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दिव्यता को सबसे भयानक और सबसे सुन्दर स्वरुप में देखने से, आप दिव्यता का अनुभव हर जगह पर करेंगे |

१० मार्च २०११, बैंगलुरू आश्रम

प्रश्न: प्रिय गुरूजी अधिकांश धर्म तब आस्तित्व में आये जब लोग किसी महान व्यक्ति या आत्मा को मानने लगे ? हिंदू धर्म आस्तित्व में कैसे आया ?
श्री श्री रवि शंकर : हिंदुत्व कोई धर्म नहीं है: यह जीवन जीने की शैली है | जब हजारो संत और पीर यहा पर थे और उन्होंने वेदो के आधार पर कुछ कहा – वेद विश्व का सबसे पहला धर्म ग्रन्थ है| और लोगो के कुछ आदर्श थे और उन्होंने वैसी जीवन शैली को अपनाया | हमारे पूर्व राष्ट्रपतिजी डॉ राधा कृष्णन से प्रश्न किया गया , हिंदू कौन होता है | उन्होंने हिंदू का वर्णन ऐसे किया : वह जो किसी पर या स्वयं पर कोई लेबल नहीं लगा देता, जैसे कि मुसलमान, ईसाई, सिख, पारसी या हिंदू ,वह हिंदू है, क्यूंकि हिंदुत्व सिर्फ एक जीवन जीने की शैली है | मुझे लगता है ,वे डॉ राधा कृष्णन ही थे, जिन्होंने इसे इस तरह से परिभाषित किया | परन्तु मै कहूंगा कि हिदुत्व का अर्थ है उदारतावाद | जिसमे एक वास्तविकता या सत्य की भक्ति करने के कई तरीके है| हिंदुत्व की तीन विशेषताये है |सबसे पहला जैसे आप चाहे वैसे भक्ति करने की स्वतंत्रता, किसी स्वरुप या नाम से | दूसरा सारा विश्व एक परिवार है | एक ही दिव्यता हैं जो स्वयं को अनेक रूपों में अभिव्यक्त करती है | एक ही भगवान परुन्तु अनेक रूप और नाम और इसको जान लीजिए | भगवान और उसकी सृष्टि कोई दो भिन्न चीज नहीं है |

जैसे शरीर और मन भिन्न नहीं है | एक प्रत्यक्ष है और दूसरा अप्रत्यक्ष है | आप मन को नहीं देख सकते परन्तु मन के बिना शरीर कुछ भी नहीं कर सकता | यदि मन न हो तो शरीर सिर्फ मृत शव है | इसलिए आत्मा और पदार्थ , प्रकृति और पुरुष यही इसका संपूर्ण सिद्धांत है | सारा विश्व दिव्यता का शरीर है | दिव्यता, जल,पर्वत, वृक्षो ,नदी आपमें, मुझमे और हर किसी में है | भगवान कोई वह नहीं हैं जो ऊपर स्वर्ग में बैठा है, परन्तु भगवान वह आधार है जिसमे सब कुछ आस्तित्व करता है | भगवान वह आकाश तत्व है, जिसमे हर तत्व समाये हुए है | इसलिए सबकुछ भगवान से बना है और भगवान है |यही हिंदुत्व का बुनियादी सिद्धांत है | अच्छाई और बुराई – सही और गलत , यह सब कुछ सिर्फ आपेक्षिक(पूरक) है, और पूर्ण नहीं है |उदारतावाद का अर्थ है स्वतंत्रता – स्वतंत्रता, समानता हिंदुत्व के मुख्य उपदेश है |

प्रश्न: जब प्रेम सिर्फ भावना नहीं है, और वह हमारा मूल आस्तित्व है तो फिर प्रेम किसी दिन कैसे गायब हो जाता है और फिर किसी अन्य दिन कैसे प्रकट हो जाता है ?
श्री श्री रवि शंकर: सूर्य भी गायब होना प्रतीत होता है ,परन्तु वास्तव में वह गायब नहीं होता है | यह सिर्फ छुपने के जैसे है या आप किसी अन्य दिशा की तरफ चले गए है | यह ऐसा ही है |

प्रश्न: क्या विचार पूर्व के कर्म या मन मे पूर्व के संस्कार के कारण उत्पन्न होते है?
श्री श्री रवि शंकर : कर्म कुछ नहीं सिर्फ मन मे पूर्व के संस्कार होते है जो समान विचार उत्पन्न करते है| और हां, यह संभव है |

प्रश्न: राधा कौन है ?
श्री श्री रवि शंकर : राधा वह है जो स्त्रोत्र के दिशा मे जा रही है | धारा प्रवाह है , और यदि धारा को उल्टा पढ़े तो वह राधा है| इसलिए वह जो स्वयं की ओर जा रहा है, वह राधा है|

प्रश्न: क्या आत्मा और चेतना समान (एक) है?
श्री श्री रवि शंकर: हां |

प्रश्न : मैं अक्सर क्रोधित हो जाती हूँ कि मै ज्ञान मे पूरी तरह से नहीं रह पा रहा हूँ | परन्तु मैं अपने आप को आपके बहुत निकट पाता हूँ| क्या यह भ्रम है या इसमें कोई सच्चाई है?
श्री श्री रवि शंकर: बिलकुल! अपने आप पर इतना अधिक रुक्ष न बने | स्वाभाविक बने रहे | ठीक है ?यह सोच कर मत परेशान हो कि “ मैं ज्ञान मे पूरी तरह से नहीं रह पा रहा हूँ |” यदि कभी कभी ऐसा होता है, तो वह ठीक है |आगे बढते रहे | जीवन चलता रहता है | नदी मे कई चीजे जैसे पत्तियां, फूल गिरते रहते है, लेकिन नदी उसे लेकर आगे बढती रहती है | समय जीवन को आगे बढ़ा रहा है | इसलिए आगे बढते रहे | और वास्तव मे हम क्या कर रहे है ? हमने अपने सिर को अतीत मे रखा हुआ है और आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे है | आपको सिर्फ आगे देखते हुए आगे बढ़ना है | आपने अतीत मे जो गलतियां करी है, उसे स्वीकार करते हुए आगे बढ़े |

