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"आत्मज्ञान के लिये कोई शर्त नहीं है"

फ़्रान्स
३० जुलाई २०१०


प्रश्न : मुझे ऑफ़िस कार्य के दौरान कई ऐसी जगह पर जाना पड़ता है जहाँ शाकाहारी भोजन आसानी से उपलब्ध नहीं होता है और दूसरे साथियों के साथ गलत भोजन करने से बहुत आलस महसूस होता है। ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
जिन लोगों को किसी भोजन से कोई एलर्जी होती है तो उस भोजन को चाहे उनके साथी खा रहे हों, वे नहीं खाते हैं। यदि तुम्हें दूध से एलर्जी हो और तुम्हारे साथी, दूध- चाय आदि पी रहे हों, तो तुम नहीं कहोगे, ‘हाँ मैं भी पी लूँगा’, क्योंकि तुम्हें पता है इससे तुम्हें हानि होगी।

वैसे ही, किसी भी संगत में रहते हुए भी तुम अपने भोजन का चुनाव खुद कर सकते हो। अगर मांसाहारी भोजन ही उपलब्ध है तो तुम कह सकते हो, ‘मैं केवल चिप्स, सब्जी, ब्रेड आदि ही खाऊँगा। माँसाहारी भोजन या अन्य भोजन जो तुम्हें अस्वस्थ करे, उसे खाने के लिये तुम्हें कोई मजबूर नही कर सकता अगर तुम ना खाना चाहो तो, ठीक है ना? अगर जानते हो कि कोक, पेप्सी आदि तुन्हारे लिए हानिकारक हैं तो तुम्हें पीने की आवश्यकता नहीं। सही है ना? देखो जो लोग बहुत पेप्सी, कोला आदि पीते हैं, उनके पेट व आँतों की अंतरीय परतें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और आगे चल कर कितने प्रकार की मुश्किलें पैदा करती हैं। ये सब गैस वाले पेय हानिकारक होते हैं, इनसे दूर ही रहना चाहिये।

किसी ने यह बात प्रमाणित करने के लिये किसी के गिरे हुए एक दाँत को जब पेप्सी से भरे एक कप में ड़ाला, तो वह उसमें गल गया! अब दाँत जो प्राकृतिक रुप से इतना मजबूत होता है, वह भी गल जाता है पेप्सी में, तो आप सोच सकते हैं कितना विनाशक होता होगा पेप्सी। और वही विनाशक पेय हमारी आँतो को, मस्तिष्क को, नाड़ी-तन्तुओं को भी कितनी हानि पहुँचा सकता है। इसलिये हमें लाभदायक भोजन करने की आदतों पर जो़र देना चाहिये और उनके बारे में प्रचार कर के दूसरों को भी सावधान करना चाहिये।

आज का समय ३० साल पहले के समय से कहीं अधिक अच्छा है। ३० साल पहले जब हमने यह पहल की थी तब लोग शाकाहारी भोजन व आध्यात्म के प्रति बहुत उदासीन थे, परंतु आज वही चीज फ़ैशन बन गयी है, क्योंकि अब हमने इसे लोगों के बीच एक प्रवृति बना दिया है और हम इसको धारा स्वरुप चलायमान रखते हैं।

प्रश्न : मैं आपकी सेवा में लगना चाहता हूँ, किस जगह जाऊँ?

श्री श्री रवि शंकर :
यहाँ बहुत से अवसर हैं। बैड अंतोगस्ट में ही बहुत लोगों की जरूरत है जो यहाँ के आश्रम में रह कर मदद करना चाहें, कर सकते हैं। अन्य जगह भी हैं।

प्रश्न : मैं दो व्यक्तियों के बीच चुनाव की दुविधा में हूँ। इनमें से एक मेरे बच्चे का पिता है किंतु मैं उसके साथ एक स्त्री के रूप में सुखी नहीं हूँ, और दूसरा जो व्यक्ति है वह मुझे अच्छा लगता है। इनमें से किसका चयन करूँ? क्या मुझे बच्चे के संरक्षण हेतु उसके पिता के साथ रहना चाहिये या मुझे अपने दिल के रास्ते पर चलना चाहिये?

श्री श्री रवि शंकर :
यह तो बड़ा मुश्किल सवाल है! यह तुम्हारे बच्चे की उमर क्या है, इस पर निर्भर करता है। और यदि बच्चे को दोनों माता-पिता का प्यार और संरक्षण चाहिये, तो तुम्हें पहले उस ओर ध्यान देना चाहिये। बाल अवस्था जीवन का बहुत कीमती व महत्वपूर्ण समय होता है। इसके लिये हमें, जब बालक का विकास हो रहा है, तब अपनी निजी इच्छाओं का भी त्याग करना पड़े तो करना चाहिये। इसलिये तुम्हारा अपने परिवार को बचाना हितकर है और यही तुम्हारा सर्व प्रथम उद्देश्य होना चाहिये। इसके लिये तुम्हें कई प्रलोभनों को, कई निजी इच्छाओं को त्यागना पड़ सकता है, हाँ?

