुछ गुरु उसे भी चुनते है|

प्रश्न: कई बार मैं अपने काम के कारण थक जाता हूं, और फिर मैं अपने आप पर से आत्म नियंत्रण खो देता हूं| मैं स्वयं पर कैसे नियंत्रण पा सकता हूं क्योंकि इसका परिणाम मेरे लिए हानिकारक है?
श्री श्री रवि शंकर: जब आप थक जाते है तो बैठ कर ध्यान करे | प्राणायाम और ध्यान करे, इससे आपकी थकावट दूर हो जायेगी |

प्रश्न: गुरूजी मैंने देखा हैं जब भी कोई आपके फोटो पर माला  पहनाता है तो वह गिर जाती है, ऐसा क्यों है?
श्री श्री रवि शंकर: माला पहनाने की कोई आवश्यकता नहीं है, मैं उसे आप को वापस कर देता हूं |

प्रश्न: गुरूजी, ऐसा कहां जाता है कि मृत्यु के समय मन में जो अंतिम विचार या स्मृति होती है,उसी पर अगला जन्म निर्भर होता है | मरे मन में इस भौतिक संसार का बहुत प्रभाव है, मैं ऐसा क्या करू कि अंतिम समय में,  आपको ही याद करू ?
श्री श्री रवि शंकर: आपको अपने जीवन के अंतिम क्षण तक रूकने की जरूरत नहीं है| प्रत्येक क्षण को खुशी और आनंद के साथ जियें और सेवा, साधना और सत्संग को करे |

प्रश्न: आदरणीय गुरूजी मैं अपने देश की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत चिंतित हूं जो अंतर्राष्ट्रीय कच्चे तेल के कारण प्रभावित है, जापान का उदाहरण  देखें तो परमाणु उर्जा भी बहुत घातक है| हमारा देश ऐसी परिस्थिति में कैसे आगे बढ़ सकता है ?
श्री श्री रवि शंकर: इसके लिए आम जनता में जागरूकता लानी होगी | हर किसी को पर्यावरण, लोगों के लिए और पूरे देश के लिये सोचना होगा | जब हर किसी को इसके लिये चिंता होगी तो निश्चित ही बदलाव आएगा |

प्रश्न: जय गुरुदेव, क्या भगवान होता है, उस पर कैसे विश्वास किया जाए ?
श्री श्री रवि शंकर: आपने सड़कों पर गाड़ियों को चलते हुये देखा है? उसके भीतर बैठकर उसे कोई चलता हैं या वह अपने आप ही चलती हैं | उसका एक वाहन चालक होता हैं, लेकिन गाड़ी के चलते समय हर समय आपको चालक दिखाई नहीं देता | ठीक हैं !

प्रश्न : गुरुजी हर कोई मोक्ष के लिए भाग रहा है मुझे भी बताएं मोक्ष क्या है ?.
श्री श्री रवि शंकर: क्या आप भी मोक्ष के लिए भाग रहे है ? यदि आप उसके लिए नहीं भाग रहे है तो क्या समस्या है जो लोग मोक्ष के लिए भाग  रहे है, मैं उन्हें बताऊंगा, आप उसकी चिंता मत करो |

प्रश्न : गुरुजी मेरे पास ३० एकड़ कृषि भूमि है जिसमें अंतिम छोर की तरफ भगवान गुरुदेव दत्तात्रेय  और साईं बाबा का एक छोटा सा मंदिर है, पश्चिम दिशा की भूमि का फैलाव उत्तर से दक्षिण की ओर है और पूर्व से पश्चिम की ओर एक ढलान है |मेरे वास्तु विशेषज्ञ कहते है कि ऐसी भूमि का होना बहुत खतरनाक  है और वे मुझे सलाह देते है कि मैं उसे बेच दूं | गुरुजी मुझे क्या करना चाहिए ?
श्री श्री रवि शंकर: ऐसी भूमि का आस्तित्व इस  गृह पर है हर भूमि  में  कुछ सकारात्मक होता है और कुछ ऐसा भी है जो इतना सकारक नहीं है फिर भी कोई बात नहीं | आप ॐ नमः शिवाय या गुरु ॐ का जप करें और फिर सारे नकारात्मक प्रभाव गायब हो जायेंगे |

प्रश्न : प्रिय गुरुजी मेरे  पति मुझसे बहुत उंची आवाज में बात करते  है और मुझ पर चिल्लाते है जब कि मैं उनसे समान्य स्वर में बात करती हूं| वे  दूसरों से  अच्छे से बात करते है , मुझे क्या करना चाहिए ?.
श्री श्री रवि शंकर: इसका अर्थ वे आप से सबसे अधिक प्रेम करते है उन्होंने यहीं पर आपमे और दूसरों में अंतर बना दिया है | अब तक आप ने संभाला है और आप को संभालना आता है इसीलिए आप उन्हें संभालें | उनसे बहुत अच्छे शब्द बोलने की उम्मीद न करें और कम से कम आप अच्छे शब्द बोलें और उन्हें कठोर ही रहने दें | इसे एक तरफा होने में भी कोई बात नहीं , फिर इससे  सामंजस्यता निर्मित होती है|

प्रश्न : गुरुजी ज्ञान का पथ बहुत कठिन है;क्या भक्ति के द्वारा ज्ञान प्राप्त हो सकता है ?
श्री श्री रवि शंकर: निश्चित ही हां |

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैं पूरी दुनिया से अपनी तुलना करना कैसे छोडू ?.
श्री श्री रवि शंकर: क्या आप के पास इतना समय है कि आप अपनी तुलना पूरी दुनिया से कर सकते है | मेरे पास इतना समय नहीं है | यदि आप के पास इतना समय है तो आप कुछ सृजनात्मक कार्य करें | अपनी दुनिया से तुलना करने का अर्थ  समय की बर्बादी है |