प्रश्न: मैं इस पीड़ित चेतना की अवस्था से कैसे निकलू खास तौर पर जब अतीत की यादें उसमे से निकलने ही नहीं देती ?
श्री श्री रवि शंकर: सिर्फ यह बात कि आप इस बात को समझ गई है, इसका मतलब है, कि इस बात का आपको एहसास हो गया है | यही से कर्म शुरुवात होती है| अतीत में यदि कुछ हुआ था, क्युकि उसे होना था इसलिए वह हुआ | अतीत में जो बीत गया उसे स्वीकार करे, और उस पर चिंता न करे, और आगे बढ़े | यदि आप ने कोई गलती करी है,जैसे आप ने किसी का अपमान किया है,और उस व्यक्ति ने उस घटना को पकड़ कर रखा है, यहाँ तक उस व्यक्ति से आपने उस घटना के लिए कई बार माफी मांगी है, फिर भी यदि वह व्यक्ति उसके लिए आप को माफ नहीं करता तो क्या किया जाए ?यदि किसी ने आप के साथ कुछ गलत किया है और आपने भी किसी के साथ कुछ गलत किया है, तो क्या आप माफी मांग कर आगे नहीं बढ़ जाते? आप भी नहीं चाहेंगे कि आप की कोई गलती कोई व्यक्ति जीवन भर पकड़ कर रखे, ठीक है न ? यदि वह व्यक्ति आपको माफ कर देता है, तो आगे बढ़ो, और अपनी स्थिति को समझ कर देखे कि आपको कैसा लगता है ? उस अन्य व्यक्ति को भी उसी तरह से देखे |

प्रश्न: यदि कोई व्यक्ति अपनी गलती के कारण पछता रहा है, परन्तु शायद अपने अहंकार के कारण बात नहीं कर पा रहा है, इसके लिए कोई क्या करे ?
श्री श्री रवि शंकर: जब आपकी चेतना पीड़ा की अवस्था में होती जिसमे रोष और क्रोध हो तो क्या वह जीवन भर साथ रखने से आपको किसी भी तरह से मदत करेगा ? बिलकुल नहीं ! यह आपके समय, योग्यता और जीवन को सिर्फ बर्बाद ही करेगा | इसलिए आपको माफ करके, भूलकर आगे बढते रहना है | आपने किसी को दर्द दिया और किसी ने आपको दर्द दिया फिर वह अध्याय समाप्त हो जाता है |एक समस्या थी जिसे आना था और वह आई और आपकी स्वयं की मूर्खता ने उसे होने दिया | अब वह समाप्त हो गयी है इसलिए आगे बढे | इस तरह की सोच को आपने अपनाना चाहिए जिससे आप बेहतर महसूस करेंगे |

प्रश्न: जो लोग प्रकृति को हानि पहुचाते है, वे आराम की नींद में कैसे सो सकते है?
श्री श्री रवि शंकर: हां! आज यह बड़ी समस्या है | प्रकृति से बहुत कुछ लेकर उसे कुछ भी वापस में नहीं देना | वृक्षो को नहीं लगाना और लगे हुए वृक्ष और जल स्त्रोत्र का संरक्षण नहीं करना, अन्न की बर्बादी करना और प्लास्टिक का उपयोग करना ...! पूर्व के वर्षों की तुलना में हाल के ५-७ वर्षों में इसके प्रति जागरूकता आई है |

प्रश्न: एक शिशु का जन्म अमरीका में हुआ और उसके दादी/नानी को लगता है कि उसके पति का उसके नाती के रूप में पुनर्जन्म हुआ है| मेरा प्रश्न है कि क्या किसी आत्मा का मुंबई से अमरीका जाना संभव है?
श्री श्री रवि शंकर: हाँ, हाँ! निश्चित रूप से ! बहुत ही कम समय में, बिना किसी टिकिट या वीज़ा और आप्रवासी की भी कोई समस्या नहीं |

प्रश्न: शरीर के मृत होने पर भी स्मृति कैसे आस्तित्व में रहती है?
श्री श्री रवि शंकर: स्मृति कोई भौतिक तत्व नहीं है| यह ठीक है कि उसमे भौतिकता होती है,परन्तु उसके सांसारिक प्रभाव/छाप चेतना पर भी होते है | आप माइक पर बोल रहे है, और उन शब्दों का विद्युतीकरण होकर, वे फिर से ध्वनि बन जाते है | यह कैसे होता है ? यही चेतना की बुद्धिमत्ता है | ध्वनि का विद्युत बनना और फिर से वही ध्वनि में परिवर्तित हो जाना | मस्तिष्क के कोशिका में संस्कार/छाप बन जाते है, जो एक जीवनकाल से अगले जीवन काल मे चलते जाते है | इसलिए चेतना में कई पूर्व की स्मृतियाँ होती है | यह अत्यंत स्वाभाविक है | कई घटनाये हो रही और कुछ चेतना में बैठ/छप जाती है |

प्रश्न: मै बहुत शरारती हूँ और बहुत शरारते करता हूँ, और उसके लिए मुझे बहुत डाँट भी पड़ती है | मुझे पता है कि आप भी बहुत शरारती थे तो फिर आपको कभी भी डाँट क्यों नहीं पड़ी ?
श्री श्री रवि शंकर: ओह ! मुझे भी डाँट पड़ती थी, और वह वयस्कता योग्य नही है जिसे बचपन में डाँट नहीं पड़ी हो !

प्रश्न: देवी के कुछ स्वरुप जैसे महाकाली का स्वरुप इतना भयानक क्यों है ?
श्री श्री रवि शंकर: प्रेम और भय एक ही चेतना के दो छोर है | यदि आप दिव्यता के इस भयानक रूप में प्रेम कर सकते है तो फिर आप किसी से भी प्रेम कर सकते है | और फिर कोई भय नहीं रह जाता है | जब आपका स्वीकार करने का स्थर विविध हो जाता है, और आप सुंदर और कुरूप को अपने स्वयं के रूप स्वीकार कर लेते है तो आ़प मजबूत और दृढ़ बन गए है | इसलिए दिव्यता की प्रस्तुति सुंदर और कुरूप स्वरुप में करना प्राचीन संतो की बुद्धिमत्ता थी |
भय और अहंकार भी उसी दिव्यता का स्वरुप है |निर्मलता से भयानक- जन्म से मृत्यु , जब किसी की चेतना का स्थर इतना जागृत होता है कि वह दिव्यता को हर स्वरुप में देख पाता है तो फिर इस सब को माया के रूप में देखा जा सकता है | जब मन शांत होता है तो दिव्यता यही पर होती है |
लोग कैक्टस (नागफनी) से भी सजावट करते है | सब कुछ में सुंदरता को देखते है- फूल में भी और कांटो में भी | यदि आप दिव्यता के इस भयानक स्वरुप को स्वीकार कर लेते है तो आपके शरीर और मन से भय पूर्णता निकल जाता है| जो कोई भी इन अवस्थाओ से निकल चुका है उनकी स्वीकार करने की शक्ति बहुत मजबूत हो गई है | सुंदरता और कुरूपता आपका स्वभाव है | सबसे सुन्दर और कुरूप स्वरुप ,यह सब कुछ एक ही सत्य के अंश है |

प्रश्न: माया क्या है?
श्री श्री रवि शंकर: माया का अर्थ है जो बदलता है,और जिसे नाप किया जा सकता है | जो कुछ भी पांच इन्द्रियों के परिधि में आता है, वह बदल रहा है, वही माया है |

प्रश्न: क्या जन्म और पुनर्जन्म होता है ? यदि हाँ तो मानव होने का अर्थ क्या है ?
श्री श्री रवि शंकर: मानव जन्म ही क्यों ? मानव जीवन , जीवन को जानने के लिए है |

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विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’

आज श्री श्री ने क्या कहा..

