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"समय से पहले जरूरत से ज्यादा मिल जाना ही सिद्धि है"


प्रश्न : गुरूजी,यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण हो सकता है परन्तु मुझे धन की समझ नहीं है| क्या आप मेरे लिए इसका वर्णन करेंगे? यह कितना महत्वपूर्ण है? मुझे यहाँ लाने के लिए धन्यवाद|

श्री श्री रवि शंकर :
वेदों के साहित्य में लिखा है धर्म सच्चाई है| तब अर्थ आता है जिसका मतलब है माध्यम। धन एक माध्यम है| तब इच्छाएं आती है| और फ़िर मोक्ष आता है| इस तरह धर्मस्य मूलं अर्थ| इसका अर्थ है धार्मिकता समृद्धि पर निर्भर करती है| यदि सभी समृद्ध होंगे तो कोई भी चोरी नहीं करेगा| धर्म का आधार समृद्धि है| और धन का आधार राष्ट्र है| इस तरह ये सब सम्बंधित है| धन महत्वपूर्ण है परन्तु धन केवल एक साधन है| यह सब कुछ नहीं है| धन को कभी भी ख़ुशी से नहीं जोड़ना चाहिए| यदि आप देखो तो पाओगे यहाँ तक कि गरीब से गरीब लोग भी खुश होते हैं | वास्तव में वे ज्यादा खुश हैं| धन सुरक्षा की एक गलत धारणा बन जाता है| आप सोचते हो यदि आपके पास धन है तो सब कुछ है।
धन का ख्याल आराम के लिए है| आप धन क्यों चाहते हो? आराम के लिए| परन्तु धन आपको केवल एक तरह का आराम दे सकता है| आराम के तीन प्रकार हैं| शरीरिक आराम,भावात्मक और मानसिक आराम, और अध्यात्मिक आराम यां आन्तरिक आराम| जबकि धन केवल एक तरह का आराम दे सकता है| यह भावनात्मक और अध्यात्मिक आराम नहीं देता| यह आवश्यक है| जैसे हम जीवित रहने के लिए खाते हैं, परन्तु यदि हम केवल खाने के लिए जीवित रहे (हंसी) तो हमारे साथ बुनियादी तौर पे कुछ गलत है|
ग्रन्थ और प्राचीन लोग बड़ी खूबसूरती से बताते हैं कि आपको अपने धन को इस्तेमाल कैसे करना चाहिए। आप धन को २०% के पांच भागों में बाँट लो| एक भाग आप अपने इस्तेमाल के लिए रखो| एक भाग आप बचा लो| २०% आप तुरंत ज़रुरतों पर खर्च कर लेते हो| २०% आप परिवार के लिए खर्च करते हो जिससे मेरा मतलब है तत्काल जरूरतों के लिए| २०% आप समाज के लिए इस्तेमाल करते हो| एक वह है जिसे आपद धन कहतें हैं जो आपातकालीन,भविष्य की जरूरतों के लिए होता है| २०% जो आप बचाते हो, उसे बाद में अपने मित्रों,परिवार या अपने वंशजों को दे देते हो|
एक और विचारधारा है जो कहती है १०% दान करो| ३०% बचत करो| ६०% को जैसे चाहो इस्तेमाल करो|
मैं कहूँगा आपको १०% भी दान देने की जरुरत नहीं है| कम से कम २% या ३% अपनी आमदनी से अलग रख दो| यदि आप बिलकुल भी दान नहीं देते तो आपका पैसा कचेहरी में मुकद्दमों और अस्पतालों में खर्च होगा| इसलिए आपके धन का कुछ हिस्सा २% या ३% अलग रखा जाना चाहिए| यहाँ तक कि १% भी चलेगा| २% फिर ३| २ से १०%दुनिया के लिए अलग रखो| तब आपके मन में लालच नहीं आएगा| लालच आदमी को खत्म करता है और बाद में उसके व्यापर को भी खत्म कर देता है|
परन्तु लक्ष्य ठीक है| आपके पास लक्ष्य होना चाहिए| आप में और धन कमाने की कामना होनी चाहिए| और अधिक धन बनाना एकदम गलत नहीं है| धन कमाओ| समझ गए आप?इस तरह से धन के लिए संतुलित रवैया होना चाहिए| धन ही जीवन में सब कुछ नहीं होना चाहिए| यह आपको बनाये रखने के लिए और शरीर को आराम देने के लिए होना चाहिए| यह केवल आध्यात्मिकता है जिससे पूर्ण विश्राम मिलता है| और यदि मानसिक और अध्यात्मिक आराम होगा, जब आप ईश्वर से जुड़े हों तो आप धन के बारे में सोचते भी नहीं| चीजें अपने आप आती हैं|
इस आश्रम को अगले साल २० साल हो जायेंगे| उससे पहले ५ बर्ष तक जब मैं उत्तरी अमेरिका में आता था तो हम यहाँ वहां किराये पर जगह लेते थे| बहुत सारे लोग आते थे| हमें शाकाहारी भोजन के लिए रसोई चाहिए थी| होटल में अडवांस कोर्स करने में मुश्किल होते थे| तब मैंने कहा अगली बार जब मैं आयूँ तो हमारे पास अपना स्थान होना चाहिए जहाँ हम पवित्र वातावरण रख सकें, ऐसे स्थान पर ध्यान लगता है और स्थान का भाव अधिक सात्विक,अधिक अनुकूल और प्रकृति के साथ लय में होता है| तब हमारे कुछ भक्त लोग यहाँ आये और स्थान के लिए छान बीन करने लगे परन्तु हमारे पास इतने पैसे नहीं थे| पर हमें बिलकुल भी चिंता नहीं हुई| हम केवल योजना बनाते हैं और बाकि सब बातो का ध्यान अपने आप रखा जाता है| सभी ने थोड़ा थोड़ा कुछ करना शुरू किया| और यह जगह सुंदर बन गई। इसे ही सिद्धि कहतें हैं| सिद्धि का मतलब है आपको जो चाहिए समय में मिल जाता है|
भारत में एक कहावत है - आप बादाम खाना चाहते हो और ये आपको तब मिलते हैं जब आपके सारे दांत गिर जाते हैं| (हंसी) आप बादाम के लिए प्रार्थना करते हो और जब आपको बादाम मिलते हैं आपके दांत जा चुके होतें हैं| इसका कोई फायदा नहीं| इस तरह सिद्धि का मतलब है समय से पहले जरूरत से ज्यादा मिल जाना|
हम कभी यह चिंता नहीं करते कि काम कैसे होगा? इसे ही सिद्धि कहते हैं। जब आध्यात्मिक उर्जा होती है तो काम सहजता से ही पूर्ण होते चले जाते हैं। इस आत्म विश्वास के साथ चलो| पर हमे ज़्यादा हवा में भी नहीं रहना चाहिए। थोड़ा सा व्यवहारिक भी होना चाहिए| जब तक आप उस अंदरूनी अध्यात्मिक निर्भरता,अध्यात्मिक ऊंचाई तक नहीं पहुँच जाते,आपको तर्कसंगत होना चाहिए,और तर्कसंगत तरीके से जागरूक होकर आपको पैसों का प्रबंध करना है। और यह आप कैसे कर सकते हो? जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा एक उपर उठा होगा| इस तरह यह एक नाच की तरह है| नाच कैसे होगा? यदि दोनों पैर कीचड़ में दबे होंगे तो क्या आप नृत्य कर सकते हो? और यदि दोनों पैर उपर हवा मैं होंगे तो भी आप गिर जाओगे| दोनो परिस्थितियों में नाच नहीं हो सकता| नाच तभी हो सकता है जब एक पैर नीचे जमीन पर होगा और दूसरा उपर हवा में| यही सम्पूर्ण ज्ञान है - व्यवहारिक लेकिन सूक्ष्म,अध्यात्मिक दृष्टिकोण से|
परन्तु मैंने कुछ लोगों को देखा है जो बहुत अधिक काल्पनिक होतें हैं| वे कोई काम नहीं करते परन्तु बैठे रहतें हैं,'मुझे २० मिलियन डॉलर चाहिए, मुझे १०० मिलियन डालर चाहिए|' वे थोड़े पैसों के लिए भी नहीं सोचते| :हंसी) केवल मिलियन के लिए सोचतें हैं| हर दिन इसके लिए प्रार्थना करते हैं| कुछ देर बाद आप जाते हो,खाना पकाते हो और भूल जाते हो| यह सही नहीं है|
इस संतुलन को जानो|