प्रश्न : गुरुजी हमारे धर्मं ग्रंथों में चार बातें जैसे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष करने की बात कही जाती है और काम, क्रोध, मोह और अहंकार को त्यागने की बात कही जाती है| ऐसा क्यों है कि काम को दोनों में ही स्थान मिला है ?.
श्री श्री रवि शंकर: किसी भी बात को अधिक करना बुरा होता है और उसका  सही मात्रा उपयोग ठीक होता है| जैसे भोजन में नमक की मात्रा होती है वैसे ही पर्याप्त मात्रा में नमक ठीक होता है और अधिक  मात्रा में उपयोग ठीक नहीं है |

प्रश्न :ज्योतिषशास्त्र में  ज्योतिष अंगूठी में रत्न धारण करने की सलाह देते है , क्या आप भी ऐसी सलाह देते है | यदि कोई आध्यात्म के पथ पर है तो क्या उसे रत्न धारण करने की आवश्यकता है ?.
श्री श्री रवि शंकर: नहीं आपको इन्हें धारण करने की आवश्यकता नहीं है | यह सही है कि हर चीज़ का कुछ प्रभाव होता है परन्तु आप एक पत्थर के टुकड़े (रत्न) से अधिक  शक्तिशाली है | यदि आप रत्न को पसंद करते है तो उसे धारण कर सकते है अन्यथा ॐ नमः शिवाय मन्त्र का जप  करें | यह एक अत्यंत शक्तिशाली मन्त्र है जो इस गृह के सभी बुरे प्रभाव का निचोड़ है |

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"जीवन का क्या महत्व क्या है"

आज श्री श्री ने क्या कहा..

२६ अगस्त २०१०


प्रश्न : एक प्रश्न मैं अपने आप से बहुत समय से करता आया हूं, पर समझ नहीं पा रहा हूं कि उसे किन शब्दों में कहूं। ये अजीब लग सकता है, पर जब मैं पूरे ब्रह्माण्ड को आपस में जुड़ा हुआ पाता हूं, तो सोचता हूं कि इस में मनुष्य का क्या कोई उपयोगी महत्व है, और क्या हम जब तक यहां हैं, क्या हमारे अस्तित्व से दूसरों को कोई लाभ है भी?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत अच्छा प्रश्न है! जीवन का क्या महत्व क्या है और हम यहां किसलिये हैं? तुम्हें खुद को शाबासी देनी चाहिये। अगर ये प्रश्न तुम्हारे जीवन में आया है, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी बुद्धि प्रौढ़ है। यहां लाखों लोग बिना ये प्रश्न पूछे कि, ‘जीवन का ध्येय क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?’ अपना पूरा जीवन बिता देते हैं। वे बस भोजन करते हैं, पीते हैं, टेलिविज़न देखते हैं, प्रेम या लड़ाई करते है और मर जाते हैं। उन्हें इस बारे में ज़रा भी ख़्याल नहीं आता। वे एक मिनट भी रुक कर ये नहीं सोचते कि, ‘जीवन क्या है? मैं कौन हूं? मुझे क्या चाहिये? मैं क्या कर सकता हूं? मैं कैसे उपयोगी हो सकता हूं?’ इन में से कोई भी प्रश्न उनके मन में नहीं आते। अगर ये प्रश्न तुम्हारे भीतर आया है तो इसका अर्थ है कि तुमने जीवन जीना शुरु कर दिया है। तुम्हारी जीवन यात्रा सही रास्ते पर जा रही है। इस यात्रा को आध्यात्म कहते हैं – ये जानना कि, ‘इस जीवन का ध्येय क्या है। मुझे क्या चाहिये? जीवन क्या है? मैं कौन हूं?’ इससे पहले कि तुम अपने आप से ये प्रश्न करो कि, ‘मुझे क्या चाहिये?’ तुम्हें ये जानना चाहिये कि तुम कौन हो। जीवन क्या है? इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण भाग हैं – एक विज्ञान है और एक आध्यात्म है। विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’

‘मैं’ और ‘ये’। ‘ये’ की समझ तुम्हें विज्ञान से आती है। ‘मैं’ की समझ तुम्हें आध्यात्म से आती है। ये ‘मैं’ क्या है? ‘मैं’ को जानने के लिये पहले ‘ये’ को जानो। ‘ये क्या है?’ ‘ओह! ये संसार है।’ ‘ये शरीर है।’ और, ‘ये शरीर कैसे आया?’ ‘ये शरीर एक ४-५ किलो के बच्चे के रूप में आया। फिर उस बच्चे ने इस धरती से ही सब सामग्री ली और अब ५० किलो का हो गया है।
तो, इस शरीर में क्या है? ये शरीर कैसे बना है?

प्रश्न: आपने शरीर के बारे में बताया है। मैं शरीर और पंचतत्वों के संबंध को जानना चाहता हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष – ये पंचतत्व हैं। अगर इन में से एक भी तत्व ना हो तो ये श्रीर टिक नहीं पायेगा। है ना? पृथ्वी तत्व से भोजन मिलता है। जल तत्व तो आप जानते ही हैं। फिर, अग्नि तत्व की, गर्मी की आवश्यकता होती है। गर्मी के बिना ये शरीर जी नहीं सकता। फिर वायु तत्व आया। शरीर के लिये वायु और अंतरिक्ष तत्व के बिना रहना भी संभव नहीं है।

इस शरीर का अस्तित्व पंचतत्वों से है। और फिर इस शरीर का क्या होता है? ये शरीर पंचतत्व से आया है और उन्हीं को वापस चला जायेगा। ये विज्ञान है। एक मृत शरीर में भे पंचतत्व विद्यमान होते हैं। तो फिर, एक मृत और जीवित शरीर में क्या अंतर है? जीवित शरीर में जीवन होता है। और, जीवन क्या है?