जर्मन आश्रम

२६ अगस्त २०१०

प्रश्न : एक प्रश्न मैं अपने आप से बहुत समय से करता आया हूं, पर समझ नहीं पा रहा हूं कि उसे किन शब्दों में कहूं। ये अजीब लग सकता है, पर जब मैं पूरे ब्रह्माण्ड को आपस में जुड़ा हुआ पाता हूं, तो सोचता हूं कि इस में मनुष्य का क्या कोई उपयोगी महत्व है, और हम जब तक यहां हैं, क्या हमारे अस्तित्व से दूसरों को कोई लाभ है भी?

श्री श्री रवि शंकर : बहुत अच्छा प्रश्न है! जीवन का क्या महत्व है और हम यहां किसलिये हैं? तुम्हें खुद को शाबासी देनी चाहिये अगर ये प्रश्न तुम्हारे जीवन में आया है, इसका अर्थ है कि तुम्हारी बुद्धि प्रौढ़ है। यहां लाखों लोग बिना ये प्रश्न पूछे कि, ‘जीवन का ध्येय क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?’ अपना पूरा जीवन बिता देते हैं। वे बस भोजन करते हैं, पीते हैं, टेलिविज़न देखते हैं, प्रेम या लड़ाई करते है और मर जाते हैं। उन्हें इस बारे में ज़रा भी ख़्याल नहीं आता। वे एक मिनट भी रुक कर ये नहीं सोचते कि, ‘जीवन क्या है? मैं कौन हूं? मुझे क्या चाहिये? मैं क्या कर सकता हूं? मैं कैसे उपयोगी हो सकता हूं?’ इन में से कोई भी प्रश्न उनके मन में नहीं आते। अगर ये प्रश्न तुम्हारे भीतर आया है तो इसका अर्थ है कि तुमने जीवन जीना शुरु कर दिया है।

तुम्हारी जीवन यात्रा सही रास्ते पर जा रही है। इस यात्रा को आध्यात्म कहते हैं – ये जानना कि, ‘इस जीवन का ध्येय क्या है। मुझे क्या चाहिये? जीवन क्या है? मैं कौन हूं?’ इससे पहले कि तुम अपने आप से ये प्रश्न करो कि, ‘मुझे क्या चाहिये?’ तुम्हें ये जानना चाहिये कि तुम कौन हो। जीवन क्या है? इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण भाग हैं – एक विज्ञान है और एक आध्यात्म है। विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’

‘मैं’ और ‘ये’। ‘ये’ की समझ तुम्हें विज्ञान से आती है। ‘मैं’ की समझ तुम्हें आध्यात्म से आती है। ये ‘मैं’ क्या है? ‘मैं’ को जानने के लिये पहले ‘ये’ को जानो। ‘ये क्या है?’ ‘ओह! ये संसार है।’ ‘ये शरीर है।’ और, ‘ये शरीर कैसे आया?’ ‘ये शरीर एक ४-५ किलो के बच्चे के रूप में आया। फिर उस बच्चे ने इस धरती से ही सब सामग्री ली और अब ५० किलो का हो गया है।

तो, इस शरीर में क्या है? ये शरीर कैसे बना है? यह ध्यान देने योग्य है।

प्रश्न : आपने शरीर के बारे में बताया है। मैं शरीर और पंचतत्वों के संबंध को जानना चाहता हूं।

श्री श्री रवि शंकर : पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष – ये पंचतत्व हैं। अगर इन में से एक भी तत्व ना हो तो ये शरीर टिक नहीं पायेगा। है ना? पृथ्वी तत्व से भोजन मिलता है। जल तत्व तो आप जानते ही हैं। फिर, अग्नि तत्व की, गर्मी की आवश्यकता होती है। गर्मी के बिना ये शरीर जी नहीं सकता। फिर वायु तत्व आया। शरीर के लिये वायु और अंतरिक्ष तत्व के बिना रहना भी संभव नहीं है।

इस शरीर का अस्तित्व पंचतत्वों से है। और फिर इस शरीर का क्या होता है? ये शरीर पंचतत्व से आया है और उन्हीं में वापिस चला जायेगा। ये विज्ञान है। एक मृत शरीर में भी पंचतत्व विद्यमान होते हैं। तो फिर, एक मृत और जीवित शरीर में क्या अंतर है? जीवित शरीर में जीवन होता है। और, जीवन क्या है?

जब ये प्रश्न आया, तब तुम देखते हो, ‘ओह! प्राण – जीवन शक्ति!’ और फिर तुम प्राण के गहन अध्धयन में जाते हो, और प्राण के बारे में समझते हो। ‘ये क्या है? ये मन है। ओह! तो ये मन क्या है? मन कितने प्रकार का होता है? मन क्या क्या करता है?’ इस जिज्ञासा से तुम आर्ट आफ़ लिविंग में आ जाते हो।

प्रश्न : अस्तित्व के इतने स्तरों के बारे में आपने बताया है, कृपया इन पर कुछ और विस्तार कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर : मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार मन के ये चार पहलू हैं।
तो, मन क्या है? क्या तुम सुन रहे हो? अगर तुम्हारी आंखें खुली हैं, और कान में तो आवाज़ जाती ही है पर यदि तुम्हारा मन कहीं और है, तो क्या तुम मेरी बात सुन सकोगे? नहीं। है कि नहीं? तो, इस मन से ही तुम महसूस करते हो। ठीक है ना? जो पांचों इन्द्रियों के ज़रिये बाहर जाता है और अनुभव करता है, वो मन है।

अच्छा, अगर तुम मन से अनुभव कर रहे हो तो बुद्धि क्या है? जब तुम अनुभव करते हो, तो कहते हो, ‘ओह! ये अच्छा है। ये अच्छा नहीं है। मुझे ये चाहिये। मुझे वो नहीं चाहिये।’ तुम्हारी बुद्धि तय करती है। ये विवेक शक्ति है। मैं बोल रहा हूं और तुम्हारा मन कह रहा है, ‘ये बात मुझे पसंद नहीं है।’ या, ‘मैं ये बात मानता हूं।’ या, ‘मैं ये बात नहीं मानता।’ तुम अपने भीतर एक वार्तालाप कर रहे हो। ये बुद्धि है।

और फिर, स्मृति वो है जो जानकारियों को संभाल कर रखती है। तो, कभी कभी कोई अनुभव करते हुये तुम्हें लगता है, ‘ओह! मैंने ऐसा अनुभव पहले किया है।’ अगर तुम एक सेब की मिठाई का मज़ा पहले ले चुके हो तो तुम कह उठते हो, ‘ओह! मैं पहले भी इसका मज़ा ले चुका हूं। मैंने ये सेब की मिठाई पहले भी खाई है।’ तो स्मृति का काम है अनुभव को पहचानना और उसे स्मृति में संजो कर रखना।

फिर आया अहंकार। अहंकार है – ‘मैं कुछ हूं। मैं बुद्धिमान हूं। मैं मूर्ख हूं। मुझे ये पसंद है। मुझे वो पसंद नहीं है। मैं अमीर हूं। मैं बहुत ग़रीब हूं। मैं बदसूरत हूं। या, मैं सुंदर हूं। मैं कुछ हूं। मैं हूं,’ ये अहंकार है।
जब तुम अहंकार को जान गये, तो कहोगे कि क्या बस इतना ही है? नहीं! अहंकार को जानने के बाद भी कुछ जानना बाकी है। वो क्या है? वो आत्मा है।

इससे आगे अगली पोसट में..


