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सफलता के रहस्य

बुधवार, ६ अप्रैल २०११

प्रश्न: शत प्रतिशत प्रयास करने के उपरांत भी यदि कोई कार्य संपन्न न हो तो कोई व्यक्ति क्या करे?
श्री श्री रवि शंकर:
सफलता के लिए या कार्य को संपन्न होने के लिए पांच बातों की आवश्यकता होती है| सबसे पहले उस व्यक्ति का आशय जो उसे कर रहा है, फिर उन साधनों और चीजों की उपलब्धता जिससे वह कार्य होना है, तीसरी बात उस कार्य को करने का मनोभाव और उसे करने की इच्छा | फिर उसे करने का समय क्योंकि प्रत्येक कार्य को करने का एक निर्धारित समय होता है, और यदि उसे सही समय पर नहीं किया जाये तो वह व्यर्थ हो जाता है| यदि आप फरवरी में बीज बोयेंगे तो उसका कोई अर्थ नहीं है,फिर आप यह नहीं कह सकते कि मैने तो बीज को बोया परन्तु कुछ उगा नहीं |आप को बारिश के बाद अप्रैल तक इंतज़ार करना होगा और फिर यदि बीज को बोयेंगे तो सकारात्मक परिणाम पायेंगे | इसलिये समय सबसे महत्वपूर्ण होता है | जब हम इस आश्रम पर आये थे तब यह सारी भूमि अनुपजाऊ थी और इस पर एक भी पत्ती या वृक्ष नहीं था |आज यहाँ पर कितने सारे वृक्ष और पौधे लगे हुये है और यह सारे वृक्ष एक ही दिन में नहीं उग गये, इसमें बहुत सारे लोगो का प्रयास और परिश्रम के उपरांत ही ये वृक्ष यहाँ पर उग सके | इसलिये समय कैसे महत्वपूर्ण है और उसके बाद दैविक कृपा जरूरी है|दैविक कृपा के बिना सफलता संभव नहीं है, इसलिये आप सेवा, साधना और सत्संग को करे और फिर किये हुये प्रयासों का सफल परिणाम समय पर मिलेगा | फिर आपके द्वारा किये गये प्रयासो का परिणाम कभी भी व्यर्थ नहीं जायेंगे इससे आश्वस्त रहे, यदि अभी नहीं तो निश्चित ही उसके परिणाम बाद में मिल ही जायेंगे |

श्री श्री रवि शंकर : संपत्ति होने अर्थ सिर्फ धन या पैसा होना नहीं है| आपके पास धन का भण्डार, काफी जमीन जायजाद भी हो सकती है, परन्तु यदि आप का चेहरा तनावग्रस्त और दुखी लगे तो कोई भी आपको समृद्ध नहीं कह सकता |समृद्धि का अर्थ बैंको में बड़ी पूंजी जमा होना नहीं होता है|समृद्धि का तात्पर्य होता जीवन की विशालता को समझ कर उसका सम्मान करना | किसी व्यक्ति का आत्मविश्वास उसकी समृद्धि को दर्शाता है| संपत्ति को आपके लिए क्या करना होता है? आपके आत्मविश्वास को बढ़ाना परन्तु यदि संपत्ति ने आपको कमजोर,बीमार और आपके लिए द्वन्द को उत्पन्न किया है, तो फिर वह संपत्ति व्यर्थहीन है ! एक अन्य किस्म की संपत्ति ज्ञान,विवेक,स्वास्थ्य, आत्मविश्वास और वीरता होती है| यदि आप में आत्मविशवास हो तो किसी भी बात को या परिस्थिति को संभाल सकते है और यह भी संपत्ति है |

प्रश्न : चेतना की दृष्टा अवस्था क्या होती है? कोई व्यक्ति इस अवस्था पर कब पहुँचता है?
श्री श्री रवि शंकर:
यह चेतना की वह अवस्था है, जब आप को यह एहसास हो जाता है कि आपके प्रयासों से घटनायें नहीं हो रही है, और वे किसी सिद्धांत,और सृष्टि की किसी शक्ति के कारण संभव हो पा रही है | जब आप शारीरिक रूप से और अपनी बुद्धि क्षमता का शत प्रतिशत प्रयास कर लेते है तो फिर आपको अनुभव हो जाता है कि आप कुछ नहीं कर रहे होते है और घटनायें होती रहती है |
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दृढ़ मनोबल किसी भी तरह के धन का कोष है

प्रश्न: समृद्धी कैसे बढ़ाई जा सकती है?
श्री श्री रवि शंकर: केवल पैसा होना ही धन नहीं है। आपके पास बड़ी बैंक राशि हो, बड़ी रियासतें हों पर यदि मुख पर तनाव झलकता हो तो आप इतने दुखी नज़र आते हैं कि कोई आपको समृद्ध नहीं कह सकता।
समृद्धि केवल ढ़ेर सारा धन जमा करना नहीं है, समृद्धि का अर्थ है जीवन की भव्यता को मान्यता देना, जीवन का सम्मान करना। व्यक्ति का सच्चा धन उसका मनोबल है। धन का जीवन में होने का प्रयोजन क्या है? यही कि उससे आपका मनोबल बढ़े।

जिस धन से मनोबल नहीं बढ़ सकता, वह धन ही क्या? जिस धन से बीमारी आये, तो वह धन ही क्या? जिस धन से विवाद बढ़े , वो धन ही क्या? ठीक है ना?

धन भी कई प्रकार के होते हैं जैसे - विद्या धन, ज्ञान धन, स्वास्थ्य धन, मनोबल धन, वीर्य धन इत्यादि। यदि आप में मनोबल है तो कोई भी कार्य सम्भाल सकते हो, हर प्रबंध को कुशलतापूर्वक कर सकते हो।

प्रश्न : लोग प्यार देना तो सीख गये हैं पर कैसे प्राप्त हो यह नहीं जानते तो भीतर जो इतना प्रेम समाया हुआ है उसका क्या करें? देने और पाने में सब उलट पुलट होता जा रहा है!
श्री श्री रवि शंकर: मैंने बहुत बार इस विषय पर चर्चा की है। जब कोई आकर प्यार का प्रदर्शन करे, तुमसे बार बार कहे- "मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मैं तुमसे प्यार करता हूँ", तो तुम कान बंद करके वहाँ से भाग जाना चाहोगे, कहोगे ठहरो, यह बहुत हो गया, और तुम भाग निकलोगे!
हम प्रेम में भी सहज नहीं हो पाते क्योंकि स्वयं से अन्तर्मन की गहराई में नहीं मिल पाये हैं, नहीं पहचान पाये हैं कि हम कौन हैं? हमें यह पता ही नहीं कि हम जिस एक तत्व से बने हैं, वह है प्रेम। इसलिये जब तक हम स्वयं से नहीं जुड़ पाते, अन्य किसी से भी नहीं जुड़ पाते। सो कोई जब तुमसे सम्बंध बनाना चाहे और तुम्हें असहजता लगे तो वह यही दर्शाता है कि तुम स्वयं से नहीं जुड़े हो और इसी कारण प्रेम पाने में असमर्थ हो।

पहले स्वयं प्रेम का सम्मान करना सीखो, और जो प्रेम का सम्मान नहीं करते उन पर बिना समझे प्रेम न्योछावर मत करते फिरो। फिर प्रेम दर्शाना, प्रेम देना भी एक कला है। प्रेम देना यानि प्रेम करना। प्रेम कोई कृत्य नहीं है, अपने अस्तित्व की ही एक अवस्था है। तुम केवल वहाँ सहजता से, बिना किसी अपेक्षा से रहो और कहो - "मैं बिना किसी शर्त के तुम्हारे लिये हूँ, तुम जब चाहो उसे ले सकते हो।"
तुम्हारे में यह मनोबल रहते सब तुम्हें बेहतर समझ सकेंगे। और फिर एक बात, तुम किसी को जबरदस्ती नहीं समझा सकते कि तुम सच्चा प्रेम करते हो, तुम यह समय पर छोड़ दो उनको स्वयं समझने के लिये। ज़ोर जबरदस्ती से समझाने की कोशिश में बात ही उलटी पड़ सकती है!
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"अधिक अंतर्ज्ञान का अर्थ है अधिक सफलता"