जब ये प्रश्न आया, तब तुम देखते हो, ‘ओह! प्राण – जीवन शक्ति!’ और फिर तुम प्राण के गहन अध्धयन में जाते हो, और प्राण से अधिक कुछ पाते हो। ‘ये क्या है? ये मन है। ओह! तो ये मन क्या है? मन कितने प्रकार का होता है? मन क्या क्या करता है?’ इस जिज्ञासा से तुम आर्ट आफ़ लिविंग में आ जाते हो।

प्रश्न : अस्तित्व के इतने स्तरों के बारे में आपने बताया है, कृपया इन पर कुछ और विस्तार कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार, मन के चार कार्य हैं। या, मन के ये चार पहलू हैं।

तो, मन क्या है? क्या तुम सुन रहे हो? अगर तुम्हारी आंखें खुली हैं, और कान तो खुले हैं ही...तुम्हारे कान में आवाज़ जाती है पर यदि तुम्हारा मन कहीं और है, तो क्या तुम मेरी बात सुन सकोगे? नहीं। है कि नहीं? तो, इस मन से ही तुम महसूस करते हो। ठीक है ना? जो पांचों इन्द्रियों के ज़रिये बाहर जाता है और अनुभव करता है, वो मन है।

अच्छा, अगर तुम मन से अनुभव कर रहे हो तो बुद्धि क्या है? जब तुम अनुभव करते हो, तो कहते हो, ‘ओह! ये अच्छा है। ये अच्छा नहीं है। मुझे ये चाहिये। मुझे वो नहीं चाहिये।’ तुम्हारी बुद्धि तय करती है। ये विवेक शक्ति है। मैं बोल रहा हूं और तुम्हारा मन कह रहा है, ‘ये बात मुझे पसंद नहीं है।’ या, ‘मैं ये बात मानता हूं।’ या, ‘मैं ये बात नहीं मानता।’ तुम अपने भीतर एक वार्तालाप कर रहे हो। ये बुद्धि है।

और फिर, स्मृति वो है जो जानकारियों को संभाल कर रखती है। तो, कभी कभी कोई अनुभव करते हुये तुम्हें लगता है, ‘ओह! मैंने ऐसा अनुभव पहले किया है।’ अगर तुम एक सेब की मिठाई का मज़ा पहले ले चुके हो तो तुम कह उठते हो, ‘ओह! मैं पहले भी इसका मज़ा ले चुका हूं। मैंने ये सेब की मिठाई पहले भी खाई है।’ तो स्मृति का काम है अनुभव को पहचानना और उसे स्मृति में संजो कर रखना।

फिर आया अहंकार। अहंकार है – ‘मैं कुछ हूं। मैं बुद्धिमान हूं। मैं मूर्ख हूं। मुझे ये पसंद है। मुझे वो पसंद नहीं है। मैं अमीर हूं। मैं बहुत ग़रीब हूं। मैं बदसूरत हूं। या, मैं सुंदर हूं। मैं कुछ हूं। मैं हूं,’ ये अहंकार है।
जब तुम अहंकार को जान गये, तो कहोगे कि क्या बस इतना ही है? नहीं! अहंकार को जानने के बाद भी कुछ जानना बाकी है। वो क्या है? वो आत्मा है।

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"मन आखिर है क्या?"

प्रश्न : आर्ट आफ़ लिविंग के एक शिक्षक ने कहा था कि, ‘ईशवर, उत्तम है। ईश्वर ने हमें बनाया है, इसलिये हम भी उत्तम हैं।’ यहाँ तक तो बात ठीक लगती है। पर जब हम उत्तम हैं, तो क्या एक इन्जीनियर का काम भी उत्तम नहीं होना चाहिये? पर ऐसा तो नहीं होता।

श्री श्री रवि शंकर : प्रश्न उत्तम है, और उत्तर और भी उत्तम है। सृष्टि में हरेक चीज़ उत्तमता के एक स्तर से दूसरे स्तर पर अग्रसर हो रही है। दूध उत्तम है, और जब वह दही बन जाता है, दही भी उत्तम है। आप दही से क्रीम निकाल सकते हैं, और वह भी उत्तम है। फिर आप मक्खन बनाते हैं और वह भी उत्तम है। ये एक दृष्टि हुई। दूसरी दृष्टि से देखें तो, दूध खराब हो गया तो आप ने उस से पनीर बनाया। जब दही खराब हो गया तो आप ने उस में से मक्खन निकाला। ये देखने का दूसरा तरीका हुआ। आप की दृष्टि पर निर्भर है कि आप कैसे देखें। अनुत्तमता से ही उत्तमता को महत्व मिलता है। है कि नहीं? आप किसी चीज़ को उत्तम कैसे कह सकते हैं?
किसी भी वस्तु को दोष रहित तभी समझ सकते हैं, जब कहीं पर दोष देख चुके हैं। इसलिये दोषयुक्त वस्तु का होना भी आवश्यक है, किसी दोषहीन उत्तम चीज़ को समझने के लिये। तो, दोष ही उत्तम को उत्तम बनाते हैं!

प्रश्न : मैं सोच रहा हूँ कि ये मन आखिर है क्या? क्या यह हमारे दिमाग में किसी एक जगह में है या यह पूरे जगत में व्याप्त है? हाँ, मैं यह भी कहना चाहता हूँ आप सर्वोत्तम हैं!

श्री श्री रवि शंकर : मन, ऊर्जा का स्वरूप है जो कि पूरे शरीर में व्याप्त है। हमारे शरीर के हर कोष से ऊर्जा प्रसारित होती है। आपके आस पास, पूरी ऊर्जा को सम्मिलित रूप से मन कहते हैं। मन, दिमाग के किसी एक भाग में नहीं स्थित है, अपितु शरीर में सभी जगह व्याप्त है।

चेतना विषयक ज्ञान बहुत गहरा है। हमें कभी कभी इस गहराई में जाना चाहिये। जितना गहराई में जायेंगे, उतना ही इसे समझ सकेंगे। जितना समझोगे, उतने ही चकित होते जाओगे! वाह!