प्रश्न : गुरूजी मुझे लगता है मैं अपने परिवार में किसी की मृत्यु के शोक से नहीं निकल पाया हूँ और यह मुझे अपने सम्बन्धों और अपना निजी परिवार की ओर चलने से रोक रहा है| मैं इस ओर आगे बढ़ना चाहता हूँ परन्तु ऐसे लगता है मैं स्वयं ही अपना शत्रु हूँ| गुरूजी कृपया मेरी मदद करें| मैं धैर्यपूर्वक आपके जबाब का इंतजार कर रहा हूँ|

श्री श्री रवि शंकर :
जब आप ध्यान करते हो,भजन करते हो तो इसकी उर्जा उन तक पहुँच जाती है| आप शांत हो तो शांतिपूर्ण भावनाएं उन तक जाती है| इसीलिए आध्यात्मिकता को संस्कृत में साधना भी कहतें हैं,इसका मतलब है असली दौलत,असली मुद्रा जो यहाँ वहां जा सकता है|(हंसी) दूसरी डालर मुद्रा दूसरी तरफ़ नहीं चल सकती|इसीलिए हम कहतें हैं जब आप सत्संग करते हो,गाते हो,ध्यान करते हो,ये सकरात्मक भाव उन तक जाते हैं| और जब ऐसे भावनाएं आती है उनका निरीक्षण करो,ध्यान से देखो| वे आयेगीं और लुप्त और गायब हो जायेंगीं| हाँ? आगे बढ़ो|

