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"‘मैं नहीं जानता हूँ,’ की अवस्था में तुम्हें जानने का मौका मिलता है"

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प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैं कभी भी एक आध्यात्मिक या सच्चा धार्मिक व्यक्ति नहीं रहा हूँ। मैं ऐसा कैसे बनूं?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हें अपने आप पर एक लेबल लगाने की आवश्यकता नहीं है – मैं धार्मिक व्यक्ति हूँ, इत्यादि। इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। बस, स्वाभाविक रहो – एक सुंदर, अच्छे इंसान। बस इतना ही!

अगर कोई अच्छा इंसान नहीं है और वो कहे कि, ‘मैं आध्यात्मिक या धार्मिक व्यक्ति हूँ,’ तो ये इसका क्या फ़ायदा है? वो किस काम का है? है कि नहीं?

अध्यात्म का ध्येय है तुम्हें अच्छा इंसान बनाना। धर्म का ध्येय है तुम्हें धर्मशील बनाना, तुम्हें विश्व से जोड़ना, विश्व की चैतन्य शक्ति से जोड़ना। यही आध्यात्म है, और एक सीधा साधा, स्वाभाविक, आम इंसान भी यही है! समझ गये? ठीक है। तो ये बेहतर होगा कि तुम अपने आप पर कोई लेबल ना लगाओ।

अगर तुम सोचते हो कि तुम आस्तिक या नास्तिक हो, तब भी अपने आप पर नास्तिक का लेबल लगाना ठीक नहीं होगा। अगर कोई व्यक्ति ये कहता है कि वह नास्तिक है, तो मेरे हिसाब से सच नहीं है। तुम सच में नास्तिक नहीं हो सकते हो। तुम्हारी चेतना के किसी कोने में तुम्हें किसी बात पर आस्था है। तुम कुछ तो ज़रूर जानते हो, क्योंकि तुम्हारी चेतना अति प्राचीन है। तुम अपनी चेतना को नहीं जानते हो, क्योंकि ये इतनी प्राचीन है, इसमें इतनी परतें हैं, तुम्हारे मन पर कितनी ही छापें हैं – ये चेतना बहुत ही अद्भुत है!

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, मैंने सत्य के बारे में सुना और समझा है, पर यह मेरे अनुभव में नहीं आया है। सत्य का नुभव करने में कृपया मेरी मदद कीजिये।

श्री श्री रवि शंकर :
बढ़िया! ‘मैं नहीं जानता हूँ,’ की अवस्था में तुम्हें जानने का मौका मिलता है। अगर तुम सोचते हो कि तुम जानते हो, तो तुम एक सिद्धांत में अटके हुये हो। उपनिषद में बहुत सुंदर बात कही गयी है, ‘जो कहता है कि, “मैं नहीं जानता हूँ।” वो जानता है, और जो कहता है, “मैं जानता हूँ।” सच में नहीं जानता है!’

प्रश्न : प्रिय गुरुजी, हाल ही में वैज्ञानिकों ने घोषित किया है कि वे लैब में जीन्ज़ में फेरबदल कर के जीवन बना सकते हैं। क्या ये आध्यात्म और धर्म के विरुद्ध नहीं है कि मनुष्य जड़ वस्तु को जीवंत बनाये?

श्री श्री रवि शंकर :
बिल्कुल नहीं। तुमने ये सुना है कि ‘ईश्वर ने मनुष्य को अपने जैसा ही बनाया है,’? ठीक है ना? तो जो ईश्वर कर सकते हैं, मनुष्य भी वो कर सकता है। ईश्वर ने मनुष्य को बनाया, अपने ही जैसा बनाया – ऐसा बाइबल में लिखा है। है ना?

५००० वर्ष पहले लिखे गये महाभारत महापुराण में भी ऐसी कथा आती है। तो, टेस्ट ट्यूब बच्चे कोई नयी बात नहीं है। महारानी गांधारी ने एक ही भ्रूण को १०० भागों में बांट कर अलग अलग मटकों में रख कर १०० तरह के बच्चे बनाये।

पर वो बच्चे किस तरह के थे, तुम सभी जानते हो! तो इस में जोखिम भी है! पर ये एक तथ्य है कि ५००० वर्ष पहले गांधारी ने १०० मटकों में १०० बच्चे बनाये थे। तो लैब में जीवन बनाना या टेस्ट ट्यूब बेबी कोई नई बात नहीं है। ऐसा ५००० वर्ष पहले किया जा चुका है!

