अपनी आत्मा को आनंद के रंगों से विकसित करो

सोमवार, १ मार्च, २०१०

होली, रंगों का त्योहार है। ये विश्व रंगमय है। प्रकृति की तरह, हमारी भावनायें भी रंगों से संबंधित हैं। लाल रंग, क्रोध से संबंधित है। ईर्ष्या, हरे रंग से संबंधित है। उत्साह और आनंद, पीले रंग से संबंधित है। प्रेम, गुलाबी रंग से संबंधित है। नीला रंग, व्यापकता से संबंधित है। सफ़ेद रंग, शांति से संबंधित है। केसरिया रंग, बलिदान का द्योतक है। बैंगनी रंग ज्ञान का द्योतक है। हर व्यक्ति रंगों का एक फ़व्वारा है, जिसमें की रंग बदलते रहते हैं।

पुराणों में कई रंगबिरंगे दृष्टांत और कथायें आती हैं। उन में होली के संबंध में एक कथा है।

एक असुर राजा, हिरण्याकश्यप, चाहता था कि सब उसकी पूजा करें। परंतु उसका पुत्र, प्रह्लाद, श्री नारायण का भक्त था। हिरण्याकश्यप श्री नारायण के प्रति शत्रुता का भाव रखता था। क्रोध में आकर हिरण्याकश्यप ने अपनी बहन होलिका से प्रह्लाद को मिटाने के लिये कहा। होलिका के पास ऐसी विद्या थी कि वो अग्नि का ताप सह सकती थी। वह जलती हुई लकड़ियों के ढेर में प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर बैठ गई। परंतु प्रह्लाद को अग्नि से कोई हानि नहीं हुई, जबकि, होलिका जल कर मिट गई।

हिरण्याकश्यप मोटी बुद्धि का प्रतीक है। प्रह्लाद, निष्पाप, सरलता, विश्वास और आनंद का प्रतीक है। आत्मा को केवल पदार्थों के प्रेम में नहीं बांधा जा सकता। हिरण्याकश्यप की आनंद की खोज केवल पदार्थों में थी। पर वो उसे प्राप्त नहीं कर सका। एक जीवात्मा, हमेशा के लिये पदार्थों के प्रेम में बंध कर नहीं रह सकती। जीव का नारायण की ओर, अपने उच्चतम स्वरूप की ओर बढ़ना स्वाभाविक है।

होलिका अतीत के संस्कारों का प्रतीक है। उन पूर्व संस्कारों के बोझ का जो प्रह्लाद की स्वाभाविकता(innocence) को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। प्रह्लाद की नारायण भक्ति दृढ़ होने की वजह से वह अपने पूर्व संस्कारों को भस्म कर सका।

जब व्यक्ति भक्ति में दृढ़ हो तो उसके जीवन में आनंद के कई रंग उभर कर आते हैं। जीवन एक उत्सव बन जाता है।

पूर्व संस्कार भस्म कर के तुम एक नई शुरुआत के लिये तैयार होते हो। अग्नि की ही तरह भावनायें तुम्हें जलाती हैं। परंतु जब ये भावनायें रंगों के फ़व्वारे की तरह हों तो जीवन में रस आता है। अज्ञानता में भावनायें परेशानी का कारण बनती हैं। ज्ञान में वही भावनायें जीवन को रंगीन बनाती हैं।

एक कथा है, जब पार्वती तपस्या में थी, और शिव समाधि में, तब शिव और पार्वती के दिव्य मिलन के लिये कामदेव ने प्रयत्न किया। शिव नें कामदेव को जला कर भस्म कर दिया। शिव को पार्वती से मिलन के लिये समाधि से बाहर आना पड़ा। पर्व का अर्थ है, त्योहार। पार्वती का अर्थ है जिसका जन्म पर्व से हुआ, उत्सव।

