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‘मुझे करना हैं', और ‘मैं इसे करूंगा’ यह मनोभाव सर्वश्रेष्ठ हैं !!!

बेंगलोर आश्रम २ अगस्त २०११ 

क्या आप लोगों ने उन योजनाओं के बारे में सोचा जिसे हमें करना हैं ? क्या आपको अनेक विचार आये? इसे जिम्मेदारी लेना कहते हैं | आपने यह नहीं कहना चाहिए कि गुरूजी आपने मुझे यह नहीं कहा विचारों को बास्केट में रख दीजिये, और आपने सिर्फ यही कहा कि अपने  नाम लिखकर दीजिये | ऐसा नहीं करना हैं | सबसे पहले आप अपने बारे में सोचते हैं कि यह कार्य करना हैं और उसके लिये आप को क्या करना हैं | आप सोचते हैं फिर वैसा करते हैं |

अपने स्वयं की पहल के द्वारा कार्य करना श्रेष्ठ होता हैं और दूसरों के बताने पर किया हुआ कृत्य औसत श्रेणी का माना जाता हैं | और किसी के बताने पर भी कृत्य नहीं करना सबसे खराब श्रेणी में आता हैं | इसलिये आप आज यह निर्णय करें  कि आप किस श्रेणी में आना चाहते हैं | ‘मुझे करना हैं’ , और ‘मैं इसे करूंगा’ और १००% करूंगा, यह मनोभाव सर्वश्रेष्ठ हैं | मैं इसके बारे में सोचूंगा कि इसे कैसे करना हैं | किसी योजना को अपनी स्वयं की समझकर उस पर कार्य करना, सबसे श्रेष्ठ हैं |

प्रश्न :मृत्यु के उपरांत गरुड़ पुराण का क्या महत्व है ?
श्री श्री रवि शंकर: गरुड़ पुराण में मृत्यु के उपरांत के जीवन के बारे वर्णन किया गया हैं | आत्मा कहाँ और कैसे जाती है इसके बारे में बताया गया है | इसका एक निश्चित समय है जब आप इसे सुन सकते है (आत्मा के शरीर छोड़ने के कुछ दिन उपरांत  ) इसे सुनने पर आपको यह मालूम पड़ता है कि स्वर्ग वासी आत्मा कहाँ गई और उसके साथ क्या हुआ | गरुड़ पुराण में ऐसी कई बातें है |

