"तुम एक पूर्णता से दूसरी उच्चतर (higher) पूर्णता की ओर बढ़ते हो"

बंगलौर आश्रम, ०६ फरवरी २०१०

प्रश्न : गुरु जी, मैं अक्सर लोगों को आपको प्रणाम करते देखता हूँ| क्या यह सब करना ज़रूरी है?

श्री श्री रविशंकर :
नहीं। बाहरी दिखावे निरर्थक हैं| उनको बहुत अधिक महत्व मत दो| हम सब गहरे स्तर, दिल के स्तर से जुड़े हैं| इसी कारण हम मिले हैं और हम सब यहाँ हैं|

प्रश्न : कल आपने लीला के बारे में बताया था| इसे बौद्धिक स्तर पर तो समझा जा सकता है, पर इसे आतंरिक अनुभव कैसे बनाएँ?

श्री श्री रविशंकर :
तुम इसे अनुभव मत बनाओ| तुम्हें बस जागना है और देखना है कि जीवन एक खेल है| इसी क्षण, जब मैं बोल रहा हूँ, जागो| अब तक जो घटित हुआ, क्या वह सपने जैसा नहीं है? तुमने आज शाम भोजन किया, सुबह ध्यान किया, सुबह योग किया और पिछली रात सोने गए,और यदि तुम याद करो तो कुछ अच्छी घटनाएं हुईं, कुछ बुरी घटनाएं हुईं, तुम्हें लाभ हुआ, तुम्हें हानि हुई, पर ठीक इस क्षण यह सब गुज़र चुका है|

इस क्षण जागो और देखो कि आने वाले कल से अगले १० साल का समय सब सपने जैसा ही है| जब तुम इस पूर्ण सत्यता का अनुभव करते हो कि भूत या भविष्य में होने वाला सब कुछ एक खेल जैसा है,तो तुम्हें यह एक धारणा नहीं लगती। यह तुम्हारा अनुभव होता है| जो अभी हो रहा है वो भी एक सपना हो सकता है| इस बात का एहसास होते ही तुम राहत महसूस करते हो| किसी दिन की प्रतीक्षा मत करो जब तुम्हें यह अनुभव होगा कि यह एक खेल है| इसी क्षण जाग कर देखो।
हो सकता है कि शरीर छोड़ने के बाद किसी दिन तुम्हें यह महसूस हो| तब तुम यह महसूस करोगे कि यह तो तुम पहले भी कर सकते थे|

प्रश्न : विराग (dispassion) और विरक्ति(indifference) में क्या अंतर है?

श्री श्री रविशंकर :
विरक्ति में उदासीनता, अस्वीकृति और निराशा का भाव होता है, जबकि वैराग्य में आनंद और उत्साह होता है|

प्रश्न : क्या हम सब के जीवन का कोई उद्देश्य है? यदि केवल एक उद्देश्य है,तो वह क्या है?

श्री श्री रविशंकर :
तुम्हारे लिए अच्छा है कि तुम कागज़ और कलम लो, और सूची बनाओ कि जीवन का उद्देश्य क्या नहीं है| ऐसा करने से जीवन का उद्देश्य समझना आसान हो जाएगा।

प्रश्न : उपनिषद क्या है?

श्री श्री रविशंकर :
निकट बैठना और ध्यान से सुनना उपनिषद है| उपनिषद सर्वोच्च ज्ञान के वचनों का संग्रह है।

प्रश्न : ईश्वर क्या है?

श्री श्री रवि शंकर :
एक उपनिषद में ईश्वर का बहुत सुन्दर वर्णन है। एक बार एक लड़का अपने पिता के पास गया और पूछा - ईश्वर क्या है?पिता ने उत्तर दिया ‘भोजन ईश्वर है, क्योंकि भोजन से सबका पालन होता है।’ तो बालक गया और कई महिनों तक इसके बारे में सोचा, भोजन के बारे में सब कुछ समझा और अपने पिता के पास वापिस लौटकर फिर पूछा ‘ईश्वर क्या है?’
पिता ने कहा ‘प्राण ईश्वर है|’ लड़का गया, चिंतन किया, प्राण के बारे में सबकुछ समझा कि कैसे प्राण उर्जा शरीर के अंदर और बाहर आ-जा रही है, प्राण कितने प्रकार के होते हैं और प्राण से सम्बंधित सभी प्रयोगों को पढ़ा| वह पुनः अपने पिता के पास लौटा और पूछा ‘ईश्वर क्या है?’
पिता ने बच्चे का तेजस्वी चेहरा देखा और कहा ‘मन ब्रह्म है, मन ईश्वर है' | पहले की तरह लड़का चला गया और तब तक मनन किया जब तक कि उसने अंतिम परमानंद (bliss) को नहीं प्राप्त कर लिया|
बच्चे ने अपने पिता से कभी शिकायत नहीं की कि उसे बताया गया था कि ‘भोजन ईश्वर है',लेकिन यह परम सत्य नहीं है। वह
उत्तर को समझकर वापिस आया और प्रश्न को पुनः पूछा| यह शिक्षा की प्राचीन विधि रही - एक
कदम से अगले कदम पर लेजाने की।
पहले भोजन, फिर प्राण, फिर मन, फिर अंतरात्मा, फिर परम ब्रह्म-परमानंद|

परमानंद ही देवत्व है| तुम्हारा अस्तित्व आकाश की तरह सर्व व्यापक है| फिर पिता ने बच्चे से कहा ‘तुममें, मुझमें और अनंत आत्मा में कोई अंतर नहीं है| हम सब एक हैं| स्वयं, गुरु और शाश्वत ऊर्जा अलग-अलग नहीं हैं| सभी एक ही तत्त्व से बने हैं| यदि तुम उन वैज्ञानिकों से बात करो, जो string theory यां परमाणु भौतिकी (quantum physics) पढ़ते हैं, वे वही कहेंगे, जो उपनिषदों में कहा गया है| उपनिषदों में यह हज़ारों साल पहले कहा गया था ‘ईश्वर स्वर्ग में कहीं बैठा हुआ कोई व्यक्ति नहीं है, अपितु वह हर जगह मौजूद है| वह सर्वव्यापी (omnipresent) और सर्वशक्तिमान (omnipotent) है| वह है और उसकी शक्ति से तुम भी बने हो, प्रत्येक चीज़ बनी है|'


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