प्रश्न : अपनापन और सात्विक शक्ति को कैसे बढ़ायें जिससे अधिकतम लोगों को इस पथ पर ला सकें?

श्री श्री रवि शंकर :
यह सवाल को मैं आप लोगों के लिये ही छोड़ता हूँ। अपने आप से पूछते रहो यह सवाल, समय समय पर इसका जवाब आपको मिलेगा तब लोगों को शांत और सुखी करने के लिये उनका इस्तमाल करते जाना। जिसे हम सात्विक शक्ति कह रहे हैं यहाँ, वह क्या है? वह है सांमजस्य - तुम्हारे भीतर और अपने आसपास में लय महसूस करना।

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मुझे शादी नहीं करनी है, पर अकेले रहना भी बहुत कठिन लग रहा है। साथ में बातचीत या काम करने के लिये कोई भी ना होने पर अधिक समय फ़िर टी.वी. देखने में चला जाता है। मैं इस स्थिति को कैसे संभालूं और क्या करूँ?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ, जो अकले रहते हैं, उन्हें ये मुश्किलें आयेंगी ही। इसी कारण आश्रम बनाये गये हैं जहाँ कई लोग मिलकर रहते हैं, हर दिन सत्संग में सामुहिक रूप से भाग लेते हैं और व्यस्त रहते हैं। तुम भी कोई प्रोजेक्ट लेकर कार्य शुरु कर सकते हो। फ़्रांस में भी बहुत मदद की जरूरत है, तुम भी फ़्राँस की टीम के साथ जुड़ सकते हो।

प्रश्न : क्या क्रोध अहंकार के साथ जुड़ा होता है? हिन्दू कथाओं में कई ऋषियों को बहुत क्रोधी बताया गया है। इससे उन की मन की शांति पर क्या असर पड़ा?

श्री श्री रवि शंकर :
बहुत नहीं, एक ही ऋषि अपने क्रोध के कारण प्रसिद्ध थे पर उनका गुस्सा भी लोगों के लिये लाभदायक सिद्ध होता था। इसलिये मैं कहता हूँ कि एक ज्ञानी का गुस्सा भी लाभदायक होता है और एक मूढ़ का प्रेम भी हानिकारक होता है।

अब देखो, कोई अज्ञानी, अनपढ़ माता अपने बच्चों को स्कूल जाने से रोकती है क्योंकि बच्चे स्कूल जाते वक्त रोते हैं। बच्चे कहते हैं हमें स्कूल नहीं जाना, नहीं पढ़ना है, तो वह मान जाती है। तो यह उसका बच्चों के प्रति अंधा प्रेम, उसकी मूर्खता है जो उसके बच्चों के हित में नहीं है, है कि नहीं ? इसलिये मूर्ख का प्रेम हानिकारक होता है पर संत, मुनियों का गुस्सा भी लाभदायक होता है।

भारत में कई कहानियां प्रचलित हैं एक क्रोधी ऋषि की जिनका नाम था दुर्वासा। कोई बहुत गुस्से वाला होता है तो लोग कहते हैं, ‘ओह! वह दुर्वासा है।’ तो दुर्वासा का मतलब हो गया जो थोड़ी सी बात पर भी क्रोधित होता हो, थोड़ी सी बात का बतंगड़ बना देता हो, पर जल्द ही सामान्य स्थिति में भी लौट सकता हो! इसको दूसरी तरह से कह सकते हैं कि गुस्सा आया तो इतनी ग्लानि मत करो, ऋषियों को भी गुस्सा आता था, तो आत्मग्लानि कर के अपने आप को परेशान मत करो। सत्य तो यह है कि आत्मज्ञान होने के लिये किसी शर्त की आवश्यकता नहीं है। क्या है? आत्मज्ञान के लिये कोई शर्त नहीं है। और एक बात, कि इसके लिये कोई खास अवस्था होना जरूरी नहीं, सो क्रोध भी किसी अवस्था में हो सकता है। और कभी कभी क्रोध भी लाभदायक साबित हो सकता है।

शेष अंश अगली पोस्ट में!!