KPMG magazine से श्री श्री रवि शंकर जी के साक्षात्कार के अंश

प्रश्न : विविधता की सबसे बड़ी महत्ता क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
अब हम दुनिया में अलग थलग नहीं जी सकते। हमारा ज्ञान और संचार विस्तृत होता जा रहा है, और दुनिया और छोटी होती जा रही है, इसलिये अब व्यवसाय, किसी एक भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित रह कर पनप नहीं पायेंगे। हमारे पास, विविधता का सम्मान करने के सिवा अब कोई रास्ता नहीं बचता। ये एक आवश्यकता है, इसमें अब कोई विकल्प नहीं है।

ये हमारे स्वभाव में है, बौधिकता और विकास का लक्षण है कि हम ये महसूस करें कि सभी संस्कृतियां, सभ्यतायें, विचारधारायें, सब हमारी हैं।

अफ़सोस है कि अज्ञान की वजह से हुई हूढ़ मत ही हमें विविधता को अपनाने से बाधित करती है। उदाहरण के तौर पर – २५ साल पहले जब हमने योरोप में योग, श्वांस प्रक्रियाओं और ध्यान के बारे में बात की, तब उसे अजीब समझा गया। उस समय पूर्वीय प्रभावों के प्रति पूर्वभावनायें प्रचलित थीं। पर अब लोग ये समझ गये हैं कि योग उनके स्वास्थ्य के लिये अच्छा है, और वे उसे अपना रहे हैं। ठीक उसी तरह आज के समय में कुछ इस्लामिक देशों में योग और ध्यान के प्रति पूर्वधारणायें हैं। इन सभी पूर्वधारणाओं को मिटाना होगा।

प्रश्न : क्या कंपनियों के भीतर विविधता की ओर ध्यान देते ही, उच्च पदों पर महिलाओं की कम प्रतिशत होने पर ध्यान ना देकर, कुछ अधिक करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
कई जगहों पर सबसे पहली कमी लिंग भेद ही नज़र आती है। लिंग भेद आजकल प्रत्यक्ष है। लिंग, धर्म, नागरिकता, सांस्कृतिक भिन्नता, इन सभी को नज़रंदाज़ करना चाहिये।

मैं ये नहीं कह रहा हूं कि आप ज़बरदस्ती किसी विशेष श्रेणी के व्यक्ति को काम दीजिये जब कि वो उसके काबिल ही ना हो। ये भी ग़लत होगा।

पहले काबलियत देखनी चाहिये। उसके बाद ही विविधता पर ध्यान दीजिये। विविधता के नाम पर हम ऐसे लोगों को ले आते हैं जिनकी योग्यता उस काम के काबिल नहीं होती है। इसकी वजह से व्यवसाय को नुक़्सान होता है।

विविधता लागू करने के लिये किसी नियम का सहारा ना लेकर, उसे स्वाभाविक रूप से आने दें। ये हमारे नज़रिये के बदलाव से आना चाहिये, ना कि सरकारी नियमों के तहत।

प्रश्न : नेताओं को शुरुवात कहां से करनी चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर
: नेताओं को बोर्डरूम से, दफ़तर से शुरुवात करनी चाहिये। एक उत्सव का माहौल बनाने के लिये, सही मनोभाव की आवश्यकता है, और सही मनोभाव को लाना ही होगा। इसमें टीम की सहभागिता की आवश्यकता हो सकती है, सब को ये मनोभाव अपनाना होगा।

एक उत्सव का माहौल – विश्वास, सहयोग, अपनापन – इन सभी को आना होगा। मुझे यक़ीन है कि लोग खुद को तरोताज़ा करने के इच्छुक होंगे ही, ज़रूरत है सिर्फ़ उनके सामने इसे कारगर तरह से रखने की। उन्हें मौका मिलना चाहिये। जब लोगों में सृजन शक्ति, ताकत और अपनेपन की कमी हो जाती है तो आखिरकर कंपनी को नुक़्सान होता है।

अब नियम और नियंत्रण का सैन्य शासन काम नहीं करता है। केवल प्रेरणा और उत्साहवर्धन ही कारगर तरीके हैं। ऐसा करने के लिये विश्व के विभिन्न भागों में प्रचलित प्राचीन सिद्धांतों को कार्यक्षेत्र में उतारने से काम का माहौल खुशनुमा हो जायेगा।

प्रश्न : क्या अगले २०-३० सालों में विश्व की व्यवस्था प्रणाली कुछ अलग ही होगी?

श्री श्री रवि शंकर :
हम पहले ही ये कह चुके हैं। भूतकाल में विश्व की व्यवसायिक व्यवस्था, वाणिज्य के दबाव पर चलती है, पर आज ग्लोबल मार्केट बहुत खुला हो गया है, और कई विकल्प मौजूद हैं। लोगों में पिछले सालों के मुकाबले, सजगता भी अधिक आ गयी है, और वे भ्रमण करना चाहते हैं। यहां नहीं तो कहीं और अच्छी नौकरी मिल जायेगी। इससे व्यवसायिक दृष्टि एकदम बदल गयी है। पहले ये अंचलों में बंटी हुई थी, क्योंकि आप एक नौकरी करना चाहते थे और नौकरियां कम थी।

प्रश्न : कार्य क्षेत्र को बेहतर कैसे बना सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
हमारे कार्यक्रम में एक बात आती है ‘Let out the steam and get into the team’ – ये हमारा नारा है। दूसरे शब्दों में, प्रबंधक का लेबल छोड़कर, अपनी कंपनी में एक खुला भाव लेकर सब के साथ बैठो। बैठ कर उनसे बात करो, उनसे अपना नज़रिया बांटो। इस तरह का आदान प्रदान शिक्षात्मक होता है। इससे लोगों में शक्ति आती है, और आपसी सहयोग बढ़ता है। इसके साथ हम श्वांस प्रक्रियाओं और व्यायाम को जोड़ कर एक ऐसी स्थिति बनाते हैं जिसमें सहभागी, स्वतंत्र हो कर तनाव के भावों को मिटा कर स्थिति को नये दृष्टिकोण से देखते हैं।

किसी भी व्यवसाय में आपको अंतर्ज्ञान की आवश्यकता होती है। जितना ही बौस का अंतर्ज्ञान विकसित होगा, उतनी ही व्यवसाय में सफलता प्राप्त होगी। अधिक अंतर्ज्ञान का अर्थ है अधिक सफलता, और यदि आपका अंतर्ज्ञान ग़लत है तो आप सफलता नहीं प्राप्त कर सकते।

हमारे कार्यक्रम का उद्देश्य है तनाव को कम करना और अंतर्ज्ञान को बढ़ाना – इससे कार्यक्षेत्र में सृजनात्मकता और उत्साह भी बढ़ता है। आज की व्यस्त दुनिया में लोग अक्सर थक जाते हैं और बीमारियां भी बहुत हैं। मानसिक बीमारियों पर योरोपियन यूनियन में ३-४ प्रतिशत GDP व्यय होता है, और ये ख़र्च कई सौ बिलियन यूरोज़ में जाता है।

वर्ल्ड हेल्थ और्गनाइज़ेशन के मुताबिक, योरोप में सभी बीमारियों में २० प्रतिशत हिस्सा मानसिक अस्वस्थता की बीमारियों का है। इस में अवसाद भी शामिल है जो चार में से एक व्यक्ति को जीवन में कभी ना कभी प्रभावित करता है। हमारे कोर्स में सिखाई गयी जीवन को बदल देने वाली प्रणालियों से लोगों को अपनी बीमारियों को मिटाने में बहुत सहायता मिलती है।

प्रश्न : क्या व्यवसायियों के लिये ये संभव है कि अपने दैनिक कार्य कलापों में वे नैतिकता का समन्वय कर सकें?