प्रश्न: प्रिय गुरूजी षोडश संस्कार क्या होता हैं ?
श्री श्री रवि शंकर: षोडश संस्कार! षोडश का अर्थ होता हैं, १६ | मानव जीवन १६ संस्कार होते हैं |
किसी पुरुष या महिला के जीवन में १६ ऐसी रस्मे या अनुष्ठान होते हैं जिसका जीवन पर प्रभाव होता हैं | वे क्या हैं ? इसकी शुरुआत  गर्भाधान ( गर्भ का धारण ) होने से होती हैं | गर्भ धारण होने की एक प्रक्रिया हैं | गर्भ के धारण का एक पूरा संस्कार हैं, कैसे पुरुष और महिला को किस समय साथ में होना चाहिए और कब गर्भ(शिशु) को धारण होना चाहिए | इस ज्ञान को गोपनीय रखा गया हैं | यदि आप को पुत्री चाहिए तो किस दिन गर्भ को धारण होना चाहिए या यदि आपको पुत्र चाहिए तो गर्भ को किस दिन धारण होना चाहिए इत्यादि  | गर्भाधान संस्कार गर्भ के धारण होने के बारे में हैं | इसे कुछ मंत्र और रस्मों के द्वारा किया जाता हैं | यह बिलकुल प्रचलन में नहीं हैं | इसे विवाह की रात्रि को  ही कुछ मंत्रोचारण के उपरान्त संपन्न कर दिया जाता हैं, जैसे कि पूरी रस्म समाप्त हो गयी हो | पांचवे महीने में एक रस्म होती हैं जिसे पुमांसं कहते हैं और आठवें महीने में सीमंत की रस्म की जाती हैं |  और स्त्री की सभी इच्छायें पूरी की जाती हैं और उसे जो कुछ भी चाहिए, वह दिया जाता हैं | उसे जो कुछ भी चाहिये वह उसे उपहार में यह कह कर दिया जाता हैं कि तुम अपने भीतर एक नए ब्रह्माण्ड की रचना कर रही हो और इस कारण उसे खुश किया जाता हैं | गर्भाधान, पुमांसं और सीमंत, यह तीन संस्कार हैं | फिर नामकरण संस्कार होता हैं जिसे जन्म के ११ दिन उपरांत किया जाता हैं | माता, पिता शिशु के लिये एक नाम चुनते हैं और उसकी जिव्हा पर शहद चटा कर उसके दायें कान में शिशु के नाम का उच्चारण करते हैं | फिर मुंडन संस्कार होता हैं जिसमे पहली बार शिशु के केश कटवायें जाते हैं, और इसे पहली से तीसरी वर्षगांठ के दौरान करवाया जाता हैं | चौल का अर्थ हैं प्रथम  केश को काटना | जब पहले केश को काटा जाता हैं तब शिशु के कान भी छिदवायें जाते हैं | विज्ञानिक दृष्टिकोण से कान की लोलकी अधिक सजगता और बुद्धि प्रदान करती हैं | फिर आठवें और ११ वर्ष के मध्य में उपनयन संस्कार किया जाता हैं, जब बालक/बालिका को प्रथम बार विद्यालय शिक्षा के लिये ले जाया जाता हैं | जब वे बचपन से किशोर अवस्था में पहुँचने से पहले उन्हें उनकी जिम्मदारियों के बारे में समझाया जाता हैं जो उन्हें निभानी होती हैं | फिर उन्हें गायत्री मंत्र दिया जाता हैं | ब्रह्म उपदेश का अर्थ है “ आप यह हैं” ‘आप यहीं हैं” उन्हें यह उपदेश दिया जाता हैं | उपनयन के उपरान्त व्यक्ति शिक्षा के लिया विद्यालय जाता और गुरुकुल में गुरु के साथ रहता हैं | समवर्तन शिक्षा ग्रहण करने उपरान्त आता हैं, जब व्यक्ति कार्य करता हैं, इसके उपरान्त विवाह | इस तरह मृत्यु तक संस्कार निभाने पड़ते हैं | जीवन की अंतिम रस्म होती अंत्येष्टि संस्कार | यह सारे संस्कार जीवन का हिस्सा हैं | प्राचीन लोगों के पास इन सभी के लिये मंत्र होते थे |

प्रश्न - गायत्री मंत्र का क्या महत्त्व है ?
श्री श्री रवि शंकर - ॐ सारी सृष्टि का सार है | ॐ सबसे महान मंत्र है, जिसमे सब कुछ मौजूद है और जब ॐ  का विस्तार हुआ तो वह गायत्री मंत्र बना | फिर गायात्री मंत्र सारे वेदों का सार है | ऐसा कहा जाता है कि गायत्री मंत्र से श्रेष्ठ कोई मंत्र नहीं है | गायत्री  मंत्र का अर्थ है मेरे सारे पाप नष्ट  हो जाएँ और मेरी चेतना में दिव्यता का उदय हो, दिव्यता प्रेरित हो कर मुझ में अंतरज्ञान प्रदान करे | यह इसकी संक्षिप्त व्याख्या है और इसकी विस्तृत व्याख्या भी हो सकती है| अभी के लिये इतना पर्याप्त है |

प्रश्न – अधिकांश  भारत में सिर्फ बुद्धिजीवी ही अष्टवक्र गीता के बारे में जानते है, जबकि सभी लोग भगवत गीता के बारे में जानते है - ऐसा क्यों है ?
श्री श्री रवि शंकर: यह बात सही हैं | अष्टवक्र गीता  स्नातकोत्तर साधकों के लिये है | इसे समझना आसान नहीं हैं | इस ज्ञान को एक राजा को प्रदान किया गया था | भगवत गीता से शुरुवात करनी चाहिये | उसमे हर किसी को कुछ समझ में आयेगा | अष्टवक्र गीता राजा जनक को प्रदान की गयी जबकि भगवत गीता एक हताश  युवा को प्रदान की गई , इसमें यही अंतर हैं | सामाज में सामान्य व्यक्ति उदासी में रहता हैं और उसमें सजगता नहीं होती | अष्टवक्र गीता राजा जनक को तब प्रदान की गयी जब वे सत्य और माया के ज्ञान के गहन में उतरने के लिये उत्सुक थे | आप के जैसे बहुत ही कम लोगों में ज्ञान को जानने की जिज्ञासा नहीं होती | इस पर विश्वास न करे कि इस वक्त यहां कोई उदास हैं ! कोई हैं क्या ?