प्रश्न : गुरूजी, क्या आप दूसरे ग्रहों पर जीवन के बारे में कुछ बताएँगे? क्या उनके पास प्रेम है जैसे हमारे पास पृथ्वी पर प्रेम। जय गुरुदेव|

श्री श्री रवि शंकर :
प्राचीन लोगों को १४ ब्रह्मांडों का पता था| १४ में से हम बीच में हैं-७ उपर ७ नीचे| अनंत ब्रह्मांड है, अनंत ग्रह है केवल एक ही नहीं है| यहाँ पर भी अस्तित्व के अलग अलग स्तर हैं| जो हम देखते हैं वह केवल एक भाग है| भौतिक विज्ञान भी यही कहता है।यहाँ पर भी बहुत से स्तर हैं| हाँ? परन्तु यह एक ब्रह्मांड हमारे लिए बहुत अच्छा और पर्याप्त बड़ा है| (हंसी)अभी इसी के बारे में सोचते हैं।

प्रश्न : गुरूजी, यह इतना सुंदर ज्ञान देने के लिए मैं आपका बहुत आभारी हूँ| मुझे बहुत जिज्ञासा होती है कि यह अंतर्दृष्टि कहाँ से आती है| जब मैं ध्यान करता हूँ कभी कभी इसके बाद शांत हो जाता हूँ और प्रभावकारी भी,परन्तु ब्रह्मांड के रहस्य अपने आप नहीं पता चलते| इसकी बजाय मैं इसी तरह के नाटक या आत्म सम्मोहन में फंस जाता हूँ| यह रास्ता मेरे लिए अच्छा है| इसका मुझे विश्वास है|परन्तु मुझ में धैर्य नहीं है|मुझे आपके प्रकृति और ईश्वर के बारे में कहे हुए शब्द शहद जैसे लागतें हैं जिनके लिए मुझे भूख है| क्या आप इसी विषय में कुछ कहेंगे| मैं प्रकृति के साथ गहरा सम्बन्ध महसूस करता था| आजकल मैं रोबोट की तरह महसूस करता हूँ| क्या मुझ में अनुग्रह नहीं रहा या कोई और बात है?

श्री श्री रवि शंकर :
नहीं नहीं| मुझे लगता है आपके पास बहुत समय है| आप बैठकर अपने बारे में बहुत सोचते रहते हो| व्यस्त हो जाओ| आप जानते हो जितना अच्छा काम आप करते हो, अपने आसपास सकरात्मक वातावरण और भाव बनाते हो| जब आप सकरात्मक भाव बनाते हो तो आपको अपने भीतर गहरे जाने में मदद मिलती है| यह आवश्यक है कि दूसरों का ध्यान रखा जाए और जो आप के पास है दूसरों के साथ बांटा जाए| जिस तरह भी आप कर सकते हो करो| किसी प्रोजेक्ट में शामिल हो जाओ| ध्यान करो| बैठ कर चिंता मत करो,'ओह आज मुझे यह अनुभव हुआ| कल क्या होगा|' यह तो आते जाते रहेंगे| आप इन सब अनुभवों से ज्यादा हो।
एक साधक को क्या करना होता है ,जो भी अनुभव हो, चाहे सबसे अच्छा अनुभव हो, को भी सवीकार करो और उसका समर्पण करो।
स्वीकारना और समर्पण करना, दोनो ही ज़रुरी हैं। यदि आप केवल त्यागने की कोशिश करते हो तो आप उनको रोकने की कोशिश कर रहे हो| यदि आप केवल स्वीकार करते हो तो आप उनको पकड़ लेते हो| इसीलिए आपको दो हाथ दिए गए हैं| एक तरफ़ से आप स्वीकार करते हो और दूसरी तरफ़ आप समर्पण कर देते हो।यह अनुभव तो आते जाते रहतें हैं ,कोई बड़ी बात नहीं|

प्रश्न : गुरूजी, कल रात आपने कहा था कि ,'यदि आप जो कर सकते हो नहीं करते हो तो आपकी चेतना में आपको पीड़ा होती है। मुझे पता है मुझमें बहुत सी योग्यताएं हैं,परन्तु कभी कभी यह बहुत कठिन काम लगता है| मैं हमेशा अपनी तरफ से अच्छा कार्य करती हूँ,हमेशा सेवा करती हूँ| मैं सेवा को बिना बोझ समझे कैसे कर सकती हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
केवल उतना ही करो जितना तुम कर सकते हो| कभी कभी आप प्रतिबद्धता लेते हो| उस क्षण यह बहुत अधिक लगता है| परन्तु यह समाप्त हो जाता है| उस प्रतिबद्धता को पूरा करो और फ़िर उसके बारे में सोचो भी मत| आपको पता है यदि आप सोचोगे ,'मैंने कितना सारा काम कर लिया' तब वह बोझ लगने लगता है| हर रोज आप में नई शक्ति आ जाती है| अगर हम देखें हमने कितना हवा,पानी और भोजन का उपभोग किया है तो हम हैरान रह जाएंगे। इसकी कोई गिनती ही नहीं है| इसलिए आप जो सेवा करते हो उसे गिनो मत| जो आपने उपभोग किया है उस सब के मुकाबले में यह बहुत कम है|