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"जीवन का क्या महत्व क्या है"

आज श्री श्री ने क्या कहा..

२६ अगस्त २०१०


प्रश्न : एक प्रश्न मैं अपने आप से बहुत समय से करता आया हूं, पर समझ नहीं पा रहा हूं कि उसे किन शब्दों में कहूं। ये अजीब लग सकता है, पर जब मैं पूरे ब्रह्माण्ड को आपस में जुड़ा हुआ पाता हूं, तो सोचता हूं कि इस में मनुष्य का क्या कोई उपयोगी महत्व है, और क्या हम जब तक यहां हैं, क्या हमारे अस्तित्व से दूसरों को कोई लाभ है भी?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत अच्छा प्रश्न है! जीवन का क्या महत्व क्या है और हम यहां किसलिये हैं? तुम्हें खुद को शाबासी देनी चाहिये। अगर ये प्रश्न तुम्हारे जीवन में आया है, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारी बुद्धि प्रौढ़ है। यहां लाखों लोग बिना ये प्रश्न पूछे कि, ‘जीवन का ध्येय क्या है? मैं यहां क्यों आया हूं?’ अपना पूरा जीवन बिता देते हैं। वे बस भोजन करते हैं, पीते हैं, टेलिविज़न देखते हैं, प्रेम या लड़ाई करते है और मर जाते हैं। उन्हें इस बारे में ज़रा भी ख़्याल नहीं आता। वे एक मिनट भी रुक कर ये नहीं सोचते कि, ‘जीवन क्या है? मैं कौन हूं? मुझे क्या चाहिये? मैं क्या कर सकता हूं? मैं कैसे उपयोगी हो सकता हूं?’ इन में से कोई भी प्रश्न उनके मन में नहीं आते। अगर ये प्रश्न तुम्हारे भीतर आया है तो इसका अर्थ है कि तुमने जीवन जीना शुरु कर दिया है। तुम्हारी जीवन यात्रा सही रास्ते पर जा रही है। इस यात्रा को आध्यात्म कहते हैं – ये जानना कि, ‘इस जीवन का ध्येय क्या है। मुझे क्या चाहिये? जीवन क्या है? मैं कौन हूं?’ इससे पहले कि तुम अपने आप से ये प्रश्न करो कि, ‘मुझे क्या चाहिये?’ तुम्हें ये जानना चाहिये कि तुम कौन हो। जीवन क्या है? इस प्रश्न के दो महत्वपूर्ण भाग हैं – एक विज्ञान है और एक आध्यात्म है। विज्ञान से तुम ये जान पाते हो कि, ‘ये क्या है।’ आध्यात्म से तुम ये जान पाते हो कि, ‘मैं क्या हूं।’

‘मैं’ और ‘ये’। ‘ये’ की समझ तुम्हें विज्ञान से आती है। ‘मैं’ की समझ तुम्हें आध्यात्म से आती है। ये ‘मैं’ क्या है? ‘मैं’ को जानने के लिये पहले ‘ये’ को जानो। ‘ये क्या है?’ ‘ओह! ये संसार है।’ ‘ये शरीर है।’ और, ‘ये शरीर कैसे आया?’ ‘ये शरीर एक ४-५ किलो के बच्चे के रूप में आया। फिर उस बच्चे ने इस धरती से ही सब सामग्री ली और अब ५० किलो का हो गया है।
तो, इस शरीर में क्या है? ये शरीर कैसे बना है?

प्रश्न: आपने शरीर के बारे में बताया है। मैं शरीर और पंचतत्वों के संबंध को जानना चाहता हूं।

श्री श्री रवि शंकर :
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अंतरिक्ष – ये पंचतत्व हैं। अगर इन में से एक भी तत्व ना हो तो ये श्रीर टिक नहीं पायेगा। है ना? पृथ्वी तत्व से भोजन मिलता है। जल तत्व तो आप जानते ही हैं। फिर, अग्नि तत्व की, गर्मी की आवश्यकता होती है। गर्मी के बिना ये शरीर जी नहीं सकता। फिर वायु तत्व आया। शरीर के लिये वायु और अंतरिक्ष तत्व के बिना रहना भी संभव नहीं है।

इस शरीर का अस्तित्व पंचतत्वों से है। और फिर इस शरीर का क्या होता है? ये शरीर पंचतत्व से आया है और उन्हीं को वापस चला जायेगा। ये विज्ञान है। एक मृत शरीर में भे पंचतत्व विद्यमान होते हैं। तो फिर, एक मृत और जीवित शरीर में क्या अंतर है? जीवित शरीर में जीवन होता है। और, जीवन क्या है?

जब ये प्रश्न आया, तब तुम देखते हो, ‘ओह! प्राण – जीवन शक्ति!’ और फिर तुम प्राण के गहन अध्धयन में जाते हो, और प्राण से अधिक कुछ पाते हो। ‘ये क्या है? ये मन है। ओह! तो ये मन क्या है? मन कितने प्रकार का होता है? मन क्या क्या करता है?’ इस जिज्ञासा से तुम आर्ट आफ़ लिविंग में आ जाते हो।

प्रश्न : अस्तित्व के इतने स्तरों के बारे में आपने बताया है, कृपया इन पर कुछ और विस्तार कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
मन, बुद्धि, स्मृति और अहंकार, मन के चार कार्य हैं। या, मन के ये चार पहलू हैं।

तो, मन क्या है? क्या तुम सुन रहे हो? अगर तुम्हारी आंखें खुली हैं, और कान तो खुले हैं ही...तुम्हारे कान में आवाज़ जाती है पर यदि तुम्हारा मन कहीं और है, तो क्या तुम मेरी बात सुन सकोगे? नहीं। है कि नहीं? तो, इस मन से ही तुम महसूस करते हो। ठीक है ना? जो पांचों इन्द्रियों के ज़रिये बाहर जाता है और अनुभव करता है, वो मन है।