तुम्हें पता लोगों का एक भूतिया हाथ होता है, जिसका अर्थ है कि सच में उनका हाथ नहीं है, पर उन्हें फिर भी उस हाथ में संवेदना होती है, पीड़ा और खुजली होती है! जो लोग अपना हाथ या पैर किसी दुर्घाटना वश खो देते हैं, उन्हें बाद में कभी कभी उस खोये हुये हाथ या पैर के अस्तित्व का अभास होता है। हालांकि वो सचमुच नहीं होता है। इस से ये साबित होता है कि मन, शरीर के किसी एक भाग में स्थित ना होकर, पूरे शरीर के इर्द गिर्द रहता है। शरीर का आभा-मण्डल ही मन है। हम सोचते हैं कि मन, शरीर के भीतर है, पर सत्य इसका उल्टा है - शरीर, मन के भीतर है। शरीर एक मोम्बत्ती की बाती की तरह है, और मन इसकी ज्योति है।

प्रश्न : गुरुजी, हम सब यहाँ मौन की गहराई की अनुभूति को समझने आये हैं। मुझे यहाँ बहुत अच्छा भी लग रहा है और मैं एकान्त व मौन में रहना पसंद करने लगा हूँ। पर जब मैं वापस ऑफ़िस या अन्य सामाजिक जगह पर जाऊँगा तो क्या बहुत मौन रखना वहाँ ठीक होगा?

श्री श्री रवि शंकर : संतुलन! जीवन में संतुलन रखो। किसी भी चीज में अति करना ठीक नहीं है। बहुत बोलना भी ठीक नहीं और बहुत मौन भी ठीक नहीं है तुम्हारे लिये इस वक्त।

प्रश्न : हम जानते हैं कि जीवन में भाग्य महत्व रखता है। जीवन में सफलता और असफलता भाग्य से ही संबंधित हैं तो फिर हमारा कार्य भार क्या रह जाता है जीवन में?

श्री श्री रवि शंकर : तुम अपना भाग्य खुद बनाते हो। तुमने कल जो किया वह आने वाले कल का भविष्य होगा और तुम आज जो करोगे वह आने वाले कल के बाद के दिनों का भाग्य बनेगा।

प्रश्न : प्राचीन भारत का इतिहास भरा पड़ा है सिद्ध ज्ञानियों और योगियों की गाथाओं से जिनमें थीं अद्‍भुत अलौकिक शक्तियाँ और सजगता। पर इन कहानियों को कैसे समझा जाये- केवल पौराणिक कहानियों के रूप में या फिर कोई संकेत है कि हम सभी में इस दैवी शक्ति के छुपे होने की सम्भावना है?

श्री श्री रवि शंकर : क्या आप को सबसे पहले उड़ने वाले हवाई जहाज़ के बारे में पता है? सबसे पहले हवाई जहाज़ किसने उड़ाया था? (जवाब आया - राइट ब्रदर्स) यही हम सब किताबों में भी पढ़ते आ रहे हैं, पर यह गलत है। राइट ब्रदर्स से ५० साल पहले, बंगलोर के सुब्रय शास्त्री ने यह कार्य किया था।

वे ध्यान और मौन के बाद एक योगी से मिले थे जिनकी सहायता से और गहरे ध्यान में जाने के बाद उन्हें विमान बनाने का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होनें विमान बनाये। उसने ‘वैमानिक शास्त्र’ नामक पुस्तक भी लिखी थी और १८०० में एक पारसी व्यक्ति के साथ मिलकर पहला विमान उड़ाया था। पारसी लोग, ईरान से आकर भारत में बसने वाले लोग हैं जो जोरोस्ट्रियन धर्म को मानते हैं। उस पारसी व्यक्ति से मिली आर्थिक सहायता से वह पहला प्लेन बना था जिसमें उन दोनों ने उड़ान भरी थी चौपाटी पर मुम्बई (बॉम्बे) के समुद्र किनारे पर। यह खबर लंदन टाइम्स अखबार में भी छपी थी। परंतु अंग्रेजी हुकूमत के अंतर्गत दोनों को जेल में डाल दिया गया था, और विमान के सब नक्शे भी जब्त कर लिये गये थे। अभी हाल ही में टेलीविजन पर यह खबर दिखायी गयी थी लंदन के अखबार की छवि सहित, जिसमें विमान बनाने के नक्शे के साथ यह खबर छपी थी।

भारद्वाज वैमानिक शास्त्र’ विमान विज्ञान, जो कि ॠषि भारद्वाज द्वारा लिखा गया था उसमें पाँच अलग अलग तरह से विमान बनाने के तरीके आज भी मौजूद हैं। ऋषि भारद्वाज ने अलग अलग विमनों की इंजिन रचना बताई है - सीधा उड़ने वाले विमान हेलीकॉप्टर जैसे और अन्य विमान जो हवाई पट्टी पर दौड़ने के बाद उड़ान भरते हैं उन के लिये भी।

इसके बारे में आपको अधिक जानकारी www.bharathgyan.com वेबसाइट से मिल जायेगी।


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"प्रकृति के साथ हमारा संबंध"

सत्य की खोज में आमतौर पर विज्ञान और आध्यात्म को एक दूसरे से भिन्न माना जाता है। दोनो का ही आधार स्तंभ है जिज्ञासा। आधुनिक विज्ञान वस्तुनिष्ठ विश्लेषण का तरीका अपनाता है, और आध्यात्म आत्मपरक विश्लेषण करता है। 'ये क्या है? जगत में ये क्या है?' इन प्रश्नों के साथ विज्ञान बाहरी जगत को जानने में रत रहता है। जबकि आध्यात्म की शुरुवात होती 'मैं कौन हूं?' प्रश्न से।

प्राचीन समय के जगत में इन दोनों प्रकार के ज्ञान में कोई संघर्ष नहीं था। मनुष्य का स्वयं के बारे में ज्ञान और ब्रह्माण्ड के बारे में ज्ञान, एक दूसरे के पूरक थे, और ये ज्ञान मनुष्य का सृष्टि के साथ एक सुदृढ़ और स्वस्थ संबंध बनाने का आधार था। इन दो प्रकार के ज्ञान को अलग मानने की वजह से आज विश्व के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