प्रश्न : जब मुझ पर करो या मरो जैसा दबाव होता है तो मेरे अंदर जो भी अच्छा है बाहर आ जाता है| यह वह समय होता है जब अपनी इच्छाओ और इरादों को पूरा करने के लिए मेरे पास प्रकाश की किरण की तरह तेज जैसी एकाग्रता,मानसिक शांति,नियन्त्रण और प्रेरणा होती है| परन्तु जब मैं खुश,विश्राम में और आनंद में होता हूँ तो मुझ में वह मानसिक शांति और अपनेआप को प्रेरित करने की शक्ति नहीं होती| मैं इस पैटर्न को कैसे बदल सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
तो किसी को आप पर ऐसा दबाव डालने के लिए कहो।सुनो यदि आपको लगता है 'मेरा अच्छा तभी बाहर आता है जब मैं खतरे में हूँ, यां दबाव में हूँ’ तो आपने ऐसा इरादा बना लिया है,ऐसा विचार मन में बना लिया है| इसलिए ऐसा ही होता रहा है|
आप तब भी उतनी ही उर्जा और एकाग्रता से काम कर सकते हैं जब आप खुश होते हो,जब आप आनंद में होते हो,जब आप मुक्त होते हो। इसलिए जब आप इस पैटर्न के प्रति सजग हो जाते हो तो यह आपकी जिम्मेवारी है कि आप इससे बाहर आएं| कोई और आपकी मदद नहीं कर सकता। केवल आप अपनी मदद कर सकते हो| आप कह सकते हो 'अभी आज मैं खुश हूँ, मैं ऐसा करने जा रहा हूँ!'

प्रश्न : गुरूजी,यह पहली बार है मैं आपकी धन्य महिमा देख रहा हूँ| क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मैं स्वयं को सम्मानित और प्रेम करना कैसे सिखा सकती हूँ?मैं अपने शरीर को दुःख देती हूँ क्योंकि मैं अपने आप को किसी योग्य नहीं समझती| मुझे क्या करना चाहिए?आपका जबाव बहुत महत्वपूर्ण है| जय गुरुदेव|

श्री श्री रवि शंकर :
सबसे पहले यह मत सोचो कि आप खुद से प्यार नहीं करते| यह किसने कहा? यहाँ तक जो व्यक्ति आत्महत्या करते हैं वे भी खुद से प्यार करते हैं| वे अपने आप से बहुत प्यार करते हैं और इसलिए पीड़ा नहीं चाहते| पीड़ा सहन नहीं कर सकते| पीड़ा से छुटकारा चाहते हैं| इसलिए जब लोग पीड़ा या दुःख सहन नहीं कर सकते,वे ख़ुशी चाहते हैं,वे आत्महत्या कर लेते हैं| इसलिए कि वे खुद को बहुत प्यार करते हैं| वे दूसरों से प्यार नहीं करते| यदि आत्महत्या करने वाला व्यक्ति अपनी माता या पुत्री या पत्नी या और कोई प्रिय को प्रेम करे तो आत्म हत्या कैसे कर सकता है?यदि आपको दूसरों की फ़िक्र होगी तो आप कभी आत्महत्या नहीं कर सकते|
उन्हें पता होता है कि यदि वे खुद को फंदा लगा लेंगे, वे अपने प्रिय जनो के लिए समस्या खड़ी कर देंगे| वे बहुत दुखी हो जायेंगे।
उनका यह सोचना, "मैं उन्हें उदास नहीं कर सकता,मैं उन्हें रुलाना नहीं चाहता| मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ| यदि मैं उन्हें खुश देखना चाहता हूँ तो मैं खुद को दुःख क्यों दूँ? मैं केवल अपनी ख़ुशी के बारे में सोच रहा हूँ,अपनी तकलीफ के बारे में सोच रहा हूँ| मैं आराम चाहता हूँ,ख़ुशी चाहता हूँ| मैं खुद को बहुत अधिक प्यार करता हूँ| तभी मैं खुद को फंदा लगाता हूँ" उन्हे कभी ऐसा कदम उठाने नहीं देगा।
इस तरह अपने लिए अपने प्यार पर शंका मत करो| कौन कहता है आप खुद को प्यार नहीं करते? यह असम्भव है क्योंकि आप स्वयं प्रेम हो|यह केवल कहीं खो गया है| कहीं आप इसे महसूस नहीं कर पा रहे हो| और आप सही जगह पर हो|अभी तक कोई भी माँ इस ग्रह पर बुरी पैदा नहीं हुई है| एक माँ के रूप में ऐसा मत सोचो कि आप बुरी या कुछ और हो। यह असम्भव है| हाँ? विश्राम में रहो और अपना काम करते आगे बढ़ो|
जो हो गया उसके बारे ज्यादा विश्लेषण मत करो। क्योंकि धरती पर कोई भी ऐसा कार्य नहीं है जो पूरी तरह दोष से मुक्त हो| हर कार्य में कहीं ना कहीं कुछ दोष होता ही है। और बुरे से बुरे कार्य में भी कुछ अच्छा होता है। अच्छे से अच्छे कार्य में भी २ प्रतिशत दोष होता है। इसलिए दोष पर इतना ध्यान मत दो।