अच्छा, अगर तुम मन से अनुभव कर रहे हो तो बुद्धि क्या है? जब तुम अनुभव करते हो, तो कहते हो, ‘ओह! ये अच्छा है। ये अच्छा नहीं है। मुझे ये चाहिये। मुझे वो नहीं चाहिये।’ तुम्हारी बुद्धि तय करती है। ये विवेक शक्ति है। मैं बोल रहा हूं और तुम्हारा मन कह रहा है, ‘ये बात मुझे पसंद नहीं है।’ या, ‘मैं ये बात मानता हूं।’ या, ‘मैं ये बात नहीं मानता।’ तुम अपने भीतर एक वार्तालाप कर रहे हो। ये बुद्धि है।

और फिर, स्मृति वो है जो जानकारियों को संभाल कर रखती है। तो, कभी कभी कोई अनुभव करते हुये तुम्हें लगता है, ‘ओह! मैंने ऐसा अनुभव पहले किया है।’ अगर तुम एक सेब की मिठाई का मज़ा पहले ले चुके हो तो तुम कह उठते हो, ‘ओह! मैं पहले भी इसका मज़ा ले चुका हूं। मैंने ये सेब की मिठाई पहले भी खाई है।’ तो स्मृति का काम है अनुभव को पहचानना और उसे स्मृति में संजो कर रखना।

फिर आया अहंकार। अहंकार है – ‘मैं कुछ हूं। मैं बुद्धिमान हूं। मैं मूर्ख हूं। मुझे ये पसंद है। मुझे वो पसंद नहीं है। मैं अमीर हूं। मैं बहुत ग़रीब हूं। मैं बदसूरत हूं। या, मैं सुंदर हूं। मैं कुछ हूं। मैं हूं,’ ये अहंकार है।
जब तुम अहंकार को जान गये, तो कहोगे कि क्या बस इतना ही है? नहीं! अहंकार को जानने के बाद भी कुछ जानना बाकी है। वो क्या है? वो आत्मा है।

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"जो विश्वास शक से होकर गुज़रता है और फिर भी बना रहता है, वही सच्चा विश्वास है"

पिछली पोस्ट के शेष अंश:

मुझे एक घटना याद है जो पिताजी मुझे बताते थे। मेरे दादीजी ने दादाजी को अपना साढ़े दस किलो सोना महात्मा गांधी को देने के लिए दिया और दादाजी २० साल तक महात्मा गांधी के साथ रहे। तुम्हें पता है, भारतीय महिलायें सोने से बहुत प्रेम करती हैं इसलिये विवाह इत्यादि उत्सवों में उन्हें आमतौर पर उपहार में सोने के आभूषण दिये जाते थे। मेरी दादीजी के पास साढ़े दस किलो सोना था। सोचो यह उस समय में कितना होगा! एक सोने की चेन को छोड़कर उन्होंने बाकी सब सोना महात्मा गांधी को दे दिया जब उन्होंने भारत का स्वतंत्रता संग्राम शुरु किया। कुछ देने के लिये कोई तुम्हें मजबूर नहीं करता, पर जब तुम कुछ देते हो तो तुम्हें अपने भीतर एक संतोष का अनुभव होता है।
मैं कहता हूँ अपने जीवन में दो बातें आवश्यक हैं – एक तो अधिक मुस्कुराओ और जितना हो सके उतना सेवा कार्य करो।

प्रश्न : अहंकार और आत्मविश्वास में क्या संबंध है?

श्री श्री रवि शंकर :
किसी और की उपस्थिति में सहज ना होना अहंकार है। तुम कहीं भी और किसी के साथ भी सहज हो तो यह आत्मविश्वास है। अहंकार का इलाज है - सहजता। सहज होना और आत्मविश्वास होना एक साथ ही होता है। ये आत्मविश्वास से अलग नहीं किया जा सकता। जब तुम में आत्मविश्वास होता है तो तुम सहज होते हो। अगर तुम सहज हो तो आत्मविश्वास भी होगा।

प्रश्न : क्या खुश होने के लिये धन का होना आवश्यक है?

श्री श्री रवि शंकर : इसमें कोई शक नहीं है कि जीवन की रोज़मर्रा की आवश्यकताओं के लिये तुम्हें कुछ धन की आवश्यकता है, पर धन से तुम खुशी खरीद नहीं सकते हो। खुशी आती है ज्ञान से।

प्रश्न : आप हर अवस्था में मुस्कुरा कैसे लेते हैं?

श्री श्री रवि शंकर : मुस्कुराहट हमारा brand mark है। मुस्कुराहट हमारी पहचान है। अगर तुम किसी को देखो जो मुस्कुरा नहीं रहा है और कहे कि उसने Art of Living कोर्स किया है, तो उसकी बात पर यकीन मत करना। मुझे यकीन है कि यहां मौजूद लोगों में जिन्होंने भी सही माइने में ये कोर्स किया है, मेरी बात से सहमत होंगे।

प्रश्न : जीवन में भीतरी संतुष्टि अनुभव करने के लिये सेवा का क्या योगदान है?

श्री श्री रवि शंकर : जीवन में हमारे पास कोई ध्येय होना चाहिये। मेरा ध्येय है अधिक से अधिक लोगों के जीवन में खुशी लाना। अगर हम बैठ कर हर समय सिर्फ़ अपने बारे में ही सोचते रहें तो हम विषादग्रस्त हो जायेंगे। हमें देखना चाहिये, ‘मैं सेवा कैसे कर सकता/सकती हूँ? मैं दूसरों के लिये उपयोगी कैसे हो सकता/सकती हूँ?’ ये विचार बहुत उपयोगी है। बहुत, बहुत, बहुत उपयोगी है।

Art of Living एक मंच प्रदान करता है जहाँ सब मिल कर सेवा कार्य कर सकें। तुम्हें पता है, ‘जब यूनाईटेड नेशन्स ने वृक्षारोपण के लिये ‘Stand up and take action’ का एलान किया तो Art of Living के सदस्यों नें विश्व भर में ५५० लाख वृक्ष लगाये।
हम सब मिलकर कोई सेवा कार्य कर सकते हैं। हिंसा कम कर सकते हैं, तनाव कम कर सकते हैं, अपनेपन का भाव फैला सकते हैं, और प्रेम और शांति की सकारात्मक उर्जा फैला सकते हैं। हम सब मिलकर ये करेंगे। क्या हम सब लोग प्रतिबद्ध हैं ऐसा करने के लिये? (सभी श्रोता एक स्वर में हाँ कहते हैं।’)

प्रश्न : अद्वैत का आधार क्या है?