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"एक पत्थर, महसूस नहीं कर सकता है पर एक मनुष्य महसूस कर सकता है"


२२ जुलाई २०१०, हार्टफ़ोर्ड, कनेक्टिनट


प्रश्न : मेरे आस पास हो रहे अन्याय पर मुझे अक्सर क्रोध आता है, पर मैं यह समझता हूँ कि प्रेम और समझ की भी आवश्यकता है। मैं इन भावनाओं को संतुलित कैसे करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
जब कई तिनके मिलाकर एक झाड़ू बनाया जाता है तब वह एक बड़े कमरे की सफ़ाई उन अलग अलग तिनकों से बेहतर कर सकता है। उसी तरह, एक संघ में रह कर आप अधिक प्रभावी कार्य कर सकते हैं, बजाये कि कोई काम अकेले करने के। चाहे सेवा कार्य हो या अन्याय के विरोध में कार्य करना हो, आपको मिलकर काम करना चाहिये। ये बहुत आवश्यक है।

अन्याय तो है। इस स्थिति को बदलना आपका काम है। चीनी भाषा में ‘मुसीबत’ और ‘नये अवसर’, दोनों ही शब्दों के लिये एक ही शब्द है। अगर आप केवल समस्या देखेंगे तो निराश हो जायेंगे। ये अच्छा नहीं है। मिलकर इस पर काम कीजिये और देखिये कि आप क्या कर सकते हैं। दुनिया के कई भागों में भ्रष्टाचार बहुत फैला हुआ है। हर काम के लिये धन खर्च होता है। हमारे संघ ने भ्रष्टाचार का विरोध कर के काफ़ी उपलब्धि प्राप्त की है।

हमारे युवाओं ने रिश्वत देने से इंकार कर दिया। जब अफ़सरों ने इस तरह का रवैया देखा, तो उनके लिये भी यह एक नई बात थी। आखिर वे भी इंसान हैं। आयुर्वेद की परियोजनाओं के लिये हमें १० लाइसेंसों की आवश्यकता थी। लोगों ने कहा कि उन्हें पाने में २ साल लग जायेंगे! हमने इन लाइसेंसों के लिये मांग पत्र भरा और रिश्वत ना देने का संकल्प किया। हम ने निश्चय किया कि आवश्यकता पड़ने पर हम ५० चक्कर लगाने को तैयार थे, पर रिश्वत देने के लिये तैयार नहीं थे। एक महीने के भीतर हमें सभी १० लाइसेंस मिल गये! तो, अन्याय के विरोध में ज़रूर लड़ो, पर बिना क्रोध के। शांत मन से लड़ो। भगवदगीता में भी ऐसा ही कहा गया है।

प्रश्न : मेरे पिता का देहान्त हुये अभी कुछ ही समय हुआ है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि वे कैसे हैं, कहाँ हैं, और मेरे बारे में क्या सोचते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
जो लोग दूसरी तरफ़ जा चुके हैं, वे आप पर आशीर्वाद बरसाते हैं। वे आपको नाप तौल की दृष्टि से नहीं देखते हैं, और ना ही आपके बारे में चिंता करते हैं। वे जानते हैं कि आप सुरक्षित रहेंगे।

प्रश्न : इच्छाओं को त्यागना चाहिये, पर क्या मुक्ति की इच्छा रखना ठीक है? ये इच्छा कब छूटेगी?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। मुक्ति की इच्छा होना ठीक है।

प्रश्न : अगर ईश्वर हमारे भीतर है, तो वे हमें सदा ही अच्छे कार्यों की तरफ़ प्रेरित क्यों नहीं करता है? विश्व में इतनी हिंसा और गुनाह क्यों है?

श्री श्री रवि शंकर :
एक फ़िल्म की कल्पना करो जिस में कोई विलेन ना हो। कल्पना करो कि केवल एक हीरो है, जो खाता है, सोता है, और बस यूं ही रहता है, कोई काम नहीं करता है! क्या तुम ऐसी फ़िल्म देखोगे? विरोधाभासी मूल्य एक दूसरे के पूरक होते हैं। कांटे और पंखुड़ियां, दोनो ही हैं। आप दोनों में से किसी को भी चुन सकते हैं।

ईश्वर आपके भीतर हैं। कभी वे सोते हैं, कभी छुप जाते हैं, कभी जागृत होते हैं और कभी नाचते हैं। थोड़ी साधना के बाद ईश्वर जागृत हो जाते हैं। तब वे चैतन्य होते हैं। अपने भीतर के देवी देवता को जगाओ!

एक पत्थर, महसूस नहीं कर सकता है पर एक मनुष्य महसूस कर सकता है। अपने भीतर के देवत्व को जगाना अति आवश्यक है। इीलिये भारत में सुबह कुछ स्तोत्र गाये जाते हैं, ‘हे ईश्वर, आप जागे और हमें आशीर्वाद दें!’ एक स्तर से ये अजीब लगता है क्योंकि बच्चे को जगाना माता पिता का कार्य है, परंतु यहाँ मनुष्य, ईश्वर के लिये गाते हैं कि जागो और सृष्टि को आशीर्वाद दो। इस विरोधाभास में अस्तित्व का गहरा रहस्य छुपा है।

प्रश्न : प्रेम हमेशा आसक्ति के साथ क्यों आता है? क्या ये संभव है कि आप अपने जीवन साथी को प्रेम भी करें पर साथ ही वैराग्य भी रहे?