अन्य अंश अगले हिस्से में:

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"जब आप विरह अनुभव करते हो तो वास्तव में आप पथ पर हो"

पिछले पोस्ट के शेष अंश

प्रश्न : गुरूजी,महत्वकांक्षा और लालच क्या है? दोनों को अलग करने वाली लकीर क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
लालच वह है जब आपके लिए धन और अपने आप के इलावा कुछ महत्व नहीं रखता।
लालच वह है जब आप अपनी योग्यता से परे किसी वस्तु की कामना करते हो और किसी भी तरह उसे पाना चाहते हो| यही लालच है| महत्वकांक्षा वह है जब आप कोई लक्ष्य रखते हो और उसे पाना चाहते हो| यह ठीक है| लालच वह है 'मुझे ये किसी भी तरह किसी भी कीमत पर चाहिए ही चाहिए| चाहे इससे मुझे या किसी और को तकलीफ हो|

प्रश्न : गुरूजी, सब कुछ के लिए धन्यवाद| मैंने छ महीने पहले आर्ट ऑफ़ लिविंग शुरू किया| मुझे पता है मैं इस यात्रा को जरी रखूंगी क्योंकि यह जीवन को बदलने वाला है| मुझे जिज्ञासा हो रही है आप किस तरह अपने व्यस्त जीवन में अपने आप को आधुनिक तकनीक और ख़बरों से सूचित रखते हो|
(श्री श्री केवल मुस्कुराये)

प्रश्न : गुरूजी, मैंने देखा है कि अनजाने में मैं अपनी तुलना अन्य लोगों के साथ करने लगती हूँ| इसे कैसे बंद करूँ? कृपया मेरी मदद करो|

श्री श्री रवि शंकर :
अनजाने में रोकने से यह आदत अनजाने ही खत्म हो जायगी| आप जानते हुए इसे क्यों रोकना चाहते हो? इसे ऐसे ही रहने दो| समझे! आपकी रोकने की कोशिश समस्या बन जायेगी| आप इसमें अटक कर रह जाओगे| केवल विश्राम में रहो| और अधिक ध्यान, अडवांस कोर्स और मौन रहने वाले कार्यक्रम करो| इससे अपने आप आदत छूट जाएगी|

प्रश्न : गुरूजी संतुलन और संयम को कैसे बनाये रखें? यदि मैं अपना जीवन १०० प्रतिशत रह कर जीउँ तो मैं घटनायों के प्रति लगाव और प्रेमातुर बन जाती हूँ| यदि मैं वैराग में रहूं तो थोड़ी सुस्त हो जाती हूँ| ओर कैसे खुद्द को जुड़ा हुआ महसूस करूँ?मुझे अभी भी खालीपन और विरह लगती है| इनसब का कोई जबाब नहीं मिलता|

श्री श्री रवि शंकर :
यह बहुत अच्छा है| आप भाग्यशाली हो| जब आप विरह अनुभव करते हो तो वास्तव में आप पथ पर हो| बहुत अच्छा| इसके बारे में चिंता मत करो|

प्रश्न : जय गुरुदेव! क्या आप २०११ के बारे में बताएँगे? हम चिंतित हैं|

श्री श्री रवि शंकर :
क्या आप को याद है ,यदि आपमें से कुछ लोग १९९९ में इसी आश्रम में थे तो बहुत से लोग डरे हुए थे,डर से लगभग पगला गए थे। वे पूछ रहे थे कि १९९९ में कम्प्यूटर क्रैश हो जायेंगे तो वे क्या करेंगे? हमें भोज नहीं मिलेगा| लोगों ने अपने घरो के भूतल में दूध और खाद्य समग्री इकट्ठी करनी शुरू कर दी थी| मैं उस वक्त हैलिफक्स में था और लोगों ने मुझे से यही एक प्रश्न किया था| लोग सामान इकट्ठा कर रहे थे और उन्होंने मुझे बताया, "हमने तीन महीने का अनाज इकट्ठा कर लिया है|" मैंने तब भी कहा था कि कुछ नहीं होगा| सब व्यवसाय हमेशा की तरह होंगे| अब भी मैं कह रहा हूँ २०१२ हम देखेंगे,१३ हम देखेंगे और सब व्यवसाय हमेशा की तरह होगें। सिर्फ यह होगा की लोग और अधिक अध्यात्मिक हो जायेंगे| आपने देखा होगा अभी के युवा और बच्चे (येस और येस + के बच्चे) कैसे प्रश्न पूछ्तें हैं| मुझे लगता है पुरानी पीढ़ी के लोग देख कर हैरान हो जायेंगे की युवा पीढ़ी कितनी अध्यात्मिक बनती जा रही है| जो प्रश्न आपको ४०-५० वर्ष की उम्र में आये उन्हें वे १५ बर्ष की उम्र में आ रहे हैं|"जीवन क्या है", जो यहाँ पर ५० या उससे ज्यादा उम्र के लोग हैं मैं उन से पूछता हूँ - क्या आपको ऐसे प्रश्न उस उम्र में आये थे? आज बच्चे इतने अध्यात्मिक हैं| समय आएगा जब आप देखोगे कि बच्चे और अधिक जागरूक हो जायेंगे| वे कपडे,गहनों और बहुत ज्यादा दिखावे में नहीं हैं| यद्यपि उनमें इलेक्ट्रोनिक चीजों के लिए इच्छा है और हाँ कारों के लिए भी| फिर भी यह इतना अधिक नहीं है जितना पहले के लोगों को था| आप लोगों में, युवाओ और बच्चों में बहुत अंतर देखोगे| वे ऐसे होंगे| शुरू में जब वीडियो खेल आए तो सब को वीडियो खेलों का कितना शौक था, वे सभी हिंसात्मक खेल| समय के साथ साथ यह कम होता जा रहा है| मुझे लगता है यह कम हो रहा है| यह होगा कि अधिक से अधिक लोगों का आध्यात्मिकता की ओर झुकाव होगा|

