"हमे अपने जीवन में बच्चों की तरह भोलापन लाने की आवश्यकता है"

पीटर मैफ़े कोन्फ्रेन्स, जर्मन
मई २०१०

हम सब किसी तरह से बच्चे ही हैं। मेरी इच्छा है हम में एक व्यसक से अधिक बच्चे का रूप हो। एक बच्चा दिन में ४०० बार मुस्कुराता है, नवयूवक १७ बार और एक व्यसक मुस्कुराता ही नहीं है। दुनिया में संघर्ष कम हो जाएगा अगर हम केवल अधिक मुस्कुरा सकें। हम सुबह से हिंसा और दुनिया में चल रहे संघर्ष की बात कर रहे हैं। इसका इलाज क्या है? हम किस दिशा में आगे बड़ रहे हैं?
हम महात्मा गांधी के सिद्धांत सुनकर बड़े हुए थे। हम अहिंसा के साथ गर्व महसूस करते थे। पर दुर्भाग्य से आज गर्व को हिंसा के साथ जोड़ा जाता है। स्कूल और कालेजों में हिंसात्मक छात्र को हीरो की तरह देखा जाता है। हमें इस धारणा को बदलने की ज़रुरत है। हमे गर्व को शांत स्वभाव और समता के साथ जोड़ने की ज़रुरत है। हमे अपने बच्चों को हिंसामुक्त और तनाव मुक्त समाज की दृष्टि देने की आव्श्यकता है।
हम ऐसा पाँच बातों को ध्यान में रखकर कर सकते हैं:
१. पहला है नृत्य और संगीत
२. दूसरा है खेल-कूद। कंप्यूटर खेल और वीडियो खेल के चलन से बच्चे अब बाहर जाकर नहीं खेलते जैसे वो पहले खेला करते थे। वे अपने को इन खेलों के साथ कमरों में बांध लेते हैं। हमें उनका झुकाव दोबारा खेल - कूद की तरफ़ करने की आवश्यकता है।
३. तीसरे नम्बर पर है - यात्रा। भारत, अमेरिका, पौलेंड, युरोप, जर्मनी, कभी कभी यूरोप और यहाँ बलैक फ़ोरेस्ट में भी हम ऐसे कार्यकम आयोजित करते हैं जिसमें सभी देशों से युवक एक सप्ताह के लिए इकट्ठा होते हैं। बहुत बार ऐसा होता है कि वो एक दूसरे की भाषा भी नहीं जानते पर केवल एक दूसरे के साथ में होने से बीच की दूरी समाप्‍त हो जाती है। हमें उन्हे अन्य धर्मों और सभ्यतायों के लोगों को मिलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
हमें बच्चों मे बहु धार्मिक और बहु सांस्कृतिक शिक्षा देने की आवश्यकता है। मेरे अनुसार हर बच्चे को दुनिया के प्रमुख धर्मों जैसे हिन्दू धर्म, जुडाइज़्म, ईसाई धर्म, शैन्टोइज़्म, बौद्ध धर्म, शाओइज़्म, कैथोलिसिज़्म का कुछ ज्ञान होना चाहिए। इस तरह से उनमें एक व्यापक दृष्टिकोण विकसित होता है। अगर दुनिया में कोई एक भी हिस्सा ऐसा छूट जाए जो सोचे कि केवल उन्हीं के पास सही ज्ञान है तो इससे शेष दुनिया भी सुरक्षित जगह नहीं रहेगी। बच्चों और यूवकों में इस भावना का विकास ज़रुरी है कि चाहे हमारे रंग, भाषा, खान पान अलग हैं पर हम एक सार्वभौमिक परिवार का हिस्सा हैं।
४. चोथे नंबर पर बच्चों और यूवकों का किसी सेवा कार्यकम में जुड़ना। जब वे सेवा के काम में जुड़ते हैं तो भीतर से खिलते हैं।
५. फिर योगा और ध्यान। मैने इनको को इतना धर्म निरपेक्ष बनाया है कि किसी भी धर्म के व्यक्‍ति को इसे करने में कोई झिझक नहीं है। यह सिर्फ कुछ सांस की क्रियाएं और कुछ योगासन हैं जो किसी एक विशेष मान्यता यां धर्म से संबंधित नहीं हैं।
हमारी सांस हमारी भावनायों से जुड़ी है। हर भाव के लिए हमारे सांस की एक विशेष लय होती है। अगर हम सीधे अपनी भावनायों पर काबू नहीं कर सकते तो सांस के द्वारा हम ऐसा कर सकते है। अगर आप थिएटर की जनकारी रखते हैं तो आपको मालूम होगा कि क्रोध की भावना लाने के लिए निर्देशक अभिनेता से तेज़ गति से श्वास लेने को कहता है। और अगर कोई शांत यां प्रेम की भावना का दृष्य हो तो अभिनेता को धीमी गति से और आराम से श्वास लेने को कहा जाता है। हम मन पर विजय प्राप्‍त कर सकते हैं अगर हम अपनी सांस की गति को समझते हैं। ऐसे में हम किसी भी नाकारात्मक भाव से बाहर आ सकते हैं जैसे क्रोध, जलन, लालच, और हम अपने दिल से मुस्कुरा सकते हैं। मुझे लगता है हमे अपने जीवन में बच्चों की तरह भोलापन लाने की आवश्यकता है जो कि ईश्वर ने सबको दिया है।


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