श्री श्री रवि शंकर :
आसक्ति से पीड़ा आती है, पर पीड़ा के बिना तो कुछ भी नहीं है। हम इस दुनिया में पीड़ा के साथ ही आते हैं। जन्म की प्रक्रिया ही बहुत पीड़ादायक होती है। नौ महीनों तक हम आराम से थे। अचानक हमारे आस पास का सागर गा़यब हो गया और हमें बाहर आना पड़ा! आसक्ति तब होती है जब आप अपने अस्तित्व पर केन्द्रित ना होकर बाहर की दुनिया को देखते हैं। नियंत्रण करने की इच्छा, प्राप्त करने की इच्छा, संचय करने की इच्छा, पीड़ा लाती है। जब हम विश्राम में होते हैं, संतुष्ट होते हैं, तब प्रेम ही आनंद में परिवर्तित हो जाता है। मांग और नियंत्रण केवल पीड़ा लाते हैं। प्रेम के साथ ज्ञान ही इसकी काट है।

प्रश्न : मैं क्रोध को कैसे काबू में करूं?

श्री श्री रवि शंकर :
उत्तमता के प्रति तुम्हारे प्रेम से ही क्रोध का जन्म होता है। अपने जीवन में तृटियों के लिये स्थान रखो। उन सब बातों की एक सूची बनाओ जो तुम्हें खराब लगती हैं। फिर अपने आस पास के लोगों से कहो कि वे उस सूची में लिखी सभी बातें करें! जब तुम क्रोधित हो जाओ तो उस संवेदना को महसूस करो। देखो तुम्हारे दांत कैसे भिंच जाते हैं। मन कैसा हो जाता है। कुछ लंबी गहरी सांसे लो और देखो अगर पहले की संवेदना से कुछ फ़र्क है। हालांकि क्रोध के मामले में मेरा अनुभव नहीं है, क्योंकि मुझे ये समस्या कभी नहीं हुई है। तो मेरी सलाह, अच्छी नहीं भी हो सकती है! तुम और लोगों से पूछो। यहाँ कई ऐसे लोग हैं जो तुम्हें बता सकते हैं। सुदर्शन क्रिया के नियमित अभ्यास से क्रोध शांत पड़ जाता है।

प्रश्न : जीवन का उद्देश्य क्या है? हम जन्म लेते हैं, पढा़ई करते हैं, काम करते हैं, और एक दिन मर जाते हैं। मैं जीवन के प्रति आसक्ति को खोता जा रहा हूँ।

श्री श्री रवि शंकर :
अच्छा है। तुम ठीक रास्ते पर हो। जो तुम कह रहे हो वो हमारी intro talk की तरह है। कल्पना करो कि हम ८० साल तक जीते हैं, तो उस में से २०-२५ साल तो सोने में चले जाते हैं। १० साल बाथरूम में गुज़र जाते हैं। १० साल ट्राफ़िक में गुज़र जाते हैं। फिर कितने साल हम दुखी रह कर बिताते हैं। अंत में केवल २-३ साल ही हम प्रार्थना, सेवा इत्यादि में बिताते हैं।

ये अच्छा है कि तुम इस बारे में सोच रहे हो। तुम सही रास्ते पर हो।

प्रश्न : अगर कोई ऩज़दीकी व्यक्ति किसी बीमारीवश मृत्यु की ओर अग्रसर हो, तो क्या करें?

श्री श्री रवि शंकर:
उन्हें आशीर्वाद दो। जीवन चलने दो, गाओ, नाचो, ध्यान करो। अगर तुम बीमारी के बारे में अधिक सोचोगे तो तुम्हारी ऊर्जा कम हो जाती है। बदलाव कभी भी आ सकता है। चिकित्सा की आवश्यकता है, पर विश्वास भी रखो। दैवी कृपा हर वक्त तुम्हारे साथ है। कभी भी कुछ भी हो सकता है।

प्रश्न : क्या ये संभव है कि हम सभी को आत्मज्ञान हो जाये?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। कभी भी! बीज तो है, वो कभी भी अंकुरित हो सकता है। वो कभी भी एक बड़ा पेड़ बन सकता है।

प्रश्न : १५ साल से मैं एक ही नौकरी कर रहा हूँ, और मेरा अधिकारी मेरी इज़्ज़त नहीं करता है। क्या मैं नौकरी छोड़ कर, अपना व्यवसाय शुरु करूं? कृपया मेरी मार्गदर्शन कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
ये चुनाव तुम्हें करना है, आशीर्वाद मुझे देना है।

प्रश्न : वैदिक ज्ञान में सृष्टि के नियमों का सत्य दिया गया है। क्या आधुनिक विज्ञन भी इसका एक अंश है?