प्रश्न : गुरुजी, क्या पिछले जन्म में की कई ग़लतियों का भी प्रभाव रहता है? अगर ऐसा है, तो इससे बचने का उपाय क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम्हें कोई ज़्यादा प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। बस, अपनी साधना करते रहो। सुदर्शन क्रिया, ध्यान और गान से तुम्हारे सभी बुरे कर्म और चित्तवृत्ति अपने आप ही साफ़ हो जायेंगे। और कुछ अडवांस कोर्स, कुछ hollow and empty meditations...सभी छाप साफ़ हो जायेगी।

प्रश्न: प्रिय गुरुजी, क्या ये सच है कि गुरु ही शिष्य को चुनता है? अगर ऐसा है तो आपने मुझे चुनने में इतनी देर क्यों लगाई??
श्री श्री रवि शंकर: (हंसी) हम भूतकाल में ना जाकर, आगे मज़े करें। आगे के सुंदर दिन, ठीक है?

प्रश्न : गुरुजी, जब आप आतंकवादियों और नक्सलियों से मिलते हैं तो उनके रवैये और ज्ञान की कमी को देख कर निराश नहीं हो जाते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
ये तो ऐसा ही हुआ अगर तुम किसी डौक्टर से पूछो, ‘क्या तुम बीमार लोगों को देख कर बीमार नहीं हो जाते हो?’!

प्रश्न : क्या आप मुझे एक सुझाव देंगे – अगर आपका जीवनसाथी आप से हमेशा क्रोधित रहे तो आप शांत कैसे रहें?

श्री श्री रवि शंकर :
मेरा जवाब प्रामाणिक नहीं होगा! यहाँ बहुत से अनुभवी व्यक्ति हैं, तुम उनसे अनुभव बांट सकते हो!

अगर कोई अक्सर ही तुम से क्रोधित रहे तो तुम्हें इसकी आदत हो जाती है, और तुम उसकी ज़्यादा फ़िक्र नहीं करते हो। है ना? पर अगर वे आमतौर पर तुमसे प्यारा बर्ताव करें और कभी कभी क्रोधित हो जायें तो तुम्हें विशेष परेशानी होती है, है ना?

भारत में एक लोकप्रिय कहानी है। एक विनम्र व्यक्ति की शादी एक बहुत ही कुटिल महिला से हुई। वो हर काम उसकी इच्छा के विरुद्ध करती थी। वो व्यक्ति जो भी कहे, वह उसका उल्टा ही करती थी। वो व्यक्ति इस बात से बहुत परेशान और दुखी था। उन दिनों भारत में तलाक इतनी आम बात नहीं थी। तो, वह व्यक्ति उस स्थिति में फंस गया था। जब आप किसी मुश्किल में फंस जाते हैं तो आप किसी ज्ञानी व्यक्ति के पास जाते है। तो, वह व्यक्ति एक योगी से मिलने गया।

उस योगी ने उसके कान में कुछ कहा, और तीन महीने बाद जब वह योगी उस व्यक्ति को फिर मिला तो वह व्यक्ति खुशी से मुस्कुरा रहा था! उसने जाकर योगी से कहा कि, ‘आपका मार्गदर्शन बहुत उपयोगी रहा, और अब घर में शांति है!’ मार्गदर्शन ये था कि वो जो भी चाहता था, अपनी पत्नि से उसका उल्टा ही कहता था। जो बात वो कहे, उसकी पत्नि तो मानने वाली थी नहीं! तो तुम्हें उस व्यक्ति की नब्ज़ जानने की ज़रूरत है।

अगर तुम्हारा जीवनसाथी हर वक्त तुमसे क्रोधित रहता है तो मैं जानते हूँ कि अपने अनुभव से तुमने इस बात को संभालना सीख ही लिया होगा, और उसके क्रोध को कम या ज़्यादा कैसे करना। है ना? ये रुचिकर है! शायद ऐसे लोगों के साथ तुम्हें एक-दो महीने ऐसा करना चाहिये, फिर अचानक एक दिन उन्हें अचंभित कर दो। अग्र वे क्रोध में हो तो उनकी तारीफ़ करो और बहुत प्रेम करो। क्रोध के साथ एक तय रवैया ना अपनाओ।


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"समाज में शांति के लिए राजनीति में आध्यात्मिकता, व्यापारिक कंपनियों में सामाजिक दायित्व की भावना और धर्म में धर्मनिरपेक्षता होना आवश्यक है"

Ramsay Taum (Director of External Relations & Community Partnerships, University of Hawaii at Manoa and Chairman of the Board of Sustain Hawaii) ने एक हवाइ मंत्र के साथ श्याम की शुरुआत की। फ़िर उन्होने भारतीय और हवाइ सभ्यता की समानता के बारे में कहा।
श्री श्री ने धन्यवाद देते हुए शुरुआत की।