श्री श्री रवि शंकर
: व्यवसायों में अनैतिकता इसलिये प्रचलित है क्योंकि व्यक्तिगत रूप से लोगों में भय व्याप्त है। इस भय से आध्यात्मिक साधना के द्वारा निबटना होगा।
इस तरह जब आप में भय कम है, जब आप विश्वसनीय बनना चाहते हैं, जब आप प्रतिबद्ध होना चाहते हैं, नैतिक होना चाहते हैं, तब आप कभी ग़लत काम नहीं करेंगे जिनसे कि हज़ारों, लाखों लोग प्रभावित हो सकते हों। इसीलिये व्यवसायों को सामाजिक ज़िम्मेदारी उठानी चाहिये (Corporate Social Responsibility)। ये केवल एक बौधिक वस्तु नहीं है – ये हरेक व्यक्ति के हृदय से आनी होगी।

हमारे जैसे कोर्स इस प्रक्रिया में सहायतार्थ तैयार किये जाते हैं। जिन व्यवसायियों ने ये कौर्पोरेट कोर्स किया है उनके लिये हम ‘व्यवसाय और नैतिकता’ पर सफल सम्मेलनों का आयोजन करते हैं। वे आकर नैतिकता के साथ व्यवसाय करने के अपने सफल अनुभव यहां बांटते हैं।

इससे दूसरे व्यवसायियों को प्रेरणा मिलती है। फिर भी अक्सर लोग ये सोचते हैं कि बिना बे‍ईमानी के सफल नहीं हो सकते हैं। पर, ऐसा नहीं है। ये एक भ्रमात्मक बुलबुला है।

हां, संतुलन की आवश्यकता है – आप सामाजिक ज़िम्मेदारी उठा कर कंपनी को घाटे में नहीं जाने दे सकते हैं। और दूसरी तरफ़, आप अपने कर्मचारियों को परेशान कर के भी फ़ायदे में नहीं रहेंगे, क्योंकि परेशान कर्मचारी अंततः नौकरी छोड़कर चले जायेंगे। इन दोनों ही परिस्थितियों में आपकी नौका डोलने लगेगी। आपको बढ़िया संतुलन बनाये रखना है। आप अपने फ़ायदे पर भी नज़र रखें, कर्मचारियों का भी ख़्याल करें, और सामाजिक ज़िम्मेदारी भी उठायें।

प्रश्न : आपकी संस्था ने २५ सालों में ३० मिलियन लोगों के जीवन को प्रभावित किया है, और साथ ही बहुत प्रगति भी की है। इसकी व्यवस्था आपने कैसे की?

श्री श्री रवि शंकर
: मैंने कोई व्यवस्था नहीं की, मैंने उसे स्वाभाविक रूप से बढ़ने दिया। मैं उसकी प्रगति में रोड़ा नहीं बना। ये संस्था स्वयंसेवियों द्वारा चलाई जाती है, और हमारे पास नेता भी हैं। मेरा बस नाम जाता है सेवा प्रौजेक्टस में, और बाकी सब लोग काम करते हैं!

गंभीरता से बात करें तो, हम जो देते हैं वो लोगों के लिये बहुत उपयोगी है, और हम विविध प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करते हैं। हमारा अंतर्ज्ञान काम करता है और हम जो भी परियोजना हाथ में लेते हैं वो सफल होती है।
अब हम १५१ देशों में कार्यरत हैं, और हमारे ४१ मुख्य केन्द्र हैं, और कई शहरों में स्थानीय केन्द्र हैं। हमारे १०० स्कूल भी हैं जिन में शुल्क लिया जाता है, और १०८ स्कूल हैं जो निशुल्क हैं और ग़रीबों के लिये हैं।

इस स्वाभाविक प्रगति के लिये आवश्यक है धैर्य, दृढ़ता और शुद्ध संकल्प! इसमें ध्येय का ठीक ज्ञान होना आ्वश्यक है, ग़लतियों को संभालने का लचीलापन होना आवश्यक है, और अच्छे संकल्प से प्रगति के लिये दूर दृष्टि आवश्यक है।

किसी भी व्यवसाय की स्वाभाविक प्रगति के लिये, नेता को ज्वरित नहीं होना चाहिये, और इल्ज़ामबाज़ी में नहीं पड़ना चाहिये। इसका मतलब है कि उन्हें सीखना चाहिये! भूतकाल से सीखना चाहिये और भविष्य के लिये एक ध्येय होना चाहिये। और उन्हें सबकी इज़्ज़त करनी चाहिये, चाहे कोई अच्छा काम करे या ना करे।

प्रश्न : लोगों को अच्छा महसूस कराने के लिये क्या श्वांस प्रक्रियायें, ध्यान और अंतर्ज्ञान काफ़ी है?

श्री श्री रवि शंकर :
ये सही है! हमें स्कूल या घर पर नकरात्मक भावनाओं जैसे कि दुख, ईर्ष्या, या क्रोध से निबटना नहीं सिखाया गया। इसका ज्ञान नहीं दिया गया। पर अगर आपको अपने क्रोध, अपनी भावनाओं को अपनी श्वांस के ज़रिये संभालना सिखा दिया जाये तो इससे आपको बहुत फ़ायदा होता है। श्वांस और ध्यान के ज़रिये ये ज्ञान पाना संभव है।

मैं सदियों से चीन, जापान और भारत में बौध और हिंदु मान्यताओं के साथ रहा हूं, पर हमारी प्रणाली और पुरानी प्रणालियों में फ़र्क ये है कि, हमारी प्रणाली आज के समय के लोगों के लिये जिनके पास समय की कमी है, उपयुक्त हैं। ये प्रणाली आज के समाज में उपयोगी और सुलभ है।

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"जो विश्वास शक से होकर गुज़रता है और फिर भी बना रहता है, वही सच्चा विश्वास है"

पिछली पोस्ट के शेष अंश:

मुझे एक घटना याद है जो पिताजी मुझे बताते थे। मेरे दादीजी ने दादाजी को अपना साढ़े दस किलो सोना महात्मा गांधी को देने के लिए दिया और दादाजी २० साल तक महात्मा गांधी के साथ रहे। तुम्हें पता है, भारतीय महिलायें सोने से बहुत प्रेम करती हैं इसलिये विवाह इत्यादि उत्सवों में उन्हें आमतौर पर उपहार में सोने के आभूषण दिये जाते थे। मेरी दादीजी के पास साढ़े दस किलो सोना था। सोचो यह उस समय में कितना होगा! एक सोने की चेन को छोड़कर उन्होंने बाकी सब सोना महात्मा गांधी को दे दिया जब उन्होंने भारत का स्वतंत्रता संग्राम शुरु किया। कुछ देने के लिये कोई तुम्हें मजबूर नहीं करता, पर जब तुम कुछ देते हो तो तुम्हें अपने भीतर एक संतोष का अनुभव होता है।
मैं कहता हूँ अपने जीवन में दो बातें आवश्यक हैं – एक तो अधिक मुस्कुराओ और जितना हो सके उतना सेवा कार्य करो।

प्रश्न : अहंकार और आत्मविश्वास में क्या संबंध है?

श्री श्री रवि शंकर :
किसी और की उपस्थिति में सहज ना होना अहंकार है। तुम कहीं भी और किसी के साथ भी सहज हो तो यह आत्मविश्वास है। अहंकार का इलाज है - सहजता। सहज होना और आत्मविश्वास होना एक साथ ही होता है। ये आत्मविश्वास से अलग नहीं किया जा सकता। जब तुम में आत्मविश्वास होता है तो तुम सहज होते हो। अगर तुम सहज हो तो आत्मविश्वास भी होगा।

प्रश्न : क्या खुश होने के लिये धन का होना आवश्यक है?