श्री श्री रवि शंकर :
हाँ। ज्ञान अनंत है। कई ऋषि, आज के वैज्ञानिक बन कर आये हैं। वे ब्रह्माण्ड की खोज में लगे रहते हैं। हर चीज़ को आदर देना चाहिये, चाहे नई हो या पुरानी। आजकल Quantum Physics की कई खोजें सामने आ रही हैं। इनमें वैदिक ज्ञान से बहुत समानता है। उदाहरण के रूप में, Dark matter तथा String Theory, दोनों के ही बारे में प्राचीन ज्ञान में बताया गया था। एक वैज्ञानिक Dr.Hans-Peter Dürr, नें मुझे बताया कि वे जब भी व्याख्यान देते हैं, उन्हें लगता है कि वे वेदान्त की बात कर रहे हैं। ये पूरा विश्व एक ही वस्तु से बना है। कोई दूसरा नहीं है। यह वेदान्त है। प्राचीन ऋषि तथा आधुनिक वैज्ञानिक, दोनों ही एक ही बात कहते हैं।


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"चेतना के विस्तार के साधन हैं संगीत, ज्ञान और मौन"

श्री श्री रवि शंकर ने क्या कहा..

न्यूयार्क के गणेश मंदिर में दिये गये व्याख़्यान के कुछ अंश

चेतना के विस्तार के लिये तीन मुख्य साधन हैं - संगीत, ज्ञान और मौन।

ज्ञान, तर्क-बुद्धि से जुड़ा है। रोज कुछ क्षण मौन रखने के अभ्यास से, हम अपनी सजगता का स्तर बढ़ा सकते हैं। बुद्धि के स्तर को उन्नत करना यानि पात्रता बढ़ाना है, और यह हो सकता है कुछ ही क्षण मौन में रहने से। बस इतना ही प्रयास चाहिये यह हासिल करने के लिये।

संगीत का उद्देश्य है मौन की ओर ले जाना, और ज्ञान का लक्ष्य है आश्चर्य की ओर ले जाना।

सचेतन

अब क्या हो रहा है यहाँ? (हँसी) सचेतन होने का आभास, ठीक है ना? मैं कुछ नहीं कह रहा हूँ और आप सब लोग कुछ पकड़ने के लिये इन्तज़ार कर रहे हैं। क्या आप को इस बात का आभास हो रहा है? किसी चीज़ को पकड़ने की अपेक्षा, अपने ध्यान को प्रतीक्षा की ओर लगाने को सचेतन होना कहते हैं, और यह है ध्यानस्थ सजगता।

क्या आप समझ रहे हैं मैं क्या कह रहा हूँ? तो जब आप सचेतन होते हैं तब क्या होता है? आप में एक बदलाव आने लगता है -आप दृश्य से हट कर दृष्टा की ओर जाने लगते हैं। अब आप ही दृष्टा और दृश्य हैं। आप मुझे देख रहे हैं और समझने की कोशिश कर रहे हैं कि मैं क्या कह रहा हूँ।

अब फिर से अपना ध्यान खुद की ओर ले जाइये। आप बैठे हैं, पढ़ रहे हैं..

अपना ध्यान अब अपनी साँस पर ले जाइये। आप्के मन में कुछ संवाद चल रहा है अपने आप से - ‘हाँ’ या ‘ना’ के रूप में। समझ रहे हैं न मेरी बात?

दृश्य से हट कर दृष्टा की ओर जाना योग द्वारा, उज्जई साँस और ध्यान से संभव होता है। इससे आपके भीतर एक करुणा का सागर उमड़ पडता है। इससे बुद्धि तीक्ष्ण और सचेत होती है। आप अधिक सजग और सूक्ष्म आभासी हो जाते हैं, और आपका मैत्रीभाव और आत्मविश्वास और अधिक बढ़ता है।

विश्वास के तीन स्तर

विश्वास के तीन स्तर होते हैं। पहला जब आप अपने में विश्वास रखते हैं तभी दूसरों में भी विश्वास रख सकते हैं। यह समाज में, लोगों की अच्छाई के प्रति विश्वास है। देखिये, यहाँ कितने अच्छे लोग बैठे हैं! ( हँसी)।

फिर, उसके प्रति जिसे देख नहीं सकते पर महसूस कर सकते हैं। यह बात समझना कठिन है पर इसे नज़र अन्दाज़ नहीं किया जा सकता।

और अंत में, दैवी शक्ति या ईश्वर में विश्वास। पर ईश्वर में विश्वास होने से पहले दुनिया के लोगों में विश्वास करना होगा। इस दुनिया में हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक अच्छाई है। यहाँ केवल थोड़े से, गिनती के सिरफिरे, राह से भटके, तनाव से भरे लोग हैं, जो तरह तरह के हिंसात्मक कार्यों में लगे हुए हैं। साधारण तौर पर दुनिया में अच्छाई ही है।