प्रश्न : मैंने इटरनिटी प्रोसेस किया| पिछले जन्मो से मैंने बहुत कुछ देखा| बहुत भक्ति का अनुभव हुआ| यहाँ तक मैंने आपको भी देखा| इसमें कितनी सचाई है? क्या मैं ऐसे ही बात को बढ़ा रही हूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
देखो इसमें संदेह मत करो| ये अनुभव एक मिश्रण है, एक तो आपकी पवित्र चेतना और आपके गहरे अनुभवों से आता है, और कुछ आपकी कल्पना से भी आ सकता है| कभी कभी आप जो कल्पना करते हो वो अनुभव हो जाता है| यह आम तौर पर मिश्रण होता है - २०% कल्पना ८०% वास्तविकता से मिल जाती है| आप को बैठ कर चिंता या सोचने कि आवश्यकता नहीं है| यह एक अनुभव है, जैसे भी यह आये इसे स्वीकार करो और आगे बढ़ो| लोगों को कई बार कूछ भ्रम भी हो जाते हैं। इसीलिए मैं कहता हूँ अपने आप को किसी भूमिका के साथ जोड़ लेना अपने आप को सीमित कर लेना है| आप इन सब अनुभवों से कहीं अधिक हो| आप इन सब पहचानो से और बहुत कुछ हो| यही आत्म ज्ञान है| यही अध्यात्मिक ज्ञान है| यही उपनिषद ज्ञान है|

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एक भक्त ही दूसरों में भक्ति को जगा सकता है

चेन्नई, भारत

आज महासत्संग में उन तीनों तत्वों का समन्वय था, जो कि एक आर्ट आफ़ लिविन्ग उत्सव का समग्र हिस्सा हैं - गान, ग्यान और ध्यान। पाश्चात्य और भारतीय संगीत में निपुण गुणीजनों ने संगीत प्रस्तुत किया। तदुपरान्त, श्री श्री ने सबको संबोधित किया और सामूहिक ध्यान कराया।

किसी भी समय में गान, ध्यान और ध्यान का बड़ा महत्व है।

सत्य को आप ना नज़रअंदाज़ कर सकते हैं , ना नकार सकते हैं।

प्रेम वही है जिसे आप पूरी तरह छुपा भी नहीं सकते, जता भी नहीं सकते।

सौंदर्य को आप बांध कर नहीं रख सकते, उसका त्याग भी नहीं कर सकते।

प्रश्न: शरीर में मन किस स्थान पर रहता है?
श्री श्री: यह प्रश्न पूछने वाला कौन या क्या है? और वो क्या है जो इस प्रश्न का उत्तर सुनेगा? बुद्धि उत्तर को दर्ज करेगी, पर वस्तुतः वो मन है जो इस उत्तर की तलाश में है।


प्रश्न: पांचों इन्द्रियों को कैसे जीतें? क्या आप एक वाक्य में बतायेंगे?
श्री श्री: सूर्य के प्रकाश के आगे मोमबत्ती का महत्व नहीं रहता। वैसी ही अन्य चीज़ें निरर्थक हो जाती हैं।

प्रश्न: ये हम कब जान पाते हैं कि हम प्रेम से ही बने हैं?
श्री श्री: प्रेम को जाना या समझा नहीं जा सकता। इसे सिर्फ़ महसूस किया जा सकता है। एक बच्चा अपनी मां से नहीं पूछता कि, "तुम्हारी योग्यता क्या है? तुम क्या करते हो? तुम्हारे मित्र कौन हैं? मुझे बताओ। तब मैं तुम्हें प्रेम करूंगा।" जैसे हमारा शरीर कार्बोहाईड्रेट्स और अमीनो ऐसिडस से बना है, हम एक ऐसे तत्व से बने हैं जो कि प्रेम है। क्रोध, लालच, ईर्ष्या ये सब प्रेम के ही विकृत रूप हैं।