श्री श्री रवि शंकर : अद्वैत quantum physics है। Quantum physics कहती है कि सभी अणु एक ही स्पंदन की लहर हैं। इस तरह पूरा ब्रह्माण्ड एक ही पदार्थ से बना है – मैं, तुम, वो, सभी लोग और सभी कुछ उसी एक तत्व से बना है। और उस तत्व का स्वभाव है - आनंद। अद्वैत यही कहता है। उसके अनुभव की एक झलक मात्र मिल जाने से ही तुम में इतनी शक्ति और स्थिरता आ जाती है कि कुछ भी तुम्हें हिला नहीं सकता, कोई तुम्हारी मुस्कुराहट नहीं छीन सकता।

प्रश्न : आपको इतनी हिम्मत कहाँ से प्राप्त होती है?

श्री श्री रवि शंकर: हिम्मत कहाँ से प्राप्त होती है? अद्वैत से। ये जानने से कि तुम में ऐसा कुछ है जो बदल नहीं रहा है। मौन, शांत चित्त और ध्यान के अनुभव से तुम्हें भीतर से बहुत हिम्मत मिलेगी।

प्रश्न : Art of Living बहुत बढ़िया काम कर रहा है। क्या ३० प्रतिशत लोगों के विषादग्रस्त होने पर और आने वाले दशक में यह संख्या ५० प्रतिशत होने की संभावना में मानव जाति के लिये कोई उम्मीद रह जाती है? क्या कोई आशा है?

श्री श्री रवि शंकर : हां, और हम सभी को इसके लिये काम करना है। तुम्हें पता है कि हमने शुरुवात भारत में एक छोटे से गांव से, ५० लोगों के साथ की थी। हमारे पास कोई साधन नहीं थे, कार्यकर्ता नहीं थे, पर हमारे पास एक दृष्टि थी – हमें विश्व में बहुत लोगों तक पहुँचना है। इस तरह इन तीस सालों में हम लाखों लोगों तक पहुँचें हैं। ये संभव है। मोबाइल की पंहुच समस्त विश्व में हो गई है। अगर मोबाइल समस्त विश्व तक पहुँच सकता है तो क्या ज्ञान और करुणा समस्त विश्व में नहीं पहुँच सकते हैं? हमें प्रयास करना होगा। ठीक है?

प्रश्न : मैंने विश्वास खो दिया है, मैं उसे दोबारा कैसे प्राप्त करूं?

श्री श्री रवि शंकर : विश्वास को दोबारा प्राप्त करने के लिये कोई प्रयास मत करो। अपने हृदय की सुनो। विश्वास कभी खो नहीं सकता है। जितना शक कर सकते हो करो। सत्य हमेशा शक पर विजयी होता है। सत्य इतना मज़बूत होता है कि शक उसे नष्ट नहीं कर सकता है। तो शक करना अच्छा है। जो विश्वास शक से होकर गुज़रता है और फिर भी बना रहता है, वो सच्चा विश्वास है।
तुम में से कितने लोगों ने अभी तक भारत नहीं देखा है? तुम में से कितने लोग भारत देखने आना चाहते हो? ओह! बढ़िया है! यहाँ से हम एक टोली की भारत यात्रा की व्यवस्था करेंगे। भारत में भी तुम्हारा अपना एक घर है। तुम सब भारत आओ, एक हफ़्ता, दस-पन्द्रह दिन...जो भी तुम्हारे लिये सम्भव हो। वहाँ आकर तुम सब सेवा कार्यों की एक झलक देख सकते हो।

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अंहकार का अर्थ है किसी एक पहचान में फंस जाना

प्रश्न: विकास के आधुनिक सिद्धांत (Modern theory of evolution) के बारे में आपके क्या विचार हैं? अगर यह सत्य है तो आत्माएं किस चरण में आती हैं? उससे पहले आतमाओं की क्या स्थिति होती है?

श्री श्री रवि शंकर: आधुनिक सिद्धांत विकसित हो रहे हैं | उनके अनुसार सब कुछ कहीं से शुरु हुआ है |मैं इसे linear understanding कहूँगा| लेकिन एक spherical thinking भी है जिसकी यहाँ कमी है| ओरिएंट में sperical thinking रही है| पच्छम में linear understanding| सबका कहीं से शुरु होना आवश्यक है| एक एडम और ईव होने ही चाहिए जिनकी सब संतान हैं| इसके आधार पर हर कोई एक दूसरे का भाई यां बहिन है| तो फिर कोई किसी से शादी कैसे कर सकता है? इस तरह से शादी ही एक अपराध हुआ| अगर ईश्वर एक एडम और ईव बना सकते हैं तो वह ऐसे और भी बना सकते थे| और फिर ईश्वर ने ऐसा ज्ञान का फल क्यों बनाया जिसे खाने के लिए मना ही करना था? इस तरह से हमारी सोच बहुत संकुचित है और हमे व्यापक समझ अपनाने की आवश्यकता है| हमे गोलाकार सोचने की आवश्यकता है| शुरुआत में किसी एक जीव का नहीं बल्कि सबकी, सब वस्तुयों की एक साथ रचना हुइ| अगर मैं तुमसे पूछ्ता हूँ कि टैनिस की गेंद का प्रारंभ बिन्दु कौन सा है तो तुम्हारा क्या उत्तर होगा? गेंद पर हर एक बिन्दू पहला है, और अंतिम भी | प्राचीन लोगों की यही सोच रही| तभी उन्होने कहा, "संसार आदि है और अनंत भी", अर्थात इसकी ना शुरुआत है और ना ही अंत| आत्मा की ना कोई शुरुआत है और ना अंत| जिस कारण ब्रह्मांड का अस्तित्व है , उस दिव्यता की ना शुरुआत है और ना ही अंत| तीनो एक ही हैं| यही अद्वैत का सिद्धांत है कि सब कुछ एक ही तत्व से बना है| यही theory of relativity है| String theory और आधुनिक वैज्ञानिकों का भी यही कहना है| आइन्सटाईन भगवद गीता का अध्ययन करके हैरान रह गया था|
ब्रह्मड में सबकुछ, चाहे जीवीत है यां अजीवित, एक ही चेतना से बना है| प्राचीन ग्रंथ जैसे उपनिष्द और गुरु ग्रंथ साहिब में भी यही कहा गया है|  सिक्खों में अभिवादन करने का बहुत उत्तम तरीका है - सत्श्रियाकाल| सत+ श्री + अकाल: सत - सत्य, श्री - धन, अकाल - जो समय से परे है| तो जब आप यह कह कर अभिवादन करते है, आप एक दूसरे को अपना वासत्विक स्वरूप याद दिलाते हैं, वो स्वरूप जो समय से परे है और आपका असली धन है| तुम अपने से बाहर क्या ढूंढते हो, सब कुछ अपने भीतर ही है|

प्रश्न: यदि सब कुछ बदल रहा है, कुछ भी करने का क्या मतलब है?