आध्यात्म का पहला नियम

हम अधिकतर दुनिया को दोष देते हैं और उसके फलस्वरुप खुद को भी दोषी ठहराने लगते हैं।

आध्यात्म का पहला नियम है- स्वयं को दोषी मत मानो और न ही दूसरों को।

क्या आपने यह पहल कदम ले लिया है? क्या आप यह कर सकते हैं? इसके बिना आगे बढ़ना बेकार है। तो, ना खुद को दोष दो और ना ही अन्य किसी को। फिर देखो क्या परिवर्तन होता है खुद में - एक उत्साह और शक्ति उभर आती है! मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि तुम अपने दोषों को छुपाओ। गलती को जान कर उसे दूर करने की चेष्टा करो। अपनी गलती को मान कर आगे बढ़ते जाओ। यह बात अपने आप को दोषी मानते रहने से भिन्न है। खुद में और समाज की अच्छाई में विश्वास रखो। इस पूरी सृष्टि के मूल सार में विश्वास रखो।

क्या आप सेलफोन इस्तेमाल करते हैं? इसको चलाने के लिये सिम कार्ड लगता है। अगर सिम कार्ड नहीं है तो नंबर लगाये जाने पर भी किसी से बात नहीं कर पाओगे। इसी तरह हमारी कई प्रार्थनायें भी नहीं पहुँच पाती हैं और न ही उनका फल मिल पाता है, क्योंकि मेरे भाई तुमने सिम कार्ड नहीं डाला!

अब सिम कार्ड लगाने पर भी अगर कहीं ज़मीन के नीचे के तल हो, तो सिग्नल नहीं मिलता है। फिर बैटरी की भी ज़रूरत होती है। तो सिम कार्ड, सिग्नल और बैटरी हो, तो तुम किसी से बात कर सकते हो। उसी प्रकार से हमारी अपनी चेतना से जुड़ने के लिये, मन शांत, शुद्ध और स्थिर होना चाहिये।

ज्ञान, संगीत और मौन - ये तीन साधन हैं जीवन में पूर्णता लाने के लिये। तब हमारी प्रार्थना सुनी जाती है।

भावपूर्वक गाते रहो। श्रद्धा, विशवास, मौन और ज्ञान से प्रेरित प्रार्थना जरूर फलित होती है।

क्या आप सब यहीं हैं?

यह आत्मा क्या है?

हम इतना सुनते हैं आत्म साक्षात्कार के बारे में पर यह आत्मा है क्या?

क्या आप जानना चाहते हैं? आप में से कितनों ने भौतिक विज्ञान (फ़िज़िक्स) और रासयनिक विज्ञान (केमिस्ट्री) पढ़ा है? सबको भौतिक विज्ञान के विषय में थोड़ी जानकारी अवश्य होनी चाहिये। हमारा शरीर करोड़ों कोशिकाओं से बना है और प्रत्येक कोश में जीवन है। प्रतिदिन नयी कोषिकायें बनती और मिटती रहती हैं। जब रगड़ कर नहाते हो तो चमड़ी पर से मरी कोषिकायें धुल जाती हैं। तुम एक अकेले व्यक्ति नहीं हो। हमारे ऋषि मुनियों ने कहा है कि तुम एक ‘पुरुष’ हो, यानि कि चलती फिरती नगरी हो। संस्कृत में ‘पुर' का अर्थ नगरी होता है। हमारी आत्मा इस नगरी यानि हमारे इस चलते फिरते शरीर में वास करती है। और इस चलते फिरते शरीर में भी अनेक जीव जन्तु घूम रहें हैं साथ साथ। जानते हैं, हमारे शरीर की केवल आँतों में ही ५०,००० कीटाणु रहते हैं?!

तो, यह शरीर तो प्रतिदिन बदल रहा है, फिर भी इसमें एक कुछ है जो नहीं बदल रहा। यह समझने के लिये मधुमक्खी के छत्ते को जानना होगा। आपने देखा है कभी छत्ता? उसे थामे रखने वाला आधार कौन है? रानी मधु मक्खी। यदि रानी उड़ जाती है तो सब नष्ट हो जाता है।

वैसे ही हमारा शरीर भी अनेक परमाणुओं से बना है और इसमें एक रानी मधुमक्खी छुपी बैठी है। प्रत्येक शरीर मधु से भरे एक छत्ते के समान है। अपने शरीर रूपी छत्ते में छुपी रानी को ढ़ूँढ निकालो। यही ध्यान है। करोड़ों परमाणु जो हमारे शरीर में मौजूद हैं वैसे ही हाथी या अन्य प्राणी में भी हैं। बाहरी शरीर की बनावट का कोई महत्व नहीं है। अंदर वास करती आत्मा सबमें एक है और नित्य है, कभी बदलती नहीं। यह ज्ञान होने पर तुम्हें कुछ भी नहीं सता सकता है, तुम्हें सब अपने लगने लगेंगे, कोई बात तुम्हें विचलित नहीं कर पायेगी तब, और यही आध्यात्म का सार है।


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"मन की आनंदित और जागृत अवस्था के बीच चैतन्य विश्राम करता है। "

बैगलोर आश्रम, ३ सितम्बर २००९

प्रश्न: कई बार सुख की इच्छा और पुरानी याद की वजह से मैं गलतियां दोहराता हूं। इससे ऊपर कैसे उठूं?