प्राचीन ज्ञान के मुताबिक मनुष्य के अनुभव में ५ परतें आती हैं, जो कि हैं – पर्यावरण, शरीर, मन, अंतर्ज्ञान और आत्मा।

पर्यावरण के साथ हमारा संबंध हमारे अनुभव की सर्वप्रथम और सब से महत्वपूर्ण परत है। अगर हमारा पर्यावरण स्वच्छ और सकरात्मक है तो हमारे अनुभव की बाकी सभी परतों पर इसका सकरात्मक प्रभाव पड़ता है, और वे संतुलित हो जाती हैं और हम अपने और अपने जीवन में आये व्यक्तियों के साथ अधिक शांति और जुड़ाव महसूस करते हैं।

मनुष्य की मानसिकता के साथ पर्यावरण का एक नज़दीकी रिश्ता है। प्राचीन समय की सभ्यताओं में प्रकृति को सम्मान के भाव से देखा गया है - पहाड़, नदियां, वृक्ष, सूर्य, चँद्र...। जब हम प्रकृति और अपनी आत्मा के साथ अपने संबंध से दूर जाने लगते हैं, तब हम पर्यावरण को प्रदूषित करने लगते हैं और पर्यावरण का नाश करने लगते हैं। हमे उस प्राचीन व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा जिससे की प्रकृति के साथ हमारा संबध सुदृढ़ बनता है।

आज के जगत में ऐसे कई व्यक्ति हैं जो कि लालचवश, जल्द मुनाफ़ा और जल्द नतीजे प्राप्त करना चाहते हैं। उनके कृत्य जगत के पर्यावरण को नुक्सान पँहुचाते हैं। केवल बाहरी पर्यावरण ही नहीं, वे सूक्ष्म रूप से अपने भीतर और अपने आस पास के लोगों में नकरात्मक भावनाओं का प्रदूषण भी फैलाते हैं। ये नकरात्मक भावनायें फैलते फैलते जगत में हिंसा और दुख का कारण बनती हैं।

अधिकतर युद्ध और संघर्ष इन्हीं भावनाओं से ही शुरु होते हैं। जिसके परिणाम में पर्यावरण को नुक्सान होता है, और उसे स्वस्थ करने में बहुत समय लगता है। हमें मनुष्य के मानसिकता पर ध्यान देने की आवश्यकता है। यह मानसिकता ही प्रदूषण की जड़ है - स्थूल तथा भावनात्मक। अगर हमारे भीतर करुणा और परवाह जग जाते हैं, तो वे आधार बनते हैं एक गहरे संबंध का जिस में कि हम पर्यावरण की और व्यक्तियों की देखभाल करते हैं।

प्राचीन समय में अगर एक व्यक्ति एक वृक्ष काटता था तो साथ ही ५ नये वृक्ष लगाता था। प्राचीन समय में लोग पवित्र नदियों में कपड़े नहीं धोते थे। केवल शरीर के अग्नि-संस्कार के बाद बची हुई राख को नदी में बहाते थे ताकि सब कुछ प्रकृति में वापिस लय हो जाये। हमें प्रकृति और पर्यावरण को सम्मान और सुरक्षा के भाव से देखने वाली प्राचीन प्रणालियों को पुनर्जीवित करना होगा।

प्रकृति के पास संतुलन बनाये रखने के अपने तरीके हैं। प्रकृति को ध्यान से देखो तो तुम पाओगे कि जो पंचतत्व इसका आधार हैं, उनका मूल स्वभाव एक दूसरे के विरोधात्मक है। जल अग्नि का नाश करता है। अग्नि वायु का नाश करती है...। और प्रकृति में कई प्रजातियां हैं - पक्षी, सरीसृप, स्तनधारी...। भिन्न प्रजातियां एक दूसरे से वैर रखती हैं, फिर भी प्रकृति एक संतुलन बना कर रखती है। प्रकृति से हमे ये सीखने की आवश्यकता है कि अपने भीतर, अपने परिवेश में और जगत में विरोधी शक्तियों का संतुलन कैसे बनाये रखें।

सबसे अधिक आवश्यक है कि हमारा मन तनाव मुक्त हो और हम इस खुले मन से जगत का अनुभव कर सकें। ऐसी मनस्थिति से हम इस सुंदर पृथ्वी का संरक्षण करने के उपाय बना सकेंगे। आध्यात्म से हमे अपने असल स्वभाव का अनुभव होता है और खुद से और अपने परिवेश से एक जुड़ाव का एहसास होता है। अपने असल स्वभाव के साथ परिचय होने पर नकारात्मक भावनायें मिट जाती हैं, चेतना ऊर्ध्वगामी होती है और पूरी पृथ्वी की देखभाल के लिये एक दृढ़ संकल्प उपजता है।