प्रश्न: आतंकवाद का नियंत्रण कैसे करें?
श्री श्री: समस्त संसार में सभी धर्मों में यही चर्चा चल रही है कि आतंकवाद को कैसे रोकें। भारत के आध्यात्म और ज्ञान में इतनी ताकत है जिससे कि आतंकवाद और धर्मांधता को नियंत्रित किया जा सकता है।

प्रश्न: क्या ज्योतिष एक विज्ञान है?
श्री श्री: हां, यकीनन ज्योतिष एक विज्ञान है। पर इसका अर्थ ये नहीं कि सभी ज्योतिषी वैज्ञानिक हैं!

प्रश्न: ऐलोपैथी में कैंसर या क्षयरोग का इलाज नहीं है। क्या आयुर्वेद या सिद्ध चिकित्सा पद्दति में इनका इलाज है?
श्री श्री: अवश्य है। तुम्हें पता है, सिद्ध चिकित्सा पद्दति केवल तमिल नाडू में ही उपलब्ध है। आयुर्वेद पूरे देश में उपलब्ध है।

प्रश्न: क्या २०१२ में दुनिया का अंत हो जायेगा? क्या ये सच है?
श्री श्री: १९९९ में लोग कहते थे कि नई सह्स्त्राब्दि के पूर्व दुनिया का विनाश हो जायेगा। कनाडा में तो कुछ लोगों ने छः छः महीने का राशन भी संग्रहित कर के रख लिया था! (हंसी)
२०१२ में एक सकरात्मक बदलाव आयेगा, और ये आध्यात्मिक होगा। तुम्हें पता है, दक्षिण ध्रुव के पास टेर डेल फ़िआगो में और उत्तरी ध्रुव के पास नौर्वे में लोग ध्यान कर रहे हैं, शाकाहारी हो रहे हैं, भारतीय परंपराओं को अपना रहे हैं और ॐ नमः शिवाय का जप कर रहे हैं।

प्रश्न: गुरुजी, हमारी दो बिनती हैं। आप चेन्नई में क्यों नहीं आते और यहां पर एक आश्रम क्यों नहीं शुरु करते?
श्री श्री: कल से यहाँ एक ध्यान केन्द्र खुलने जा रहा है। तुम सब यहाँ आकर ध्यान किया करना।

प्रश्न: हम ’आर्ट आफ़ लिविन्ग’ का एक टी वी चैनेल क्यों नहीं शुरु करते, ताकि ज्ञान सब तक पंहुचे?
श्री श्री: इसे सिर्फ़ एक चैनेल तक सीमित क्यों रखें? ये सभी चैनेलों पर होना चाहिये। (हंसी)
यदि तुम एक चैनेल शुरु करना चाहते हो तो मैं तुम्हारा प्रोत्साहन करता हूं। उस चैनेल में सिर्फ़ ध्यान और संगीत ना होकर आध्यात्मिक ज्ञान भी हो, और दुनिया में क्या हो रहा है उसकी भी खबर हो।
एक आखिरी बात, जब भी तुम्हें कोई चिंतायें सतायें, तुम पत्र या कोरियर के द्वारा मुझे दे दो। कुछ ऐसा करो जो तुम्हारे आसपास के लोगों के लिये उपयोगी हो। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम्हारे बाकी सब विषयों की देखभाल हो जायेगी।


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प्रयत्न और प्रार्थना, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं

बैंगलोर आश्रम, २२ नवंबर २००९

अगर हम रोज़ प्रेम व्यक्त करते रहते हैं तो वो सिर्फ़ शब्द रहे जाते हैं जिनमें भाव नहीं रहता। अगर रोज़ कहते रहो, "मैं तुम्हें प्रेम करता हूँ।" तो अंतत: ये हो जाता है, "मैं तुम्हें बर्दाश्त नहीं कर सकता।" ज़रुरत से अधिक अभिव्यक्ति बात को बिगाड़ देती है। अगर बिलकुल अभिव्यक्त ना करो, तब भी ठीक नहीं है। संतुलन होना चाहिये। जैसे कि एक बीज को अगर सतह पर ही रख दोगे तो वो उगेगा नहीं, और ना ही तब उगेगा जब वो धरती के भीतर बहुत गहरा दब गया हो। इसे सही गहराई पर बोने की आवश्यकता है, संतुलन की आवश्यकता है।

प्रश्न: औरा को साफ़ करने में नींबू का क्या महत्व है?
श्री श्री: तुमने कभी माइक्रोस्कोप से नींबू के रस को देखा है? वो सूर्य की किरणों की तरह दिखता है। विटामिन सी को माइक्रोस्कोप से देखो तो वो सूर्यमुखी के फूल की तरह दिखता है। कुछ पदार्थ जैसे कि नमक, नींबू और सही मात्रा में मिर्च ऐसी शक्ति रखते हैं कि वो नकरात्मक ऊर्जा को मिटा देते हैं। यहाँ श्रद्धा भी काम करती है। अगर तुम कोई दवा भी लेते हो और तुम्हें उस दवा या उसे देने वाले डाक्टर पर भरोसा नहीं है तो शायद वो दवा तुम पर असर ना करे।