श्री श्री रवि शंकर : इसमें कोई शक नहीं है कि जीवन की रोज़मर्रा की आवश्यकताओं के लिये तुम्हें कुछ धन की आवश्यकता है, पर धन से तुम खुशी खरीद नहीं सकते हो। खुशी आती है ज्ञान से।

प्रश्न : आप हर अवस्था में मुस्कुरा कैसे लेते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : मुस्कुराहट हमारा brand mark है। मुस्कुराहट हमारी पहचान है। अगर तुम किसी को देखो जो मुस्कुरा नहीं रहा है और कहे कि उसने Art of Living कोर्स किया है, तो उसकी बात पर यकीन मत करना। मुझे यकीन है कि यहां मौजूद लोगों में जिन्होंने भी सही माइने में ये कोर्स किया है, मेरी बात से सहमत होंगे।

प्रश्न : जीवन में भीतरी संतुष्टि अनुभव करने के लिये सेवा का क्या योगदान है?

श्री श्री रवि शंकर : जीवन में हमारे पास कोई ध्येय होना चाहिये। मेरा ध्येय है अधिक से अधिक लोगों के जीवन में खुशी लाना। अगर हम बैठ कर हर समय सिर्फ़ अपने बारे में ही सोचते रहें तो हम विषादग्रस्त हो जायेंगे। हमें देखना चाहिये, ‘मैं सेवा कैसे कर सकता/सकती हूँ? मैं दूसरों के लिये उपयोगी कैसे हो सकता/सकती हूँ?’ ये विचार बहुत उपयोगी है। बहुत, बहुत, बहुत उपयोगी है।

Art of Living एक मंच प्रदान करता है जहाँ सब मिल कर सेवा कार्य कर सकें। तुम्हें पता है, ‘जब यूनाईटेड नेशन्स ने वृक्षारोपण के लिये ‘Stand up and take action’ का एलान किया तो Art of Living के सदस्यों नें विश्व भर में ५५० लाख वृक्ष लगाये।
हम सब मिलकर कोई सेवा कार्य कर सकते हैं। हिंसा कम कर सकते हैं, तनाव कम कर सकते हैं, अपनेपन का भाव फैला सकते हैं, और प्रेम और शांति की सकारात्मक उर्जा फैला सकते हैं। हम सब मिलकर ये करेंगे। क्या हम सब लोग प्रतिबद्ध हैं ऐसा करने के लिये? (सभी श्रोता एक स्वर में हाँ कहते हैं।’)

प्रश्न : अद्वैत का आधार क्या है?

श्री श्री रवि शंकर : अद्वैत quantum physics है। Quantum physics कहती है कि सभी अणु एक ही स्पंदन की लहर हैं। इस तरह पूरा ब्रह्माण्ड एक ही पदार्थ से बना है – मैं, तुम, वो, सभी लोग और सभी कुछ उसी एक तत्व से बना है। और उस तत्व का स्वभाव है - आनंद। अद्वैत यही कहता है। उसके अनुभव की एक झलक मात्र मिल जाने से ही तुम में इतनी शक्ति और स्थिरता आ जाती है कि कुछ भी तुम्हें हिला नहीं सकता, कोई तुम्हारी मुस्कुराहट नहीं छीन सकता।

प्रश्न : आपको इतनी हिम्मत कहाँ से प्राप्त होती है?

श्री श्री रवि शंकर: हिम्मत कहाँ से प्राप्त होती है? अद्वैत से। ये जानने से कि तुम में ऐसा कुछ है जो बदल नहीं रहा है। मौन, शांत चित्त और ध्यान के अनुभव से तुम्हें भीतर से बहुत हिम्मत मिलेगी।

प्रश्न : Art of Living बहुत बढ़िया काम कर रहा है। क्या ३० प्रतिशत लोगों के विषादग्रस्त होने पर और आने वाले दशक में यह संख्या ५० प्रतिशत होने की संभावना में मानव जाति के लिये कोई उम्मीद रह जाती है? क्या कोई आशा है?

श्री श्री रवि शंकर : हां, और हम सभी को इसके लिये काम करना है। तुम्हें पता है कि हमने शुरुवात भारत में एक छोटे से गांव से, ५० लोगों के साथ की थी। हमारे पास कोई साधन नहीं थे, कार्यकर्ता नहीं थे, पर हमारे पास एक दृष्टि थी – हमें विश्व में बहुत लोगों तक पहुँचना है। इस तरह इन तीस सालों में हम लाखों लोगों तक पहुँचें हैं। ये संभव है। मोबाइल की पंहुच समस्त विश्व में हो गई है। अगर मोबाइल समस्त विश्व तक पहुँच सकता है तो क्या ज्ञान और करुणा समस्त विश्व में नहीं पहुँच सकते हैं? हमें प्रयास करना होगा। ठीक है?

प्रश्न : मैंने विश्वास खो दिया है, मैं उसे दोबारा कैसे प्राप्त करूं?

श्री श्री रवि शंकर : विश्वास को दोबारा प्राप्त करने के लिये कोई प्रयास मत करो। अपने हृदय की सुनो। विश्वास कभी खो नहीं सकता है। जितना शक कर सकते हो करो। सत्य हमेशा शक पर विजयी होता है। सत्य इतना मज़बूत होता है कि शक उसे नष्ट नहीं कर सकता है। तो शक करना अच्छा है। जो विश्वास शक से होकर गुज़रता है और फिर भी बना रहता है, वो सच्चा विश्वास है।
तुम में से कितने लोगों ने अभी तक भारत नहीं देखा है? तुम में से कितने लोग भारत देखने आना चाहते हो? ओह! बढ़िया है! यहाँ से हम एक टोली की भारत यात्रा की व्यवस्था करेंगे। भारत में भी तुम्हारा अपना एक घर है। तुम सब भारत आओ, एक हफ़्ता, दस-पन्द्रह दिन...जो भी तुम्हारे लिये सम्भव हो। वहाँ आकर तुम सब सेवा कार्यों की एक झलक देख सकते हो।

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"समय से पहले जरूरत से ज्यादा मिल जाना ही सिद्धि है"


प्रश्न : गुरूजी,यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण हो सकता है परन्तु मुझे धन की समझ नहीं है| क्या आप मेरे लिए इसका वर्णन करेंगे? यह कितना महत्वपूर्ण है? मुझे यहाँ लाने के लिए धन्यवाद|