हमारी चेतना को ऊर्ध्वगामी बनाने में और अपने आप से और अपने परिवेश से अपने संबंध को सुदृढ़ करने के लिये क्या करना चाहिये? ये कुछ सक्षम सूत्र हैं -
  1. उप्युक्त भोजन : भोजन से हमारे मन पर असर पड़ता है। जैन परंपरा में मन पर भोजन के प्रभाव के विषय में बहुत शोध किया है । आयुर्वेद, चीनी चिकित्सा पद्दति एवं विश्व की अन्य कई प्राचीन परंपराओं में भोजन से होने वाले मन पर प्रभाव को पहचाना था। आधुनिक विज्ञान भी इस बात की पुष्टि करता है कि भोजन से हमारी भावनाओं पर सीधा प्रभाव पड़ता है। भावनात्म्क रूप से परेशान बच्चे अधिक भोजन लेते हैं और मोटापे के शिकार हो जाते हैं। एक संतुलित आहार का हमारी भावनाओं पर सकारात्मक प्रभाव होता है और इसका असर हमारी चेतना पर होता है।
  2. हल्का या मध्यम व्यायाम|
  3. पंचकर्म : आयुर्वेद की प्राचीन चिकित्सा परंपरा में भीतरी सफ़ाई की एक प्रक्रिया है जिसे पंचकर्म कहते हैं। पंचकर्म में शामिल होती हैं - मालिश प्रक्रिया, निर्धारित भोजन, और शरीर की भीतरी सफ़ाई। इससे हज़ारों लोगों को तनाव से मुक्त होने में और अपने व्यवहार में आये विकारों से मुक्त होने में सहायता मिली है। साथ ही, ये कई बीमारियों से छुटकारा दिलाता है।
  4. योग, ध्यान और प्राणायाम : योग, ध्यान और प्राणायाम। अपने शरीर और पर्यावरण को सम्मान की दृष्टि से देखने में ये बहुत सहायक हैं। ये अपने शरीर और पर्यावरण को प्रदूषण से मुक्त रखने में सहायक होता है और भावनात्मक असंतुलन से भी मुक्त करता है।
  5. संगीत और नृत्य : इनसे शरीर और मन में तारतम्यता और समतुलना आती है। खासतौर पर उस संगीत से जो कि बहुत तेज़ और कोलाहलपूर्ण ना हो। शांतिदायक संगीत हमारे मन और शरीर में एक स्पंदन पैदा करता है जो कि समतुलना लाता है, जैसे कि शास्त्रीय और लोक संगीत।
  6. प्रकृति : प्रकृति के साथ समय बिताना, मौन रहना, प्रार्थना करना..ये बहुत सहायक हैं अपने मन के साथ रहने में।
  7. और फिर सेवा। यह जीवन में संतुष्टि के लिए अनिवार्य है।

संदर्भ..


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"ध्यान में बैठना सर्वोत्तम पूजा है"


बैंगलोर आश्रम, ४ सितंबर २००९

प्रश्न : लाखों लोग आध्यात्म के पथ पर चलते हैं, पर कोई कोई व्यक्ति ही लक्ष्य तक पहँच पाता है। क्या मैं उन भाग्यशाली व्यक्तियों की गिनती में आ सकता हूं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये कोई नई बात नहीं है। भगवद गीता में भगवान कृष्णः ने कहा था कि विश्व की इतनी जन्संख्या में से कुछ ही लोग इस पथ पर चलते हैं।

जैसे प्रधान मंत्री की कुर्सी के लिये कई लोग चुनाव लड़ते हैं, पर अंत में एक ही चुना जाता है। जैसे कई लोग IPS, IAS अफ़सर बनना चाहते हैं..। आध्यात्म के पथ पर ये अच्छी बात है कि हर व्यक्ति लक्ष्य तक पहुँच सकता है।

बुद्ध के काल में दस हज़ार लोगों ने मुक्ति प्राप्त की। आज भी लाखों लोग साधना कर रहें हैं और उन में से कई लक्ष्य को पा लेंगे।

सागर के पास कुछ लोग जाते हैं ताज़ी हवा खाने के लिये। कुछ लोग सागर से मोती निकालने जाते हैं। कुछ लोग सागर से तेल निकालने के लिये जाते हैं। हमारी पात्रता ये निर्धारित करती है कि हम कहां पहुँचेंगे। इस पथ पर एक भी कदम बेकार नहीं जाता है। वो तुम्हें आगे ही ले जायेगा।

एक बार तुम प्रेम में पीड़ा का अनुभव कर लेते हो तो तुम मुक्ति चाहते हो। शांति और प्रेम के बिना, आनंद अधूरा है। आनंद हमारा स्वभाव है। वहाँ पहुँचने में कोई व्यवधान नहीं है। ये ना सोचो कि तुम वहाँ पहुँच पाओगे या नहीं। अगर तुम ऐसा चाहते हो, तो ये होगा – आज या कल।

प्रश्न : ईसाई धर्म में ‘फ़ैसले के दिन’ का क्या रहस्य है?

श्री श्री रवि शंकर :
ईसाई धर्म कहता है कि फ़ैसले का दिन आयेगा। उस दिन सभी मुर्दे धरती से बाहर आ जायेंगे, और उनसे उनके अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब लिया जायेगा, जिसके हिसाब से उन्हें स्वर्ग यां नर्क में भेजा जायेगा।

आज जो ‘फ़ैसले के दिन’ का मतलब समझा जाता है, वो उसका असल रूप नहीं है। समय के फेर और भिन्न व्याख्याओं से इसका अर्थ वो नहीं रहा जो कि असल में था। जिस भौगोलिक स्थान पर ईसाई धर्म और इस्लाम धर्म का जन्म हुआ था, वहाँ लकड़ी की कमी थी। वहाँ की धरती पहाड़ी और पथरीली थी। वहाँ मुर्दों को दफ़न करना बेहतर विकल्प था, और ये महंगा भी नहीं था।

भारत में लकड़ी की तादाद बहुत थी, तो यहां मृत शरीर को जलाने की प्रथा चली। जबकि इस्लाम और ईसाई धर्म जहाँ जन्में वहाँ मुर्दों को जलाना संभव नहीं था। तो, स्थान के अनुसार लोग प्रथा बनाते हैं।

‘फ़ैसले के दिन’ की लोक प्रचलित व्याख्या ये है कि मरे हुये लोग अपनी समाधि से बाहर आयेंगे। पर ऐसा नहीं है।

बाइबल में ईसा ने कहा है, ‘Judge not and ye shall not be judged.’ ईसा कहते हैं, किसी व्यक्ति की आलोचना मत करो। निर्णय का काम भगवान पर छोड़ दो। एक दिन (फ़ैसले के दिन), भगवान अपना निर्णय उस व्यक्ति को देंगे।