श्री श्री रवि शंकर :
एक ही बात को एक अलग नज़रिए से सुनकर बहुत अच्छा लगा। यह बहुत ही सुन्दर है कि किस तरह सभी सभ्यतायों में एक जैसी बात कही गई है। जिस तरह Ramsay Taum ने ज़िक्र किया, उसी तरह संस्कृत में भी पाँच तत्व हैं - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश। फिर हैं मन, बुद्धि और अहंकार। और फ़िर आत्मा।
जब हम ने एक दूसरे को mahalo कह कर नमस्कार किया, तो वो अहंकार से परे एक कदम है। ’मा’ का अर्थ है - जिसे तुम जानते हो। बच्चे का पहला शब्द माँ होता है। एक बच्चा मैं की भावना से परे देखता है। यह बहुत ही सुन्दर है कि दुनिया में सभी सभ्यतायों का मूल एक जैसा ही है।

प्रश्न : हम अहंकार पर काबू कैसे कर सकते हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
अहंकार को काबू करने का प्रयास भी मत करो। अगर तुम्हे लगता है कि तुममे अहंकार है तो इसे अपनी जेब में रखो। अहंकार को काबू करने में उससे भी बड़ा अहंकार हो जाता है। अहंकार अनदेखा किया जाना पसन्द नहीं करता। अहंकार का इलाज है - बच्चे की तरह सरलता में रहना। अगर फ़िर भी तुम्हे अहंकार परेशान करे तो उसे वहीं रहने दो।

प्रश्न : कुछ लोग लालची और क्रूर क्यों होते हैं? हम उन्हे बदल सकते हैं यां उन्हे वैसे ही स्वीकार कर लेना चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
कुछ लोग नहीं जानते वो भीतर से कितने सुन्दर है। हर अपराधी के भीतर हालात का शिकार एक व्यक्ति मदद की पुकार कर रहा है। कोई भी पैदाइश से हिंसक नहीं होता। सही शिक्षा के अभाव में इन्सान ऐसा बन जाता है।

प्रश्न : ध्यान का यह तरीका अन्य तरीकों से कैसे विशेष है?

श्री श्री रवि शंकर :
यह तुम्हे साधारन बनाता है और यह केवल साधारन लोगो के लिए ही है। अगर तुम खुद को बहुत विशेष मानते हो तो ध्यान नहीं होगा। इसकी यही विशेषता है।

प्रश्न : हमें प्रेम के बारे में कुछ बताएं। अनुशासन का पालन कैसे करें?

श्री श्री रवि शंकर :
तुम अपने पर किसी चीज़ को प्रेम करने यां ना करने के लिए दबाव नहीं डाल सकते। सहजता से अपने स्वभाव में रहो।
तीन सूरतों में तुम अनुशासन का पालन कर सकते हो:
प्रेम, भय और लालच। जब तुम प्रेम में होते हो तो अनुशासन सहज ही हो जाता है। किसी चीज़ का भय यां कोई बड़ा लालच भी तुम्हे अनुशासन में रखता है।

प्रश्न : अपना भाग्य पूरा करने के लिए क्या चाहिए?

श्री श्री रवि शंकर :
विश्वास - यह विश्वास की तुम अपना भाग्य पा सकते हो।

प्रश्न : क्या विश्व के नेता दुनिया की मुश्किलों का हल कर सकते हैं? यां वो आर्थिक रूप से कुछ ही लोगो से प्रेरित हैं?

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे लगता है तुम्हारे प्रश्न में उत्तर भी है। मुझे लगता है ऐसे बहुत से विश्व के नेता हैं जो समाज के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं पर उनके हाथ बन्धे हैं। बहुत बार वो सामाजिक व्यवस्था के कारण कुछ कर नहीं पाते। कुछ ऐसे भी हैं जिनको केवल अपनी पदवी और पार्टी से ही मतलब है। लोगों के हित से ज़्यादा इनके लिए अगले चुनाव और पार्टी की ज़रुरतें ज़्यादा महत्वपूर्ण है। ये बड़े मुद्दों पर काम करना भी चाहें तो इनके सामने अपने राजनीतिक एजेंडे खड़े हो जाते है। एक शासक सुधारक नहीं बन सकता और एक सुधारक शासक नहीं बन सकता। इनकी अलग अलग भूमिका है और इनको मिलकर काम करना चाहिए।