श्रोताओं ने उत्साह के साथ उत्तर दिया, नहीं !!!!

सत्संग में कोई भी उदास नहीं रह सकता |
भगवत गीता एक निराश और दुखी युवा को प्रदान की गयी थी जबकी अष्टवक्र गीता सत्य और ज्ञान को जानने की जिज्ञासा रखने वाले व्यक्ति को प्रदान की गयी थी |  इसीलिए यह थोड़ी कठिन और भिन्न है | भगवत गीता हर किसी व्यक्ति का ध्यान रखती है, यहां तक उनका भी जो दुखी, निराश और उदास है | जो जीवन का कुछ अर्थ समझना चाहता है और जीवन से कुछ प्राप्त करना चाहता है, यह उन सबके लिये है  |

प्रश्न : गुरूजी भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंग का क्या महत्त्व है ? क्या इनका दर्शन करना आवश्यक है ?
श्री श्री रवि शंकर: तीर्थ स्थानो का उद्देश्य लोगों को साथ में लेकर आना होता है और देश को कश्मीर से रामेश्वरम और कामाख्या से सोमनाथ तक जोड़ना भी है | भगवान शिव सिर्फ मंदिरों में ही निवास नहीं करते | वे आपके दिलों में भी निवास करते है | आप जहाँ पर भी है उनका स्मरण करें और वे प्रकट हो जायेंगे |

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अध्यात्मिक ज्ञान और व्यावहारिक ज्ञान साथ साथ चलतें हैं

ऋषिकेश,भारत-०८ मार्च २०१०

प्रश्न : शिव कौन है?

श्री श्री रवि शंकर :
पूछना यह चाहिए कि कौन शिव नहीं है? पूरा संसार शिव
से भरा है| शिव-जिसका शरीर पूरे ब्रह्माण्ड में है| कलाकारों के लिए शिव
का चित्र बनाना बहुत कठिन है, क्योंकि शिव कल्पना से परे है| इस कारण शिव को
नीला रंग दिया गया| नीले का अर्थ है- सर्व-व्यापक, अनंत जिसकी कोई सीमा न
हो| शिव का कोई आकार नहीं है| वेदों के ज्ञान का
कोई आकार नहीं है, लेकिन यह ज्ञान ब्रह्माण्ड के कण-कण में बसा हुआ है|
“साम्ब सदा शिव” – शिव तत्त्व में शिव और शक्ति दोनों मौजूद है ( नर और
नारी शक्ति)| पार्वती शिव से अलग नहीं हैं| पार्वती यज्ञ से उत्पन्न
हैं|शिव तत्त्व के बिना यज्ञ सम्भव नहीं है| शिव और शक्ति को एक क्षण
के लिए भी अलग नहीं किया जा सकता| यदि शिव हर जगह है, तो शक्ति इसकी
परिधि के बाहर कैसे ही सकती है| पुराणों में शिव की तमाम कहानियाँ हैं,
जिनकी रचना यह ध्यान में रख कर की गई है कि एक बच्चा भी शिव तत्त्व के बारे में कुछ जान सके|
तुम सब चेतना की तीन अवस्थाओं का अनुभव करते हो- जागृत, स्वप्न और सुप्त|
शिव चेतना की चौथी अवस्था है, जिसे “तुरीया” कहते हैं, जिसका अनुभव तुम गहन ध्यान में करते
हो| जब तुम उस अवस्था का अनुभव करते हो, तो भोलापन उदय होता है|
और बिना भोलेपन के तुम उस तत्त्व में विलीन नहीं हो सकते | इसीलिये
शिव को भोलेनाथ भी कहा जाता है|

प्रश्न : भोलापन क्या है? भोलापन कैसे चला जाता है?

श्री श्री रवि शंकर :
भोलेपन के लिए तुम्हें समझना होगा कि कोई अन्य नहीं है|

प्रश्न : शिवजी के गले में विष रोकने की कथा का क्या मतलब है?