श्री श्री रवि शंकर :
वेदों के साहित्य में लिखा है धर्म सच्चाई है| तब अर्थ आता है जिसका मतलब है माध्यम। धन एक माध्यम है| तब इच्छाएं आती है| और फ़िर मोक्ष आता है| इस तरह धर्मस्य मूलं अर्थ| इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है| यदि सभी समृद्ध होंगे तो कोई भी चोरी नहीं करेगा| धर्म का आधार समृद्धि है| और धन का आधार राष्ट्र है| इस तरह ये सब सम्बंधित है| धन महत्वपूर्ण है परन्तु धन केवल एक साधन है| यह सब कुछ नहीं है| धन को कभी भी ख़ुशी से नहीं जोड़ना चाहिए| यदि आप देखो तो पाओगे यहाँ तक कि गरीब से गरीब लोग भी खुश होते हैं | वास्तव में वे ज्यादा खुश हैं| धन सुरक्षा की एक गलत धारणा बन जाता है| आप सोचते हो यदि आपके पास धन है तो सब कुछ है।
धन का ख्याल आराम के लिए है| आप धन क्यों चाहते हो? आराम के लिए| परन्तु धन आपको केवल एक तरह का आराम दे सकता है| आराम के तीन प्रकार हैं| शरीरिक आराम,भावात्मक और मानसिक आराम, और अध्यात्मिक आराम यां आन्तरिक आराम| जबकि धन केवल एक तरह का आराम दे सकता है| यह भावनात्मक और अध्यात्मिक आराम नहीं देता| यह आवश्यक है| जैसे हम जीवित रहने के लिए खाते हैं, परन्तु यदि हम केवल खाने के लिए जीवित रहे (हंसी) तो हमारे साथ बुनियादी तौर पे कुछ गलत है|
ग्रन्थ और प्राचीन लोग बड़ी खूबसूरती से बताते हैं कि आपको अपने धन को इस्तेमाल कैसे करना चाहिए। आप धन को २०% के पांच भागों में बाँट लो| एक भाग आप अपने इस्तेमाल के लिए रखो| एक भाग आप बचा लो| २०% आप तुरंत ज़रुरतों पर खर्च कर लेते हो| २०% आप परिवार के लिए खर्च करते हो जिससे मेरा मतलब है तत्काल जरूरतों के लिए| २०% आप समाज के लिए इस्तेमाल करते हो| एक वह है जिसे आपद धन कहतें हैं जो आपातकालीन,भविष्य की जरूरतों के लिए होता है| २०% जो आप बचाते हो, उसे बाद में अपने मित्रों,परिवार या अपने वंशजों को दे देते हो|
एक और विचारधारा है जो कहती है १०% दान करो| ३०% बचत करो| ६०% को जैसे चाहो इस्तेमाल करो|
मैं कहूँगा आपको १०% भी दान देने की जरुरत नहीं है| कम से कम २% या ३% अपनी आमदनी से अलग रख दो| यदि आप बिलकुल भी दान नहीं देते तो आपका पैसा कचेहरी में मुकद्दमों और अस्पतालों में खर्च होगा| इसलिए आपके धन का कुछ हिस्सा २% या ३% अलग रखा जाना चाहिए| यहाँ तक कि १% भी चलेगा| २% फिर ३| २ से १०%दुनिया के लिए अलग रखो| तब आपके मन में लालच नहीं आएगा| लालच आदमी को खत्म करता है और बाद में उसके व्यापर को भी खत्म कर देता है|
परन्तु लक्ष्य ठीक है| आपके पास लक्ष्य होना चाहिए| आप में और धन कमाने की कामना होनी चाहिए| और अधिक धन बनाना एकदम गलत नहीं है| धन कमाओ| समझ गए आप?इस तरह से धन के लिए संतुलित रवैया होना चाहिए| धन ही जीवन में सब कुछ नहीं होना चाहिए| यह आपको बनाये रखने के लिए और शरीर को आराम देने के लिए होना चाहिए| यह केवल आध्यात्मिकता है जिससे पूर्ण विश्राम मिलता है| और यदि मानसिक और अध्यात्मिक आराम होगा, जब आप ईश्वर से जुड़े हों तो आप धन के बारे में सोचते भी नहीं| चीजें अपने आप आती हैं|
इस आश्रम को अगले साल २० साल हो जायेंगे| उससे पहले ५ बर्ष तक जब मैं उत्तरी अमेरिका में आता था तो हम यहाँ वहां किराये पर जगह लेते थे| बहुत सारे लोग आते थे| हमें शाकाहारी भोजन के लिए रसोई चाहिए थी| होटल में अडवांस कोर्स करने में मुश्किल होते थे| तब मैंने कहा अगली बार जब मैं आयूँ तो हमारे पास अपना स्थान होना चाहिए जहाँ हम पवित्र वातावरण रख सकें, ऐसे स्थान पर ध्यान लगता है और स्थान का भाव अधिक सात्विक,अधिक अनुकूल और प्रकृति के साथ लय में होता है| तब हमारे कुछ भक्त लोग यहाँ आये और स्थान के लिए छान बीन करने लगे परन्तु हमारे पास इतने पैसे नहीं थे| पर हमें बिलकुल भी चिंता नहीं हुई| हम केवल योजना बनाते हैं और बाकि सब बातो का ध्यान अपने आप रखा जाता है| सभी ने थोड़ा थोड़ा कुछ करना शुरू किया| और यह जगह सुंदर बन गई। इसे ही सिद्धि कहतें हैं| सिद्धि का मतलब है आपको जो चाहिए समय में मिल जाता है|
भारत में एक कहावत है - आप बादाम खाना चाहते हो और ये आपको तब मिलते हैं जब आपके सारे दांत गिर जाते हैं| (हंसी) आप बादाम के लिए प्रार्थना करते हो और जब आपको बादाम मिलते हैं आपके दांत जा चुके होतें हैं| इसका कोई फायदा नहीं| इस तरह सिद्धि का मतलब है समय से पहले जरूरत से ज्यादा मिल जाना|
हम कभी यह चिंता नहीं करते कि काम कैसे होगा? इसे ही सिद्धि कहते हैं। जब आध्यात्मिक उर्जा होती है तो काम सहजता से ही पूर्ण होते चले जाते हैं। इस आत्म विश्वास के साथ चलो| पर हमे ज़्यादा हवा में भी नहीं रहना चाहिए। थोड़ा सा व्यवहारिक भी होना चाहिए| जब तक आप उस अंदरूनी अध्यात्मिक निर्भरता,अध्यात्मिक ऊंचाई तक नहीं पहुँच जाते,आपको तर्कसंगत होना चाहिए,और तर्कसंगत तरीके से जागरूक होकर आपको पैसों का प्रबंध करना है। और यह आप कैसे कर सकते हो? जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा एक उपर उठा होगा| इस तरह यह एक नाच की तरह है| नाच कैसे होगा? यदि दोनों पैर कीचड़ में दबे होंगे तो क्या आप नृत्य कर सकते हो? और यदि दोनों पैर उपर हवा मैं होंगे तो भी आप गिर जाओगे| दोनो परिस्थितियों में नाच नहीं हो सकता| नाच तभी हो सकता है जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा और दूसरा उपर हवा में| यही सम्पूर्ण ज्ञान है - व्यवहारिक लेकिन सूक्ष्म,अध्यात्मिक दृष्टिकोण से|
परन्तु मैंने कुछ लोगों को देखा है जो बहुत अधिक काल्पनिक होतें हैं| वे कोई काम नहीं करते परन्तु बैठे रहतें हैं,'मुझे २० मिलियन डॉलर चाहिए, मुझे १०० मिलियन डालर चाहिए|' वे थोड़े पैसों के लिए भी नहीं सोचते| :हंसी) केवल मिलियन के लिए सोचतें हैं| हर दिन इसके लिए प्रार्थना करते हैं| कुछ देर बाद आप जाते हो,खाना पकाते हो और भूल जाते हो| यह सही नहीं है|
इस संतुलन को जानो|

प्रश्न : गुरूजी मुझे लगता है मैं अपने परिवार में किसी की मृत्यु के शोक से नहीं निकल पाया हूँ और यह मुझे अपने सम्बन्धों और अपना निजी परिवार की ओर चलने से रोक रहा है| मैं इस ओर आगे बढ़ना चाहता हूँ परन्तु ऐसे लगता है मैं स्वयं ही अपना शत्रु हूँ| गुरूजी कृपया मेरी मदद करें| मैं धैर्यपूर्वक आपके जबाब का इंतजार कर रहा हूँ|

श्री श्री रवि शंकर :
जब आप ध्यान करते हो,भजन करते हो तो इसकी उर्जा उन तक पहुँच जाती है| आप शांत हो तो शांतिपूर्ण भावनाएं उन तक जाती है| इसीलिए आध्यात्मिकता को संस्कृत में साधना भी कहतें हैं,इसका मतलब है असली दौलत,असली मुद्रा जो यहाँ वहां जा सकता है|(हंसी) दूसरी डालर मुद्रा दूसरी तरफ़ नहीं चल सकती|इसीलिए हम कहतें हैं जब आप सत्संग करते हो,गाते हो,ध्यान करते हो,ये सकरात्मक भाव उन तक जाते हैं| और जब ऐसे भावनाएं आती है उनका निरीक्षण करो,ध्यान से देखो| वे आयेगीं और लुप्त और गायब हो जायेंगीं| हाँ? आगे बढ़ो|