श्री श्री रवि शंकर: यह सवाल पूछने में क्या मतलब है? उत्तर समझने में क्या मतलब है? हम कुछ करते हैं क्योंकि हम कुछ किए बिना नहीं रह सकते
यह भी बदलाव का हिस्सा है|
'सब कुछ बदल रहा है' - यह समझने के लिए है|
पर हमें कुछ करते रहना है, और यदि हम ऐसा करते हैं जो हमे शांति देता है और विकास की तरफ ले जाता है तो यह बहाव की दिशा में तैरने जैसा है|
और कुछ ऐसा करना जो हमे विकास से दूर ले जाता है, बहाव की उल्टी दिशा में तैरने जैसा है|

प्रश्न: अपने प्रति अपराधबोध और आलोचना के भाव से कैसे बाहर आ सकते हैं? मुझे ऐसा करके बहुत दुख होता है जब्कि मैं जानता हूँ जो मैने किया वो मेरे लिए सबसे बेहतर था|

श्री श्री रवि शंकर: और Advance कोर्स

प्रश्न: अहंकार क्या है? क्या अहंकार और प्रेम एकसाथ चल सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर:
अहंकार अलगाव की भावना है, एक अलग पहचान की भावना
तीन प्रकार का अहंकार है:

१. 'मैं यह हूँ'
२. 'मैं यह नहीं हूँ'
३. 'मैं दूसरों से भिन्न हूँ'

अहंकार कैसे लुप्त हो सकता है?
जब अहंकार का विस्तार होता है  'मैं यह हूँ', 'मै यह भी हूँ', 'मैं वो भी हूँ'| मुश्किल तब होती है जब हम किसी एक पहचान में फंस जाते है| जैसे कि अगर तुम सेना अधिकारी हो और घर पर भी तुम वैसा ही व्यवहार करते हो तो मुश्किल होती है| तुम सेना अधिकारी हो, यह तुम्हारी एक पहचान है| पर तुम एक पिता, एक पति, एक पुत्र भी हो यह सभी तुम्हारी पहचान है| जब तुम इन सब भूमिकाओं को एक जैसा महत्व देते हो तो अहंकार घुल जाता है| एक संकुचित पहचान से दिव्यता के साथ पहचान करना ही अहंकार का विस्तार करना है तुम मैंपन से अहं ब्रह्म की ओर बढ़ते हो| 'मैं कुछ हूँ' से 'मैं कुछ नहीं हूँ', और 'मैं कुछ नहीं हूँ' से 'मै सबकुछ हूँ' पर यह बहुत दार्शनिक लगता है तुम अपने दफ्तर में जाकर यह नहीं कह सकते कि तुम कुछ नहीं हो ना ही तुम अपने घर पर कह सकते हो कि तुम सबकुछ हो ऐसा करने से कुछ नहीं होगा| मैं कहूँगा, अपने अहंकार से बाहर आने का सबसे श्रेष्ठ तरीका है - सहजता|
अहंकार से तुम असहज, अप्राकृतिक और अलग महसूस करते हो हर किसी से हर परिस्थिति में सहजता से व्यवहार करना, यह एक बच्चे की तरह सरल रहना है|
अहंकार के बारे में एक अंतिम बात यह कहूँगा कि अगर तुम्हे लगता है कि तुममें अहंकार है तो इससे छेड़-छाड़ मत करो| इसे अपनी जेब में रखो और चिन्ता मत करो
प्रश्न: मैं अपने शरीर को शुद्ध कैसे कर सकता हूँ?

श्री श्री रवि शंकर: प्राणायाम, सही भोजन, मन और शरीर को विश्राम देकर, और सही मार्गदर्शन में उपवास रखकर

प्रश्न: हम कौन से निर्णय दिल से लेते हैं और कौन से दिमाग से?

श्री श्री रवि शंकर: व्यापार दिमाग से और सेवा दिल से करो

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"समाज में शांति के लिए राजनीति में आध्यात्मिकता, व्यापारिक कंपनियों में सामाजिक दायित्व की भावना और धर्म में धर्मनिरपेक्षता होना आवश्यक है"

Ramsay Taum (Director of External Relations & Community Partnerships, University of Hawaii at Manoa and Chairman of the Board of Sustain Hawaii) ने एक हवाइ मंत्र के साथ श्याम की शुरुआत की। फ़िर उन्होने भारतीय और हवाइ सभ्यता की समानता के बारे में कहा।
श्री श्री ने धन्यवाद देते हुए शुरुआत की।

श्री श्री रवि शंकर :
एक ही बात को एक अलग नज़रिए से सुनकर बहुत अच्छा लगा। यह बहुत ही सुन्दर है कि किस तरह सभी सभ्यतायों में एक जैसी बात कही गई है। जिस तरह Ramsay Taum ने ज़िक्र किया, उसी तरह संस्कृत में भी पाँच तत्व हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। फिर हैं मन, बुद्धि और अहंकार। और फ़िर आत्मा।
जब हम ने एक दूसरे को mahalo कह कर नमस्कार किया, तो वो अहंकार से परे एक कदम है। ’मा’ का अर्थ है - जिसे तुम जानते हो। बच्चे का पहला शब्द माँ होता है। एक बच्चा मैं की भावना से परे देखता है। यह बहुत ही सुन्दर है कि दुनिया में सभी सभ्यतायों का मूल एक जैसा ही है।

प्रश्न : हम अहंकार पर काबू कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
अहंकार को काबू करने का प्रयास भी मत करो। अगर तुम्हे लगता है कि तुममे अहंकार है तो इसे अपनी जेब में रखो। अहंकार को काबू करने में उससे भी बड़ा अहंकार हो जाता है। अहंकार अनदेखा किया जाना पसन्द नहीं करता। अहंकार का इलाज है - बच्चे की तरह सरलता में रहना। अगर फ़िर भी तुम्हे अहंकार परेशान करे तो उसे वहीं रहने दो।

प्रश्न : कुछ लोग लालची और क्रूर क्यों होते हैं? हम उन्हे बदल सकते हैं यां उन्हे वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
कुछ लोग नहीं जानते वो भीतर से कितने सुन्दर है। हर अपराधी के भीतर हालात का शिकार एक व्यक्ति मदद की पुकार कर रहा है। कोई भी पैदाइश से हिंसक नहीं होता। सही शिक्षा के अभाव में इन्सान ऐसा बन जाता है।

प्रश्न : ध्यान का यह तरीका अन्य तरीकों से कैसे विशेष है?