प्रश्न : शादी के महत्व के बारे में हमे बताएं।

श्री श्री रवि शंकर :
मुझे इस विषय में अनुभव नहीं है!
शादी एक महत्वपूर्ण पद्धती है जो तुम्हे जीवन में किसी को स्वीकार करके आगे बढ़ना सिखाती है। इससे तुम बाँटना, दूसरे की देखभाल करना और अपनी देखभाल कराना सिखते हो।


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"बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है"

बैंगलोर आश्रम

तुम्हें प्रतिदिन ध्यान करना चाहिये। तुम प्रतिदिन दांत मांजते हो। शरीर को स्वच्छ रखने के लिये नहाते हो। वैसे ही, प्रतिदिन थोड़ा ज्ञान सुनो और ध्यान करो। बुद्दि की शुद्धि ज्ञान से होती है। वो ज्ञान जो तुम्हें बोध कराता है कि यहां सब कुछ नाशवान है। संगीत और समरसता भावनाओं को शुद्ध बना कर हृदय को संपन्न बनाते हैं। कुछ देने से हृदय शुद्ध होता है। ज्ञान और ध्यान से सब शुद्ध हो जाता है।

प्रश्न : गुरुजी, किसी का देहांत होने पर ‘राम नाम सत्य है’ क्यों कहते हैं?

श्री श्री : किसी के देहांत पर तुम ये समझ जाते हो कि यही सत्य है। एक दिन हर किसी की मृत्यु होगी। जीवित रहते हुए तुम इस सत्य से अन्भिग्य रहते हो। तुम बेकार बातों में फंसे रहते हो।
सत्य को तुम टाल नहीं सकते। सौंदर्य का त्याग नहीं हो सकता। प्रेम की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती।
ये तीन बातें ही याद रखने के लिये बहुत हैं। इन्हें पचाओ।

प्रश्न : यज्ञ के क्या क्या अंग होते हैं?

श्री श्री : किसी भी यज्ञ में ध्यान, दान, ज्ञान और गान होता है। गान दिमाग के दायें भाग को पुष्ट करता है। ज्ञान दिमाग के बायें भाग को पुष्ट करता है। ध्यान से दिमाग के दोनों भाग पुष्ट होते हैं। यज्ञ से हमारा विकास होता है।

प्रश्न : गुरुजी, अपना जीवनसाथी चुनते समय हमें उस में किन किन गुणों को परखना चाहिये?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुये) मुझे इस का अनुभव नहीं है! उन से पूछो जिन्हें अनुभव है। तुम यहाँ वैवाहिक विभाग से भी मदद ले सकते हो।
तुम्हें पता है ये क्यों कहते हैं कि ‘विवाह स्वर्ग में पूर्वनिश्चित किये जाते हैं’? क्योंकि, तुम्हारे लिये चुनाव हो चुका है। तुम्हें सिर्फ़ उसे लेना है और आगे बढ़ना है। तुम चुनाव की प्रक्रिया से मुक्त हो। जो तुम्हारी थाली में आये, उसे लो और आगे बढ़ो।
तुम्हें पता है, सबसे अच्छी बात होगी कि तुम अपने जीवनसाथी की कमियों पर ध्यान ना दो। किसी भी रिश्ते में अगर दोनों व्यक्तियों का ध्यान आध्यात्म पर होगा तो वे समांनांतर रेखाओं की तरह बिना किसी टकराव के अनंत तक साथ साथ आगे बढ़ पायेगें। जिस क्षण आध्यात्म से ध्यान हटा और एक दूसरे पर गया तो टकराव होंगे। आध्यात्म के पथ पर रहना बहुत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न : गुरुजी, विशालाक्षी मण्डप का निर्माण कैसे हुआ?

श्री श्री : मनुजी (एक शिष्य) ने कहा, "गुरुजी, एक सभा कक्ष होना चाहिये जहां लोग ध्यान कर सकें।" तो मैनें एक चित्र बनाया और उसे बनाया गया। पहले कोई सभा कक्ष नहीं था। अष्टावक्र गीता की व्याख्या ऐसी जगह की गई थी, जहां बारिश का पानी भीतर आ जाता था।
जब हमने विशालाक्षी मण्डप का उद्घाटन किया, तो इतने लोग आये कि वो उसी वक्त छोटा पड़ गया! तुम्हें पता है, जब लोग एक साथ ध्यान करते हैं तो वो ऊर्जा विशव में प्रसारित होती है।

प्रश्न : गुरुजी, इस स्थान का रहस्य क्या है?

श्री श्री : (मुस्कुराते हुए) रहस्य यहाँ है (अपने हृदय को इंगित करते हुए)।


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