प्रश्न : गुरूजी, क्या आप दूसरे ग्रहों पर जीवन के बारे में कुछ बताएँगे? क्या उनके पास प्रेम है जैसे हमारे पास पृथ्वी पर प्रेम। जय गुरुदेव|

श्री श्री रवि शंकर :
प्राचीन लोगों को १४ ब्रह्मांडों का पता था| १४ में से हम बीच में हैं-७ उपर ७ नीचे| अनंत ब्रह्मांड है, अनंत ग्रह है केवल एक ही नहीं है| यहाँ पर भी अस्तित्व के अलग अलग स्तर हैं| जो हम देखते हैं वह केवल एक भाग है| भौतिक विज्ञान भी यही कहता है।यहाँ पर भी बहुत से स्तर हैं| हाँ? परन्तु यह एक ब्रह्मांड हमारे लिए बहुत अच्छा और पर्याप्त बड़ा है| (हंसी)अभी इसी के बारे में सोचते हैं।

प्रश्न : गुरूजी, यह इतना सुंदर ज्ञान देने के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ| मुझे बहुत जिज्ञासा होती है कि यह अंतर्दृष्टि कहाँ से आती है| जब मैं ध्यान करता हूँ कभी कभी इसके बाद शांत हो जाता हूँ और प्रभावकारी भी,परन्तु ब्रह्मांड के रहस्य अपने आप नहीं पता चलते| इसकी बजाय मैं इसी तरह के नाटक या आत्म सम्मोहन में फंस जाता हूँ| यह रास्ता मेरे लिए अच्छा है| इसका मुझे विश्वास है|परन्तु मुझ में धैर्य नहीं है|मुझे आपके प्रकृति और ईश्वर के बारे में कहे हुए शब्द शहद जैसे लागतें हैं जिनके लिए मुझे भूख है| क्या आप इसी विषय में कुछ कहेंगे| मैं प्रकृति के साथ गहरा सम्बन्ध महसूस करता था| आजकल मैं रोबोट की तरह महसूस करता हूँ| क्या मुझ में अनुग्रह नहीं रहा या कोई और बात है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं नहीं| मुझे लगता है आपके पास बहुत समय है| आप बैठकर अपने बारे में बहुत सोचते रहते हो| व्यस्त हो जाओ| आप जानते हो जितना अच्छा काम आप करते हो, अपने आसपास सकरात्मक वातावरण और भाव बनाते हो| जब आप सकरात्मक भाव बनाते हो तो आपको अपने भीतर गहरे जाने में मदद मिलती है| यह आवश्यक है कि दूसरों का ध्यान रखा जाए और जो आप के पास है दूसरों के साथ बांटा जाए| जिस तरह भी आप कर सकते हो करो| किसी प्रोजेक्ट में शामिल हो जाओ| ध्यान करो| बैठ कर चिंता मत करो,'ओह आज मुझे यह अनुभव हुआ| कल क्या होगा|' यह तो आते जाते रहेंगे| आप इन सब अनुभवों से ज्यादा हो।
एक साधक को क्या करना होता है ,जो भी अनुभव हो, चाहे सबसे अच्छा अनुभव हो, को भी सवीकार करो और उसका समर्पण करो।
स्वीकारना और समर्पण करना, दोनो ही ज़रुरी हैं। यदि आप केवल त्यागने की कोशिश करते हो तो आप उनको रोकने की कोशिश कर रहे हो| यदि आप केवल स्वीकार करते हो तो आप उनको पकड़ लेते हो| इसीलिए आपको दो हाथ दिए गए हैं| एक तरफ़ से आप स्वीकार करते हो और दूसरी तरफ़ आप समर्पण कर देते हो।यह अनुभव तो आते जाते रहतें हैं ,कोई बड़ी बात नहीं|

प्रश्न : गुरूजी, कल रात आपने कहा था कि ,'यदि आप जो कर सकते हो नहीं करते हो तो आपकी चेतना में आपको पीड़ा होती है। मुझे पता है मुझमें बहुत सी योग्यताएं हैं,परन्तु कभी कभी यह बहुत कठिन काम लगता है| मैं हमेशा अपनी तरफ से अच्छा कार्य करती हूँ,हमेशा सेवा करती हूँ| मैं सेवा को बिना बोझ समझे कैसे कर सकती हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
केवल उतना ही करो जितना तुम कर सकते हो| कभी कभी आप प्रतिबद्धता लेते हो| उस क्षण यह बहुत अधिक लगता है| परन्तु यह समाप्त हो जाता है| उस प्रतिबद्धता को पूरा करो और फ़िर उसके बारे में सोचो भी मत| आपको पता है यदि आप सोचोगे ,'मैंने कितना सारा काम कर लिया' तब वह बोझ लगने लगता है| हर रोज आप में नई शक्ति आ जाती है| अगर हम देखें हमने कितना हवा,पानी और भोजन का उपभोग किया है तो हम हैरान रह जाएंगे। इसकी कोई गिनती ही नहीं है| इसलिए आप जो सेवा करते हो उसे गिनो मत| जो आपने उपभोग किया है उस सब के मुकाबले में यह बहुत कम है|

प्रश्न : जब मुझ पर करो या मरो जैसा दबाव होता है तो मेरे अंदर जो भी अच्छा है बाहर आ जाता है| यह वह समय होता है जब अपनी इच्छाओ और इरादों को पूरा करने के लिए मेरे पास प्रकाश की किरण की तरह तेज जैसी एकाग्रता,मानसिक शांति,नियन्त्रण और प्रेरणा होती है| परन्तु जब मैं खुश,विश्राम में और आनंद में होता हूँ तो मुझ में वह मानसिक शांति और अपनेआप को प्रेरित करने की शक्ति नहीं होती| मैं इस पैटर्न को कैसे बदल सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तो किसी को आप पर ऐसा दबाव डालने के लिए कहो।सुनो यदि आपको लगता है 'मेरा अच्छा तभी बाहर आता है जब मैं खतरे में हूँ, यां दबाव में हूँ’ तो आपने ऐसा इरादा बना लिया है,ऐसा विचार मन में बना लिया है| इसलिए ऐसा ही होता रहा है|
आप तब भी उतनी ही उर्जा और एकाग्रता से काम कर सकते हैं जब आप खुश होते हो,जब आप आनंद में होते हो,जब आप मुक्त होते हो। इसलिए जब आप इस पैटर्न के प्रति सजग हो जाते हो तो यह आपकी जिम्मेवारी है कि आप इससे बाहर आएं| कोई और आपकी मदद नहीं कर सकता। केवल आप अपनी मदद कर सकते हो| आप कह सकते हो 'अभी आज मैं खुश हूँ, मैं ऐसा करने जा रहा हूँ!'