श्री श्री रवि शंकर: इससे ऊपर उठने के तीन उपाय हैं। सबसे पहले, अपने आप को याद दिलाओ कि पूर्व भी तुम्हें इसकी वजह से कितना कष्ट उठाना पड़ा था। हर बार सुख की लालसा से तुम्हें दुख ही मिला है। यां तो खुद पर बीते अनुभव याद करो यां दूसरों के अनुभव से सीख लो।

दूसरा उपाय है, सर्वोत्तम आनंद की एक झलक भर पा लो। बिना प्रयत्न के जो सुख प्राप्त होता है, वो प्रयत्न से प्राप्त सुख से श्रेष्ठ है।

तीसरा उपाय है, अपने आप को व्यस्त रखो। जब तुम व्यस्त रहोगे तो सुख का लालच छिपा रहेगा, यां उसका बीज अंकुरित नहीं होगा।

प्रश्न: अनंत पद्म चतुर्दशी का क्या महत्व है, और कलाई पर लाल धागा बांधने का क्या उद्देश्य है?

श्री श्री रवि शंकर: अनंत पद्म चतुर्दशी का त्यौहार अनंत को मनाने का उत्सव है। (अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत पद्मनाभ स्वामी (भगवान विष्णु) की पूजा होती है।)

जीवन का उच्चतम ध्येय है अनंत का अनुभव करना। बिना अनंत के अनुभव के मनुष्य जीवन पशु के जीवन के समान है। आत्मा की अनंतता की एक झलक मात्र पा जाने से जीवन में बदलाव आ जाता है। सभी साधक इसके ज़रिये ही साधक बनते है - ध्यान में साधक अनंत की एक झलक का अनुभव कर लेते हैं।

चित्रकार ने भगवान विष्णु को क्षीर सागर (दूध के सागर) पर नाग के बिछौने पर विश्राम करते हुये दिखाया है। मन की आनंदित स्थिति क्षीर सागर है, जहाँ संतोष की लहरे हिलोरे लेती हैं। नाग, मन की जागृत अवस्था का प्रतीक है - कुण्डलिनी शक्ति जो कि हमारे भीतर है। मन की आनंदित और जागृत अवस्था के बीच, चैतन्य विश्राम करता है। इसकी तीन परते हैं। दूध के सागर का अर्थ है कि वातावरण अनुकूल है। वातावरण के अनुकूल होने पर ही समाधि संभव है। शास्त्रों का अध्य्यन मनन करने के लिये भी ये आवश्यक है कि वातावरण में कोई व्यवधान ना हो। अगर आस-पास भूकंप यां बाढ़ आई हो, तो कोई बैठ कर शास्त्र का पाठ, यां ज्ञान की चर्चा नहीं करेगा। इसीलिए क्षीर सागर अनुकूल वातावरण का प्रतीक है।

जब तक ज्ञान का गहराई से अनुभव ना हो, वह ज्ञान सतही रहता है। जितना चाहे कोई वेदांत का अध्य्यन कर ले, पर बिना अनुकूल वातावरण के...।

जब कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठती है, तब हमारे भीतर जो चैतन्य शक्ति है, जो अनंत है, उसी का राज हो जाता है। उस अनंत शक्ति की नाभि से बिना किसी प्रयास के ही कमल का प्रागट्य हो जाता है। इसी तरह सृजन शक्ति का जन्म हुआ।

चैतन्य के आनंदित स्वरूप से सृजन शक्ति का उदय होता है। बड़े से बड़े वैज्ञानिकों ने विश्राम करते हुये ही नये अविष्कार किये हैं।

शोधकर्ताओं के लिये ये परम आवश्यक है कि उनका वातावरण अनुकूल हो - कोई शोर या व्यवधान ना हो। आप किसी से दो दिन में कोई नया अविष्कार करने को नहीं कह सकते हैं। अविष्कार, समय के बंधन से परे है, और प्रतिकूल वातावरण में नहीं हो सकता है।