भारत में हम कर्म पर विश्वास करते हैं, जिसका अर्थ है कि तुम अपने सभी कर्मों का फल भोगोगे। अच्छे कर्म सुख लायेंगे और बुरे कर्म दुख लायेंगे। इसी तरह, ईसाई धर्म में कहा कि किसी के कर्म की आलोचना मत करो, सबको अपने कर्मों का सलीब उठाना ही है।

प्रश्न : कभी कभी मैं अपने भीतर कई विकार पाता हूं, और ये महसूस करता हूं कि मैं आध्यात्म के पथ पर चलने लायक नहीं हूं। मैं क्या करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
आत्मग्लानि से छुटकारा पाओ। अभी तक तुम आत्मग्लानि में तप रहे थे और तुम्हें ये पता तक नहीं था। अब जब तुम ये जान गये हो, तो इसे और नहीं सह पाओगे। इससे तुम साधक बन गये। कितने लोगों ने अपने विकार छोड़ दिये हैं। सत्संग और सेवा करते रहो और ध्यान की गहराई में जाओ – इस से तुम्हारे सब विकार और पुराने संस्कार मिट जायेंगे। अगर तुम एकदम नाकारा होते तो तुम्हें यहाँ, सत्संग में, इस पथ पर आने का सौभाग्य नहीं मिलता। तुमने कुछ अच्छे कर्म किये हैं। अपने अच्छे कर्मों पर भी ध्यान दो।

प्रश्न : क्या समाधि से आगे भी कुछ है?

श्री श्री रवि शंकर :
समाधि से आगे है बोध मात्र शुद्ध सत्ता।

ऐसी सजगता जो ना भीतर की है और ना बाहर की। बेहोशी नहीं है। शुद्ध चेतना है। कोई फ़र्क नहीं पड़ता चाहे आंखें खुली हों या बंद – सब एक जैसा ही लगता है।

प्रश्न : समाधि क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
जब मन केन्द्रित और विश्राम में होता है, तब समाधि की एक झलक मिलती है। सुदर्शन क्रिया के बाद जब तुम लेटते हो तो ये अनुभव तुम्हें होता है। जब तुम्हें लगता है – मुझे पता नहीं मैं कहाँ हूं, पर मैं हूं।

प्रश्न : आप कहते हैं कि भगवान के सभी रूप चित्रकार की कल्पना से बने है। फिर मंत्रजाप से इनका क्या संबंध है?

श्री श्री रवि शंकर :
कांचीपुरम के कामाक्षी मंदिर में एक सुंदर स्वरूप है। वहाँ तुम्हें प्रसाद मिलता है। पर ऐसा कहा जाता है कि इस का फल तुम्हें तब तक नहीं मिलेगा जब तक तुम इसे मंदिर के पीछे अरूप लक्ष्मी को अर्पित नहीं करते। अरूप लक्ष्मी से तुम्हें फिर प्रसाद मिलता है।

इसका अर्थ बहुत गहरा है। ये एक प्रथा है जिसकी जड़ वेदांत में है। तुम्हें रूप से अरूप तक ले जाया जाता है। पहले तुम रूप की पूजा करते हो, फिर शालिग्राम (काले रंग का गोलाकार पत्थर) की। मन, जब रूप में केंद्रित हो जाता है, तब उसे गोल पत्थर में केंद्रित किया। जब वहाँ मन लग जाये तो उससे आगे मंत्र आता है।

भगवान कहीं आसमान में नहीं हैं, बल्कि स्पंदन में है – हमारी चेतना है। ध्यान में बैठना सर्वोत्तम पूजा है। उस में मंत्रों को भी समर्पित कर देते हैं। मंत्र का उपयोग भी कुछ कुछ रूप जैसा ही है (केंद्रित करने के लिये)। ये एक पड़ाव है।

प्रश्न : प्रसाद का वैज्ञानिक महत्व क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
प्रसाद वही है, जिसके मिलने से मन प्रसन्न हो जाता है। कर्नाटक के एक संत ने लिखा है कि, ये समय जो हमें मिला है, ये प्रसाद है, हमारी सांस, शरीर, मन, प्राण और भाव, सभी प्रसाद हैं। हमें जीवन में जो भी मिला है वो प्रसाद है। जो मैंने बिछाया है वो प्रसाद है, और जिससे मैंने अपने आप को ढका है, वो भी प्रसाद है।


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"थोड़ा सा त्याग करने से भी व्यक्ति का व्यक्तित्व खिल उठता है"

बैंगलोर आश्रम, १ सितंबर २००९

प्रश्न: हम मे से हरेक के पास विश्व के लिये एक संदेश है, पर वह माया से ढक जाता है। उस संदेश को बाहर कैसे लायें?

श्री श्री:
जब हम शांत और अनासक्त होते हैं, तो हमारा संदेश खुद ही बाहर आ जाता है।

प्रश्न: संकल्प का क्या महत्व है, और इसे कैसे शक्तिशाली बनायें? क्या विश्व संकल्प के बल पर ही चलता है?

श्री श्री:
मन में संकल्प और विकल्प भरे हुये हैं। हर काम संकल्प से ही पूरा होता है। अपना हाथ हिलाने की प्रक्रिया के पहले हाथ हिलाने का संकल्प आता है। अगर मन में एक साथ २० संकल्प उठें तो कोई काम नहीं होता। जब हमारा मन शांत और विश्राम की स्थिति में हो तो हमारा संकल्प शक्तिशाली बनता है।

एक कमज़ोर मन का संकल्प कमज़ोर होता है, और शक्तिशाली मन का संकल्प शक्तिशाली होता है। हम अपने मन को साधना और ज्ञान से शक्तिशाली बना सकते हैं। तब संकल्प भी शक्तिशाली होगा। एक ज्ञानी व्यक्ति ५० दिनों के बाद एक संकल्प करता है और एक अज्ञानी व्यक्ति एक दिन में ५० संकल्प करता है।

प्रश्न: अगर विपरीत मूल्य एक दूसरे के पूरक होते हैं, तो क्या मैं अच्छा हूं या बुरा, या दोनो ही?