प्रश्न : गुरूजी,यह पहली बार है मैं आपकी धन्य महिमा देख रहा हूँ| क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मैं स्वयं को सम्मानित और प्रेम करना कैसे सिखा सकती हूँ?मैं अपने शरीर को दुःख देती हूँ क्योंकि मैं अपने आप को किसी योग्य नहीं समझती| मुझे क्या करना चाहिए?आपका जबाव बहुत महत्वपूर्ण है| जय गुरुदेव|

श्री श्री रवि शंकर :
सबसे पहले यह मत सोचो कि आप खुद से प्यार नहीं करते| यह किसने कहा? यहाँ तक जो व्यक्ति आत्महत्या करते हैं वे भी खुद से प्यार करते हैं| वे अपने आप से बहुत प्यार करते हैं और इसलिए पीड़ा नहीं चाहते| पीड़ा सहन नहीं कर सकते| पीड़ा से छुटकारा चाहते हैं| इसलिए जब लोग पीड़ा या दुःख सहन नहीं कर सकते,वे ख़ुशी चाहते हैं,वे आत्महत्या कर लेते हैं| इसलिए कि वे खुद को बहुत प्यार करते हैं| वे दूसरों से प्यार नहीं करते| यदि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपनी माता या पुत्री या पत्नी या और कोई प्रिय को प्रेम करे तो आत्म हत्या कैसे कर सकता है?यदि आपको दूसरों की फ़िक्र होगी तो आप कभी आत्महत्या नहीं कर सकते|
उन्हें पता होता है कि यदि वे खुद को फंदा लगा लेंगे, वे अपने प्रिय जनो के लिए समस्या खड़ी कर देंगे| वे बहुत दुखी हो जायेंगे।
उनका यह सोचना, "मैं उन्हें उदास नहीं कर सकता,मैं उन्हें रुलाना नहीं चाहता| मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ| यदि मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ तो मैं खुद को दुःख क्यों दूँ? मैं केवल अपनी ख़ुशी के बारे में सोच रहा हूँ,अपनी तकलीफ के बारे में सोच रहा हूँ| मैं आराम चाहता हूँ,ख़ुशी चाहता हूँ| मैं खुद को बहुत अधिक प्यार करता हूँ| तभी मैं खुद को फंदा लगाता हूँ" उन्हे कभी ऐसा कदम उठाने नहीं देगा।
इस तरह अपने लिए अपने प्यार पर शंका मत करो| कौन कहता है आप खुद को प्यार नहीं करते? यह असम्भव है क्योंकि आप स्वयं प्रेम हो|यह केवल कहीं खो गया है| कहीं आप इसे महसूस नहीं कर पा रहे हो| और आप सही जगह पर हो|अभी तक कोई भी माँ इस ग्रह पर बुरी पैदा नहीं हुई है| एक माँ के रूप में ऐसा मत सोचो कि आप बुरी या कुछ और हो। यह असम्भव है| हाँ? विश्राम में रहो और अपना काम करते आगे बढ़ो|
जो हो गया उसके बारे ज्यादा विश्लेषण मत करो। क्योंकि धरती पर कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरी तरह दोष से मुक्त हो| हर कार्य में कहीं ना कहीं कुछ दोष होता ही है। और बुरे से बुरे कार्य में भी कुछ अच्छा होता है। अच्छे से अच्छे कार्य में भी २ प्रतिशत दोष होता है। इसलिए दोष पर इतना ध्यान मत दो।

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"दान संपत्ति को शुद्ध करता है|"


मिडवेस्ट एरलाइन सेंटर
मिलवॉकी

२३ एप्रिल, २०१०

प्रश्न : हम ईश्वर को क्यों ढूँढते हैं जब कि वो तो हमारे भीतर ही है|

श्री श्री रवि शंकर :
क्योंकि हमें पता नहीं है, हमारे मन में उसके बारे में सिर्फ़ एक धारणा है| तुम्हें ईश्वर का पूर्व अनुभव है| अगर तुम्हें मालूम ही न हो कि आम का अस्तित्व है, तो तुम उसे तलाश करने नहीं जाओगे| तुम किसी भी चीज़ जैसे 'बर-बर' की तलाश में नहीं निकलते हो, क्योंकि तुम्हें मालूम है कि 'बर-बर' जैसी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है| तो भूतकल में तुम्हें ईश्वर का अनुभव हुआ है, पर वर्तमान में वो नहीं है| ईश्वर को इधर-उधर मत ढूँढो| अपने भीतर गहराई में जाओ, भीतर देखो| विश्राम करो| वो तुम्हारे भीतर है|

प्रश्न : क्या सचमुच परम सत्य का अस्तित्व है?

श्री श्री रवि शंकर :
आदि शंकराचार्य ने कहा है कि सत्य की परिभाषा वो है जो समय से अछूती है| सत्य वो है जो कल भी था, आज भी है और कल भी रहेगा| तो इस परिभाषा के हिसाब से शारीर और मन सत्य नहीं हैं| सत्य संपूर्ण जगत कि बुनियाद है| हमारे अस्तित्व के केंद्र में कुछ है जो कभी नहीं बदलता और वही परम सत्य है| इसीलिए जब तुम वृद्ध हो जाते हो तब भी तुम्हें लगता नहीं है कि तुम वृद्ध हो गए हो| मन के किसी कोने में हमें मालूम है कि हम में कुछ है जो कभी नहीं बदलता और ना ही मरता है|

प्रश्न : क्या आध्यात्मिक होने के लिए धार्मिक होना ज़रूरी है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम कैसे रहते हो, कैसा महसूस करते हो, और जीवन और ब्रह्मांड के पहलुओं से कैसे जुड़े हो, ये अध्यात्म है| ये सभी धर्मों का निचोड़ है| धर्म के साथ अध्यात्म मिल जाए तो अद्भुत है, पर अध्यात्म के बिना धर्म विनाशकारी होगा!

प्रश्न : हम आनेवाली पीढ़ी के लिए आतंकवाद को किस तरह मिटा सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
आतंकवाद तब उठता है जब कोई ये सोचने लगे कि सिर्फ वही स्वर्ग में जायेगा और बाकी सब लोग नरक में जायेंगे| वे सोचते हैं कि वे सबको अपने रस्ते पर चलना सिखा दें ताकि वे भी स्वर्ग में जा सकें| इस तरह की संकुचित विचार-धारा ही दुःख का कारण है| यदि हर बच्चा बहुसांस्कृतिक वातावरण में शिक्षित हो तो उसकी सहनशीलता ज़रूर विकसित होगी| अगर अफ्गानिस्तान के बच्चों को थोड़ा उनके मूल धर्म के बारे में, और थोड़ा हिन्दू, इसाई और दुसरे धर्मों के बारे में सिखाया जाता तो वे शायद इतने असहिष्णु नहीं होते और तालिबान खड़ा नहीं होता| उन्हें बुद्ध और उपनिषद की महान बातों के बारे में थोडा-बहुत मालूम होना चाहिए| कृष्ण ने वही कहा जो कि यीशु ने| बहु-धार्मिक परवरिश विश्व में प्रेम और संवादिता ले आयेगी|
अंतर-धर्मिक शिक्षण और उसके परिचय से प्रेम और संवादिता ज़रूर आयेगी| यदि सभी देश अपने बजट में से २% ज्ञान और बुद्धिमता को सारे विश्व में फ़ैलाने में लगायें तो दुनिया का हरेक बच्चा एक ज्यादा खुश इन्सान बन सकेगा|
भारत से एक छोटी उम्र कि महिला 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' की ओर से आईवरी कोस्ट में सिखाने के लिए गयीं| आईवरी कोस्ट में इस्लाम और ईसाई सम्प्रदायों में काफी अन-बन है| वो लोग अलग-अलग गांवों में रहते हैं और सदियों से वे एक दुसरे के प्रति ज़रा भी सहन शील नहीं रहे हैं| उस महिला के वहां रहते हुए सिर्फ एक महीने में उसके कार्य की वजह से दो अलग - अलग धार्मिक सम्प्रदायों के बीच बात-चीत शुरु हुई| मुसलमानों ने ईसाई गाँव में स्कूल खुलवाया| ईसाईयों ने मुसलमानों के लिए रोड और शौचालय बनवाये| ये चमत्कार बहुत कम समय में हुआ| अगर एक व्यक्ति इतना बड़ा बदलाव ला सकता है तो सोचो अगर हम सब साथ मिल जाएँ तो क्या हो सकता है| अगर हम साथ चलें तो कुछ बड़ा हासिल कर सकते हैं|