श्री श्री रवि शंकर :
यह तुम्हे साधारन बनाता है और यह केवल साधारन लोगो के लिए ही है। अगर तुम खुद को बहुत विशेष मानते हो तो ध्यान नहीं होगा। इसकी यही विशेषता है।

प्रश्न : हमें प्रेम के बारे में कुछ बताएं। अनुशासन का पालन कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम अपने पर किसी चीज़ को प्रेम करने यां ना करने के लिए दबाव नहीं डाल सकते। सहजता से अपने स्वभाव में रहो।
तीन सूरतों में तुम अनुशासन का पालन कर सकते हो:
प्रेम, भय और लालच। जब तुम प्रेम में होते हो तो अनुशासन सहज ही हो जाता है। किसी चीज़ का भय यां कोई बड़ा लालच भी तुम्हे अनुशासन में रखता है।

प्रश्न : अपना भाग्य पूरा करने के लिए क्या चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
विश्वास - यह विश्वास की तुम अपना भाग्य पा सकते हो।

प्रश्न : क्या विश्व के नेता दुनिया की मुश्किलों का हल कर सकते हैं? यां वो आर्थिक रूप से कुछ ही लोगो से प्रेरित हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे लगता है तुम्हारे प्रश्न में उत्तर भी है। मुझे लगता है ऐसे बहुत से विश्व के नेता हैं जो समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर उनके हाथ बन्धे हैं। बहुत बार वो सामाजिक व्यवस्था के कारण कुछ कर नहीं पाते। कुछ ऐसे भी हैं जिनको केवल अपनी पदवी और पार्टी से ही मतलब है। लोगों के हित से ज़्यादा इनके लिए अगले चुनाव और पार्टी की ज़रुरतें ज़्यादा महत्वपूर्ण है। ये बड़े मुद्दों पर काम करना भी चाहें तो इनके सामने अपने राजनीतिक एजेंडे खड़े हो जाते है। एक शासक सुधारक नहीं बन सकता और एक सुधारक शासक नहीं बन सकता। इनकी अलग अलग भूमिका है और इनको मिलकर काम करना चाहिए।

प्रश्न : शादी के महत्व के बारे में हमे बताएं।

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे इस विषय में अनुभव नहीं है!
शादी एक महत्वपूर्ण पद्धती है जो तुम्हे जीवन में किसी को स्वीकार करके आगे बढ़ना सिखाती है। इससे तुम बाँटना, दूसरे की देखभाल करना और अपनी देखभाल कराना सिखते हो।


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"साधना का अर्थ है हर तरह के प्रयत्न से विश्राम"

बैंगलोर आश्रम, भारत

ध्यान में कोई प्रयत्न नहीं है।
हम जो भी प्रयत्न से प्राप्त करते हैं, वो हमारे अहंकार को बढ़ाता है। जो तुम नहीं कर सकते, तुम्हें करने की आवश्यकता नहीं है। कोई कहे कि तुम्हें ४० दिन तक उपवास रखना है। तुम्हारा शरीर इसे सहन नहीं कर सकता। ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। पर अगर तुम सोचो कि तुम कुछ नहीं कर सकते, तो तुम आलसी हो जाओगे। तब भी तुम कुछ नहीं पाओगे।

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"आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है"

बैंगलोर आश्रम, २ सितंबर २००९

श्री श्री ने आज कहा -

प्रश्न : मैं अपने प्रदेश में एक सम्मानित, प्रतिष्ठित और जाना माना, उच्च पदाधिकारी हूं। जब मैं किसी अन्य जगह जाता हूं तो कभी कभी मुझे लगता है कि वहां मेरा महत्व कुछ कम है। मैं अपनी identity पर प्रश्न चिह्न लगा लेता हूं। इससे छुटकारा कैसे पाऊं?

श्री श्री :
तुम्हें पता है, तुम्हें एक सूट पहनना आना चाहिये – और उसे उतारना भी! अपने घर में सब राजा होते हैं। अकिंचन रहना सीखो – मैं कुछ नहीं हूँ। जीवन की पूरी यात्रा है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर ‘मैं ही सब हूँ।’ आमतौर पर जीवनयात्रा होती है, ‘मैं कुछ हूँ’ से ‘मैं कुछ नहीं हूँ’ और फिर, ‘मैं कुछ हूँ’!

सत्संग में बैठो। अपने वजूद को घुल जाने दो। अपने वजूद को घुलकर जाने देना, समाधि है, आनंद है। तुम जान जाओगे कि तुम अमर हो।

प्रश्न : Art of Living संस्था के लिये आपका क्या vision है?

श्री श्री :
आध्यात्म, इस नये युग की भाषा है। तुम अपना vision खुद बनाओ। मैं कहूंगा कि तुम दृष्टा बन जाओ, अपने दृश्य खुद बनाओ। परमात्मा तुम्हें नींद देंगे, स्वप्न तुम खुद बनाओ।

प्रश्न : अगर १ से १०० तक की rating करें और एक पत्थर का स्तर शून्य है और मनुष्य का १००, तो बीच के बाकी जीवों का क्या स्तर तय करेंगे?

श्री श्री :
Rating की क्या आवश्यकता है? सब कुछ उस एक का है। उसका ही अंग है। उस एक ने ही ये सभी अनंत रूप लिये हैं। शून्य और १००, सभी में वही है। एक पत्थर में भी जड़ता और चैतन्य होगी। ब्रह्म में जड़ और चैतन्य दोनों का ही समन्वय है। वे ब्रह्म का अंग हैं।

भगवान श्री कृष्ण, भगवद्गीता में कहते हैं, ‘माया भी मुझ से ही है। समस्त विश्व मुझ में ही है। फिर भी मैं किसी में नहीं हूं।’ भगवद्गीता की philosophy भ्रामक लग सकती है। बिना सत्य के अनुभव के philosophy केवल कुछ सिद्धांत मात्र हैं। अपने आप का सत्य अनुभव करने के लिये तुम अपने भीतर, गहरे उतर जाओ।

प्रश्न : मैं अपनी नकरात्मक भावनाओं से ज्ञान के द्वारा कैसे छुटकारा पा सकता हूं? अगर मैं उन्हें हटाने के लिये प्रतिबद्ध हो जाऊं तो वे मेरा विरोध करेंगे। अगर मैं उनका विरोध ना करूं, तो वे यथावत रहेंगे।

श्री श्री :
नकरात्मक भावनाओं के साथ लड़ो मत, और उनसे मित्रता भी मत करो। युक्ति से, सांस से, सही दृष्टिकोण से, सभी नकरात्मकता से छुटकारा हो सकता है। अष्टावक्र गीता में कहा गया है, ‘सही तरीके से मन के ऊपर जाओ।’

प्रश्न : शिव जी के परिवार में हरेक का वाहन, जीव जगत में आपस में दुश्मन है। एक बैल है, चूहा है, मोर इत्यादि है – फिर भी वे आपस में शांते से रहते है! ऐसा कैसे?

श्री श्री :
शिव का शांत, अद्वैत तत्व, हरेक को संग लाता है, और सद्भावना लाता है।

प्रश्न : जिज्ञासा का सार तत्व क्या है?

श्री श्री :
तुम्हारा प्रश्न ही जिज्ञासा के सार तत्व का उदाहरण है। जो तुम पूछ रहे हो, वही इसका उत्तर है। ये तो ऐसा ही है जैसे कोई पूछे कि ध्वनि क्या है?


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