श्री श्री रवि शंकर :
इसका गहरा अर्थ है| बोलने से ही विष फैलता है| बोलने से
मन उत्तेजित होता है| सभी झगड़े सही ज्ञान की कमी और कठोर शब्दों के कारण ही
होते हैं| शिवजी को नीलकंठ भी कहा जाता है – जिसका अर्थ है कि जब महादेव
विषपान करते हैं, यह उनके पूरे शरीर में नहीं पहुंचता| जब सही और गलत
विचारों में संघर्ष होता है, विष पैदा होता है| शिव तत्त्व में उस विष को
रोक कर रखने की शक्ति होती है| यदि तुम्हें किसी की आलोचना करनी भी पड़े, तो
इसे होठों से करो – दिल से नहीं| जब तुम इसे दिल से करते हो, यह तुम्हें
नुकसान पहुंचाता है| जब यह केवल होठों के स्तर तक रहता है, तो समाज में
किसी का भला होता है| तुम हर समय मीठे बोल नहीं बोल सकते| यह अपने-आपको
तथा दूसरों को धोखा देना होगा| तुम्हें दूसरों को शीशा दिखाना पड़ता है,
लेकिन यह दिल के स्तर से नहीं होना चाहिये| यहाँ तक कि शिव भी गुस्सा
होते हैं, पर अंदर से नहीं| अंदर वही शांति रहती है| यह बच्चों द्वारा
अपनी माँ से गुस्सा होने जैसा है| पर तुरंत ही बच्चों की मुस्कान लौट आती है| यही
भोलपन है| बड़े लोग ही झगड़ों को लंबे समय तक रोके रखते है|

प्रश्न : बच्चा गलत भाषा कैसे सीखता है?

श्री श्री रवि शंकर :
प्रत्येक बच्चा जन्म के समय भोला होता है| लेकिन वे
वातावरण से गलत भाषा सीख जाते हैं| पहले-पहल वे केवल अपने माता-पिता या
अपने आस-पास के लोगों की नक़ल करते हैं| लेकिन बाद में यह आदत बन जाती है|
जो तुम देते हो, वही तुम्हारे पास लौटकर आता है| उससे केवल तुम्हारा ही
दिमाग खराब होता है|

प्रश्न : शिव के त्रिशूल का क्या महत्व है?

श्री श्री रवि शंकर :
त्रिशूल पकड़ने का अर्थ है कि शिव जागृत, स्वप्न और
सुप्त – तीनों अवस्थाओं से परे हैं| लेकिन इन सभी को साथ में लेकर चलते हैं|

प्रश्न : क्या किसी की निकटता अनुभव करने में भौतिक दूरी बाधक है?

श्री श्री रवि शंकर :
मन के लिए कोई दूरी नहीं है| जब तुम भावनाओं से जुड़ते
हो, सभी दूरियां समाप्त हो जाती हैं| यदि कोई भाव नहीं है, तो तुम अपने
बिलकुल पास बैठे व्यक्ति से भी निकटता नहीं महसूस करते| यह बात ईश्वर,
देवता और सभी सम्बन्धों के लिए सत्य है| जब पूरे ब्रह्माण्ड से ऐसा
सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो तुम शिव तत्व का अनुभव करते हो|

प्रश्न : प्रत्येक वस्तु और व्यक्ति में शिव को कैसे देखा जा सकता है?

श्री श्री रविशंकर :
“शिव हर जगह है”|यह आध्यात्मिक सत्य है और दूसरा
व्यवहारिक ज्ञान है| दोनों को साथ में लेकर चलो | जो केवल सामाजिक व्यवहार
में अटका रहता है, उसे कुछ नहीं मिलता| यह उसके लिए भी सत्य है जो केवल ध्यान
और आध्यात्मिकता की परिकल्पना में बहुत अधिक डूबा हुआ है|
यदि तुम्हारे घर में चोर घुस आता है, तो तुम उसे शिव का रूप मानकर उसे
मनमानी करने नहीं दे सकते|(हँसते हुए) तब शिव के इस रूप को पुलिस रूपी
शिव को संभालने दो|

तुम ड्रग या शराब पीने को यह कहकर उचित नहीं ठहरा सकते कि इनमें भी शिव
मौजूद है| हमारा शरीर ऐसा बना है कि यदि तुम अपनी चेतना और प्राण को बढ़ाते हो, तो तुम ईश्वरत्व का अनुभव करते हो | और यदि तुम
इन्हें घटाते हो, तो तुम सुस्ती का अनुभव करते हो|
जहाँ प्राण हैं, वहीं सच्ची सुंदरता या शिव है|


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"आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है"

बैंगलोर आश्रम, २ सितंबर २००९

श्री श्री ने आज कहा -

प्रश्न : मैं अपने प्रदेश में एक सम्मानित, प्रतिष्ठित और जाना माना, उच्च पदाधिकारी हूं। जब मैं किसी अन्य जगह जाता हूं तो कभी कभी मुझे लगता है कि वहां मेरा महत्व कुछ कम है। मैं अपनी identity पर प्रश्न चिह्न लगा लेता हूं। इससे छुटकारा कैसे पाऊं?