श्री श्री:
तुम अपने आप पर अच्छे या बुरे होने का लेबल क्यों लगाना चाहते हो? लेबल को छोड़ो और सहज हो कर रहो। शांति से रहो। जब हम किसी दुर्गुण को अपना समझते हैं तो हम आत्मग्लानि से भर जाते हैं। जब हम किसी सदगुण को अपना समझते हैं तो हम घमंड से भर जाते हैं। ये दोनों ही स्थितियां मन की अस्वस्थता दिखाती हैं। सदगुण और दुर्गुण, दोनों ही परमात्मा को समर्पित कर दो।

एक समर्पित व्यक्ति अच्छा ही होगा। समर्पण से जीवन केंद्रित और चरित्रवान हो जाता है। इन दोनों के बिना जीवन को दिशा नहीं मिलती।

थोड़ा सा त्याग करने से भी व्यक्ति का व्यक्तित्व खिल उठता है। त्याग के बिना तेज नहीं आता। त्याग से जीवन में लंबा सा दुखी चेहरा लटकाकर नहीं रहना होता। विरक्त आनंद में रहते हैं, जबकि कामी लोग दुख के बोझ से दबे रहते हैं। अपने आप को खाली कर देना, समर्पण है, साधना है।

प्रश्न: क्या आत्मसाक्षात्कार के लिये दिन में एक घंटे की साधना काफ़ी है?

श्री श्री:
२४ घंटे भी काफ़ी नहीं हैं और दस या दो मिनट की समाधि भी काफ़ी है। साधना समय सापेक्ष नहीं है। अपने पूरे जीवन को साधना बना लो। पर, साधना ना करने के लिये ये बहाना नहीं बनाना! और ये भी मत सोचना कि दिन में एक घंटे साधना कर लेने पर तुम बाकी समय मनमानी कर सकते हो।

प्रश्न: मैं परमात्मा पर केंद्रित हूं, फिर भी बेचैनी है। हालांकि बाहर से सब एकदम ठीक लगता है।

श्री श्री:
हरेक साधक के जीवन में ऐसा समय आता है जब दिल बेचैन हो जाता है। पश्चिमी देशों में इसे कहते हैं - आत्मा के लिये काला दिन।

ऐसा समय आता है जब सत्वगुण कम हो और रजोगुण और तमोगुण अधिक हो, तो बेचैनी का जन्म होता है। तीन तरह की ताप जीवन में आते हैं, जिनमें से एक है, आध्यात्मिक ताप। पर ये थोड़े समय के लिये ही होता है। इसीलिये सत्संग बहुत आवश्यक है, खासतौर पर तब जब तुम्हारा मन सत्संग करने का बिल्कुल नहीं होता। १२ वर्षों में एक बार आध्यात्म में कमी आती है। तब अपने आप पर, साधना के मार्ग पर और गुरु पर शंका होती है। शास्त्रों में ऐसा बताया है। इसीलिये कुंभ मेला १२ साल में मनाया जाता है और तब सब संत मिलकर अपने सभी पाप धो लेते हैं। ये परंपरा बहुत पुरानी है। जिस स्थान पर साधक सत्संग करते हैं और जहाँ वेदों का उच्चारण होता है, वहां कलियुग कभी नहीं आता।

प्रश्न: कोई कार्य करने से पहले मुहूर्त देखने का क्या महत्व है?

श्री श्री:
ज्योतिष को ज्ञान की आंख कहा गया है। पर आजकल के ज्योतिषियों पर पूरी तरह विश्वास नहीं कर सकते हैं। ज्योतिष के पीछे दौड़ो मत। ज्योतिष ज्ञान का एक क्षेत्र है, शास्त्र है, और सत्य है। ज्योतिष एक विज्ञान है पर हर ज्योतिषी विज्ञानी नहीं है। साधना में बहुत शक्ति होती है। शिवजी, महाकाल हैं। जैसा भी काल हो, बस ॐ नमः शिवाय कहो। शिव में सभी पंचतत्व आ जाते हैं। शिव के बाहर कुछ नहीं है। ये बहुत शक्तिशाली मंत्र है।

जब तुम मंत्र का जप करो तो ये मत समझ लेना कि शिव यानि पूरे शरीर पर भस्म लगाये, हाथ में त्रिशूल लिये कहीं बैठें हैं...ये सिर्फ़ एक चित्रकार की कल्पना है। शिव, चैतन्य तत्व है, हमारी आत्मा है, हर जगह वर्तमान है, ऊर्जा का क्षेत्र है।

तुम्हें पता है कि हम माथे पर भस्म क्यों लगाते हैं? हमारे माथे पर तीन प्रकार के mites होते हैं, जो कि हमारे अंगूठे के निशान की तरह हर व्यक्ति में दूसरों से अलग होते हैं। इन mites को इनके स्थान में रखने के लिये हम माथे पर तीन रेखायें बनाते हैं।

रूस में हुये एक अध्य्यन में ये पाया गया कि गाय के गोबर या अग्निहोत्र की भस्म से लिपे हुये स्थान पर Chernobly disaster के दौरान परमाणु radiation से हुये बुरे असर बहुत कम हो गए थे।

प्रश्न: मै आश्रम में अपने आप को सुरक्षित महसूस करता हूं। बाहर की दुनिया में वापिस जाने के विचार से ही मुझे भय लगता है। मैं क्या करूं?

श्री श्री:
ठीक है, भय को रहने दो। जोश को जागृत करो। जो भी हो उसे होने दो। कम से कम ये विश्वास रखो कि तुम अकेले नहीं हो। दिव्य शक्ति तुम्हारे साथ है।

इस बात पर गौर करो कि भय के स्पंदन को तुम शरीर में कहां मह्सूस करते हो? हृदय में, कंठ में, शरीर के अन्य भागों में? प्राणायाम, भस्त्रिका और सुदर्श्न क्रिया करो। अपने आप को व्यस्त रखो, खाली बैठकर सोचने का समय ना दो। तब भय के लिये कहां समय है?


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