समाधि और उत्सव के मिलन हेतु कामना आवश्यक थी। इसलिये, कामदेव का आह्वाहन किया गया। परंतु उत्सव मनाने के लिये कामना से ऊपर उठने की आवश्यकता है। इस कारण शिव ने तीसरा नेत्र खोल कर कामना को जला कर भस्म कर दिया। जब मन में कामना खत्म होती है तब जीवन में उत्सव होता है। जीवन रंगमय हो जाता है।

होली की ही तरह जीवन भी रंगमय होना चाहिये, उदास नहीं। जब हर रंग अलग अलग दिखाई दे, तो जीवन रंगमय दिखता है। अगर सब रंगों को मिला दो, तो काला रंग हो जाता है। इसी प्रकार, जीवन में भी हम विभिन्न भूमिकायें निभाते हैं। हर भूमिका और भावना को परिभाषित करने की आवश्यकता है। भावनात्मक भ्रम से समस्यायें जन्म लेती हैं।
जब तुम पिता हो, तो तुम्हें पिता की भूमिका अदा करनी है। दफ़्तर में तुम पिता की भूमिका में नहीं रह सकते। जीवन में जब तुम अपनी भूमिकाओं का मिश्रण कर लेते हो, तो भूल हो जाती है। तुम जिस भी भूमिका में हो, उसे पूरी तरह निभाओ। विविधता में एकता जीवन को जीवंत, आनंदमय और रंगमय बनाती है।
जीवन में तुम जिस आनंद की अनुभूति करते हो, वो तुम्हारे भीतर से ही आता है -- जब तुम सब पर अपनी पकड़ छोड़ कर अपने भीतर के आकाश में केन्द्रित हो जाते हो। इसे ध्यान कहते हैं। ध्यान कोई विशेष क्रिया नहीं है। कुछ ना करने की कला ही ध्यान है! ध्यान में जो विश्राम मिलता है, वो गहरी से गहरी नींद के विश्राम से अधिक है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि ध्यान में तुम सब कामनाओं से ऊपर उठ जाते हो। इस से दिमाग को ठंडक मिलती है और शरीर और मन को पूर्ण विश्राम।

तभी हम आत्मा की उच्च अवस्था का अनुभव कर सकते हैं और ये देख पाते हैं कि समस्त विश्व आत्मा या चेतना ही है। उत्सव आत्मा का सहज स्वभाव है। मौन से जिस उत्सव का जन्म हो, वही सच्चा उत्सव है। अगर उत्सव के साथ पवित्रता का समागम हो जाये, तो वो पूर्ण-उत्सव है, जिसमें केवल शरीर और मन ही नहीं, आत्मा भी उत्सव मनाती है।

उत्सव के उत्साह में अक़्सर ही मन दिव्यता को भूल जाता है। हमें दिव्य शक्ति की उपस्थिति और अपने इर्द-गिर्द उसके दिव्य प्रकाश को अनुभव करना चाहिये। तुम में उस तत्व को अनुभव करने की इच्छा होनी चाहिये जिसकी शक्ति से पूरी दुनिया चल रही है। पूरे मन से ऐसी प्रार्थना करनी चाहिये। अगर प्रार्थना करते समय तुम्हारा मन कहीं और बंटा है, तो ये प्रार्थना नहीं है।

जब तुम समस्याओं से घिरे हो, तो गहरी प्रार्थना से चमत्कार हो सकता है। प्रार्थना दो ही स्थिति में, यां इन दोनों स्थितियों के समन्वय में होती है। जब तुम खुद को कृतज्ञ महसूस करते हो, या बिल्कुल असहाय। कृत्ज्ञता ना होने पर
तुम दुख अनुभव करते हो। कृतार्थ भाव तुम्हें किसी भी असफलता के धक्के से बाहर ले आयेगा। एक बार तुम ये जान लेते हो कि तुम कृपा के पात्र हो, तुम्हारी शिकायतें, बड़बड़ाहट, असुरक्षित होने की भावना, सभी दूर हो जाती हैं।

सहज ही जीवन एक रंगमय उत्सव हो जाता है।


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