प्रश्न: शक्ति और भक्ति कैसे प्राप्त कर सकते हैं?
श्री श्री: विश्राम से तुम भक्ति को प्राप्त करते हो। जब तुम विश्राम के साथ में प्रयत्न लगाते हो तब तुम्हें शक्ति मिलती है। प्रयत्न और प्रार्थना, दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। एक दूसरे के बिना दोनों अधूरे हैं। किसी कार्य की पूर्णता के लिये दोनों की आवश्यकता है। आमतौर पर महिलायें केवल प्रार्थना करती हैं और पुरुष केवल प्रयत्न करते हैं। प्रार्थना और प्रयत्न दोनों को ही करना होगा।

प्रश्न: मैं परिवार और आजीविका में किस को चुनू, ये तय नहीं कर पा रहा हूँ।
श्री श्री: आजिविका पर ध्यान दोगे तो माता पिता भी तुम पर प्रसन्न होंगे। अगर आजिविका के अभाव में तुम घर पर बैठ जाओ तो क्या उन्हें अच्छा लगेगा? नहीं! इस तरह से परिवार और आजिविका दोनों एक साथ आ गये।

प्रश्न: मैं जीवन में कभी सफल नहीं हुआ। मैं अपने आप को अपने माता पिता पर बोझ समझता हूँ।
श्री श्री: आलस छोड़ो और अधिक नुक्ताचीनी ना करो। जो भी काम मिले उसे करो। ये ना सोचो कि कोई काम तुम्हारे लिये तुच्छ है। ये ना सोचो कि तुम सफल नहीं हो। हर काम आदर और प्रतिष्ठापूर्ण है।

प्रश्न: गुरुजी, मेरे परिवार में कुछ अलगाव है। एक सदस्य ’आर्ट आफ़ लिविन्ग’ को मानता है। दूसरा सदस्य किसी और आध्यात्मिक मार्ग, प्राणिक चिकित्सा की पद्दति पर चलता है।
श्री श्री: दोनों अपने अपने आध्यात्मिक मार्ग पर दृढ़ रहो।

प्रश्न: ध्यान करते समय, मन कई जगह जाता है। एक बार आपने कहा था कि, "मन जहां भी जाये उसे जाने दो।" क्या इसका अर्थ हुआ कि मेरा और मेरे मन का अस्तित्व अलग अलग है? अगर ये सच है तो मेरा मन क्या है और मैं कौन हूं?
श्री श्री: जब तुम अपने मन को रोक कर रखने की कोशिश करते हो तो ये इधर उधर भागता है। जब तुम इस भागते मन को देखते हो तो तुम्हें ये एहसास होता है कि तुम अपने मन से बड़े हो। जब तुम ये जान लेते हो कि तुम मन नहीं हो, शरीर नहीं हो, कुछ और नहीं हो, जो बचता है वही तुम हो। अपने आप को जान कर तुम श्रेष्ठतम को जान लेते हो। तुम पाते हो कि तुम ही सर्व हो। तुम ही मन हो। तुम ही विचार हो। तुम ही पूरा संसार हो। पर ये होता है दूसरे स्तर पर। जब तुम स्वयं को जान लेते हो, तुम दैवी शक्ति को जान लेते हो। सर्व खल्विदम ब्रह्म - सब वही एक शक्ति है। ये जानकर ज्ञान में स्थापित हो जाओ।

प्रश्न: गुरुजी, एक बार आपने कहा था कि इच्छायें आती हैं, जाती हैं। जिन इच्छाओं को पूर्ण होना होता हैं वे रहती हैं, बाकी गायब हो जाती हैं। पर उन इच्छाओं का क्या जो रहती हैं, पर पूरी नहीं होती?
श्री श्री: प्रतीक्षा करो और दृढ़ रहो।

प्रश्न: मैं यहां आने के लिये इतना पागल क्यों रहता हूं?
श्री श्री: क्योंकि मैं भी ऐसा ही हूँ। कोई अमीर ही दूसरे को अमीर बना सकता है। कोई मुक्त ही दूसरों को मुक्त करा सकता है। एक भक्त ही दूसरों में भक्ति को जगा सकता है। ईशवर से प्रेम करने वाला व्यक्ति दूसरों को भी वैसा बना देता है। जो तुम्हारे भीतर है, वही दूसरे तुम से ले पाते हैं। जो तुम्हारे भीतर है, वही तुम दूसरों में देखते हो।

प्रश्न: जीवन साथी(Soul mate) क्या है?
श्री श्री: पहले अपनी आत्मा (Soul) से मिलो, फिर जीवन साथी (Soul mate) के बारे में जान सकते हो।



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