श्री श्री :
तुम्हें पता है, तुम्हें एक सूट पहनना आना चाहिये – और उसे उतारना भी! अपने घर में सब राजा होते हैं। अकिंचन रहना सीखो – मैं कुछ नहीं हूँ। जीवन की पूरी यात्रा है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर ‘मैं ही सब हूँ।’ आमतौर पर जीवनयात्रा होती है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर, ‘मैं कुछ हूँ’!

सत्संग में बैठो। अपने वजूद को घुल जाने दो। अपने वजूद को घुलकर जाने देना, समाधि है, आनंद है। तुम जान जाओगे कि तुम अमर हो।

प्रश्न : Art of Living संस्था के लिये आपका क्या vision है?

श्री श्री :
आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है। तुम अपना vision खुद बनाओ। मैं कहूंगा कि तुम दृष्टा बन जाओ, अपने दृश्य खुद बनाओ। परमात्मा तुम्हें नींद देंगे, स्वप्न तुम खुद बनाओ।

प्रश्न : अगर १ से १०० तक की rating करें और एक पत्थर का स्तर शून्य है और मनुष्य का १००, तो बीच के बाकी जीवों का क्या स्तर तय करेंगे?

श्री श्री :
Rating की क्या आवश्यकता है? सब कुछ उस एक का है। उसका ही अंग है। उस एक ने ही ये सभी अनंत रूप लिये हैं। शून्य और १००, सभी में वही है। एक पत्थर में भी जड़ता और चैतन्य होगी। ब्रह्म में जड़ और चैतन्य दोनों का ही समन्वय है। वे ब्रह्म का अंग हैं।

भगवान श्री कृष्ण, भगवद्गीता में कहते हैं, ‘माया भी मुझ से ही है। समस्त विश्व मुझ में ही है। फिर भी मैं किसी में नहीं हूं।’ भगवद्गीता की philosophy भ्रामक लग सकती है। बिना सत्य के अनुभव के philosophy केवल कुछ सिद्धांत मात्र हैं। अपने आप का सत्य अनुभव करने के लिये तुम अपने भीतर, गहरे उतर जाओ।

प्रश्न : मैं अपनी नकरात्मक भावनाओं से ज्ञान के द्वारा कैसे छुटकारा पा सकता हूं? अगर मैं उन्हें हटाने के लिये प्रतिबद्ध हो जाऊं तो वे मेरा विरोध करेंगे। अगर मैं उनका विरोध ना करूं, तो वे यथावत रहेंगे।

श्री श्री :
नकरात्मक भावनाओं के साथ लड़ो मत, और उनसे मित्रता भी मत करो। युक्ति से, सांस से, सही दृष्टिकोण से, सभी नकरात्मकता से छुटकारा हो सकता है। अष्टावक्र गीता में कहा गया है, ‘सही तरीके से मन के ऊपर जाओ।’

प्रश्न : शिव जी के परिवार में हरेक का वाहन, जीव जगत में आपस में दुश्मन है। एक बैल है, चूहा है, मोर इत्यादि है – फिर भी वे आपस में शांते से रहते है! ऐसा कैसे?

श्री श्री :
शिव का शांत, अद्वैत तत्व, हरेक को संग लाता है, और सद्भावना लाता है।

प्रश्न : जिज्ञासा का सार तत्व क्या है?

श्री श्री :
तुम्हारा प्रश्न ही जिज्ञासा के सार तत्व का उदाहरण है। जो तुम पूछ रहे हो, वही इसका उत्तर है। ये तो ऐसा ही है जैसे कोई पूछे कि ध्वनि क्या है?