नाभि को दूसरा मस्तिष्क भी कहा जाता है। इस तरह, हमारे शरीर में दो मस्तिष्क हैं। एक तो सिर है, और दूसरा है नाभि। इसे मणिपुर चक्र (solar plexus) कहते हैं। दिमाग जो कार्य करता है, मणिपुर चक्र उसकी सहायता करता है। आधा कार्य तो मणिपुर चक्र ही करता है। इसीलिये, जब पेट अस्वस्थ होता है, तो अक्सर दिमाग में उथल पुथल होती है, मन में बहुत सारे विचार होते हैं।

इसलिये कहा गया है कि योग साधना से मणिपुर चक्र खिल उठता है। जो लोग योग साधना नहीं करते, उनका मणिपुर चक्र एक आमले के आकार का होता है। जब कुण्डलिनी शक्ति विकसित हो, तो मणिपुर चक्र का आकार एक संतरे से भी बड़ा हो जाता है - एक खिले हुये कमल के फूल की तरह।

धागा एक बहुत बढ़िया प्रतीक है। भारत में हर महीने कोई ना कोई उत्सव होता है। जिसका उद्देश्य है किसी ना किसी तरह उत्सव मना कर चेतना को ऊँचा उठाना। कुछ लोग व्रत करते है, कुछ लोग पूजा करते हैं, और एक प्रतीक के रूप में एक धागे में १४ गांठ लगा कर कलाई में बांधते हैं। हमारे देश में, पूर्णिमा के एक दिन पहले यां बाद में अक्सर कोई ना कोई उत्सव होता है। मन का संबंध चंद्रमा से है। पूर्णिमा और अमावस्या के आस पास के दिनों में मन में अधिक हलचल रहती है। इस दौरान मानसिक और शारीरिक रोग बढ़ जाते हैं। इन दिनों अगर हम उत्सव में व्यस्त हों तो स्वास्थ्य भी ठीक रहता है।

पूर्णिमा के दिन, नींद भी कम आती है। इस समय उत्सव की व्यस्तता के बाद नींद में भी मदद मिलती है।

हर व्रत के साथ कोई कथा जुड़ी है। इन कथाओं में किसी राजा यां व्यापारी की कहानी होती है जो वह व्रत करने से अपनी समस्याओं को सुलझा सका, और बहुत लाभ प्राप्त किया। तो, इस लालच से कई लोग कोई व्रत-नियम करते हैं। हर कथा ये दर्शाती है कि कैसे पूजा करने से समस्या का समाधान हो गया। आजकल लोग सोचते हैं कि इन कथाओं के श्रवण मात्र से वे अपनी समस्याओं से छुटकारा पा जायेंगे। हमारे पूर्वज बड़े कुशल थे। हर उत्सव के साथ उन्होंने कोई लाभ जोड़ दिया था।

जीवन में हमें जो कुछ मिला है, उसके लिये कृतज्ञ होना सर्वश्रेष्ठ है। किसी लाभ के लोभ में पूजा करना, मध्यम प्रकार की पूजा है। और भय के कारण पूजा करना निम्न प्रकार की पूजा है। पर, कैसे भी करें, लाभ ही है।

प्रश्न: ये कैसे जाने कि हमें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है या नहीं?

श्री श्री रवि शंकर: इसका क्या प्रमाण है कि तुम्हारे पैर में दर्द है? तुम ये कैसे जानते हो कि तुम्हारे पैर में दर्द है? आत्मज्ञान हो जाने पर ऐसे प्रश्न मन में नहीं उठेंगे। दूसरों से पूछना कि तुम्हें आत्मज्ञान प्राप्त हो गया है कि नहीं, ये अज्ञान है। आत्मज्ञान हो जाने पर हमें प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती है। जैसे तुम्हारा दर्द, स्वयं ही प्रमाण है, वैसे ही आत्मज्ञान स्वयं ही प्रमाण है। पर कल्पनाओं में नहीं फंसना कि आत्मज्ञान कैसा होगा। सहज रहो।

तुम वो हो, जो तुम हो, इसलिये विश्राम करो। कुछ करने से आत्मज्ञान नहीं होता, अपितु विश्राम करने से आत्मज्ञान होता है। और विश्राम तुम कुछ करने के बाद ही कर सकते हो।

प्राणायाम और आसन करने से रजोगुण से तुम निवृत्त होते हो। और तब सत्वगुण बढ़ता है। जब ऐसा होता है तब हम ध्यान कर सकते हैं और सजगता बड़ती है। अगर ठीक तरक से नींद ना आये तो सत्वगुण नहीं जगेगा।रजोगुण के द्वारा तमोगुण से ऊपर उठा जा सकता है। और रजोगुण से ऊपर उठने के लिये आवश्यकता है विश्राम की और कर्म की।

भगवद् गीता में कहा है, 'युक्ताहार विहारस्य योगः भवति सिद्धितः।' समाधि ना तो अधिक सोनेवाले लोगों के लिये है, और ना ही उनके लिये जो बहुत अधिक कार्यों में पूरे दिन व्यस्त रहते हैं।


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