प्रश्न : आध्यात्मिक जीवन की खोज में धन की क्या जगह होनी चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
समस्या तब होती है जब तुम पैसे जेब में ही नहीं बल्कि दिमाग में भी ले के घूमते हो| वैसे भी रात-दिन इसके बारे में सोच-सोच के क्या फायदा जब जेब खाली हो? पैसा एक साधन है जीवन को चलाने का, जीवन का लक्ष्य नहीं| विश्वास रखो कि तुम्हें जब भी जितने पैसों कि ज़रुरत होगी, मिल जायेंगे| इस आस्था के साथ प्रयत्न करो और आगे बढ़ो| इसके आलावा जो भी तुम कमाते हो उसका २-३% समाज के लिए खर्च करो| हम इसे धन-शुद्धि कहते हैं|
संस्कृत में एक शब्द है अन्न शुद्धि| इसमें चावल में घी डालने को कहा गया है| अगर तुम बिना कुछ डाले चावल खाओ तो वो तुम्हारे शारीर के लिए इतना अच्छा नहीं है क्योंकि इससे तुम्हारे शारीर में शक़्क़र का प्रमाण एकदम से बढ़ जाता है| तो इस में ज़रा-सा घी डालने से शक़्क़र को स्टार्च में बदलने कि प्रक्रिया धीमी हो जाती है| इस तरह पाचन क्रिया धीमी पड़ने से तुम्हें डायबिटीस होने का खतरा कम रहता है| इसलिए हम कहते हैं घी डालने से चावल शुद्ध हो जाता है| इसी तरह ज़रुरत-मंदों को देने से धन शुद्ध हो जाता है| 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' गाँव के स्कूलों में सेवा-कार्य कर रही है|
'डॉलर अ डे' कार्यक्रम में हम बच्चों को भोजन, कपड़े और शिक्षा दिलाते हैं| हमारे पास इस तरह के ज़रुरत-मंदों के लिए ऐसे १०० स्कूल हैं| ये बच्चे को ज़बरदस्ती के बाल-श्रम से छुटकारा दिलाता है| इससे उनके सर से बोझ उतर जाता है | ये बच्चे क्षेत्र में पढ़नेवाली पहली पीढ़ी बनते हैं और ये बदलाव बहुत प्रभावशाली है| ये ऐसा है जैसे किसी को मछली देने के बजाए उसे मछली पकड़ना सिखाना ज्यादा लाभदायक है| साथ ही अगर महिलाओं को ऐसे सशक्त बनाने वाले कार्यक्रम में भारती किया जाये तो बहुत अद्भुत रहेगा| यही ज़रूरी है - शिक्षा जो तकनिकी , वैज्ञानिक और साथ ही आध्यात्मिक हो|

प्रश्न : जो लोग धोखाधड़ी या अन्य अपराध करते हैं उन्हें कैसे प्रेम करते रहें?

श्री श्री रवि शंकर :
ये लोग ऐसे नहीं हैं जिनको सुधारा ही न जा सके| हर अपराधी उसकी कमजोरियों का शिकार है जो मदद की पुकार करता है | अगर तुम गौर से देखो तो पाओगे कि समाज में लालची लोगों के कोई दोस्त नहीं होते| जैसे ही वे दोस्ती करते हैं, लालच गायब हो जाता है|
इसी तरह भ्रष्टाचार मित्रता के अन्दर हो ही नहीं सकता| बेईमान और धोखेबाज़ लोग असल में अपनी कमजोरियों के शिकार होते हैं| क्योंकि इन्हें अध्यात्म कि शिक्षा नहीं दी गयी है| पता है, हमने अपने सब कार्यक्रमों में, खास कर के 'प्रिजन स्मार्ट') प्रोग्राम में देखा है कि एक अपराधी के अन्दर भी एक अच्छी आत्मा है जो मदद के लिए रो रही है और प्यार के लिए तरस रही है| हम उनकी मदद कर सकते हैं|

प्रश्न : नींद के दौरान हमारा मन कितना सक्षम होता है? क्या चेतना की सभी सतहों के पर जाना मुमकिन है?

श्री श्री रवि शंकर :
सजग अवस्था में तुम्हें सबसे अच्छा विश्राम ज्ञान से मिलता है| स्वप्न की अवस्था गहरा विश्राम है| निद्रा उससे भी गहरा विश्राम है| चौथी अवस्था ध्यानावस्था है| यह तुम्हे पूर्ण विश्राम देती है|

प्रश्न : ह्रदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को प्राणायाम और ध्यान से क्या लाभ हो सकता है?

श्री श्री रवि शंकर :
अनुसंधान बताते हैं कि श्वास और ध्यान से कोलेस्ट्रॉल कम होता है और हृदय मजबूत होता है|इनसे तनाव कम होता है, होरमोन नियंत्रित होते हैं और ग्रंथियों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ता है|

प्रश्न : हमें सुबह जगने पर सबसे पहले और रात को सोते समय आखिर में क्या करना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
आइने में अपना चेहरा देखो और अपने आप को एक बड़ी-सी मुस्कान दो| अगर मुस्कुरा नहीं सकते तो भौहों को चढ़ा के देखो| धीरे धीरे तुम मुस्कुराना शुरू कर दोगे|

प्रश्न : आत्म-प्रेम कितना ज़रूरी है? क्या ये ज़रूरी है कि हम दुनिया को प्यार करने से पहले अपने आप को प्यार करें ?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, पर बैठ कर यह मत जपते रहो कि "मैं खुद को प्रेम करता हूँ" | क्या तुम "मैं मिल्वौकी में हूँ" ऐसा जपते रहते हो? तुम्हारा शारीर, मन और चेतना सत्य, प्रेम, सौन्दर्य और शांति से बने हैं| बस समझ लो कि तुम अपने आप से प्रेम करते हो| अगर तुम्हें ऐसा लगता है कि तुम खुद से प्रेम नहीं करते तो ये तुम्हारा भ्रम है|

प्रश्न : क्या आप मानते हैं कि यह समय मानव विकास का बड़े पैमाने पर वैश्विक परिवर्तन का युग है?

श्री श्री रवि शंकर :
तीस साल पहले आध्यात्म और ज्ञान पर लोगों को बड़ा पूर्वग्रह था| लोग आध्यात्म को दस कदम दूर रखते थे और सोचते थे ये सब उनके लिए नहीं है| आज इन सब को लोग स्वीकृति से देखते हैं| वे ये देखने के लिए तैयार हैं कि उन्हें इन सब से कितना फायदा है और उनका पूर्वग्रह कम हुआ है| इससे मानवीय मूल्य और ऊपर आएंगे| और २०१२ की फ़िक्र मत करना| मैं तुम्हें विश्वास दिलाता हूँ कि विश्व का विनाश नहीं होने वाला है|

प्रश्न : जिसे हम मृत्यु कहते हैं, उसके परे का अनुभव क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हें अभी के अभी सब कुछ क्यों जानना है? मैं नहीं चाहता कि मरने के बाद भी तुम उब जाओ| पहले हम जीवन को समझ लें, उसके बाद हम मृत्यु को समझेंगे|

प्रश्न : संसार में आप सबसे ज्यादा आशावान किस बात के लिए हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मैं अपनी दृष्टि के बारे में सबसे अधिक वास्तविक हूँ| अभी तक 'आर्ट ऑफ़ लिविंग' १५१ देशों में पहुँच चुका है| बहुत से लोग ये तकनीक सीख रहे हैं| अगर मोबाइल फोन की तकनीक दुनिया में सब जगह फ़ैल सकती है, तो लोगों को खुश और शांत बनाने की तकनीक और बुद्धिमता घर-घर क्यों नहीं पहुँच सकती? यह ज़रूर पहुंचेगी| हममें मुश्किल कार्य को संभव करने की दृष्टि होनी चाहिए| ये मेरी आदत और रूचि है|

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