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"परमात्मा तुम्हें नींद देंगे, स्वप्न तुम खुद बनाओ"

बैंगलोर आश्रम, २ सितंबर २००९
श्री श्री ने आज कहा -


प्रश्न : मैं अपने प्रदेश में एक सम्मानित, प्रतिष्ठित और जाना माना, उच्च पदाधिकारी हूं। जब मैं किसी अन्य जगह जाता हूं तो कभी कभी मुझे लगता है कि वहा मेरा महत्व कुछ कम है। मैं अपनी पहचान पर प्रश्न चिह्न लगा लेता हूं। इससे छुटकारा कैसे पाऊं?

श्री श्री : तुम्हें एक सूट पहनना आना चाहिये – और उसे उतारना भी! अपने घर में सब राजा होते हैं। अकिंचन रहना सीखो – मैं कुछ नहीं हूँ। जीवन की पूरी यात्रा है, ‘मैं कुछ हूं’ से ‘मैं कुछ नहीं हूं’ और फिर ‘मैं ही सब हूं।’ आमतौर पर जीवनयात्रा होती है, ‘मैं कुछ हूं’ से ‘मैं कुछ नहीं हूं’ और फिर, ‘मैं कुछ हूं’!
सत्संग में बैठो। अपने वजूद को घुल जाने दो। अपने वजूद को घुल जाने देना, समाधि है, आनंद है। तुम जान जाओगे कि तुम अमर हो।

प्रश्न : Art of Living संस्था के लिये आपकी क्या दृष्टि है?

श्री श्री :
आध्यात्म इस नये युग की भाषा है। तुम अपनी दृष्टि खुद बनाओ। मैं कहूंगा कि तुम दृष्टा बन जाओ, अपने दृश्य खुद बनाओ। परमात्मा तुम्हें नींद देंगे, स्वप्न तुम खुद बनाओ।

प्रश्न : अगर १ से १०० तक की rating करें और एक पत्थर का स्तर शून्य है और मनुष्य का १००, तो बीच के बाकी जीवों का क्या स्तर कैसे तय करेंगे?

श्री श्री : Rating की क्या आवश्यकता है? सब कुछ उस एक का है। उसका ही अंग है। उस एक ने ही ये सभी अनंत रूप लिये हैं। शून्य और १००, सभी में वही है। एक पत्थर में भी जड़ता और चैतन्य होगी। ब्रह्म में जड़ और चैतन्य दोनों का ही समन्वय है। वे ब्रह्म का अंग हैं।
भगवान श्री कृष्ण भगवद‍ गीता में कहते हैं, ‘माया भी मुझ से ही है। समस्त विश्व मुझ में ही है। फिर भी मैं किसी में नहीं हूं।’ भगवद गीता का ज्ञान भ्रमक लग सकता है। बिना सत्य के अनुभव के ज्ञान केवल कुछ सिद्धांत मात्र हैं। अपने सही स्वरूप के अनुभव के लिये तुम अपने भीतर, गहरे उतर जाओ।

प्रश्न : मैं अपनी नकरात्मक भावनाओं से ज्ञान के द्वारा कैसे छुटकारा पा सकता हूं? अगर मैं उन्हें हटाने के लिये प्रतिबद्ध हो जाऊं तो वे मेरा विरोध करेंगे। अगर मैं उनका विरोध ना करूं, तो वे यथावत रहेंगे।

श्री श्री :
नकरात्मक भावनाओं के साथ लड़ो मत, और उनसे मित्रता भी मत करो। युक्ति से, सांस से, सही दृष्टिकोण से, सभी नकरात्मकता से छुटकारा हो सकता है। अष्टावक्र गीता में कहा गया है, ‘सही तरीके से मन के ऊपर जाओ।’

प्रश्न : शिव जी के परिवार में हरेक का वाहन, जीव जगत में आपस में दुश्मन है। एक बैल है, चूहा है, मोर इत्यादि है – फिर भी वे आपस में शांति से रहते है! ऐसा कैसे?

श्री श्री :
शिव का शांत, अद्वैत तत्व, हरेक को संग लाता है, और सद्भावना लाता है।

प्रश्न : जिज्ञासा क्या है?

श्री श्री : तुम्हारा प्रश्न ही जिज्ञासा के सार तत्व का उदाहरण है। जो तुम पूछ रहे हो, वही इसका उत्तर है। ये तो ऐसा ही है जैसे कोई पूछे कि ध्वनि क्या है?



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